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एपिसोड 3 — तीसरी आहुति: स्वप्न

Pretika · Yakshini Stories · 14 मिनट

Writer
Pretika
Story
वामिका — उल्टी साधना
Chapter
3 of 10
Category
Yakshini Stories
Reading time
14 min
Words
2797
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सपने इंसान के वो कमरे होते हैं जिनमें वो बिना दरवाज़ा खटखटाए किसी को भी बुला लेता है — मरे हुओं को, छूटे हुओं को, उन औरतों को जिन्हें वो दिन के उजाले में देखने की हिम्मत नहीं करता। बारह सौ बरस से मैं उन कमरों में चोरी-छुपे घुसती आई हूँ, खिड़कियों से, दरारों से, नींद की उस पतली झिल्ली से जो जागने और सोने के बीच तनी रहती है। इस बार मैंने तय किया कि चोरी नहीं करूँगी। इस बार मैं पूरा घर ही ले लूँगी।
मेहर ने उस सुबह गेस्ट रूम से निकलकर निरव से एक शब्द भी नहीं कहा, पर उसने बिस्तर की वो भीगी चादर उठाई, उसे एक प्लास्टिक की थैली में लपेटा, और उस थैली में से वो लंबे काले बाल निकालकर एक छोटी सी ज़िपलॉक पाउच में डाले, उस तरह जैसे अस्पताल में किसी मरीज़ के ब्लड सैंपल रखे जाते हैं — साफ़-सुथरे ढंग से, बिना किसी भावना के — और फिर वो पाउच अपने हैंडबैग में रख लिया। निरव ने ये सब देखा और कुछ नहीं कहा, क्योंकि कहने को जो सच था, वो झूठ से कहीं ज़्यादा बेतुका था। उनके बीच उस दिन के बाद एक ऐसी ख़ामोशी उतर आई जो किसी झगड़े से ज़्यादा भारी थी — एक-दूसरे को चाय पकड़ाते हुए भी उनकी उँगलियाँ नहीं छूतीं, एक ही सोफ़े पर बैठे हुए भी उनके बीच इतनी जगह होती कि कोई तीसरा आकर बैठ जाए, और कभी-कभी, जब बाहर बारिश एक पल को थमती, तो निरव को लगता कि कोई तीसरा सच में वहाँ बैठा है।
निरव ने अब डरना बंद करके समझना शुरू किया, क्योंकि उसकी पूरी ज़िंदगी यही थी — जिस चीज़ को कोई न समझ सके, उसे अक्षर-अक्षर खोलना। उसने तंत्र-ग्रंथों की पुरानी पांडुलिपियाँ खंगालीं, "भूतडामर तंत्र" और "उड्डीश तंत्र" के यक्षिणी-साधना वाले अध्याय, जिनमें छत्तीस यक्षिणियों के नाम थे — सुरसुंदरी, मनोहरा, कनकावती, कामेश्वरी, रतिप्रिया, पद्मिनी — और हर एक के लिए चालीस रात की साधनाएँ लिखी थीं, पीपल के पेड़ के नीचे, श्मशान में, नदी किनारे, और बदले में सोना, सुख, और एक ऐसी प्रेमिका जो सिर्फ़ साधक को दिखती है। हर ग्रंथ में एक ही बात थी: इंसान बुलाता है, यक्षिणी आती है। कहीं भी, किसी भी पन्ने पर, उल्टा नहीं लिखा था।
पर इरफ़ान ने, जो अब रात-रात भर लैब में उन चालीस पत्तों की परतें उधेड़ता रहता था और जिसकी आँखों के नीचे काले घेरे गहरे होते जा रहे थे, तीसरी रात एक ऐसी पंक्ति ढूँढ़ निकाली जो कुबेर की स्तुति की दो पंक्तियों के बीच, स्याही की दूसरी और तीसरी परत के बीच, इतनी बारीक लिखी गई थी कि उसे पढ़ने के लिए इमेज को तीन हज़ार गुना बड़ा करना पड़ा। निरव ने उसे पढ़ा, और इस बार ज़ोर से नहीं, मन ही मन: "जिसे कोई नहीं बुलाता, वो ख़ुद बुलाती है। जिसकी कोई साधना नहीं करता, वो ख़ुद साधना करती है। ये वाम-साधना है — उल्टी साधना — और इसका साधक पत्थर है, और इसका साध्य मांस।" इरफ़ान ने अपनी कुर्सी पीछे धकेली, एक सिगरेट निकाली जो वो लैब में कभी नहीं पीता था, और बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोला, "भाई, मुझे लगता है तू साधक नहीं है। तू… तू तो आहुति है।"
