Pretika › Jinn & Spirits › रेत का क़ैदी
एपिसोड 29: साथ रहना
firoj saifi · Jinn & Spirits · 16 मिनट
नदी का हाथ पानी का बना था, और उसकी हर उँगली में सूरज की रोशनी इंद्रधनुष बनकर टूट रही थी।
वह मीरा की ओर नहीं झपटा। उसने उसे खींचा भी नहीं। वह बस हवा में ठहरा रहा, हथेली ऊपर की ओर, खुला, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को गोद में आने का न्योता दे। पर मीरा ने उसकी कलाई पर बँधी चाँदी की डोर को तनते देखा, और उसे महसूस हुआ कि उसके पैरों के नीचे नाव की तख़्ती हल्के से फिसल रही है, पानी की ओर।
सिर्फ़ मीरा नहीं। नाव के सब छह गायकों की कलाई पर बँधी डोरें एक साथ तन गई थीं। विक्रम की, हकीम की, कबीर की, मल्हार की, जमुना की। हर एक उसी विशाल आकृति की ओर खिंच रहा था, धीरे-धीरे, ज़बरदस्ती नहीं, पर एक ऐसे प्राचीन खिंचाव से जिसे रोकना किसी के बस में नहीं था।
"मैं यह नहीं चाहती," नदी ने कहा। उसकी आवाज़ में अब वह काँपती घबराहट नहीं थी, पर एक गहरी बेबसी थी। "मैं तुम सबको बाँधना नहीं चाहती। पर यह बंधन मेरा नहीं है। यह गुरु का है। उसने सात ताले बनाए थे और आख़िरी ताले की एक ही शर्त थी: जो नाम गाए, वह मेरे साथ रहे। मैंने तीन हज़ार साल उसे तोड़ने की कोशिश की। नहीं तोड़ पाई।"
"तो क्या होगा?" कबीर ने पूछा। उसकी साँस तेज़ थी, और वह नाव की रेलिंग को दोनों हाथों से पकड़े था, जैसे वह उसे रोक सकती हो।
"तुम सब मेरे साथ बहोगे। मेरे पानी में, मेरी लहरों में, मेरी हर साँस में, जब तक मैं बहती हूँ। तुम्हें किनारा नहीं दिखेगा, न घर, न सूरज। सिर्फ़ मैं।"
"नहीं," विक्रम ने कहा। उनकी आवाज़ में वह पुरानी पढ़ाने वाली धार लौट आई थी। "यह नहीं हो सकता।"
"मैं भी यही कहती हूँ, विक्रम सिंह। पर मैं बँधी हूँ।"
हकीम ने धीमे से कहा, "हम सब बँधे हैं।"
पर मीरा ने नदी के चेहरे की ओर देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जिसे उसने पहचाना। पीड़ा नहीं, माफ़ी माँगने की झिझक नहीं। वह एक माँ की नज़र थी जो अपने बच्चे को किसी ऐसे वादे में बाँधने जा रही हो जिसे वह निभाना नहीं चाहती।
"माँ," उसने कहा। "वह पन्नी की पंक्ति फिर से पढ़ दीजिए।"
"क्या?"
"मल्हार ने जो पढ़ा था। पूरी।"
मल्हार, जो पानी में नाव के पास खड़ा था, एक क्षण असमंजस में रहा। फिर उसने काँपते होंठों से, याद से, वह पंक्ति दोहराई जो उसकी अपनी लिखावट में थी:
“'नाम पूरा होते ही नदी अपने बिस्तर में लौटेगी। पर वह अकेली नहीं लौटेगी। जो उसके साथ गाएगा, वह उसके साथ रहेगा, उसकी हर बहती साँस में, जब तक वह बहती है। यही केवट का धर्म है।'”
“उसके साथ रहेगा, उसकी हर बहती साँस में,” मीरा ने धीरे-धीरे दोहराया। “जब तक वह बहती है। यह पंक्ति किसी क़ैद की बात नहीं करती। यह एक रिश्ते की बात करती है। नदी हमेशा बहती है, माँ, और जो उसके साथ रहता है, वह उसके किनारे पर रहता है, उसकी धार के पास, हर बहाव को देखता हुआ।”
"पर गुरु ने..."
