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एपिसोड 10 — दसवीं आहुति: मृत्यु

Pretika · Yakshini Stories · 26 मिनट

Writer
Pretika
Story
वामिका — उल्टी साधना
Chapter
10 of 10
Category
Yakshini Stories
Reading time
26 min
Words
5099
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

मौत इंसान की आख़िरी दौलत है। वो इकलौती चीज़ जो सच में उसकी अपनी होती है — जिसे कोई राजा नहीं छीन सकता, कोई साहूकार गिरवी नहीं रख सकता, कोई औरत उधार नहीं माँग सकती। आज रात मैं उससे वही माँगूँगी। और तुम — हाँ, तुम, जो इतनी रात गए, शायद अकेले, शायद किसी खिड़की के पास, इस पन्ने को पढ़ रहे हो — तुम भी गवाह रहोगे। तुमने मुझे नौ रातों तक पढ़ा है। ज़ोर से नहीं, मन ही मन सही। पर पढ़ा तो है। और मैंने तुमसे पहले ही एपिसोड में कहा था — जो मुझे पढ़ेगा, मैं उसे पढ़ूँगी।
बारिश ऐसे गिरी जैसे बयालीस साल का सारा रुका हुआ आसमान एक ही रात में ख़ाली हो जाना चाहता हो। मोटी, भारी, बर्फ़ीली बूँदें, जो सूखे जलाशय की फटी हुई ज़मीन पर गिरते ही उसकी दरारों में समा जातीं, और कुछ ही मिनटों में वो दरारें छोटी-छोटी नालियाँ बन गईं, और नालियाँ धाराएँ, और मेहर उन धाराओं के बीच, कीचड़ में टखनों तक धँसती, फिसलती, गिरती, फिर उठती, उस काले शिखर की ओर बढ़ती रही जिसके पास लालटेनों की पीली रोशनी तूफ़ान में किसी डूबते जहाज़ की बत्तियों की तरह टिमटिमा रही थी। उसने टॉर्च बंद कर दी थी। बिजलियाँ काफ़ी थीं। हर कड़क के साथ पूरा जलाशय एक पल के लिए सफ़ेद दिन में बदल जाता, और उस पल में वो अगले बीस क़दम का रास्ता याद कर लेती, और फिर अँधेरे में उन्हें गिनती हुई चलती।
मंदिर के आधे धँसे दरवाज़े के बाहर शिंदे खड़ा था — बारिश में भीगता, एक काला रेनकोट पहने, उसका दायाँ हाथ कमर पर बँधे होलस्टर के पास — और वो बाहर की ओर देख रहा था, पर अंदर से आती आवाज़ों की ओर उसके कान लगे हुए थे, क्योंकि गर्भगृह से एक आदमी की गहरी, जवान आवाज़ में कोई श्लोक गूँज रहा था, और उस आवाज़ के साथ-साथ पत्थर की दीवारें हल्के-हल्के काँप रही थीं, जैसे कोई बहुत बड़ा घंटा बहुत धीरे बज रहा हो। मेहर मंदिर की दीवार से सटकर, कीचड़ में पेट के बल, उसके पीछे की ओर सरकी। उसकी मुट्ठी में एक इंजेक्शन था — ढक्कन दाँतों से खींचकर फेंका हुआ, सुई नंगी। आठ साल में उसने हज़ारों इंजेक्शन लगाए थे। कभी किसी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ नहीं।
बिजली कड़की। शिंदे मुड़ा — शायद कोई आवाज़ सुनकर, शायद किसी जानवर वाली सहज बुद्धि से — और उसने उसे देखा, कीचड़ में उठती हुई, और उसका हाथ होलस्टर पर गया, और मेहर उससे पहले उस पर थी। वो उससे डेढ़ फ़ुट छोटी थी और उसका आधा वज़न, पर उसमें एक ऐसी चीज़ थी जो शिंदे में नहीं थी — खोने के लिए कुछ न होना। उसने अपना पूरा वज़न उसके सीने पर डाला, और दोनों कीचड़ में गिरे, और शिंदे का बड़ा, भारी हाथ उसकी गर्दन पर कसा, और उसकी साँस रुकी, और उसकी आँखों के आगे काले धब्बे नाचने लगे — और उसने, बिना देखे, सिर्फ़ उँगलियों की याद से, शिंदे की गर्दन के बाईं ओर, उस पुराने जले के निशान के ठीक नीचे, जहाँ बाहरी जुगुलर नस होती है, सुई घुसाई और पूरी दवा एक झटके में उँडेल दी।
