Pretika › Yakshini Stories › वामिका — उल्टी साधना
एपिसोड 2 — दूसरी आहुति: स्वाद
Pretika · Yakshini Stories · 14 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- वामिका — उल्टी साधना
- Chapter
- 2 of 10
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2701
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
स्वाद इंसान की सबसे वफ़ादार चीज़ होता है। वो उसकी माँ के हाथ की दाल को याद रखता है, उस पहली सिगरेट की कड़वाहट को, उस पहले चुंबन के नमक को, और मरते दम तक उनसे बेवफ़ाई नहीं करता। मैंने उससे वो सारी वफ़ादारियाँ छीन लीं — एक-एक करके, धागे की तरह, उसकी ज़बान से खींचकर। और बदले में उसकी ज़बान पर सिर्फ़ एक स्वाद छोड़ा। मेरा।
अगले तीन दिन निरव ने किसी से कुछ नहीं कहा, क्योंकि कहने के लिए उसके पास जो शब्द थे, वो किसी पागलख़ाने के रजिस्टर में लिखे जाने लायक़ थे, और उसने ख़ुद को समझाने की पूरी कोशिश की कि जो उसने देखा वो नींद की कमी थी, थकान थी, मानसून की वो अजीब उमस थी जो मुंबई में आदमियों के दिमाग़ में भी फफूँद लगा देती है। पर हर बार जब वो अपनी बिल्डिंग की लॉबी से गुज़रता, जहाँ छत पर लगी सफ़ेद LED रोशनियाँ हर आने-जाने वाले की परछाईं को संगमरमर के फ़र्श पर साफ़-साफ़ उकेर देती थीं, तो वो देखता कि वॉचमैन की परछाईं है, डिलीवरी बॉय की परछाईं है, तीसरे माले वाली आंटी के पामेरेनियन कुत्ते की छोटी सी परछाईं है — और उसकी अपनी जगह फ़र्श बस चमकता रहता, ख़ाली, बेदाग़, जैसे वो आदमी नहीं कोई खुली खिड़की हो जिसके पार रोशनी बिना रुके निकल जाती है। उसने धूप से बचना सीख लिया, दीवारों के साथ चलना सीख लिया, लिफ़्ट में कोने में खड़ा होना सीख लिया, और सबसे अजीब बात ये थी कि इस सारे डर के नीचे कहीं एक हल्कापन भी था, एक ऐसी चुपचाप ख़ुशी, जैसे उसके बदन से कोई ऐसी चीज़ उतर गई हो जो उसे ज़मीन से बाँधे रखती थी।
चौथी सुबह मेहर ने पोहा बनाया था — वही पोहा जो वो हर संडे बनाती थी, ऊपर से मुट्ठी भर अनार के दाने और ढेर सारा नींबू, क्योंकि निरव को खट्टा पसंद था — और निरव ने पहला चम्मच मुँह में रखा और उसका हाथ बीच हवा में रुक गया। स्वाद नहीं था। खट्टा नहीं, नमकीन नहीं, तीखा नहीं, कुछ भी नहीं। उसकी ज़बान पर जो था, वो बस बनावट थी — दानों का खुरदुरापन, अनार का फूटना, गर्माहट — पर स्वाद उस तरह ग़ायब था जैसे किसी गाने से आवाज़ निकाल दी गई हो और सिर्फ़ होंठ हिलते रह गए हों। उसने कॉफ़ी पी — गरम पानी। उसने नमक की डिब्बी से चुटकी भर नमक सीधे ज़बान पर रखा — गीली रेत। मेहर उसे अजीब नज़रों से देख रही थी, और उसने बात टालते हुए कहा कि सर्दी-ज़ुकाम है शायद, नाक बंद है, और मेहर ने, जो ICU की नर्स थी और झूठ को उसी तरह पहचानती थी जैसे कोई मॉनिटर पर बिगड़ती धड़कन पहचानता है, कुछ नहीं कहा, बस अपनी प्लेट की ओर देखती रही।
