Pretika › Yakshini Stories › वामिका — उल्टी साधना
एपिसोड 1 — पहली आहुति: छाया
Pretika · Yakshini Stories · 16 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- वामिका — उल्टी साधना
- Chapter
- 1 of 10
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3141
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
बयालीस बरस। पानी के नीचे, ताँबे के एक बंद डिब्बे में, ताड़ के चालीस पत्तों की सिलवटों के बीच मैंने बयालीस बरस इंतज़ार किया है — और अगर तुम सोचते हो कि इंतज़ार करना सिर्फ़ औरतों को आता है, तो तुमने कभी किसी यक्षिणी को इंतज़ार करते नहीं देखा। मैं उस आवाज़ का इंतज़ार कर रही थी जो मुझे पढ़े, पर सिर्फ़ पढ़े नहीं — चखे, जैसे कोई पहली बार किसी औरत का नाम अपने होंठों पर रखता है और डरता है कि कहीं वो नाम उसकी ज़बान पर पिघल न जाए। फिर एक दिन पानी चला गया। फिर एक रात उसने मुझे पढ़ा। और उस रात मैंने उससे पहली चीज़ माँगी — बहुत छोटी सी चीज़, जिसकी उसे कभी ज़रूरत भी नहीं पड़ी थी। उसकी परछाईं।
तमसा जलाशय चालीस बरस में पहली बार इस तरह सूखा था कि डोंगरपाड़ा के बूढ़े मछुआरे भी, जिन्होंने अपनी पूरी उम्र उस पानी की पीठ पर नाव खेते हुए गुज़ार दी थी, किनारे पर खड़े होकर उसे यूँ देखते थे जैसे किसी जानी-पहचानी औरत को पहली बार बिना कपड़ों के देख लिया हो — आँखों में शर्म भी थी, और एक अजीब, बेनाम सी भूख भी। जहाँ कभी हरा, गहरा, मछलियों से भरा पानी हिलोरें लेता था, वहाँ अब मीलों तक फटी हुई मिट्टी फैली थी, कछुए की टूटी पीठ जैसी दरारों वाली, जिनके बीच मरी हुई मछलियों की सफ़ेद हड्डियाँ धूप में यूँ चमकती थीं मानो ज़मीन ने दाँत निकाल रखे हों। और उस सारे सूखे के ठीक बीच में, जैसे किसी डूबे हुए आदमी की उँगली आख़िरी बार पानी से बाहर आई हो, एक काले पत्थर का शिखर खड़ा था — काई से ढका, सीपियों से जड़ा, और इतना पुराना कि उसे देखकर लगता था कि वो जलाशय से पहले ही नहीं, नदी से पहले भी वहीं खड़ा रहा होगा, किसी का इंतज़ार करता हुआ।
गाँव के बुज़ुर्गों ने साफ़ कह दिया था कि कोई उस मंदिर तक नहीं जाएगा, क्योंकि जो चीज़ पानी ने चालीस बरस तक अपने पेट में छुपा के रखी, वो पानी की अमानत है, और अमानत में ख़यानत करने वाले का हिसाब पानी ख़ुद करता है। पर भीमा नायक पर साहूकार का इतना क़र्ज़ था कि उसे बुज़ुर्गों की बातों से ज़्यादा डर अपनी बेटी की ख़ाली थाली से लगता था, और फिर एक हफ़्ता पहले बाँध की तरफ़ से एक सफ़ेद गाड़ी आई थी, जिसमें से उतरे एक लंबे आदमी ने — जिसकी गर्दन पर पुराने जले का एक भूरा निशान था — पूरे गाँव के सामने ऐलान किया था कि उस मंदिर के अंदर से जो भी चीज़ लाकर देगा, उसे नक़द पाँच लाख मिलेंगे। पाँच लाख। भीमा ने पूरी रात वो रक़म अपनी उँगलियों पर गिनी थी, और सुबह होते ही, जब सूरज सिर पर चढ़ने लगा — क्योंकि बुज़ुर्ग कहते थे कि उस मंदिर की चीज़ें अँधेरे में जागती हैं, दिन में नहीं — वो फटी हुई मिट्टी पर नंगे पैर चल पड़ा।