"गुरु ने इसे ताला बनाया था, क्योंकि वह डरता था। मल्हार ने इसे पन्नी पर लिखा, क्योंकि वह जानता था कि यह सही बात है।" मीरा ने साँस ली। "आपने तीन हज़ार साल इसे क़ैद समझा, क्योंकि आप ख़ुद कैद थीं। पर आप आज़ाद हैं। अब आप किनारे वाली नदी हैं।"
सबसे पहले जमुना बोली, और उसकी बात एकदम सीधी और साफ़ थी।
"माँ, डोर ढीली कर दो ना।"
नदी की आँखें उसकी ओर मुड़ीं।
"भैया की नाव किनारे से बँधी होती थी," जमुना ने कहा। वह अपनी कलाई की चाँदी की डोर को दोनों हाथों से थामे हुए थी, और उसके नन्हे चेहरे पर बच्चे जैसी गंभीरता थी, जो अपनी बात सबसे ज़्यादा पक्के तौर पर कहता है। "नाव किनारे से बँधी रहती थी, पर आगे जाती थी। रस्सी खिंचती थी, पर टूटती नहीं थी। और रस्सी कभी नाव को डुबोती नहीं थी। जब नाव दूर जाती थी, रस्सी लंबी हो जाती थी। जब पास आती थी, ढीली हो जाती थी।" उसने मीरा की ओर देखा। "यह बंधन ऐसा ही है। यह खींचता नहीं है। यह थामता है।"
कक्ष की तरह, पूरी घाटी में सन्नाटा छा गया।
नदी चुपचाप जमुना की उँगलियों में उलझी चाँदी की डोर को देखती रही। फिर उसने अपनी विशाल, पारदर्शी हथेली को बहुत धीरे से हिलाया।
मीरा की कलाई पर बँधी डोर, जो तनकर नदी की ओर खिंच रही थी, एक क्षण में ढीली पड़ गई। वह अब हवा में तैर रही थी, लंबी, लहराती, किसी लचकदार रस्सी की तरह, जिसके दोनों छोर किसी को खींच नहीं रहे थे। और एक-एक करके बाक़ी पाँचों डोरें भी वैसी ही ढीली पड़ीं।
मीरा के पाँव नाव की तख़्ती पर सीधे खड़े हो गए।
"तो..." कबीर ने अविश्वास से पूछा। "हम जा सकते हैं?"
"तुम जा सकते हो," नदी ने कहा। "जहाँ चाहो। जब चाहो। पर यह डोर टूटेगी नहीं। जब तक मैं बहती हूँ और तुम जीते हो, यह तुम्हें मेरी ओर लौटने का रास्ता दिखाएगी। जहाँ भी पानी हो, मैं तुम्हारी आवाज़ सुनूँगी।"
"यानी हम आपके किनारे हैं।"
"तुम मेरे किनारे हो।"
मीरा ने अपनी कलाई की डोर को देखा, जो अब किसी हल्के चाँदी के कंगन की तरह उसकी त्वचा से लिपटी हुई थी, और उसके भीतर एक नन्ही सी लहर बहती दिख रही थी। वह मुस्कुराई, और उसकी आँखें भर आईं।
"पर दो हैं," नदी ने धीमे से कहा, "जिन्हें यह डोर बाँधती नहीं, खींचती है।"
सबने मल्हार और जमुना की ओर देखा।
वे दोनों नाव के पास खड़े थे, भाई-बहन, एक ही पानी में, एक ही रोशनी में, और उनकी डोरें, बाक़ी चारों से अलग, ढीली नहीं पड़ी थीं। वे तनी रहीं, पर इस बार दोनों उसे खींचने की जगह उसकी ओर बढ़ रहे थे, अपनी मर्ज़ी से, एक-एक क़दम।
"मैं केवट हूँ," मल्हार ने कहा। उसकी आवाज़ शांत थी। "मेरा काम नदी को उसके किनारे तक पहुँचाना है। और नदी का आख़िरी किनारा समुद्र है। मैं उसे वहाँ तक ले जाऊँगा।"
"तुम अकेले नहीं जाओगे," जमुना ने कहा। "मैं भी जाऊँगी।"
"चिड़िया..."
