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एपिसोड 30: किनारा
firoj saifi · Jinn & Spirits · 18 मिनट
बारिश तीन दिन चली।
यह वह तेज़, चीख़ती, बिजली गिराने वाली बारिश नहीं थी जो रेगिस्तान में कभी-कभार आकर सब कुछ उजाड़ देती है। यह धीमी थी, नरम, लगातार, जैसे कोई माँ किसी थके बच्चे के बालों में उँगलियाँ फेर रही हो। रेत ने उसे सोख लिया, और सोखते-सोखते उसकी ऊपरी परत गहरे भूरे रंग की हो गई। दूसरे दिन के अंत तक, जहाँ-जहाँ पानी की धाराएँ गुज़री थीं, वहाँ हरी, बारीक, मुलायम घास की पतली लकीरें उभर आई थीं।
पाँचों लोग किले की टूटी हुई प्राचीर के नीचे, एक सूखे कोने में, इन तीन दिनों में लगभग चुप रहे।
यह थकान की चुप्पी नहीं थी। यह उस चुप्पी जैसी थी जो किसी बहुत लंबी बीमारी के बाद आती है, जब बुख़ार उतर चुका हो और आप पहली बार बिस्तर पर बैठकर खिड़की से बाहर देखते हैं और पता चलता है कि दुनिया वैसी की वैसी है, पर आप बदल चुके हैं।
कबीर ने पहली बार जी भरकर खाना खाया, भंवर की बची हुई रोटियाँ और सूखे चने, जो बारिश में भीगकर नरम पड़ गए थे। विक्रम ने आसमान की ओर पीठ करके देर तक सोने की कोशिश की, और हर बार कुछ घंटों बाद चौंककर उठ बैठे, यह देखने के लिए कि बच्चे अब भी वहीं हैं। हकीम ने अपनी पोटली की सारी चीज़ें धूप में सुखाने के लिए फैला दीं, काली माला, नमक की थैली, चाँदी की कीलें, और उन सबके बीच गुड़िया को सबसे ऊपर रखा, ताकि वह भी सूख जाए।
मीरा सबसे अलग बैठी थी, सात क़ब्रों वाले आँगन में।
सातों क़ब्रें वैसी ही थीं। छह पर नाम खुदे थे, और सातवीं पर वही ख़ाली, चिकना पत्थर। बस इतना बदला था कि बारिश के बाद हर चबूतरे के किनारे घास के नन्हे कोंपल निकल आए थे, और छहों दीये, जो पहले बुझे हुए थे, पानी से भर गए थे और उनमें आसमान का नीला रंग झलक रहा था।
मीरा ने तहख़ाने से लौटते वक़्त हकीम की सलाह पर एक काम किया था। सातवीं क़ब्र के चबूतरे के भीतर की उस छोटी सीढ़ियों वाली कोठरी में, जहाँ जगत की रेत मिली थी, उसने राजा सूरजमल की डायरी रखी थी, और उसके ऊपर विजय की सोने की ताबीज़। उसने ताबीज़ खोली नहीं थी। उसे लगा कि जो चिट्ठी तीन सौ साल से एक बच्चे के गले में बंद है, उसे खोलने का हक़ उसका नहीं।
पर आज सुबह, जब वह सातवीं क़ब्र के सामने खड़ी थी, तो हकीम साहब उसके पास आकर बैठे।
"मैंने कुछ सोचा है, बेटी।"
"क्या?"