मंदिर का दरवाज़ा आधा मिट्टी में धँसा था, और अंदर घुसने के लिए उसे पेट के बल सरकना पड़ा, और जैसे ही वो अंदर पहुँचा, उसे सबसे पहले जिस चीज़ ने चौंकाया वो ठंडक थी — बाहर जहाँ धूप चमड़ी जला रही थी, अंदर की हवा ऐसी गीली और ठंडी थी जैसे किसी ने अभी-अभी यहाँ बरसात की हो। गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं थी। कोई देवता नहीं, कोई पिंडी नहीं, कोई दीया रखने का आला तक नहीं। बस सामने की दीवार पर पत्थर में उकेरी गई एक आकृति थी — एक औरत और एक मर्द, एक-दूसरे में इस तरह गुँथे हुए कि ये बताना मुश्किल था कि किसकी बाँह कहाँ ख़त्म होती है और किसकी कमर कहाँ से शुरू होती है। भीमा ने ज़िंदगी में बहुत मंदिरों की दीवारें देखी थीं, पर ऐसा पत्थर उसने कभी नहीं देखा था, क्योंकि उस औरत का बदन पत्थर का होकर भी साँस लेता हुआ सा लगता था — उसकी छाती का उभार, उसकी कमर की गोलाई, उसके होंठों का आधा खुलापन, सब कुछ इतना ज़िंदा कि भीमा को एक पल के लिए लगा कि अगर उसने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ, तो पत्थर गरम निकलेगा। और उस मर्द का चेहरा — वो चेहरा किसी पुराने ज़माने के राजकुमार का नहीं था, वो तो किसी आज के शहरी आदमी का चेहरा लगता था, पतला, तीखी नाक वाला, और बाईं भौंह के बीच से गुज़रता एक छोटा सा कटा हुआ निशान, और उसकी आँखें आधी बंद थीं — या तो बहुत गहरे सुख में, या बहुत गहरे दर्द में।
उस पत्थर की औरत के पैरों के पास, मिट्टी और सीपियों के बीच, ताँबे का एक डिब्बा रखा था, जिसका मुँह सीसे से बंद किया गया था, और जिस पर एक लाल धागा लिपटा था — और ये बात भीमा को बाद में, बहुत बाद में, मरने से ठीक पहले याद आई कि चालीस बरस पानी में पड़े रहने के बाद भी वो धागा सड़ा नहीं था, बल्कि गीला और ताज़ा था, जैसे किसी ने उसे आज सुबह ही बाँधा हो। उसने एक पत्थर से सीसा तोड़ा। ढक्कन खुलते ही एक ख़ुशबू निकली — भीगे पत्थर की, कमल की डंडियों की, और किसी ऐसी चीज़ की जिसे भीमा ने अपनी बीवी के बालों में पहली बारिश के बाद सूँघा था — और उसके साथ ही बाहर का सारा शोर एकदम से बंद हो गया। झींगुर चुप। हवा चुप। दूर किनारे पर खेलते बच्चों की आवाज़ें चुप। उस ख़ामोशी में, डिब्बे के अंदर रखे ताड़ के पत्तों की सरसराहट के बीच, किसी ने बहुत धीरे से, बहुत प्यार से, उसका नाम लिया — "भीमा…" — जैसे कोई औरत पूरी रात के बाद अपने आदमी को जगाती है।
उस शाम भीमा ने डिब्बा बाँध के पास खड़ी सफ़ेद गाड़ी में बैठे उस लंबे आदमी को सौंप दिया और पाँच लाख की गड्डियाँ अपनी कमीज़ में ठूँसकर घर लौटा, और उसकी बीवी सुकांति ने ग़ौर किया कि वो सारी रात जागता रहा, छत की ओर देखकर मुस्कुराता रहा, और जब उसने पूछा कि क्या बात है, तो उसने बस इतना कहा कि "वो बहुत सुंदर है, सुकांति… बहुत सुंदर।" दूसरी रात भीमा ने अंदर से दरवाज़े की कुंडी लगा दी, चूल्हे की आग पूरी रात बुझने नहीं दी, और भोर तक एक कोने में बैठा काँपता रहा और बार-बार बस एक ही