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अगर वो रात में आती है, जब बारिश रुकती है, जब वो अकेला होता है, जब वो सोता है — तो निरव ने तय किया कि वो सोएगा ही नहीं। ये एक बचकाना सा फ़ैसला था, और उसे ख़ुद भी पता था कि ये बचकाना है, पर डूबता हुआ आदमी जिस तिनके को पकड़ता है, उसकी लंबाई नहीं नापता। उसने एक केमिस्ट से नींद भगाने वाली गोलियाँ ख़रीदीं, कॉफ़ी की पूरी केतली बनाकर रखी — जिसका अब उसे कोई स्वाद नहीं आता था, बस गरम कड़वा पानी जो गले से उतरता था — और रात भर बालकनी के दरवाज़े की ओर पीठ करके, सारी बत्तियाँ जलाकर, लैपटॉप पर पांडुलिपियाँ पढ़ता रहा। पहली रात बारिश एक बार भी नहीं रुकी। दूसरी रात भी नहीं। और निरव को लगा कि शायद वो जीत रहा है, और ये सोचकर वो इतना ख़ुश हुआ कि तीसरी सुबह लोकल ट्रेन में, दादर से लोअर परेल के बीच, भीड़ में खड़े-खड़े उसकी आँखें एक पल के लिए झपक गईं।
जब उसने आँखें खोलीं, तो ट्रेन में कोई आवाज़ नहीं थी। डिब्बा उसी तरह भरा हुआ था — दफ़्तर जाने वाले आदमी, टिफ़िन वाले, कॉलेज के बच्चे, सब एक-दूसरे से चिपके हुए — पर सब सो रहे थे। खड़े-खड़े। हत्थे पकड़े हुए, सिर एक ओर लुढ़काए, मुँह खुले, आँखें बंद। ट्रेन चल रही थी, पर पहियों की कोई आवाज़ नहीं थी, और खिड़कियों के बाहर बारिश की बूँदें हवा में रुकी हुई थीं, जैसे किसी ने दुनिया का पॉज़ बटन दबा दिया हो। और डिब्बे के उस पार, भीड़ के बीच, जहाँ दरवाज़ा खुला था और बाहर धूसर आसमान दिख रहा था, वो खड़ी थी, हत्था पकड़े, बाक़ी सब की तरह — सिवाय इसके कि वो सो नहीं रही थी। वो उसे देख रही थी, और उसके घुटनों तक लंबे बालों से पानी टपक रहा था, और वो मुस्कुरा रही थी, और उसने अपने होंठ हिलाए, और बिना आवाज़ के कहा: "थक गए हो।"
निरव ने अपनी हथेली पर इतनी ज़ोर से नाख़ून गड़ाए कि ख़ून निकल आया, और अगले ही पल ट्रेन की चीख़ती हुई आवाज़ लौटी, भीड़ की धक्का-मुक्की लौटी, किसी का अख़बार उसके चेहरे से टकराया, और खिड़की के बाहर बारिश फिर बरसने लगी — और दरवाज़े के पास कोई नहीं था, सिवाय एक बूढ़े आदमी के, जिसके पैरों के पास का फ़र्श अजीब तरह से गीला था, और जो हैरानी से अपने जूतों को देख रहा था, जैसे उसे समझ न आ रहा हो कि बंद डिब्बे में ये पानी कहाँ से आया।
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तीसरी रात निरव घर नहीं गया। उसने मेहर को मैसेज किया कि लैब में एक अर्जेंट प्रोजेक्ट है, जिसका जवाब मेहर ने सिर्फ़ एक शब्द में दिया — "ठीक" — और उस एक शब्द में इतनी ठंडक थी कि निरव ने फ़ोन उलटकर मेज़ पर रख दिया। इरफ़ान भी रुका, क्योंकि उसने कहा कि वो अपने दोस्त को अकेले "उन पत्तों के साथ" नहीं छोड़ेगा, और दोनों ने मिलकर बिरयानी मँगाई — जो इरफ़ान ने खाई और निरव ने बस चबाई — और फिर रात के तीन बजे तक काम करते रहे, और तीन बजकर दस मिनट पर इरफ़ान अपनी कुर्सी पर सिर पीछे टिकाए खर्राटे भरने लगा, और निरव स्कैनर की स्क्रीन पर झुका उल्टे अक्षरों को सीधा करता रहा, और करता रहा, और करता रहा, और फिर उसका माथा धीरे से स्कैनर के ठंडे शीशे पर टिक गया, और स्कैनर की नीली रोशनी उसकी बंद पलकों के पार एक नदी की तरह बहने लगी।