"सातवाँ आमिल।" उन्होंने ख़ाली पत्थर की ओर इशारा किया। "मौलाना ख़लील। वह उस रात भागा नहीं था। उसे मारा गया था। और उसके बाद तीन हज़ार साल किसी ने उसका नाम पत्थर पर नहीं लिखा। जिसने उसे मारा, उसी ने उसकी जगह ले ली, और आज वह आदमी माफ़ी माँग चुका है। पर माफ़ी माँगना किसी की क़ब्र पर नाम लिखना नहीं होता।"
मीरा ने सिर हिलाया। "हम उसे लिखेंगे।"
"मैं लिखूँगा," हकीम ने कहा। उन्होंने अपनी पोटली से एक छोटी, पुरानी छेनी निकाली। "यह मेरे उस्ताद की थी। वे मज़ारों पर नाम खोदा करते थे, जब कोई पीर चुपचाप चला जाता था और किसी को उसकी कोई ख़बर नहीं रहती थी।"
उन्होंने पत्थर के सामने घुटने टेके और बहुत धीरे, बहुत सधे हाथों से अरबी में नाम खोदना शुरू किया। 'मौलाना ख़लील, जो द्वार पर रुका।' छेनी की ठकठक आँगन में गूँजती रही, और बीच-बीच में उनके होंठ धीमी दुआ बुदबुदाते। मीरा ख़ामोशी से देखती रही। जब आख़िरी अक्षर पूरा हुआ, तो ठीक उसी पल पत्थर पर एक पतली, ताज़ी, पहली बूँद गिरी, ऊपर से, किसी बादल से।
हकीम ने सिर उठाया। आसमान में एक छोटा, हल्का, सफ़ेद बादल तैर रहा था।
"बुरा नहीं लगा उसे," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।
चौथे दिन सुबह, जब आसमान पूरी तरह साफ़ हो चुका था और धूप तेज़ थी, पूरब की ओर से ऊँटों की घंटियों की आवाज़ आई।
भंवर सबसे पहले उठा। उसने हाथ की ओट से क्षितिज को देखा और उसकी भौंहें सिकुड़ीं। "लोग हैं," उसने कहा। "गाँव वाले।"
वे सब बाहर आए। रेत की ढलान पर, चमकते हुए नए पानी के किनारे-किनारे, दस-बारह लोग ऊँटों पर चले आ रहे थे। उनके आगे एक बूढ़ा था, सफ़ेद पगड़ी, लंबी मूँछें, और आँखों में वह चौकस, भरी हुई गंभीरता जो रेगिस्तान के बुज़ुर्गों में होती है। उसके हाथ में एक पुरानी लाठी थी, और वह सीधा भंवर सिंह की ओर देख रहा था।
"भंवर?" उसने कहा। उसकी आवाज़ ऊँची थी, पर काँप रही थी। "भंवर सिंह? तू ज़िंदा है?"
"काका!" भंवर दौड़कर आगे गया। "रेतवाला के सरपंच जी!"
"तीन दिन पहले आधी रात को," बूढ़े ने ऊँट से उतरते हुए कहा, "हमारे गाँव के पूरब के सारे सूखे कुओं में एक साथ पानी भर आया। एक साथ! सात गाँवों में। और बारिश हुई, तीन दिन। हमने सोचा कि भगवान का कोई चमत्कार है, और फिर सुबह-सुबह किसी ने कहा कि सूनगढ़ की तरफ़ से एक नदी बहती आ रही है।" वह रुका, और उसकी आँखें भर आईं। "हम डरते-डरते चले आए। हमारे बाप-दादा कहते थे कि सूनगढ़ के नाम पर कभी पानी नहीं गिरेगा। और आज..."
वह बात पूरी नहीं कर पाया। उसने आगे बढ़कर भंवर को सीने से लगा लिया। "तू छह दिन से ग़ायब था। हमने सोचा कि..."
"मैं ठीक हूँ, काका।" भंवर की आँखों में आँसू थे। "मैडम और साहब भी।"
सरपंच ने मीरा, विक्रम, कबीर और हकीम की ओर देखा। बहुत देर तक उसकी नज़र विक्रम पर टिकी रही, जैसे उसे कोई पुरानी, धुँधली याद आ रही हो। "तुम... तुम तो वह मास्टर साहब हो न? बाईस साल पहले के? जिन्हें हमने ढूँढा था?"