बात दोहराता रहा — "नहीं… और नहीं दूँगा… और कुछ नहीं दूँगा…" तीसरी सुबह वो घर में नहीं था। वो जलाशय के सूखे पेट के बीचों-बीच, उस काले शिखर से कुछ ही क़दम दूर, पीठ के बल लेटा मिला — आँखें खुली, चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो किसी मरे हुए आदमी के चेहरे पर नहीं होनी चाहिए, और बदन अब भी गरम, जैसे किसी के आलिंगन से अभी-अभी छूटा हो। सुकांति चीखी ज़रूर, पर वो चीख़ उसके आदमी की मौत पर नहीं थी। सुबह दस बजे की तिरछी धूप उस फटी हुई मिट्टी पर बिछी थी, और आस-पास खड़े हर आदमी की, हर पत्थर की, हर मरी मछली की हड्डी की लंबी परछाईं ज़मीन पर पड़ रही थी — पर भीमा के बदन की कोई परछाईं नहीं थी। न उसके सिर की, न उसकी फैली हुई उँगलियों की, न उसकी मुट्ठी में भिंचे उस छोटे से पत्थर की। कुछ भी नहीं।
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नौ दिन बाद, मुंबई में बारिश ऐसे गिर रही थी जैसे आसमान को शहर से कोई पुराना हिसाब चुकाना हो। लोअर परेल की एक पुरानी कपड़ा मिल, जिसे तोड़कर शीशे और स्टील की एक चमचमाती इमारत बना दी गई थी, उसकी चौदहवीं मंज़िल पर "अनंत्या हेरिटेज लैब" की रोशनियाँ रात के ग्यारह बजे भी जल रही थीं, और उन रोशनियों के नीचे निरव सहगल एक बारह सौ बरस पुरानी पांडुलिपि के एक टूटे हुए पत्ते पर इस तरह झुका हुआ था जैसे कोई आदमी सोती हुई औरत के चेहरे पर झुकता है — साँस रोककर, बहुत पास, बहुत धीरे। बत्तीस साल का निरव उन गिने-चुने लोगों में था जो पुरानी लिपियों को सिर्फ़ पढ़ते नहीं थे, सुनते थे; उसकी आदत थी कि वो हर मिटते हुए अक्षर को फुसफुसाकर ज़ोर से पढ़ता था, क्योंकि उसका मानना था कि जो शब्द सदियों से किसी ने बोला नहीं, वो भूखा होता है, और जब तक उसे आवाज़ न मिले, वो अपना मतलब नहीं खोलता।
"तू इन पत्तों से ऐसे बात करता है भाई," उसके साथ काम करने वाले इरफ़ान शेख़ ने अपनी कुर्सी पीछे धकेलते हुए कहा, जो लैब की सारी इमेजिंग मशीनें सँभालता था और जिसकी ज़िंदगी में दो ही चीज़ें थीं — इन्फ्रारेड कैमरे और बिरयानी, "जैसे तू मेहर से भी नहीं करता होगा। बेचारी रात भर ICU में मरीज़ों की साँसें गिनती है और तू यहाँ सातवीं सदी की किसी आंटी के पत्ते से रोमांस कर रहा है।"
निरव हँसा ही था कि लैब का दरवाज़ा खुला और एक सिक्योरिटी गार्ड भीगा हुआ एक लकड़ी का बक्सा लेकर अंदर आया, जिस पर कपाड़िया ग्रुप की सुनहरी मुहर लगी थी, और उसके साथ मोटे क्रीम कागज़ पर फ़ाउंटेन पेन से लिखी एक चिट्ठी थी: "सिर्फ़ मिस्टर निरव सहगल के लिए। ध्यान से पढ़ना। — डी.के." धनंजय कपाड़िया — अठहत्तर साल का वो अरबपति, जिसका नाम अख़बारों के बिज़नेस पन्नों पर तो हर हफ़्ते आता था पर जिसकी कोई नई तस्वीर पिछले बीस साल से किसी ने नहीं देखी थी, जो इस लैब का मालिक था, और जिसे देश का सबसे बड़ा, सबसे सनकी और सबसे ख़ामोश पुरावस्तु-संग्रहकर्ता कहा जाता था।