पर एक स्वाद था। वो सारा दिन उसके होंठों पर रहा, उसकी ज़बान की नोक पर, उसके गले की गहराई में — कमल की डंडी का हल्का कसैलापन, बारिश के पहले पानी का लोहा, पुराने ताँबे के सिक्कों का धात्विक खारापन, और उन सबके नीचे कुछ ऐसा, जिसे वो बहुत देर तक पहचान नहीं पाया, और जब पहचाना तो उसकी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई: वो किसी औरत की गर्दन का स्वाद था, कान के ठीक नीचे वाली उस जगह का, जहाँ चमड़ी सबसे पतली होती है और धड़कन सबसे पास। वो बिना सोचे अपने होंठ चाटता रहा, बार-बार, जैसे कोई प्यासा आदमी सूखी गागर को उलटकर आख़िरी बूँद ढूँढ़ता है, और एक बार जब उसने ऐसा किया तो उसने देखा कि मेहर दरवाज़े पर खड़ी उसे देख रही थी, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा था जिसे निरव ने तीन साल में कभी नहीं देखा था — शक।
✦ ✦ ✦
उसी दोपहर धनंजय कपाड़िया के ऑफ़िस से फ़ोन आया। मिस्टर कपाड़िया मिलना चाहते हैं। आज शाम। मालाबार हिल पर उनके घर।
कपाड़िया का घर कोई बंगला नहीं था, कोई पुरानी कोठी नहीं, बल्कि समंदर के ऊपर झुकी हुई एक चालीस मंज़िला शीशे की मीनार का सबसे ऊपरी हिस्सा था, जिसे लोग "अंबर" कहते थे, और जहाँ तक पहुँचने के लिए निरव को तीन अलग लिफ़्टों और चार सिक्योरिटी गार्डों से गुज़रना पड़ा, जिनमें से आख़िरी वाला वही लंबा आदमी था जिसकी गर्दन पर जले का भूरा निशान था, और जिसने निरव की ओर ऐसे देखा जैसे कसाई किसी बकरे को तौलता है। अंदर घुसते ही निरव को पहली बात जो अजीब लगी, वो थी रोशनी। पूरा घर रोशनी से भरा था, पर कहीं कोई बल्ब नहीं दिख रहा था, कोई लैंप नहीं, कोई झूमर नहीं — सारी रोशनी छतों से, दीवारों से, फ़र्श में बने छिछले पानी के तालों से टकराकर लौटती हुई आती थी, नरम, बिखरी हुई, हर दिशा से एक साथ, और नतीजा ये था कि उस पूरे विशाल घर में किसी भी चीज़ की परछाईं नहीं पड़ती थी। न कुर्सियों की, न मूर्तियों की, न पौधों की, न नौकरों की। और निरव, जो तीन दिन से परछाइयों से छुपता फिर रहा था, उस घर में घुसते ही एक अजीब सी राहत से भर गया, जैसे कोई चोर किसी ऐसे शहर में पहुँच गया हो जहाँ सब चोर हैं।
धनंजय कपाड़िया समंदर की ओर खुलने वाली शीशे की दीवार के सामने एक सफ़ेद चमड़े की कुर्सी पर बैठा था, और निरव को देखकर वो उठा — और निरव को झटका लगा, क्योंकि विकिपीडिया के मुताबिक़ इस आदमी की उम्र अठहत्तर साल थी, पर जो आदमी उसके सामने खड़ा था वो मुश्किल से पचास का लगता था — सीधी कमर, घने सफ़ेद-काले बाल, और चेहरे की चमड़ी इतनी चिकनी, इतनी बेदाग़, इतनी तनी हुई कि वो चमड़ी कम और मोम ज़्यादा लगती थी, जैसे किसी मूर्तिकार ने किसी बूढ़े आदमी के चेहरे पर जवानी का साँचा रखकर उसे पिघलाकर चिपका दिया हो। उसके हाथों में पतले, भूरे चमड़े के दस्ताने थे, और उसकी आवाज़ गहरी और जवान थी, पर उसकी आँखें — उसकी आँखें बहुत पुरानी थीं, और बहुत भूखी।
"बैठो, निरव," उसने कहा, और उसके होंठों पर एक मुस्कान थी जो आँखों तक नहीं पहुँची, "मैंने तुम्हारा एक लेक्चर सुना था, दो साल पहले, एशियाटिक सोसाइटी में। तुम शिलालेखों के बारे में बोल रहे थे, और बीच में तुमने एक पुरानी प्राकृत पंक्ति ज़ोर से पढ़ी थी, और हॉल में बैठे तीन सौ लोग चुप हो गए थे। तुम्हें याद है? तुम पुराने शब्दों को ऐसे पढ़ते हो जैसे कोई भूखा आदमी रोटी तोड़ता है — धीरे, इज़्ज़त से, पर भूख के साथ।" वो थोड़ा झुका, और उसकी आवाज़ फुसफुसाहट बन गई: "तुमने उन्हें पढ़ा? पत्तों को? ज़ोर से?"