विक्रम ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। "देर से लौटा, सरपंच जी।"
"भगवान का चमत्कार है," बूढ़े ने बार-बार कहा। "भगवान का चमत्कार।"
"चमत्कार नहीं," मीरा ने धीमे से कहा। पर उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी। "एक नदी लौटी है।"
वे रेतवाला गाँव पहुँचे तो वहाँ का हर घर पानी से तर था।
पुराने कुएँ लबालब थे, छतों से बारिश की बूँदें अब भी टपक रही थीं, और बच्चे गली में नंगे पैर पानी में छपछप दौड़ रहे थे, जो पहली बार ज़िंदगी में इतना पानी देख रहे थे। औरतें घड़े लिए कुओं के चारों ओर खड़ी थीं, पर पानी भरने से ज़्यादा उसे छूने, उसकी ठंडक महसूस करने में लगी थीं।
गाँव के चौपाल पर पहुँचकर उन्होंने सबसे पहली बात यह सुनी, जो सरपंच ने खड़े-खड़े सबसे कही थी।
"इस नदी का एक नाम तो होना चाहिए।"
"यह नदी का नाम कोई नहीं जानता," हकीम ने धीमे से कहा।
"हमें जानने की ज़रूरत नहीं," सरपंच ने कहा। "हम अपनी भाषा में नाम रखेंगे। मेरे बाप के बाप कहते थे कि हमारे गाँव में हर घर की एक बेटी का नाम जमुना होता है। हमने कभी पूछा नहीं क्यों। शायद इसी दिन के लिए।" उसने पास खड़ी एक छोटी बच्ची की ओर इशारा किया, जिसकी चोटियों में लाल रिबन बँधे थे। "यह मेरी पोती है। जमुना। हम इस नदी को जमुना माई कहेंगे।"
मीरा की साँस रुक गई। उसे लगा कि दूर कहीं, किसी पानी की सतह पर, एक छोटी सी, तुतलाती आवाज़ हँस रही है।
कबीर ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
विक्रम, मीरा और कबीर जयपुर लौटे तो वहाँ उनकी माँ की क़ब्र पर घास उग आई थी।
यह वही क़ब्र थी जिसे मीरा ने बारह साल पहले माँ के निधन के बाद पहली बार देखा था, और जिसे उसने उसके बाद हर साल जाकर साफ़ किया था। विक्रम पहली बार उसके सामने खड़े हुए। बहुत देर तक वे कुछ नहीं बोले, बस सीधे खड़े रहे, हैट हाथ में लिए, और बारिश की पतली बूँदें उनके सफ़ेद होते बालों पर गिरती रहीं।
"जमुना," उन्होंने आख़िरकार कहा। "मैं देर से आया।"
मीरा और कबीर पीछे खड़े थे। विक्रम ने क़ब्र पर घुटने टेके और अपनी हथेली घास पर रख दी।
"मैंने तुमसे कहा था कि मैं जल्दी आऊँगा। तुमने कहा था कि मैं हमेशा देर से आता हूँ।" उनकी आवाज़ टूट गई। "तुम सही थीं।"
मीरा ने अपने गले से चाँदी की ज़ंजीर उतारी, जिस पर नाव वाला लॉकेट लटक रहा था, और धीरे से उसे माँ की क़ब्र पर रख दिया। लॉकेट खुला था, भीतर की पन्नी ग़ायब थी, पर उसके भीतर की नन्ही नाव पर बारिश की एक बूँद टिकी हुई थी।
"माँ," उसने कहा। "आपके भाई ने बताया कि मैंने अच्छा गाया।"
हवा का एक हल्का झोंका क़ब्र पर से गुज़रा, और घास सरसराई। मीरा ने साफ़ सुना कि वह घास एक पुरानी धुन गुनगुना रही है। हूँ-हूँ-हूँ... हूँ-हूँ...