शिंदे की पकड़ ढीली पड़ी। उसने पिस्तौल निकाली, और एक गोली चली — आसमान की ओर, बेमतलब, उसकी गरज बिजली की गरज में खो गई — और वो घुटनों पर आया, और उसकी आँखें मेहर पर टिकी रहीं, हैरानी से, जैसे उसे यक़ीन न हो रहा हो कि एक नर्स ने उसके साथ ये किया, और फिर वो आगे की ओर गिरा — चेहरे के बल — ज़मीन की एक चौड़ी दरार में, जो अब तक बारिश के पानी से लबालब भर चुकी थी। मेहर ने उसे पलटने के लिए हाथ बढ़ाया। और फिर रोक लिया। और उसने उसे वहीं छोड़ दिया — उस पानी में, बेहोश, औंधे मुँह — और बहुत बाद में, जब वो ये रात याद करती, तो उसे इस बात पर हैरानी होती कि उस पल उसे कुछ भी महसूस नहीं हुआ था। न डर, न पछतावा। जैसे उसकी भी कोई आहुति, बिना माँगे, चुपचाप ले ली गई हो।
✦ ✦ ✦
गर्भगृह में दो लालटेनें जल रही थीं, और उनकी रोशनी में मेहर ने वो देखा जिसे देखने के लिए वो मुंबई से हज़ार किलोमीटर चलकर आई थी — और जिसे देखकर उसका दिल एक पल के लिए सच में रुक गया।
निरव ज़ंजीरों में था, घुटनों के बल, उस पत्थर की दीवार के सामने, और उसकी बाईं हथेली से सुनहरा-लाल ख़ून बह रहा था, और उस हथेली को एक दूसरी हथेली ने कसकर पकड़ रखा था — एक ऐसी हथेली जो हाथ नहीं, फटी हुई, टपकती, काई लगे सिक्कों से भरी कीचड़ थी — और वो हथेली एक ऐसे आदमी की थी जो अब आदमी कम और किसी सूखते तालाब की तली से निकाली गई मूर्ति ज़्यादा लगता था। धनंजय कपाड़िया अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ था — किसी ऐसी ताक़त से जो उसके सड़े हुए बदन में नहीं होनी चाहिए थी — और उसका आधा चेहरा उखड़ चुका था, और उसके नीचे की गीली, काली मिट्टी में उसकी जवान, भूखी आँखें जल रही थीं, और उसके होंठ — जो बचे थे — वो टेढ़ा, ज़ंजीर की कड़ियों जैसा श्लोक पढ़ रहे थे, और हर शब्द के साथ उन दोनों की जुड़ी हुई हथेलियों से एक पतली, सुनहरी, धुएँ जैसी रोशनी उठ रही थी।
और बारिश रुकी।
बाहर, एक झटके में, पूरा तूफ़ान थम गया — गरज, बिजली, हवा, सब — और गर्भगृह में एक ऐसा सन्नाटा उतरा कि मेहर को लालटेन की लौ का जलना सुनाई देने लगा। और पत्थर की दीवार से, उस पत्थर की औरत से, जिसकी आँखों से पानी बह रहा था — वो निकली। दीवार से बाहर क़दम रखती हुई, जैसे कोई पानी से निकलती है, पत्थर उसके बदन से पानी की तरह फिसलता हुआ, और दीवार पर पीछे सिर्फ़ पत्थर का वो मर्द बचा, जिसका चेहरा निरव का था, अब अकेला, किसी को आलिंगन में भरे हुए जो वहाँ नहीं था।
वामिका।
और धनंजय ने अपनी आवाज़ ऊँची की, और श्लोक का आख़िरी हिस्सा चिल्लाकर पढ़ा — और उन दोनों की जुड़ी हुई हथेलियों से वो सुनहरी रोशनी ज़ंजीरों में बदल गई। असली ज़ंजीरें। चमकती हुई, पिघले सोने की, भारी, खनकती हुई — जो हवा में साँपों की तरह लहराईं और वामिका की ओर लपकीं, और उसकी कलाइयों के चारों ओर लिपट गईं, उसके टखनों के चारों ओर, उसकी कमर के चारों ओर, उसकी गर्दन के चारों ओर — और वो चीख़ी। एक ऐसी चीख़ जो मेहर ने कभी किसी इंसान या जानवर के गले से निकलते नहीं सुनी थी — एक ऐसी आवाज़, जैसे कोई नदी पत्थरों पर पटकी जा रही हो — और वो घुटनों पर गिरी, उसके लंबे बाल गीले फ़र्श पर फैल गए, और ज़ंजीरें और कसीं।
"बयालीस बरस!" धनंजय कपाड़िया चिल्लाया, और उसकी आवाज़ में जीत थी, और पागलपन, और सड़ी हुई भूख, और उसके चेहरे से सिक्के बारिश की तरह गिर रहे थे, "बयालीस बरस, वामिका! तूने मुझे छोड़ा था, याद है? नौवीं के बाद? तूने मेरी ओर देखा तक नहीं था कल रात! अब देख! अब तू मेरी है! मेरी ज़ंजीर में! दे दसवीं! मेरे बेटे की मौत मुझे दे! अब! हुक्म है मेरा!"