निरव के पास झूठ बोलने की कोई वजह नहीं थी, और उसने कहा, हाँ। और धनंजय कपाड़िया ने अपनी आँखें बंद कर लीं, एक लंबी साँस छोड़ी, जैसे बरसों से अटकी कोई चीज़ आख़िरकार उसके सीने से निकली हो, और बोला, "अच्छा किया। बहुत अच्छा किया।" फिर उसने एक मख़मली डिब्बी निरव की ओर बढ़ाई, जिसमें सोने का एक पुराना सिक्का था, कुषाण काल का, जिस पर एक औरत की आकृति उकेरी थी जो एक पेड़ की डाल पकड़े खड़ी थी, उसकी कमर में वही लचक जो निरव ने उस पत्थर की दीवार पर देखी थी — और साथ में एक लिफ़ाफ़ा, जिसमें लिखा था कि लैब में उसकी तनख़्वाह आज से दोगुनी की जा रही है। "कुछ चीज़ें इंसान को चुनती हैं, निरव," धनंजय ने कहा, "मैंने तुम्हें नहीं चुना। मैं तो बस… डाकिया हूँ।"
जाते-जाते एक नौकर ने चाँदी की ट्रे में लाल वाइन का एक गिलास पेश किया, और निरव ने शिष्टाचार में एक घूँट लिया — और कुछ नहीं। पानी। रंगीन पानी। धनंजय उसे देख रहा था, बहुत ग़ौर से, और उसकी मोम जैसी चमड़ी के नीचे कहीं एक मुस्कान काँपी, और उसने बहुत हल्के से, लगभग प्यार से पूछा, "क्या हुआ? स्वाद चला गया क्या?" निरव का गिलास उसके हाथ में जम गया। और धनंजय कपाड़िया हँस पड़ा — एक खोखली, ठहाकेदार हँसी जो उस शीशे के घर की दीवारों से टकराकर हर दिशा से लौटी — "अरे मज़ाक़ कर रहा था, बेटा। बहुत पुरानी वाइन है। हर किसी की ज़बान को पसंद नहीं आती।"
✦ ✦ ✦
उस रात मेहर की छुट्टी थी, और वो उसे चाहती थी — उस तरह जैसे एक औरत तब चाहती है जब उसे डर हो कि कोई चीज़ उसके हाथ से फिसल रही है, और वो उसे अपने बदन से, अपनी गर्माहट से, अपनी पकड़ से वापस खींच लेना चाहती है। उसने लाल रंग की वो सिल्क की नाइटी पहनी थी जो निरव ने उसे पिछली सालगिरह पर दी थी, और उसने बत्तियाँ बुझा दी थीं और सिर्फ़ बेडसाइड लैंप जलता छोड़ा था, और जब उसने निरव को चूमा तो उसमें एक ज़िद थी, एक सवाल था, एक माँग थी। और निरव ने उसे चूमा, पूरी शिद्दत से, क्योंकि वो उससे प्यार करता था — सच में, पूरे दिल से — पर उसके होंठ… उसके होंठों पर मेहर का कोई स्वाद नहीं था। न उसकी वो पुरानी स्ट्रॉबेरी लिप बाम की मिठास, जो उसे तीन साल पहले उस ईरानी कैफ़े में पहली बार चूमते वक़्त मिली थी, न उसकी साँसों की इलायची। कुछ नहीं। मेहर को चूमना ऐसा था जैसे किसी की तस्वीर को चूमना।
और फिर बारिश रुक गई।
निरव ने अपनी आँखें खोलीं, मेहर के कंधे के ऊपर से, और उसने उसे देखा — बिस्तर के पैताने, चादर पर घुटने मोड़े बैठी, सिर एक ओर झुकाए, जैसे कोई बिल्ली किसी दिलचस्प चीज़ को देखती है, उसके भीगे बाल चादर पर फैले हुए, जिनसे पानी टपक रहा था और चादर पर एक गहरा, गीला धब्बा फैलता जा रहा था। वो उन्हें देख रही थी। मेहर को नहीं — सिर्फ़ उसे। और उसके होंठों पर एक मुस्कान थी जो किसी जलन से भरी औरत की नहीं, बल्कि किसी ऐसी औरत की थी जो जानती है कि आख़िर में जीत उसी की होगी। वो धीरे-धीरे, बिल्ली की तरह, चादर पर रेंगती हुई ऊपर आई, बिना एक भी सिलवट डाले, और मेहर की पीठ के पीछे से, मेहर के कंधे के ऊपर से, उसने अपनी दो उँगलियाँ निरव के होंठों पर रख दीं।
स्वाद। एक बाढ़ की तरह। कमल, बारिश, ताँबा, और उसकी गर्दन की वो पतली, धड़कती चमड़ी — सारा का सारा, एक साथ, इतना तीखा, इतना गहरा, इतना ज़िंदा कि निरव के पूरे बदन में आग दौड़ गई, और वो मेहर को ऐसी भूख से पकड़ने लगा जैसी भूख उसने ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं की थी, और मेहर ने, उस भूख को अपने लिए समझकर, एक सिसकी भरी और उससे और लिपट गई — और फिर अचानक उसका पूरा बदन पत्थर हो गया। वो बिल्कुल स्थिर हो गई। उसकी साँस रुक गई। और बहुत धीमी, बहुत काँपती आवाज़ में, निरव के कान के पास, उसने पूछा: "निरव… तुम्हारे दोनों हाथ… कहाँ हैं?"