कबीर ने भाई-बहन की तरह, पिता के कंधे पर हाथ रख दिया, और तीनों बहुत देर तक वहीं खड़े रहे।
एक साल बीत गया।
मीरा ने इस बीच यूनिवर्सिटी में अपनी रिपोर्ट जमा की: 'सूनगढ़ का पुरा-नदी तंत्र: एक पुनर्खोज'। भू-वैज्ञानिकों ने उपग्रह की तस्वीरों में उन सात नई धाराओं के पुराने बिस्तर ढूँढे, जो ठीक वहीं थीं जहाँ मीरा ने नक़्शे पर बताया था। एक सरकारी टीम ने ग़ौर से देखा कि रेतवाला के आसपास के सात गाँवों में पानी का स्तर पिछले दस साल के रिकॉर्ड से कई गुना ऊँचा है, और एक अख़बार ने सुर्ख़ी लगाई: 'थार में लौटी हज़ारों साल पुरानी नदी, वैज्ञानिक हैरान'। किसी ने उसमें यह नहीं लिखा कि पूरब का एक बूढ़ा सरपंच उसे 'जमुना माई' कहकर पुकारता है, और हर पूर्णिमा पर उसके किनारे दीये जलाता है।
विक्रम फिर से यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे, पर अब उनकी कक्षा में सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल यह था कि 'सर, क्या आप सच में बाईस साल लापता रहे थे?', और वे हर बार मुस्कुराकर कहते थे, "मैं सो रहा था, बेटा। मेरी बेटी ने मुझे जगाया।"
हकीम रुस्तम ने जैसलमेर की पुरानी दुकान बंद कर दी और रेतवाला गाँव के पास, नदी के किनारे, एक छोटा सा दवाख़ाना खोल लिया। उसके बाहर एक पुरानी तख़्ती टँगी थी, जिस पर उर्दू और हिंदी दोनों में लिखा था: 'यहाँ हर प्यासे को पानी मिलता है।' हर शाम वे दवाख़ाने के बाहर बैठकर नदी की ओर देखते, और पास में रखी एक पुरानी कपड़े की गुड़िया हवा में हल्के-हल्के हिलती रहती।
भंवर सिंह गाँव का पहला नदी-रखवाला बन गया। जब भी किसी बच्चे को नदी के पास जाते डर लगता, वह उसके साथ चलता, किनारे पर बैठकर उसे पानी की भाषा सिखाता। सुबह-सुबह, जब पहली किरण नदी की सतह पर उतरती, तो वह एक पल रुककर हाथ जोड़ता और बहुत धीमे बुदबुदाता, "जगत, देख रहा है न?"
और कबीर ने तैरना सीख लिया। रोज़ सुबह, नदी के किनारे, बिना किसी डर के, घंटों तक।
पहली बारिश की रात, ठीक एक साल बाद, वे सब फिर सूनगढ़ गए।
अब वहाँ जीप की ज़रूरत नहीं थी। एक कच्ची सड़क बन चुकी थी, जो रेतवाला से सीधी किले तक जाती थी। किले की प्राचीर के आसपास की घास हरी और घनी हो चुकी थी, और घेरे के भीतर का पूरा कटोरा एक चौड़ी, शांत, नीली झील बन गया था, जिसके किनारों से सात पतली धाराएँ सात दिशाओं में निकलकर रेगिस्तान को चीरती हुई चली जाती थीं। बीच में, उत्तर के कुएँ पर, एक छोटा सा पुल बन गया था।
आसमान में बादल थे, और हवा में बारिश की महक।
विक्रम के हाथ में चाय की एक पुरानी, पीतल की केतली थी, और उसके साथ मिट्टी के पाँच कुल्हड़। हकीम के कंधे पर उनकी पोटली लटक रही थी, और भंवर ने अपनी रेत की ख़ाली पोटली को हमेशा की तरह सीने से लगाया हुआ था। कबीर के गले में दो कैमरे लटक रहे थे, और मीरा के हाथ में पुरानी नोटबुक थी।
वे नदी के किनारे बैठ गए। विक्रम ने स्टोव जलाया, केतली चढ़ाई, और चाय की पत्ती डाली। भाप ऊपर उठने लगी।
"चीनी कम," उन्होंने बुदबुदाकर कहा।
सूरज डूब चुका था, और उत्तर की ओर से, नदी की चौड़ी धारा के ऊपर, एक लंबी, पतली, काली आकृति तैरती दिखाई दी।
नाव।
कबीर ने सबसे पहले उसे देखा। उसने कैमरा उठाया, और उसके लेंस में नाव साफ़ दिखाई दी, पर उसका चेहरा सुन्न पड़ गया। "दी," उसने कहा। "मेरे कैमरे में तीन बच्चे हैं।"
"क्या?"