"नहीं—" मेहर आगे बढ़ी, और दोनों ने उसकी ओर देखा — धनंजय ने हैरानी से, और वामिका ने, ज़मीन पर, ज़ंजीरों में, अपने गीले बालों के बीच से, एक ऐसी नज़र से जिसे मेहर पढ़ नहीं पाई — और मेहर ने अपनी जेब से वो पीला, कई बार तह किया हुआ काग़ज़ निकाला और उसे खोला, और लालटेन की रोशनी में उन उल्टे अक्षरों और उनके नीचे डॉक्टर सुधा के लिखे उच्चारणों को देखा, और अपने होंठ खोले पहला शब्द बोलने के लिए—
"पढ़ोगी," वामिका ने कहा — ज़मीन से, ज़ंजीरों के बीच से, बिना चीख़े, बहुत शांत आवाज़ में — "तो मैं फिर क़ैद हो जाऊँगी। पत्तों में। पानी के नीचे। और वो भी, मेहर। वो अब आधा मेरा है। नौ आहुतियाँ मेरे पास हैं। जो मेरे साथ क़ैद होगा, वो भी पानी के नीचे जाएगा। मेरे साथ। अगले बयालीस बरस। या अगले बारह सौ।"
मेहर का हाथ काँपा। उसने निरव की ओर देखा — ज़ंजीरों में, घुटनों पर, उसकी सुनहरी ख़ून वाली हथेली धनंजय की सड़ी हथेली में जकड़ी हुई — और निरव ने उसकी ओर देखा, और उसकी आँखों में कोई पहचान नहीं थी, पर कुछ था — कुछ बहुत दूर का, बहुत धुँधला, जैसे किसी ऐसे गाने की धुन जिसके बोल याद न हों। और मेहर ने काग़ज़ नीचे कर लिया।
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और तब वामिका हँसी।
पहले बहुत धीरे। फ़र्श पर, ज़ंजीरों में, उसके कंधे हिले, और एक धीमी, गहरी, गले से उठती हँसी निकली, जैसे कोई बहुत पुराना मज़ाक़ याद आ गया हो। फिर तेज़। फिर इतनी तेज़ कि गर्भगृह की दीवारें उससे गूँजने लगीं, और लालटेनों की लौ काँपी, और धनंजय कपाड़िया का विजयी चेहरा — जो बचा था — धीरे-धीरे बदलने लगा, जैसे किसी को एहसास हो रहा हो कि जिस पुल पर वो खड़ा है, उसके नीचे पानी नहीं, बल्कि ख़ाली खाई है।
और वामिका उठी। ज़ंजीरों के साथ। और वो ज़ंजीरें — पिघले सोने की, भारी, खनकती हुई — उसके बदन से ऐसे पिघलने लगीं जैसे बारिश में रखी चीनी की मूर्ति। टपकती हुई, बहती हुई, उसकी काँसे जैसी चमड़ी पर सुनहरी लकीरें बनाती हुई, और फ़र्श पर गिरकर गीली रेत बनती हुई। वो पूरी खड़ी हुई, और अपने गीले बाल पीछे झटके, और धनंजय कपाड़िया की ओर देखा — बयालीस बरस में पहली बार, सीधे उसकी आँखों में देखा — और उसकी आँखों में जो था, उसे देखकर मेहर समझ गई कि डॉक्टर सुधा ने उन्हें क्या कहा था। "उसकी आँखों में… मैं तुम्हें नहीं बता सकती उनमें क्या था।"
"तुम्हें सच में लगा था, धनंजय," वामिका ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था, बस एक बर्फ़ीली, बारह सौ बरस पुरानी शांति, "कि तुमने ये जलाशय सुखाया? तुम्हारे फाटक खुलने से दो महीने पहले से मैं इसे पी रही थी। बूँद-बूँद। रात-रात। जब भी बारिश रुकती। पूछ लेना मछुआरों से — वो जानते हैं। तुम्हारे फाटकों ने बस वो बहाया जो मैं बचा चुकी थी।" उसने एक क़दम आगे बढ़ाया, और धनंजय एक क़दम पीछे हटा, और उसकी एड़ी से सिक्के टूटकर गिरे। "और ये ज़ंजीर वाला श्लोक? जो तुम्हें उन पत्तों की सबसे गहरी परत में मिला, जो तुम्हारे लोगों ने महीनों खोजकर निकाला? कभी सोचा कि वो किसने लिखा था? उन पत्तों पर कोई भी अक्षर मेरी मर्ज़ी के बिना नहीं उगता, धनंजय। वो मैंने लिखा था। तुम्हारे लिए। चारा। बिल्कुल वैसे ही जैसे मछुआरा काँटे पर केंचुआ लगाता है।"