"भैया, मैंने तीन हज़ार साल इंतज़ार किया है। अब मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।" उसने उसकी कमीज़ का किनारा पकड़ लिया। "तुमने कहा था कि नाव चलेगी। चलनी चाहिए।"
मल्हार ने बहन को देखा, और फिर पूरी नाव को, और अपने नए दोस्तों के चेहरों को। उसके होंठ काँपे।
"तुम सबको छोड़कर जाना कठिन होगा।"
"यह छोड़ना नहीं है," विक्रम ने कहा। उसने पानी में उतरकर मल्हार का हाथ थामा। "यह बस आगे जाना है। और हम किनारे पर खड़े होंगे।"
मल्हार ने सिर हिलाया। फिर उसने अचानक पानी से अपना दाहिना हाथ बाहर निकाला, उसी हाथ में, जिसकी तर्जनी की जगह अब तक धुएँ की एक काली, लहराती उँगली थी।
वह उँगली धीरे-धीरे सुलझ रही थी।
पहले काला धुआँ भूरा हुआ, फिर पारदर्शी, फिर मांस के रंग में बदलने लगा। हड्डियाँ उभरीं, त्वचा चढ़ी, और एक पल में एक असली, साधारण, मछुआरे की तर्जनी उसके हाथ में खड़ी थी, घट्टेदार, रस्सी के निशान वाली, गर्म।
उसने हैरानी से उसे देखा।
और फिर उसकी नज़र नीचे पानी की सतह पर गई।
सुबह की रोशनी में उसके पैरों से निकलती एक परछाईं तैर रही थी। वह लंबी थी, सीधी थी, और पानी की सतह पर लहरों के साथ झिलमिला रही थी। वह उसके पैरों से जुड़ी थी।
"तुम्हारी परछाईं," नदी ने कहा। उसकी आवाज़ में तीन हज़ार साल का प्यार था। "मैंने इसे सँभालकर रखा था, मल्हार। इसी दिन के लिए।"
मल्हार ने हाथ उठाया। परछाईं का हाथ उठा। उसने क़दम बढ़ाया। परछाईं ने क़दम बढ़ाया।
वह बहुत देर तक कुछ नहीं बोला। फिर बहुत धीमे, काँपती हुई आवाज़ में उसने कहा, "तो अब मैं मर सकता हूँ।"
"हाँ।"
"किसी दिन।"
"किसी दिन, बहुत दिनों बाद, मेरे किनारे पर, जब तुम थक जाओगे।"
मल्हार हँस पड़ा। वह रुलाई और हँसी का एक ऐसा मिश्रण था जो सिर्फ़ उसे समझ आता था जो तीन हज़ार साल बाद पहली बार थकने का हक़ पाए। "यह अच्छी बात है, माँ।"
अब विदाई का वक़्त आया।
सबसे पहले हकीम रुस्तम ज़ैनब को गोद में लिए नाव के सामने खड़े हुए। उनकी दाढ़ी भीगी थी, और उनके कंधे झुके हुए थे। ज़ैनब ने गुड़िया को सीने से लगा रखा था और अपने अब्बा की आँखों में देख रही थी।
"अब्बा, मैं नाव में जाऊँगी?"
"हाँ, बेटी।"
"आप भी चलेंगे?"
हकीम ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। उनके होंठ हिले, बंद हुए, फिर हिले। "नहीं, मेरी चिड़िया," उन्होंने आख़िरकार कहा। "मुझे यहाँ रुकना होगा। कुछ काम बाक़ी हैं।"
"कौन से काम?"