"नाव में। एक आदमी पतवार चला रहा है, और तीन बच्चे। दो लड़कियाँ और एक..." उसने कैमरा नीचे किया। "पर आँखों से सिर्फ़ दो लड़कियाँ दिखती हैं।"
भंवर की साँस थम गई। वह उठकर खड़ा हो गया।
नाव किनारे आई, और उसका लंबा काला बदन पानी में रुक गया। उसके पतवार पर एक अधेड़ आदमी खड़ा था, मछुआरे की पुरानी कमीज़ पहने, सिर पर एक पुराना अंगोछा बाँधे, और उसकी दाढ़ी में पहली बार सफ़ेद बाल दिखाई दे रहे थे।
उसकी परछाईं पानी में उसके साथ-साथ तैर रही थी, गहरी और साफ़।
"चाय तैयार है?" मल्हार ने पूछा।
विक्रम ने मुस्कुराकर उसे एक कुल्हड़ पकड़ाया, गर्म, भाप उठाता हुआ। मल्हार ने उसे दोनों हाथों से थामा, आँखें बंद कीं, और पहला घूँट लिया। उसकी भौंहें ऊपर उठीं।
"चीनी कम है," उसने कहा।
"जैसा तुम चाहते थे।"
"तीन हज़ार साल में पहली बार ऐसी चाय पी है।" उसकी आँखों में आँसू थे, पर वह हँस रहा था। "दुनिया में चाय जैसी चीज़ भी होती है।"
जमुना और ज़ैनब नाव से कूदकर किनारे की ओर दौड़ीं। ज़ैनब सीधी हकीम की बाँहों में चढ़ गई, और हकीम ने उसे ऊपर उठाकर घुमाया, उसकी हँसी पूरे किनारे पर गूँज रही थी। जमुना मीरा के पास आई, उसका हाथ पकड़ा और बोली, "दीदी, देखो! हम समुद्र तक गए थे!"
"कैसा था?" मीरा ने झुककर पूछा।
"बहुत बड़ा। इतना बड़ा कि माँ भी चुप हो गई थीं।" जमुना ने आँखें फैलाईं। "पर उन्होंने कहा कि यह बहुत अच्छा लगा। उन्होंने कहा कि पहली बार सब कुछ मिल गया।"
भंवर नाव के पास खड़ा था, और उसके हाथ काँप रहे थे। मल्हार ने कुल्हड़ नीचे रखा, नाव के अगले हिस्से की ओर देखा, और फिर भंवर की ओर।
"वह यहीं है," उसने धीमे से कहा। "उसे पानी बहुत पसंद है। वह हर रोज़ नाव पर चढ़कर लहरों से खेलता है।"
भंवर ने आँखें बंद कर लीं। उसके गाल पर आँसू लुढ़के, पर उसके होंठों पर एक सच्ची, खुली, पंद्रह साल बाद की मुस्कान थी।
रात गहरी हुई। चाय की दूसरी केतली ख़त्म हो चुकी थी, और सब किनारे पर घेरा बनाकर बैठे थे। नदी के पानी में चाँद की रोशनी फैल रही थी, और उसके साथ हल्की बूँदा-बाँदी शुरू हो गई थी।
मल्हार ने कमीज़ की जेब में हाथ डाला और एक छोटा, मुड़ा हुआ, पुराना, पीला पड़ा हुआ कपड़े का टुकड़ा निकाला।
"हकीम साहब," उसने कहा। "यह मेरे पास बहुत समय से था। इसे आपको देना है।"
हकीम ने उसे लिया। वह एक चमड़े का पन्ना था, पुराना, भुरभुरा, किनारों पर जला हुआ, और उस पर वही पुरानी, हरी स्याही की लिखावट थी जो उनके उस्ताद के बही-खाते में थी।
उनके हाथ काँपने लगे।
"यह... यह तो..."
"फटा हुआ पन्ना," मल्हार ने कहा। "सातवाँ। मैंने इसे फाड़ा था।"
हकीम ने उसकी ओर देखा। उनके चेहरे पर कोई ग़ुस्सा नहीं था, बस एक गहरा, उलझा हुआ आश्चर्य। "क्यों?"