"नहीं…" धनंजय ने कहा, और उसकी जवान आवाज़ पहली बार बूढ़ी हुई।
"वो नौ चीज़ें मेरी थीं," वामिका ने कहा, और अब वो उसके ठीक सामने थी, इतनी पास कि उसके भीगे बालों का पानी उसकी सड़ी हुई चमड़ी पर गिर रहा था और वहाँ छोटे-छोटे गड्ढे बना रहा था, "मैंने उन्हें उधार दिया था — एक प्रेमी को। और तुम उन्हें चुराकर भागे। बयालीस बरस मैं पानी के नीचे बैठी सोचती रही कि उन्हें वापस कैसे लूँ। और पत्तों में लिखा है — दी हुई आहुति वापस ली जा सकती है। सिर्फ़ एक तरह से। अगर लेने वाला ख़ुद चलकर, अपना ख़ून लेकर, किसी चलती साधना के घेरे में क़दम रखे।" उसने झुककर उनकी जुड़ी हुई हथेलियों को देखा — निरव की सुनहरी, धनंजय की कीचड़ वाली — और मुस्कुराई। "तुमने रखा। अपने हाथ से। अपने ख़ून से। मेरे घेरे में। धन्यवाद, धनंजय।"
और उसने उसे चूमा।
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जो उसके बाद हुआ, मेहर ने उसे ज़िंदगी भर हर रात अपनी बंद आँखों के पीछे देखा, और कभी किसी को नहीं बताया, क्योंकि ऐसे कोई शब्द बने ही नहीं थे जिनमें उसे कहा जा सके। वामिका ने उसे नहीं चूमा था — उसने उससे कुछ वापस खींचा था। और हर खिंचाव के साथ, एक-एक करके, उसी क्रम में जिसमें वो दी गई थीं, नौ आहुतियाँ बयालीस बरस बाद अपने असली मालिक के पास लौटीं — और हर एक अपने साथ बयालीस बरस का सूद लेकर आई।
पहले परछाईं। पत्थर की उस दीवार से — जहाँ पत्थर का मर्द अकेला खड़ा था — एक गाढ़ी, काली, तेल जैसी चीज़ रिसने लगी, और फ़र्श पर गिरी, और एक आकार में सिमटी — एक आदमी का आकार, बेल-बॉटम वाला, खुले कॉलर वाला, सत्तर के दशक के बालों वाला — और वो परछाईं, जो बयालीस बरस से किसी पत्थर की औरत की मुट्ठी में क़ैद थी, फ़र्श पर रेंगती हुई धनंजय के पैरों तक आई, और उनसे चिपक गई। वापस। पर उसकी नक़ल करने के लिए नहीं। उसे पकड़ने के लिए।
फिर स्वाद। धनंजय का मुँह खुला, और उसकी सड़ी हुई ज़बान पर बयालीस बरस का हर वो स्वाद एक साथ लौटा जो उसने कभी नहीं चखा था — और वो सब सड़ चुके थे। बयालीस साल की सड़ी शराब, सड़ा मांस, सड़ा सोना, और अपने ही बदन की सड़ांध का स्वाद, और वो उल्टी करने लगा, और उसके मुँह से काला, गाढ़ा, जलाशय की तली वाला पानी निकला, सिक्कों के साथ।
फिर दर्द। और मेहर ने उसे चीख़ते सुना — और उस चीख़ में एक आदमी की नहीं, बयालीस बरस की चीख़ थी। हर वो चोट जो उसे कभी नहीं लगी थी, हर वो बीमारी जो उसने कभी महसूस नहीं की थी, हर वो सड़ती हुई दरार जो बयालीस बरस से उसके बदन में चुपचाप गहरी होती जा रही थी — सब एक ही पल में, एक साथ, उसकी हर नस में — और वो ज़मीन पर गिरा, और तड़पने लगा, और उसकी परछाईं उसे पकड़े रही।