"बहुत सारे लोग हैं जिन्हें मेरी दवा चाहिए।" उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की। "और एक सातवाँ पन्ना है जिसे मुझे दोबारा लिखना है।"
ज़ैनब ने सोचा। फिर उसने अपनी गुड़िया को उनके हाथ में रखा। "यह आपके पास रहेगी, अब्बा।"
"मैं इसे सँभालकर रखूँगा।"
"और जब आपको मेरी याद आए तो पानी के पास जाना। मैं सुन लूँगी।"
हकीम ने उसे सीने से कसकर लगा लिया। उनके कंधे हिल रहे थे, और वे बिना आवाज़ के रो रहे थे। चालीस साल का सारा बोझ उनकी बाँहों से बहकर पानी में घुल रहा था। ज़ैनब ने नन्हे हाथों से उनकी सफ़ेद दाढ़ी को थपथपाया।
"अब्बा, अब निगल सकती हूँ," उसने कहा, वही बात जो उसने मरते वक़्त कही थी। पर इस बार उसकी आँखों में कोई तड़प नहीं थी, बस एक बहुत हल्की, बहुत सुकून भरी मुस्कान। "आपने मुझे बहुत देर तक याद रखा। बस। अब बहुत है।"
हकीम ने उसे नाव में बिठा दिया, और जमुना ने उसका हाथ पकड़कर अपने बगल में बैठा लिया। दोनों नन्ही लड़कियाँ, एक छह की, एक तीन की, एक-दूसरे का हाथ थामे बैठीं, और जमुना ने ज़ैनब के कान में फुसफुसाकर कुछ कहा, जिस पर वह खिलखिलाकर हँस पड़ी।
हकीम ने गुड़िया को अपने कुर्ते के भीतर, सीने से सटाकर रख लिया, और पीछे हट गए।
भंवर सिंह नाव के पास आया। उसके हाथ में पोटली थी, जगत की रेत की, पतली, हल्की, लगभग ख़ाली। उसने बहुत देर तक उसे देखा।
"यह आख़िरी है," उसने मल्हार से कहा। "बाक़ी सब मैंने रास्ते में बाँट दी थी। कुछ विक्रम साहब के हाथ पर, कुछ कबीर के पाँव पर, कुछ मैडम के घेरे पर।" उसने पोटली खोली। भीतर मुट्ठी भर सुनहरी, गर्म रेत थी, जो सूरज की रोशनी में चमक रही थी। "जगत के बारे में मैंने तुझसे कभी पूछा नहीं। उसे पानी की तरफ़ ले चल।"
"पूछो," मल्हार ने कहा।
"वह दर्द में गया था?"
मल्हार ने सच कहा। "हाँ। पर बहुत कम। मैंने उसे वहाँ सुलाया था, जैसे बच्चे को लोरी सुनाकर सुलाते हैं। उसने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ तुम्हारा नाम लिया। एक बार।"
भंवर ने आँखें बंद कर लीं। उसके गाल पर एक आँसू लुढ़का। फिर उसने मुट्ठी भर रेत उठाई और बहुत धीमे, बहुत सँभालकर, पानी की सतह पर बिखेर दी।
रेत पानी में उतरी। सुनहरे कणों का एक पतला पर्दा सतह पर फैला, और नाव के पास पानी हल्का सा गर्म हो गया। फिर कुछ ऐसा हुआ जिसे सिर्फ़ भंवर ने देखा। नाव के अगले हिस्से पर, जमुना और ज़ैनब के पास, एक तीसरी आकृति उभरी। बीस साल का दुबला-पतला नौजवान, कुर्ता-पायजामा पहने, भीगे बालों वाला, जो उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रहा था, वही हँसमुख, खुली मुस्कान।
उसके हाथ में टोपी नहीं थी। वह उसे नहीं मसल रहा था।
"जगत," भंवर ने फुसफुसाया।
आकृति ने हाथ उठाकर हिलाया, जैसे दूर से कोई भाई को पुकारता है। फिर वह धुँधली होकर नाव की रोशनी में घुल गई।
भंवर ने बाक़ी रेत पानी में उँडेल दी और पोटली को सीने से लगाकर बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा। जब वह पीछे हटा, तो उसके चेहरे पर बीस साल बाद पहली बार एक पूरी, बिना बोझ वाली साँस थी।
विजय नाव के किनारे पर बैठा था, पैर पानी में लटकाए, और उसकी माँ का सफ़ेद बादल उसके कंधों पर लिपटा हुआ था।
"तुम नहीं जाओगे?" मीरा ने उसके पास बैठते हुए पूछा।
"मैं माँ के साथ जाऊँगा," विजय ने कहा। "पर नदी के साथ नहीं।" उसने ऊपर देखा। "आसमान में।"
"आसमान में?"
"माँ ने कहा है कि वह बरसेंगी। और मैं..." उसने कंधे उचकाए। "मैं भी बरसूँगा। जहाँ ज़रूरत हो, वहाँ। एक बादल की तरह।" उसके चेहरे पर एक अजीब सी शरारत उतरी, जो शायद तेरह साल का वह राजकुमार तब दिखाता था जब सब उसे गंभीर समझते थे। "यह रक्षक का काम है, दीदी। रेगिस्तान को पानी चाहिए। इस जगह पर हर साल पानी बरसेगा। और जब भी बरसेगा, तो पहली बूँद मेरी होगी।"
मीरा की आँखों में आँसू भर आए। "तुम बहुत बहादुर हो, विजय।"
"मैं बहुत थका हुआ हूँ।" उसने हँसकर कहा। "और अब सो जाने का वक़्त है। तीन सौ साल हो गए।"
"तुम्हें अब नींद आएगी?"