"क्योंकि मैं डरता था।" मल्हार ने नज़र नदी पर टिका ली। "सातवाँ सिलसिला केवट घराने का था। गुरु ने उसे चुना था, क्योंकि वह जानता था कि नदी की देखभाल कोई केवट ही कर सकता है। मेरे गाँव के लोग, मेरी बहन की संतान, मेरे ही भतीजे-भतीजियाँ। और मैं जानता था कि अगर वे रखवाले बने तो वे भी इस बोझ में बँध जाएँगे। मैं उन्हें उस बोझ से बचाना चाहता था।" उसने गहरी साँस ली। "इसलिए मैंने पन्ना फाड़ दिया, ताकि कोई उन्हें ढूँढे नहीं, कोई उन्हें याद न दिलाए। मैंने सोचा कि यह दया है।"
हकीम ने पन्ना खोला।
पन्ने पर सात खड़ी रेखाएँ खिंची थीं, और हर रेखा के साथ एक नाम, एक के नीचे एक, पीढ़ी-दर-पीढ़ी। सबसे ऊपर एक नाम था, जिसे सब पहचान गए, 'जमुना', और उसके नीचे और नाम, बहुत धुँधले, बहुत पुराने, और सबसे नीचे के नाम की स्याही इतनी ताज़ा थी कि जैसे अभी लिखी गई हो।
मीरा की साँस रुक गई। उसने झुककर देखा।
'जमुना। उसकी पुत्री: मीरा। उसके पुत्र: कबीर।'
पन्ने के नीचे एक पतली, काँपती, हरी स्याही की पंक्ति थी, जो उनके सामने ही, जैसे किसी अदृश्य हाथ से, लिखी जा रही थी।
'सातवाँ सिलसिला। जो पानी के साथ रहे। जो किनारा बने।'
हकीम की आँखों से आँसू बह निकले।
"मैंने सोचा था कि यह मर चुका है," उन्होंने फुसफुसाया। "मेरी सबसे बड़ी भूल।"
"भूल नहीं थी," मल्हार ने कहा। "मेरी थी। और अब मैं इसे लौटा रहा हूँ। तुम्हारी बहन की बेटी का ख़ून मेरे ही घाट का है, मीरा। तुम सबसे आख़िरी रखवाली हो, और सबसे पहली।"
मीरा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर उसी क्षण उसने अपने दाहिने हाथ की तर्जनी के नीचे कुछ महसूस किया। एक हल्की, ठंडी चुभन।
उसने हाथ उठाकर देखा। उसकी तर्जनी के जोड़ के ठीक नीचे, त्वचा के भीतर, पानी की एक नन्ही बूँद का नीला गोदना उभर रहा था। कबीर ने अपने हाथ को देखा, और उसकी साँस भी रुक गई। उसके दाहिने हाथ की तर्जनी पर वही निशान चमक रहा था, ठीक वैसा, जैसा हकीम के हाथ पर था।
"यह..." कबीर ने घबराकर कहा। "क्या यह फिर वही..."
"यह बंधन नहीं है," मीरा ने उसकी बात काटी। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर उसमें कोई डर नहीं था। उसने अपनी कलाई की चाँदी की डोर को देखा, जो उसकी त्वचा पर हल्के-हल्के चमक रही थी। "यह वह रस्सी है जो नाव को किनारे से बाँधती है। हम किनारे हैं, कबीर। हमेशा थे।"
हकीम ने दोनों के हाथ अपने हाथों में थाम लिए, और बहुत धीमे से कहा, "बंद के रखवाले।"
विक्रम ने पास आकर दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखा। "तुम्हारी माँ को यह सब पता था," उन्होंने कहा। "उसने तुम दोनों को पानी से दूर रखा, क्योंकि वह जानती थी कि जिस दिन पानी तुम्हें बुलाएगा, तुम सुनोगे। वह इसे रोकना नहीं चाहती थी। वह बस चाहती थी कि जब वह दिन आए, तो तुम पूरी तरह तैयार रहो।"
मीरा की आँखें नम थीं। उसने आसमान की ओर देखा, जहाँ बादल छँट रहे थे और तारे निकल रहे थे।
"माँ," उसने धीमे से कहा। "मैं तैयार थी।"
उस रात, देर से, मीरा नदी के किनारे अकेली बैठी थी।