फिर प्रतिबिंब। गर्भगृह की गीली, चमकती, पानी से तर पत्थर की दीवारों ने उसे देखना शुरू किया — हर दीवार पर, हर गीली सतह पर, उसका असली चेहरा उभरा, बिना मोम के, बिना मेकअप के, बिना किसी वरदान के — एक अठहत्तर साल के आदमी का, जिसने अपनी सेक्रेटरी का दिल रुकवाया था, अपने बेटे की ज़िंदगी बेची थी, एक अंधी औरत से उसकी आँखें और एक मछुआरे से उसकी ज़िंदगी ली थी — और वो चेहरा उन दीवारों से उसे घूर रहा था।
फिर नाम। और वो चीख़ते-चीख़ते अचानक रुका, और उसने ऊपर देखा, हैरान, खोया हुआ, और उसके होंठ हिले — "मैं… मैं कौन… मेरा नाम… मेरा…" — और वो याद नहीं कर पाया। अठहत्तर साल का वो नाम, जो अख़बारों के बिज़नेस पन्नों पर हर हफ़्ते छपता था, जिसे सुनकर मंत्री खड़े हो जाते थे — वो उसकी अपनी ज़बान से फिसल गया।
फिर सपने — बयालीस बरस के सारे सपने, जो उसने कभी नहीं देखे थे, एक साथ, और वो सब बुरे थे। फिर धड़कन — और उसके सीने में बयालीस बरस की वो सारी धड़कनें जो उसके दिल ने कभी नहीं धड़की थीं, एक ही पल में, हज़ारों, लाखों, एक-दूसरे पर चढ़ती हुई, जैसे किसी ने किसी ढोल पर एक साथ सौ हाथ मार दिए हों, और उसका सीना अंदर से फटने लगा। फिर स्मृति — हर वो चेहरा जिसे उसने भुला दिया था। कामिनी। सुधा। भीमा। इरफ़ान। फिर साँस — और उसका गला घुटा, और उसकी छाती उठी, और कोई हवा अंदर नहीं गई, क्योंकि बयालीस बरस की सारी साँसें एक साथ बाहर निकलना चाहती थीं और अंदर आने के लिए कोई जगह नहीं बची थी।
और फिर धनंजय कपाड़िया टूट गया। सचमुच। जैसे सूखी मिट्टी का कोई ढेला टूटता है। उसकी दरारें चौड़ी हुईं, गहरी हुईं, और एक-दूसरे से मिल गईं, और उसका पूरा बदन — बाँहें, छाती, चेहरा, वो जवान भूखी आँखें — भरभराकर गिरा, और फ़र्श पर एक ढेर बचा। गीली, काली, सड़ती गाद का एक ढेर, जिसमें सैकड़ों, हज़ारों हरे, काई लगे सोने के सिक्के चमक रहे थे। और उस ढेर के ऊपर उसकी परछाईं थी, जो अब भी उससे चिपकी थी, और उस परछाईं ने धीरे से, बड़े प्यार से, उस पूरे ढेर को अपनी बाहों में समेटा — और फ़र्श की एक दरार में खींच लिया। नीचे। ज़मीन के अंदर। और दरार बंद हो गई।
गर्भगृह में सिर्फ़ तीन लोग बचे। और एक दीवार, जिस पर पत्थर का एक मर्द किसी ख़ाली जगह को आलिंगन में भरे खड़ा था।
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वामिका निरव की ओर मुड़ी। ज़ंजीरें उसके बदन से गिर चुकी थीं — धनंजय के जाते ही — और वो ख़ाली हाथों, खुली हथेली, ख़ून से भीगा, घुटनों पर बैठा था। उसने उसके सामने घुटने टेके, और उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया — उसी तरह, जैसे पहली रात लिया था — और बहुत धीमे से पूछा:
"दसवीं दोगे, मेरी जान? अपनी मृत्यु? मुझे?"