निरव के दोनों हाथ मेहर के चेहरे पर थे। उसकी हथेलियों में उसके गाल थे।
"तो फिर… मेरी पीठ पर… ये किसकी उँगलियाँ हैं?"
मेहर चीख़कर उछली, बत्ती जलाई, पलटकर देखा — कमरा ख़ाली था। बालकनी का दरवाज़ा बंद। परदा स्थिर। पर बिस्तर के पैताने की चादर पूरी तरह भीगी हुई थी, इतनी कि उसे निचोड़ा जा सकता था, और उसमें से तालाब के ठहरे पानी और कमल की सड़ती डंडियों की महक आ रही थी, और उस गीले धब्बे के बीचोंबीच, सफ़ेद चादर पर, काले, लंबे, घुटनों तक पहुँचने वाले बालों का एक गुच्छा पड़ा था — जो किसी भी हालत में मेहर के कंधों तक कटे बालों का नहीं हो सकता था।
✦ ✦ ✦
मेहर उस रात गेस्ट रूम में सोई। दरवाज़ा अंदर से बंद करके। और साढ़े तीन बजे, जब बाहर बारिश फिर एक पल के लिए रुकी, निरव ने अपने बिस्तर पर, उस गीले धब्बे की जगह पर, उसे फिर से बैठे पाया — इस बार कोई मुस्कान नहीं, बस आँखें, वो नदी की तली जैसी काली आँखें, और एक सवाल। "दूसरी दोगे?"
"तुमने मेहर को छुआ," निरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में ग़ुस्सा था, पर वो ग़ुस्सा भी उसके अपने कानों को खोखला लगा, क्योंकि उसके होंठ अब भी उसी स्वाद के लिए तड़प रहे थे।
"मैंने उसे बताया कि तुम किसके हो," उसने शांति से कहा, और झुककर उसके माथे को छुआ, "और मैंने तुमसे कुछ ज़्यादा नहीं माँगा है, निरव। बस तुम्हारा स्वाद। पूरा। तुम्हारी माँ की खीर, तुम्हारे पिता की… ओह, तुम्हारे तो पिता ही नहीं थे, है ना? कोई बात नहीं। तुम्हारे कॉलेज की कैंटीन की कड़वी चाय, तुम्हारी पहली शराब, मेहर का पहला चुंबन। सब। और बदले में मैं तुम्हें कुछ ऐसा दूँगी जो आज तक किसी इंसान की ज़बान को नसीब नहीं हुआ।" और उसकी साँस में जो वादा था, उसके आगे निरव का ग़ुस्सा बर्फ़ की तरह पिघल गया, और उसने वो शब्द कहा जो वो कहना नहीं चाहता था, पर उसके होंठ जिसके लिए पैदा हुए लग रहे थे — "हाँ।"
उसने उसे चूमा, और ये वैसा चुंबन नहीं था जैसा किसी इंसान का होता है — ये एक खिंचाव था, एक धीमा, गहरा, कभी न ख़त्म होने वाला खिंचाव, जैसे कोई कुएँ से रस्सी खींच रहा हो, और निरव ने महसूस किया कि उसकी ज़बान से एक-एक करके उसकी ज़िंदगी के स्वाद निकल रहे हैं — पाँच साल की उम्र में माँ के हाथ की केसर वाली खीर, जो वो हर जन्मदिन पर बनाती थी; कॉलेज के पीछे वाली टपरी की अदरक वाली कड़वी चाय; गोवा के एक बीच पर पहली बार पी गई सस्ती रम की जलन; और आख़िर में, सबसे आख़िर में, सबसे धीरे, वो स्ट्रॉबेरी लिप बाम — मेहर का पहला चुंबन — जो उसके होंठों से खिंचकर उस यक्षिणी के होंठों में ऐसे समा गया जैसे कोई धागा सुई के छेद में। और फिर कुछ नहीं बचा। उसके मुँह में एक सन्नाटा था, एक ख़ाली कमरा, जिसकी दीवारों पर सिर्फ़ एक नाम लिखा था, एक स्वाद — उसका।