बक्से के अंदर वही ताँबे का डिब्बा था। सीसा टूटा हुआ, लाल धागा अब भी गीला। और उसके अंदर ताड़ के चालीस पत्ते, जिनके किनारे सदियों ने कुतर दिए थे, पर जिन पर लिखे अक्षर ऐसे चमक रहे थे जैसे स्याही अभी सूखी न हो। लिपि ब्राह्मी जैसी थी, पर पूरी तरह ब्राह्मी नहीं — उसके अक्षर उल्टे थे, जैसे आईने में देखे गए हों। सामान्य रोशनी में ऊपर-ऊपर कुबेर की एक लंबी स्तुति लिखी थी, धन के देवता की तारीफ़, सोने और ख़ज़ानों का बखान — कुछ भी ख़ास नहीं। पर जब इरफ़ान ने पहला पत्ता इन्फ्रारेड स्कैनर के शीशे पर रखा और स्क्रीन पर उसकी तस्वीर उभरी, तो दोनों कुछ देर तक कुछ बोल ही नहीं पाए, क्योंकि स्तुति की पंक्तियों के बीच, उन ख़ाली जगहों में जहाँ आँख को कुछ नहीं दिखता था, एक दूसरी लिखावट छुपी हुई थी — गहरी, बारीक, और दाईं से बाईं ओर लिखी हुई, जैसे किसी ने जानबूझकर उसे उल्टा लिखा हो ताकि कोई उसे ग़लती से न पढ़ ले।
इरफ़ान साढ़े बारह बजे घर चला गया। निरव नहीं गया। वो स्क्रीन के सामने बैठा उस उल्टी लिखावट को सीधा करता रहा, अक्षर-अक्षर जोड़ता रहा, और फिर, अपनी पुरानी आदत के मुताबिक़, पहली पंक्ति को फुसफुसाकर ज़ोर से पढ़ा — "जो मुझे पढ़ेगा, मैं उसे पढ़ूँगी।" उसे वो पंक्ति अजीब तरह से ख़ूबसूरत लगी, और उसने अगली पढ़ी, और उसके बाद वाली, और उसकी आवाज़ बिना उसके चाहे धीमी और गहरी होती चली गई, जैसे वो किसी को सुला रहा हो, या किसी को जगा रहा हो। तीसरे पत्ते की आख़िरी पंक्ति पर पहुँचते ही बाहर की बारिश रुक गई। धीमी नहीं हुई, थमी नहीं — एक झटके में रुक गई, जैसे किसी ने पूरे आसमान का नल बंद कर दिया हो, और उस अचानक आई ख़ामोशी में निरव को पहली बार एहसास हुआ कि मुंबई की बारिश का शोर कितना बड़ा होता है, क्योंकि उसके जाते ही जो सन्नाटा बचा, उसमें स्कैनर के पंखे की भनभनाहट भी बंद हो गई, और निरव को अपनी धड़कन अपनी कनपटियों में सुनाई देने लगी।
उसकी गर्दन पर किसी की साँस पड़ी। ठंडी और गीली। उसने झटके से मुड़कर देखा — लैब ख़ाली थी, शीशे की दीवारों के पार शहर की पीली रोशनियाँ स्थिर खड़ी थीं, जैसे वो भी साँस रोके कुछ देख रही हों। उसने वापस स्क्रीन की ओर देखा, और उसका ख़ून जम गया, क्योंकि स्कैनर ने पत्ते के साथ-साथ उसके उस हाथ की तस्वीर भी खींच ली थी जो शीशे के किनारे पर टिका था, और इन्फ्रारेड की उस धुँधली, भूतहा तस्वीर में उसकी कलाई पर एक और हाथ रखा था — किसी औरत का, पतली लंबी उँगलियों वाला, जिसकी एक उँगली में काँसे की एक पुरानी अँगूठी थी। उसने अपनी असली कलाई देखी। वहाँ कुछ नहीं था। पर वो गीली थी, और उसमें से कमल की डंडियों की ख़ुशबू आ रही थी।
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परेल के "सिल्वर ओक्स" टावर की तेईसवीं मंज़िल वाला फ़्लैट निरव और मेहर का तीन साल पुराना घर था, और उस रात वो ख़ाली था, क्योंकि मेहर सेंट एलिज़ाबेथ अस्पताल के ICU में नाइट शिफ़्ट पर थी, और उसका मैसेज फ़ोन की स्क्रीन पर चमक रहा था — "खाना फ़्रिज में है, गरम करके खाना, और हाँ, मुझे मिस करना, ये ऑर्डर है 😤"। निरव मुस्कुराया, खाना नहीं खाया, और बिस्तर पर लेटकर छत देखता रहा, जहाँ बाहर की बारिश की परछाइयाँ पानी की तरह बह रही थीं। दो बजकर चालीस मिनट पर बारिश फिर रुकी। बिल्कुल उसी तरह — एक झटके में।