"नहीं!" मेहर आगे आई, और दोनों के बीच घुटनों पर गिर पड़ी, और उसने वामिका के हाथ पकड़ लिए — उसके ठंडे, गीले, काँसे जैसे हाथ — और मेहर को उनसे डर नहीं लगा, और ये बात उसे बाद में सबसे ज़्यादा डराती रही। "नहीं, सुनो, सुनो मेरी बात, मैं… मैं एक सौदा करना चाहती हूँ।" उसकी आवाज़ टूट रही थी, पर उसने बोलना नहीं छोड़ा। "उसे छोड़ दो। उसकी नौ चीज़ें उसे लौटा दो — उसकी परछाईं, उसका स्वाद, उसकी याद, सब — और बदले में… मेरी ले लो। मेरी मौत ले लो। मैं दूँगी। मर्ज़ी से। अभी। तुम्हें पूछना नहीं पड़ेगा। मैं ख़ुद कह रही हूँ — हाँ। मेरी ले लो।"
वामिका ने उसकी ओर देखा। बहुत देर तक। और उसकी आँखों में — उन नदी की तली वाले काले पत्थरों में — मेहर ने कुछ पिघलते देखा। "तुम उससे सच में प्यार करती हो," वामिका ने कहा, और ये सवाल नहीं था। "वो तुम्हें पहचानता तक नहीं, और तुम उसके लिए मरने को तैयार हो।" उसने बहुत धीरे से, लगभग प्यार से, मेहर के गाल पर अपनी उँगली फेरी, और उसके आँसू की एक बूँद उठाई, और उसे अपने होंठों पर रखा, और चखा। "नमक। बहुत सारा। और शहद की एक धार।" फिर उसने अपना हाथ हटाया। "पर आहुति वही दे सकता है जिसकी साधना हो रही है, मेहर। ये मेरा नियम नहीं। ये मेरा श्राप है। उससे पूछो।"
मेहर निरव की ओर मुड़ी। और उसने उसे पुकारना चाहा — उसका नाम, वो नाम, जो तीन साल तक हर सुबह उसके होंठों पर सबसे पहला शब्द होता था — और वो नहीं आया। उसके होंठ खुले, और कुछ नहीं निकला, बस एक टूटी हुई साँस। "सुनो…" उसने कहा, "तुम… सुनो… मेरी ओर देखो… प्लीज़… तुम…"
निरव ने उसकी ओर देखा।
और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — उसकी आँखों में कुछ जागा। बहुत दूर से। बहुत गहराई से। किसी ऐसी जगह से जहाँ तक कोई आहुति नहीं पहुँच सकती थी, जहाँ न स्वाद था, न याद, न नाम — सिर्फ़ हड्डियाँ, और हड्डियों में बसी कोई पुरानी धुन। उसने अपना ख़ून से भीगा हाथ उठाया, और मेहर के चेहरे को छुआ, और उसकी उँगलियाँ उसके बाएँ कान के पीछे गईं — बिना सोचे, बिना जाने — ठीक उस जगह, जहाँ एक छोटा सा तिल था। और उसके होंठों से, बिना साँस के, एक शब्द निकला:
"मेहर?"
मेहर का पूरा बदन काँप गया। उसने उसका हाथ अपने गाल पर दबा लिया, और हँसी, और रोई, और एक ही साथ दोनों। "हाँ… हाँ, मैं… मैं हूँ… तुम्हें याद है… तुम्हें…"
"नहीं," उसने कहा, बहुत धीरे, बहुत ईमानदारी से। "मुझे याद नहीं। मुझे नहीं पता तुम कौन हो।" उसकी उँगली अब भी उस तिल पर थी। "पर मेरे हाथ जानते हैं। मेरी हड्डियाँ जानती हैं। और वो मुझसे कह रही हैं कि तुम्हें ज़िंदा रहना चाहिए।"
फिर उसने अपना हाथ उसके गाल से हटाया। और वामिका की ओर मुड़ा।
"तुम्हारी मौत नहीं," उसने मेहर से कहा, बिना उसकी ओर देखे। "मेरी।"
और फिर, वामिका की आँखों में देखते हुए, उसने कहा — और इस बार उसकी आवाज़ में कोई नशा नहीं था, कोई धुंध नहीं, कोई जादू नहीं, बल्कि एक पूरी, साफ़, जागी हुई मर्ज़ी — "मैं मरना नहीं चाहता। और तुम्हारे बिना जीना भी नहीं चाहता। मैं तुम्हारा होना चाहता हूँ। दसवीं ले लो।"
मेहर ने बाद में सैकड़ों रातें इस सवाल के साथ गुज़ारीं कि उसने ऐसा क्यों कहा। क्या उसने उसे बचाने के लिए कहा — ताकि उसे अपनी मौत न देनी पड़े? या इसलिए कि वो सच में, पूरे दिल से, उस चीज़ का होना चाहता था? क्या उसकी हड्डियों ने उसे बचाया, या उसे छोड़ा? उसे कभी जवाब नहीं मिला। और शायद इसका कोई जवाब था भी नहीं।