"माँ कहती हैं कि बादलों में बहुत आराम होता है।" उसने मीरा का हाथ पकड़ा और अपने गाल से लगा लिया। "दीदी, बाबा को कहना कि मैं उन्हें माफ़ करता हूँ। मैंने कहा था। पर किसी को बता देना कि मैंने कहा था।"
"बताऊँगी।"
"मेरी एक चीज़ और ले जाना।" उसने अपने गले से एक छोटी, पुरानी, सोने की ताबीज़ उतारी, जो उसकी राजसी पोशाक के भीतर छिपी थी। "यह बाबा की दी हुई थी। इसमें एक चिट्ठी है। मैं कभी खोल नहीं पाया।"
मीरा ने उसे हथेली में लिया। वह बहुत हल्की और बहुत गर्म थी।
विजय खड़ा हुआ। उसके पैर पानी की सतह से ऊपर उठे। उसकी देह धीरे-धीरे, किसी सुबह की धुंध की तरह, पारदर्शी होती गई। रानी का बादल उसके चारों ओर लिपट गया, और दोनों एक साथ ऊपर की ओर उठने लगे, धीरे, बहुत धीरे, जैसे कोई माँ अपने बेटे को बहुत लंबे दिन के बाद गोद में उठाकर घर ले जा रही हो।
"अम्मा..." विजय की आवाज़ ऊपर से आई, बहुत दूर, बहुत नरम।
"हाँ, लाल।"
"अब ठंड नहीं लग रही।"
एक नन्हा, सफ़ेद, गर्म बादल आसमान में तैरता गया, और उसके पीछे अनगिनत छोटे बादलों की एक लंबी, चमकदार क़तार, जो नदी के हर प्रेत की आख़िरी विदाई थी।
अब सिर्फ़ शरर बाक़ी था।
वह मीरा की हथेली पर बैठा था, एक नन्ही सुनहरी लौ, पर उसका आकार अब भी बहुत छोटा था। उसकी रोशनी सुबह की धूप से टकराकर और भी धुँधली लग रही थी।
"मैं कहाँ जाऊँगा?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक बच्चे जैसी जिज्ञासा। "मैं तो चिंगारी हूँ। आग बुझ गई तो..."
"तुम बुझे नहीं हो," मीरा ने कहा। "तुम सूरज की पहली किरण हो। मैंने कहा था न।"
"पर किरण तो एक पल की होती है।"
"रोज़ आती है।"
शरर चुप रहा। फिर उसकी लौ धीरे-धीरे ऊपर उठी, मीरा की हथेली से, और नदी के विशाल, पारदर्शी, पानी के चेहरे की ओर बढ़ी। नदी ने अपनी हथेली बढ़ाई, और चिंगारी उसकी उँगलियों के बीच जाकर बैठ गई।
"मेरा बच्चा," नदी ने कहा। उसकी आवाज़ में अनगिनत सुबहें थीं। "मेरा पहला आँसू। मैंने तुझे बहुत अकेला रखा।"
"माँ..."
"पर अब मैं तुझे अकेला नहीं रखूँगी। तू मेरे साथ बहेगा। हर सुबह, जब सूरज की पहली किरण मेरी सतह को छुएगी, तब वह तू होगा। मेरी लहरों के ऊपर, चमकता हुआ, नाचता हुआ। हर लहर पर, हर बूँद में।"
शरर की नन्ही सुनहरी लौ काँपी, फिर धीरे-धीरे फैली, और नदी की हथेली से निकलकर पानी की सतह पर बिखर गई, टूटकर हज़ारों नन्ही चमकती बूँदों में, जो पूरी झील पर चाँदी-सोने के सितारों की तरह तैर गईं। उसकी आख़िरी आवाज़, बहुत हल्की, बहुत ख़ुश, पूरी नदी पर फैल गई।
"चमकना अच्छा लगता है।"
मीरा की आँखों में आँसू और हँसी एक साथ आ गए।
मल्हार ने पतवार थामी।
पानी की सतह पर नाव अब बिल्कुल हल्की, बिल्कुल जीवित थी। जमुना और ज़ैनब अगले हिस्से पर बैठी थीं, एक-दूसरे से सटकर। नदी की विशाल आकृति धीरे-धीरे पानी में समाती गई, और उसकी जगह पर अब एक चौड़ी, चमकती, बहती हुई धारा थी, जो घेरे की सबसे बड़ी नाली से पूरब की ओर निकल रही थी।
"विक्रम," मल्हार ने कहा।
"हाँ।"
"मेरी चाय कब पिलाओगे?"