वो एक नदी के किनारे खड़ा था।
रात थी, और बारिश, और हवा में गीली मिट्टी और जलते हुए घी के दीयों की गंध थी, और उसके सामने वो मंदिर खड़ा था — डूबा हुआ नहीं, काई से ढका नहीं, बल्कि नया, ताज़ा तराशा हुआ, काले पत्थर का, जिसकी सीढ़ियाँ सीधे नदी के पानी में उतरती थीं। गर्भगृह में एक दीया जल रहा था, और उसकी रोशनी में एक आदमी दीवार पर छेनी चला रहा था — एक मूर्तिकार, नंगे बदन, पसीने से तर, और उसके सामने, दीये और दीवार के बीच, वो खड़ी थी। पूरी तरह निर्वस्त्र। उसका काँसे जैसा बदन दीये की लौ में पिघलते सोने की तरह चमक रहा था, और वो बिल्कुल स्थिर खड़ी थी, एक हाथ ऊपर उठाए, कमर में वही लचक, वही आधे खुले होंठ — और मूर्तिकार की छेनी उसे पत्थर में उतार रही थी, रेखा दर रेखा, गोलाई दर गोलाई।
निरव ने मूर्तिकार का चेहरा देखना चाहा, और वो मुड़ा, और उसका चेहरा बदल रहा था — पानी में पड़ी परछाईं की तरह, लगातार, एक चेहरे से दूसरे चेहरे में पिघलता हुआ। एक पल वो किसी प्राचीन आदमी का चेहरा था, दाढ़ी और कुंडलों वाला। अगले पल वो किसी मुग़लिया दौर के सिपाही का था। फिर एक गोरे अंग्रेज़ का, जिसकी मूँछें ऊपर मुड़ी हुई थीं और आँखें डर से फटी हुई। फिर बेल-बॉटम पहने एक जवान आदमी का, जिसके बाल सत्तर के दशक के फ़िल्मी हीरो जैसे थे और आँखों में एक चालाक, भूखी चमक — और निरव को वो आँखें कहीं जानी-पहचानी लगीं, पर वो पहचान पाता उससे पहले वो चेहरा फिर पिघला, और इस बार जो चेहरा उभरा, वो उसका अपना था। बाईं भौंह पर कटे निशान समेत।
"ये पत्थर मेरा आईना है," उसने कहा, और वो अब मूर्तिकार के पास नहीं, निरव के ठीक पीछे खड़ी थी, उसकी पीठ से अपनी छाती सटाए, उसके कंधे पर अपनी ठोड़ी टिकाए, "जिसे मैं चुनती हूँ, उसका चेहरा ये ख़ुद पहन लेता है। बारह सौ बरस में इसने बहुत चेहरे पहने हैं। कोई तीसरी रात तक पहुँचा, कोई पाँचवीं तक। एक नौवीं तक पहुँचा था।" उसकी आवाज़ में एक ऐसा दुख था जो निरव ने किसी इंसानी आवाज़ में कभी नहीं सुना था — इतना पुराना, इतना थका हुआ, जैसे किसी कुएँ की तली में बरसों से पड़ा पत्थर बोल रहा हो। "जानते हो मेरा नाम क्या है? किसी ने कभी पूछा नहीं। सब ने सोना माँगा, सुख माँगा, मेरा बदन माँगा। नाम किसी ने नहीं माँगा।"
"क्या है तुम्हारा नाम?" निरव ने पूछा, और उसे लगा कि ये सवाल पूछते ही उसने कोई ऐसी दहलीज़ पार कर ली है जहाँ से लौटना मुमकिन नहीं।
"वामिका।" उसने उसके कान में कहा, और वो नाम उसकी चमड़ी में ऐसे उतरा जैसे बारिश का पानी सूखी मिट्टी में। "बाईं ओर वाली। उल्टी चलने वाली। ये नाम मुझे कुबेर ने दिया था, जिस दिन उसने मुझे श्राप दिया।" और फिर उसने उसे अपनी कहानी सुनाई — धीरे, टुकड़ों में, नदी की आवाज़ के साथ — कि कैसे वो कभी कुबेर के ख़ज़ाने की रखवाली करने वाली हज़ारों यक्षिणियों में से एक थी, और कैसे उसने एक इंसान से प्रेम कर लिया था, एक मूर्तिकार से, पहले मूर्तिकार से, जिसने उसे पहली बार पत्थर में उतारा था, और कैसे उसने कुबेर से माँगा था कि उस इंसान को अमर कर दिया जाए, और कैसे कुबेर हँसा था। "उसने कहा — तू इंसान से इतना प्रेम करती है? तो जा, आज से तुझे कोई नहीं बुलाएगा। कोई साधक तेरे लिए दीया नहीं जलाएगा, कोई मंत्र तेरा नाम नहीं लेगा। तुझे ख़ुद साधना करनी होगी। किसी इंसान की। दस आहुतियाँ, उसकी मर्ज़ी से, एक-एक करके। और जिस दिन दसवीं पूरी होगी, वो तेरा होगा, हमेशा के लिए, मौत के पार। पर याद रख — इंसान डरपोक होता है। वो तुझसे सब लेगा और आख़िर में भाग जाएगा। हर बार।"