बाक़ी सब सो चुके थे। विक्रम और मल्हार देर तक चाय के बाद की बातें करते रहे थे, तीन हज़ार साल पुराने और बाईस साल पुराने क़िस्से, एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर हँसते-रोते हुए। हकीम बहुत पहले ही ज़ैनब को सीने से लगाकर, पुरानी चटाई पर लेट गए थे, और उनके चेहरे पर बहुत सालों बाद की शांति थी। भंवर नाव के पास अकेले बैठकर पानी में पैर डाले हुए था, और बार-बार नाव के अगले हिस्से की ओर देखकर मुस्कुरा देता था। कबीर कैमरा हाथ में लिए नदी की लहरों का फ़ोटो ले रहा था, और हर कुछ पल बाद चौंककर रुक जाता था।
मीरा ने पानी की सतह में अपना चेहरा देखा।
उसे एक पल को वह पहली रात याद आई, उत्तर के कुएँ पर, जब कबीर की बोतल में उसका अपना चेहरा मुस्कुरा रहा था, जबकि कबीर गंभीर था। वह डर अब बहुत दूर लग रहा था, किसी पिछली ज़िंदगी की बात की तरह।
उसने पानी में अपनी शक्ल देखी। थकी हुई, पर शांत। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे, माथे पर पसीने की एक पतली लकीर। और जब उसने हल्के से मुस्कुराकर सिर हिलाया, तो उसकी परछाईं ने ठीक उसी पल, एक सेकंड भी देर किए बिना, मुस्कुराकर सिर हिलाया।
वह हँस पड़ी।
कबीर उसके पास आया, कैमरा नीचे किए हुए। उसने भी पानी में झाँका। उसने सिर हिलाया, और पानी में उसकी परछाईं ने भी, ठीक उसी पल, सिर हिलाया। उसने हाथ उठाया, परछाईं का हाथ उठा। दोनों भाई-बहन एक-दूसरे को देखकर हँस दिए।
"दी, कभी ऐसा लगता है कि सब कुछ सपना था?"
"नहीं," मीरा ने कहा। उसने अपनी हथेली पानी में डुबोई। पानी गर्म था, और उसकी उँगलियों के बीच से बहता हुआ नीचे जा रहा था। "यह सब यहीं है, कबीर।"
उसने आँखें बंद कर लीं, और बहुत देर तक उस पानी की आवाज़ सुनती रही। उसमें लहरों की सरसराहट थी, दूर के किसी पक्षी की पुकार, और उसके भी नीचे, बहुत धीमे, एक पुरानी, जानी-पहचानी धुन। लोरी। पर इस बार उसमें कोई ख़ाली जगह नहीं थी। नाम की जगह, जहाँ उसकी माँ हमेशा रुक जाती थीं, पानी ने उसे अपनी आवाज़ में पूरा गाया, सात स्वरों में, बिना शब्दों के, बिना किसी भाषा के, पर इतना साफ़ कि मीरा उसे अपने भीतर समझ सकती थी।
और उसके पीछे, कहीं बहुत गहरे, नदी के सबसे गहरे तल पर, एक और आवाज़ थी, जो पहले दिन से उसके कानों में रही थी, पर जिसे वह तब पहचान नहीं पाई थी।
टप... टप... टप...
वही बूँद के गिरने की आवाज़। जो उसने पहली बार सूनगढ़ के तहख़ाने में सुनी थी, जिसने उसके पूरे बदन में सिहरन भर दी थी। वह आवाज़ अब भी वहाँ थी, उसी लय में, उसी बराबर अंतराल पर, गहरे कुएँ से आती हुई।
पर अब वह किसी क़ैदी की पुकार नहीं थी।
वह एक नब्ज़ थी। एक धड़कन। एक विशाल, जीवित, बहती हुई चीज़ के दिल की, जो तीन हज़ार साल बाद पहली बार अपनी रफ़्तार से चल रही थी।
मीरा के होंठों पर एक धीमी, पूरी मुस्कान आई।
उसे पहली बार वह आवाज़ डरावनी नहीं लगी।
समाप्त
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 30 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 18 min
- Words
- 3469
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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