विक्रम हँसे, और वह हँसी बाईस साल की सबसे सच्ची, सबसे हल्की हँसी थी। "अगली बारिश में, भाई। मैं यहीं आऊँगा। चाय की पोटली लाकर।"
"चीनी कम।"
"जानता हूँ।"
मल्हार ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। फिर उसने मीरा की ओर देखा।
"मीरा।"
"हाँ।"
"तुम्हारी माँ का नाम जमुना था।"
"हाँ।"
"उसे बताना कि उसके भाई ने उसकी बेटी को देखा था।" उसकी आँखों में कुछ चमका। "और कहना कि उसकी बेटी ने बहुत अच्छा गाया।"
मीरा ने सिर हिलाया, कुछ कह नहीं पाई।
मल्हार ने पतवार को पानी में डाला। नाव धीरे-धीरे आगे सरकी, पानी की चमकती धारा पर। उसके पीछे नदी बह रही थी, और उसके आगे सूरज था, पूरा, सुनहरा, ऊपर उठता हुआ। और जैसे ही नाव पहले मोड़ पर पहुँची, मीरा ने देखा कि मल्हार की परछाईं पानी की सतह पर उसके साथ-साथ चल रही है, लंबी, साफ़, उसके हर क़दम के साथ।
वह मुड़ा नहीं। उसने हाथ उठाया और एक बार हिला दिया।
जमुना ने ज़ोर से पीछे मुड़कर हाथ हिलाया। "दीदी! कबीर भैया! फिर आना! नाव में जगह बहुत है!"
और फिर नाव मोड़ के पीछे चली गई।
पीछे घेरे में पानी तेज़ी से सात दिशाओं में उतर रहा था, पर वह बाढ़ नहीं थी। वह एक विशाल, शांत साँस की तरह थी, जो अब अपने बिस्तरों में लौट रही थी। रेत के नीचे की पुरानी नालियाँ भर रही थीं, और पानी की सात पतली, चमकती लकीरें रेगिस्तान पर खिंच रही थीं, किसी सोई हुई हथेली की रेखाओं की तरह जो जाग रही हों।
आसमान में बादलों का एक लंबा झुंड पूरब से पश्चिम की ओर जा रहा था, जिसके सबसे अगले हिस्से में एक छोटा, गोल, गर्म बादल था।
और फिर, सूनगढ़ के ठीक ऊपर, जहाँ पाँच सौ साल से कोई बादल नहीं ठहरा था, पहली बूँद गिरी।
मीरा ने हाथ फैला दिए। बूँद उसकी हथेली पर गिरी, और वह गर्म थी। फिर दूसरी, तीसरी। फिर पूरी बारिश, धीमी, कोमल, रेगिस्तान की प्यासी ज़मीन पर उतरती हुई। रेत ने उसे सोख लिया, और जहाँ-जहाँ बूँदें गिरीं, वहाँ से सोंधी, गीली, जीवित मिट्टी की महक उठी।
कबीर आसमान की ओर मुँह उठाए खड़ा था, आँखें बंद, चेहरे पर बारिश की धार। विक्रम ने बच्चों को अपनी बाँहों में समेट लिया। हकीम ने गुड़िया सीने से लगाए पानी में घुटने टेक दिए और आँखें बंद करके कोई दुआ पढ़ने लगे, पर उनके होंठों पर आँसुओं के साथ मुस्कान थी। भंवर ने ख़ाली पोटली हवा में उछाल दी, और वह बारिश में तैरती हुई दूर चली गई।
और सूनगढ़ की टूटी हुई प्राचीर पर, पाँच सौ साल में पहली बार, एक नन्ही सी चिड़िया आकर बैठी।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 29 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3032
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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