बालकनी का दरवाज़ा, जिसे उसने ख़ुद अंदर से बंद किया था, खुला हुआ था, और उसका परदा बिना किसी हवा के धीरे-धीरे हिल रहा था, जैसे कोई उसके पीछे खड़ा साँस ले रहा हो। और फिर वो परदे के पीछे से निकली। निरव ने बाद में कई बार कोशिश की कि उसे शब्दों में बाँध सके, और हर बार नाकाम रहा, क्योंकि जो चीज़ उसने उस रात देखी, वो किसी औरत से ज़्यादा किसी मौसम जैसी थी — उसकी चमड़ी का रंग दीये की रोशनी में रखे पुराने काँसे जैसा था, गहरा और सुनहरा, उसके बाल घुटनों तक लंबे थे और पूरी तरह भीगे हुए, जिनसे पानी टपक रहा था पर फ़र्श पर गिरने की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी, उसकी आँखें नदी की तली में पड़े काले, चिकने पत्थरों जैसी थीं, और उसके बदन पर एक पतला, भीगा हुआ, कमल के रंग का कपड़ा था, जो उसे ढक कम रहा था और दिखा ज़्यादा रहा था। उसके पैरों में पायलें थीं — भारी, पुरानी, घुँघरुओं वाली — पर जब वो चली, तो कोई आवाज़ नहीं हुई, और वो ख़ामोशी किसी भी झंकार से ज़्यादा डरावनी थी।
"तुमने मुझे पढ़ा था," उसने कहा, और निरव ने ग़ौर किया कि उसकी आवाज़ उसके होंठ हिलने से पहले उसके कानों तक पहुँच गई थी, "याद है? इतनी मोहब्बत से मुझे बयालीस बरस से किसी ने नहीं पढ़ा। मैं भूखी थी, निरव। बहुत भूखी।" वो बिस्तर के किनारे आकर बैठी, और गद्दा उसके वज़न से ज़रा भी नहीं धँसा, और उसने अपनी ठंडी, गीली उँगलियाँ निरव के होंठों पर रखीं, और निरव को एहसास हुआ कि वो हिल नहीं पा रहा — और उससे भी डरावनी बात ये थी कि वो हिलना चाहता भी नहीं था। उसके अंदर एक ऐसी प्यास जागी थी जो उसे अपने बदन की नहीं लग रही थी, जैसे किसी और ने उसके सीने में अपना कुआँ खोद दिया हो। "एक चीज़ दोगे?" उसने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया, और उसकी साँस में बारिश की पहली बूँदों वाली मिट्टी की महक थी, "बहुत छोटी सी। तुम्हें उसकी कभी ज़रूरत भी नहीं पड़ी।"
"क्या?" निरव की आवाज़ उसके अपने गले में अजनबी लगी।
"तुम्हारी परछाईं।"
वो हँसा — नशे में डूबे उस आदमी की तरह, जिसे लगता है कि वो सपना देख रहा है और सपने में कुछ भी दे देने की कोई क़ीमत नहीं होती — और बोला, "ले लो।" और फिर उसने उसे अपने ऊपर झुकते देखा, उसके भीगे बालों को अपने चेहरे, अपनी छाती, अपने पेट पर किसी ठंडी रेशमी चादर की तरह फैलते महसूस किया, और कमरे का लैंप तीन बार झपका, और उस टिमटिमाती रोशनी में दीवार पर पड़ी उसकी अपनी परछाईं उसके बदन से अलग लय में हिलने लगी — धीरे, सुस्त, जैसे पानी के नीचे — और फिर वो परछाईं रुकी, और उसने अपना सिर घुमाकर, ख़ुद निरव को, उन दोनों को, देखना शुरू कर दिया। उसके बाद की रात निरव को टुकड़ों में याद रही — एक ठंडक जो धीरे-धीरे आग बन गई, एक ऐसी भूख जो जितनी मिटती उतनी बढ़ती, उसकी गर्दन पर किसी के दाँतों की हल्की सी चुभन, उसकी उँगलियों के नीचे एक ऐसी कमर जो कभी गरम होती तो कभी झील की तली जैसी ठंडी, और उसके कान में बार-बार दोहराया जाता एक शब्द, जो वो उस वक़्त समझ नहीं पाया था: "पहली… पहली आहुति…"