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वामिका ने उसे चूमा। और मेहर ने, एक हाथ की दूरी पर बैठे हुए, उसे बदलते देखा।
उसकी चमड़ी का रंग बदलने लगा — उसकी गर्दन से शुरू होकर, नीचे और ऊपर फैलता हुआ — एक इंसान के गेहुएँ रंग से गहरा होता हुआ, सुनहरा होता हुआ, पुराने काँसे जैसा, दीये की लौ में चमकते धातु जैसा। उसके बाल लंबे होने लगे, गीले होने लगे, उनसे पानी टपकने लगा जो ज़मीन पर गिरते ही सुनहरी धूल बन जाता था। उसकी हथेली का घाव बंद हुआ, और उसमें से अब ख़ून नहीं, कमल की डंडी का गाढ़ा हरा रस टपका और सूख गया। और जब उसने अपनी आँखें खोलीं — मेहर ने देखा, और उसकी साँस रुक गई — तो वो आँखें अब भूरी नहीं थीं, जैसी तीन साल से थीं, जैसी वो हर सुबह उठकर सबसे पहले देखती थी। वो काली थीं। नदी की तली में पड़े दो चिकने, गीले, चमकदार पत्थरों जैसी।
और दीवार पर, पत्थर का वो मर्द — जिसका चेहरा निरव का था — उसके चेहरे में एक लंबी दरार पड़ी, माथे से ठोड़ी तक, और फिर पूरी दीवार में, और पूरा मंदिर काँपा, और ज़मीन के नीचे से, गहराई से, एक आवाज़ आई — पानी की। बहुत सारे पानी की। जैसे बयालीस बरस से किसी ने कोई साँस रोक रखी हो और अब उसे छोड़ रहा हो।
गर्भगृह के फ़र्श की दरारों से पानी फूटने लगा।
"भागो," वामिका ने मेहर से कहा — उसकी ओर बिना देखे, निरव को अपनी बाहों में लिए हुए — "जलाशय वापस आ रहा है। मैंने जो पिया था, उसे लौटा रही हूँ। सारा। एक साथ।"
मेहर उठी — और उठते-उठते उसकी नज़र फ़र्श पर, उस सिक्कों वाली गाद के बचे-खुचे निशान के पास, एक चीज़ पर पड़ी जो धनंजय अपने साथ लाया था — ताँबे का वो डिब्बा, जिसका ढक्कन खुला था और जिसमें ताड़ के चालीस पत्ते थे। चालीसों। चालीसवाँ भी, नामों वाला, जो शिंदे ने लैब से चुराया था। उसने डिब्बा उठाया, सीने से लगाया, और दौड़ी।
वो आधे धँसे दरवाज़े से पेट के बल निकली, और बाहर का जलाशय अब जलाशय नहीं था — वो एक ज़िंदा चीज़ था, जो चारों ओर से फूट रहा था, हर दरार से, हर गड्ढे से, ज़मीन के नीचे से ऊपर की ओर उबलता हुआ, और बारिश फिर से गिरने लगी थी, पूरे ज़ोर से, और मेहर उस उबलते, चढ़ते पानी में दौड़ी, पहले टखनों तक, फिर घुटनों तक, फिर कमर तक, किनारे की ओर, पहाड़ी की ओर, डोंगरपाड़ा के टिमटिमाते दीयों की ओर, डिब्बे को अपने सिर के ऊपर उठाए — और उसके पीछे, कहीं, एक आवाज़ उसके साथ-साथ चल रही थी, उसके कानों में नहीं, उसके सिर के अंदर, वामिका की आवाज़, नरम और थकी हुई:
"श्राप कभी मरता नहीं, मेहर। बस करवट बदलता है।"
जब वो किनारे पर पहुँची, और कीचड़ में गिरी, और हाँफती हुई, खाँसती हुई, डिब्बे को सीने से भींचे पलटी — तो उसने देखा कि जलाशय भर चुका था। पूरा। किनारों तक। जैसे वो कभी सूखा ही न था। और वो काला शिखर आख़िरी बार पानी के ऊपर दिखा — किसी डूबते आदमी की आख़िरी उँगली की तरह — और फिर डूब गया।
और पानी की सतह पर, बिजली की एक लंबी, सफ़ेद चमक में, दो आकृतियाँ खड़ी थीं। पानी पर। जैसे वो ज़मीन हो। एक-दूसरे का हाथ थामे। दोनों के लंबे, भीगे बाल हवा में लहराते हुए। दोनों की चमड़ी पुराने काँसे की तरह चमकती हुई।
और उनमें से एक ने — लंबा, दुबला, बाईं भौंह पर एक कटे निशान वाला — बहुत देर तक किनारे की ओर देखा। सीधे उसकी ओर।
फिर बिजली बुझी। और पानी पर कोई नहीं था।
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उपसंहार — तीन महीने बाद