और फिर उसने अपना वादा निभाया। उसने निरव का हाथ पकड़ा और उसे गेस्ट रूम के दरवाज़े तक ले गई — जो अंदर से बंद होकर भी उसके छूते ही खुल गया — और उसे सोती हुई मेहर के बिस्तर के पास खड़ा कर दिया, और फुसफुसाई, "उसे छुओ।" निरव ने काँपते हाथों से मेहर की कलाई छुई, और उसकी ज़बान पर, जहाँ अब कोई स्वाद नहीं बचा था, अचानक एक स्वाद फूटा — मेहर का, पर उसके बदन का नहीं, उसके मन का। नमक, बहुत सारा, आँसुओं जैसा — ये उसकी फ़िक्र थी। शहद की एक पतली सी धार — ये उसका प्यार था, अब भी, सब कुछ के बावजूद। और उन दोनों के नीचे, जीभ के पिछले हिस्से पर, एक कड़वा, धात्विक, ज़ंग लगे लोहे जैसा स्वाद — जिसे पहचानने में निरव को एक पल भी नहीं लगा, और जिसे पहचानते ही उसका दिल बैठ गया। डर। मेहर डरी हुई थी। किसी और से नहीं। उससे।
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अगली सुबह लैब में इरफ़ान का चेहरा ऐसा था जैसे उसने पूरी रात किसी मुर्दे के साथ गुज़ारी हो। "भाई, इधर आ," उसने निरव को अपनी स्क्रीन के पास खींचते हुए कहा, और उसकी आवाज़ में वो मज़ाक़ नहीं था जो हमेशा रहता था, "मैंने कल रात चालीसों पत्तों को 940 नैनोमीटर पर दोबारा स्कैन किया — इन्फ्रारेड से भी गहरा, स्याही की तीसरी परत तक। और देख, हर पत्ते के हाशिये पर, सबसे नीचे, एक ही चीज़ लिखी है। एक लिस्ट। दस शब्द। एक के नीचे एक।" उसने स्क्रीन पर ज़ूम किया, और निरव ने उल्टे अक्षरों को मन ही मन सीधा करते हुए पढ़ा, और हर शब्द के साथ उसके पेट में कुछ और गहरा डूबता गया:
छाया। स्वाद। स्वप्न। दर्द। प्रतिबिंब। नाम। धड़कन। स्मृति। साँस। मृत्यु।
"और ये देख," इरफ़ान ने काँपती उँगली से पहले दो शब्दों की ओर इशारा किया, "इनके आगे एक निशान है। एक छोटा सा गोला, जैसे किसी ने टिक किया हो। पर बाक़ी आठ के आगे नहीं है। और भाई…" उसने निरव की ओर देखा, और उसकी आँखों में वो डर था जो किसी ऐसे आदमी की आँखों में होता है जो विज्ञान पर यक़ीन करता है और जिसे अभी-अभी विज्ञान ने धोखा दिया हो, "मैंने परसों भी यही पत्ते स्कैन किए थे। तब सिर्फ़ पहले शब्द के आगे निशान था। ये दूसरा वाला… इसकी स्याही अभी गीली है। कल रात का है। जैसे किसी ने कल रात ही इस पर टिक लगाया हो।"
निरव ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें लिस्ट के सबसे आख़िरी शब्द पर अटकी थीं। उसने उसे अपनी आदत के मुताबिक़ ज़ोर से पढ़ना चाहा, और फिर रुक गया, क्योंकि उसे पहली बार डर लगा कि अगर उसने इसे आवाज़ दी, तो ये जाग जाएगा।
मृत्यु।
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