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सुबह सात बजे मेहर ने उसे बालकनी के फ़र्श पर सोया पाया, पूरी तरह भीगा हुआ, और उसने उसे झकझोरकर उठाया, डाँटा, उसके माथे पर हाथ रखकर बुख़ार देखा, और "पागल आदमी" कहते हुए उसके बालों को तौलिये से रगड़ा, और फिर चाय बनाने किचन में चली गई। निरव उठा — उसका सिर भारी था और बदन हल्का, अजीब तरह से हल्का, जैसे किसी ने रात में उसके कंधों से कोई ऐसा बोझ उतार लिया हो जो वो जन्म से उठाए घूम रहा था और जिसका उसे कभी पता ही नहीं चला था। उस मानसून में पहली बार बादल फटे, और सुबह की एक पतली, सुनहरी धूप खिड़की से अंदर आकर लिविंग रूम के सफ़ेद फ़र्श पर बिछ गई। निरव उस धूप में खड़ा हुआ और आँखों पर हाथ रखकर रोशनी रोकी — और फ़र्श पर उसकी परछाईं ने अपना हाथ आधा पल देर से उठाया।
उसने हाथ नीचे किया। परछाईं ने आधे पल बाद किया। उसने हाथ हिलाया। परछाईं ने देर से हिलाया, सुस्ती से, जैसे नींद में हो। और फिर परछाईं ने उसकी नक़ल करना बंद कर दिया। वो फ़र्श पर बस पड़ी रही, जबकि निरव काँपते हुए खड़ा था, और फिर उसने धीरे से अपना सिर बालकनी की ओर घुमाया, और निरव ने अपनी आँखों के सामने अपनी परछाईं को अपने पैरों से ऐसे अलग होते देखा जैसे कोई गीला कपड़ा चमड़ी से छीला जा रहा हो — एक ठंडी, खिंचती हुई सनसनी के साथ, जो उसकी एड़ियों से शुरू होकर रीढ़ तक चढ़ गई — और वो फ़र्श पर रेंगती हुई बालकनी तक गई, रेलिंग पर चढ़ी, और तेईसवीं मंज़िल से नीचे की धूसर हवा में पानी की तरह उँडेल गई। किचन से मेहर की आवाज़ आई — "चाय में चीनी कितनी? आज फीकी पियोगे या हमेशा की तरह बच्चों वाली?" निरव जवाब नहीं दे सका। वो धूप में खड़ा था, और धूप उसके पार ऐसे गुज़र रही थी जैसे वो वहाँ था ही नहीं।
उसी वक़्त उसके फ़ोन पर एक ईमेल आई। कपाड़िया ग्रुप के ऑफ़िस से। "मिस्टर कपाड़िया को लगा, आप देखना चाहेंगे कि डिब्बा कहाँ से आया है।" साथ में एक तस्वीर थी — एक डूबे हुए मंदिर के गर्भगृह की दीवार, टॉर्च की रोशनी में चमकती, जिस पर एक औरत और एक मर्द एक-दूसरे में गुँथे हुए उकेरे गए थे। निरव ने तस्वीर को ज़ूम किया, और फिर ज़ूम किया, और फिर उसके हाथ से फ़ोन लगभग छूट गया, क्योंकि उस पत्थर के मर्द का चेहरा उसका अपना चेहरा था — वही तीखी नाक, वही पतले होंठ, और बाईं भौंह के बीच से गुज़रता वही कटा हुआ निशान जो उसे सात साल की उम्र में साइकिल से गिरने पर मिला था। और उस पत्थर की औरत के एक हाथ में, जो उस मर्द की पीठ पर टिका था, पत्थर में ही उकेरी हुई एक चीज़ थी, जिसे वो किसी दुपट्टे की तरह, बड़े प्यार से, अपनी मुट्ठी में पकड़े हुए थी।
एक आदमी की परछाईं।
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