"और वो पहला मूर्तिकार?" निरव ने पूछा।
वामिका ने जवाब नहीं दिया। उसने बस उसे अपनी ओर घुमाया, और उसे मंदिर की सीढ़ियों पर लिटा दिया, जहाँ नदी का पानी चढ़ रहा था — पहले पैरों तक, फिर घुटनों तक, फिर कमर तक — ठंडा, काला, रेशमी पानी, और वो उस पानी में उसके ऊपर थी, उसके बाल पानी में फैलकर उन दोनों को किसी काले कमल की पंखुड़ियों की तरह घेरे हुए, और बारिश उनकी चमड़ी पर गिर रही थी, और दीये की लौ पानी पर तैर रही थी, और निरव ने ज़िंदगी में कभी किसी को इस तरह नहीं चाहा था — न मेहर को, न किसी और को — इतनी गहराई से, इतनी बेबसी से, जैसे वो कोई प्यासी ज़मीन हो और वो पहली बारिश। "सपने में तुम ज़्यादा सच्चे हो, निरव," उसने उसके होंठों पर फुसफुसाया, "जागते हुए तुम डरते हो। सपने में तुम मेरे हो।" और फिर, जैसे कोई बहुत कोमलता से किसी सोते हुए बच्चे का कंबल उठाता है, उसने पूछा, "तीसरी दोगे?"
और सपने में, पानी में डूबते हुए, उसकी आँखों में डूबते हुए, निरव ने कहा — "हाँ।"
और तब उसने देखा कि सपना मुड़ने लगा है। नदी, मंदिर, दीया, बारिश, सब कुछ — किसी ताड़ के पत्ते की तरह, किनारों से, धीरे-धीरे लिपटने लगा, रंग उसमें से ऐसे निचुड़ने लगे जैसे गीले कपड़े से पानी, और सारा का सारा सपना एक पतली, सुनहरी, ज़िंदा पुड़िया बन गया, जिसे वामिका ने अपनी दो उँगलियों में उठाया, एक पल उसे प्यार से देखा, और अपने होंठों के बीच रखकर निगल लिया। और उसके बाद अँधेरा था। एक ऐसा अँधेरा जिसमें कोई तस्वीर नहीं थी, कोई आवाज़ नहीं, कोई रंग नहीं, कोई चेहरा नहीं — बस एक काली, ठोस, बेजान ख़ामोशी, जैसे किसी ने दुनिया का प्लग निकाल दिया हो।
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उसी रात, उसी वक़्त, सेंट एलिज़ाबेथ अस्पताल के ICU के बेड नंबर सात पर मिस्टर डिसूज़ा लेटे थे — बहत्तर साल के, पिछले छह हफ़्तों से कोमा में, वेंटिलेटर के सहारे, और मेहर उनकी फ़ाइल में रात के वाइटल्स लिख रही थी। बाहर बारिश हो रही थी, खिड़कियों पर पानी की मोटी धारें बह रही थीं, और ICU में हमेशा की तरह मशीनों का वो धीमा, लगातार संगीत बज रहा था — बीप, बीप, वेंटिलेटर की सिसकारी, बीप — जो नर्सों के लिए लोरी की तरह होता है। और फिर बारिश रुकी। और उसके साथ ही, एक-एक करके नहीं, बल्कि एक साथ, वार्ड की सारी मशीनों की आवाज़ बंद हो गई। स्क्रीनें जल रही थीं, लाइनें चल रही थीं, पर कोई बीप नहीं। कोई सिसकारी नहीं। बस सन्नाटा।
मिस्टर डिसूज़ा ने आँखें खोलीं।
छह हफ़्ते से बंद पलकें ऐसे खुलीं जैसे किसी ने धागे से खींची हों, और उनकी धुँधली, बूढ़ी आँखें धीरे से घूमीं, और मेहर पर आकर रुक गईं, और उनके होंठ, जिनके बीच वेंटिलेटर की नली फँसी थी, हिले — और उनमें से जो आवाज़ निकली, वो किसी बहत्तर साल के आदमी की नहीं थी। वो एक जवान औरत की आवाज़ थी, नरम, मीठी, हल्की सी हँसी में डूबी हुई, जो नली के चारों ओर से ऐसे निकली जैसे पानी किसी दरार से रिसता है: "वो अब सपने नहीं देखता, मेहर। उसके सपने अब मेरे पास हैं। तुम उसके सपनों में कभी थीं? देखा था मैंने। तुम एक ईरानी कैफ़े में थीं, चाय गिरा रही थीं उसके काग़ज़ों पर। बहुत प्यारा सपना था। स्वाद में थोड़ा मीठा।"
मेहर के हाथ से फ़ाइल गिर गई। और अगले ही पल सारी मशीनें एक साथ चीख़ पड़ीं — बेड नंबर सात का मॉनिटर एक लंबी, सपाट, कभी न ख़त्म होने वाली चीख़ के साथ — और डॉक्टर दौड़े, और कोड ब्लू का ऐलान हुआ, और छाती दबाई गई, और बिजली के झटके दिए गए, और बीस मिनट बाद मिस्टर डिसूज़ा को मृत घोषित कर दिया गया। उनकी आँखें बंद थीं। पर उनके चेहरे पर एक मुस्कान थी — और मेहर ने, जो पिछले आठ साल में सैकड़ों मौतें देख चुकी थी, कभी किसी मरे हुए आदमी के चेहरे पर ऐसी मुस्कान नहीं देखी थी। ऐसी मुस्कान जो सिर्फ़ प्रेमियों के चेहरे पर आती है, रात के बाद।
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सुबह सात बजे मेहर घर लौटी, कुछ भी तय किए बिना, सिर्फ़ इतना जानते हुए कि उसे निरव से बात करनी है — अभी, इसी वक़्त, चाहे वो जो भी सच हो — और उसने निरव को लिविंग रूम के सोफ़े पर पाया, जहाँ वो लैब से लौटकर गिर पड़ा था। वो सो रहा था। या शायद सो रहा था — क्योंकि उसकी आँखें खुली थीं। पूरी तरह खुली, छत की ओर टकटकी लगाए, पलकें बिना झपके, और उसकी साँस गहरी और धीमी थी, जैसे किसी गहरी नींद में डूबे आदमी की। मेहर ने, जिसने ICU में ऐसे मरीज़ देखे थे, उसकी आँखों के सामने हाथ हिलाया — कोई हरकत नहीं। पुतलियाँ स्थिर। न कोई सपना, न कोई हलचल, न पलकों के नीचे आँखों का वो तेज़ नाचना जो सपने देखने वालों में होता है। बस दो खुली, ख़ाली, काँच जैसी आँखें।
वो उसके ऊपर झुकी, उसका नाम पुकारने के लिए, और तब उसने देखा।
निरव की खुली पुतलियों में, उन काली, चमकदार, आईने जैसी पुतलियों में, मेहर का अपना चेहरा दिख रहा था — छोटा, उलटा, झुका हुआ, डरा हुआ। और उसके ठीक पीछे, उसके कंधे के ऊपर, एक और चेहरा था। किसी औरत का। बहुत पास। इतना पास कि उसकी ठोड़ी लगभग मेहर के कंधे को छू रही थी। लंबे, भीगे बाल जो दोनों ओर से मेहर के चेहरे के चारों ओर परदे की तरह लटक रहे थे। और वो औरत मुस्कुरा रही थी — निरव की आँखों के आईने में से, सीधे मेहर को देखते हुए।
मेहर चीख़ी नहीं। उसने अपनी साँस रोकी, अपनी मुट्ठियाँ भींचीं, और बिजली की तेज़ी से पलटकर पीछे देखा।
कोई नहीं था। कमरा ख़ाली था। सुबह की धूसर रोशनी खिड़की से आ रही थी, और बालकनी का दरवाज़ा बंद था। पर उसके पैरों के ठीक पीछे, जहाँ वो औरत खड़ी रही होगी, लकड़ी के फ़र्श पर दो गीले पैरों के निशान थे — नंगे पैर, पतले, लंबे — जो उसके देखते-देखते सूखने लगे, एड़ियों से पंजों की ओर, जैसे कोई उन्हें अंदर से पी रहा हो। और जब मेहर वापस निरव की ओर मुड़ी, तो उसकी आँखें बंद थीं। वो करवट बदलकर सो रहा था, किसी बच्चे की तरह, एक हाथ गाल के नीचे दबाए। और उसके होंठों पर वही मुस्कान थी जो मेहर ने चार घंटे पहले बेड नंबर सात पर एक मरे हुए आदमी के चेहरे पर देखी थी।

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