मुंबई में दिसंबर था, और दिसंबर में मुंबई में बारिश नहीं होती — ये बात हर मुंबईकर बचपन से जानता है, जैसे ये जानता है कि लोकल ट्रेन में दरवाज़े के पास खड़े होना चाहिए और वड़ा पाव के साथ सूखी चटनी माँगनी चाहिए। पर उस रात, दिसंबर की उन्नीस तारीख़ को, शाम सात बजे अचानक आसमान काला हुआ, और बारिश शुरू हुई — मोटी, भारी, मानसून जैसी — और टीवी चैनलों ने इसे "सौ साल में पहली बार" कहा, और मौसम विभाग ने इसे "एक असामान्य पश्चिमी विक्षोभ" कहा, और परेल के "सिल्वर ओक्स" टावर की तेईसवीं मंज़िल पर, अपने फ़्लैट में अकेली बैठी मेहर ने इसे कुछ नहीं कहा। उसने बस खिड़की के पास एक कुर्सी खींची, और बैठ गई, और इंतज़ार करने लगी।
उसने फ़्लैट नहीं छोड़ा था। सबने कहा था छोड़ दो — उसकी माँ ने, उसकी दोस्तों ने, अस्पताल की हेड नर्स ने — कि यहाँ इतनी यादें हैं। पर उसके लिए यहाँ यादें नहीं थीं। यादें उससे छिन चुकी थीं — उसकी नहीं, उसकी, जिसके साथ वो यहाँ रहती थी। यहाँ सिर्फ़ चीज़ें थीं। उसकी कमीज़ें, जो अब भी अलमारी में टँगी थीं। उसकी किताबें। उसका ख़ाली कप, जिसमें वो "बच्चों वाली" चाय पीता था। और लिविंग रूम की मेज़ पर, एक काले कपड़े पर, ताँबे का एक डिब्बा, जिसमें ताड़ के चालीस पत्ते थे।
वो अब भी उसका नाम नहीं ले पाती थी। उसने कोशिश करना छोड़ दिया था।
रात दो बजकर चालीस मिनट पर बारिश रुकी।
एक झटके में। जैसे किसी ने आसमान का नल बंद कर दिया हो। और घड़ी की टिक-टिक रुक गई। और फ़्रिज की भनभनाहट। और शहर का वो दूर का, हमेशा रहने वाला शोर — ट्रैफ़िक, हॉर्न, कुत्ते — सब। और उस सन्नाटे में मेहर ने अपनी साँस सुनी, और उसे वो शोर लगी।
वो उठी, और बेडसाइड लैंप जलाया, और उसकी पीली रोशनी में दीवार पर उसकी परछाईं पड़ी। उसने अपना हाथ उठाया, धीरे से, और देखा।
परछाईं ने अपना हाथ आधा पल देर से उठाया।
मेहर चीख़ी नहीं। वो मुस्कुराई। और उसने अलमारी से वो लाल सिल्क की नाइटी निकाली जो उसे पिछली सालगिरह पर मिली थी, और पहनी, और आईने के सामने बैठकर अपनी आँखों में काजल लगाया — धीरे, सावधानी से, जैसे किसी बहुत पुराने प्रेमी से मिलने से पहले लगाया जाता है — और फिर उठकर बालकनी का दरवाज़ा खोल दिया। पूरा। और परदा बिना किसी हवा के हिलने लगा।
वो परदे के पीछे से आया। लंबा, दुबला, उसकी चमड़ी दीये की लौ में रखे पुराने काँसे जैसी, उसके बाल कंधों से नीचे तक, गीले, जिनसे पानी टपक रहा था और फ़र्श पर गिरने की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। उसकी आँखें नदी की तली के काले पत्थर थीं। और उसकी बाईं भौंह पर, जो अब किसी मूर्ति की भौंह जैसी तराशी हुई लगती थी, वो पुराना कटा निशान अब भी था।
"मुझे तुम्हारा नाम याद नहीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ उसके होंठ हिलने से पहले मेहर तक पहुँची — गहरी, गूँजती हुई, जैसे पानी किसी अँधेरी गुफ़ा में धीरे-धीरे भरता है। "मुझे याद नहीं कि हम कहाँ मिले थे, या तुमने मुझे क्या कहकर बुलाया था, या तुम अपनी चाय में कितनी चीनी डालती हो। पर तीन महीने से, हर रात, मेरी हड्डियाँ किसी को ढूँढ़ रही थीं। और आज रात वो मुझे यहाँ ले आईं।"
"मैंने तुम्हें कभी भूलने नहीं दिया," मेहर ने कहा। "तुम भूल गए, पर मैंने नहीं भूलने दिया।"
वो उसके पास आया, और उसने उसके गाल को छुआ — ठंडी, गीली उँगलियाँ — और उसकी उँगली बिना सोचे उसके बाएँ कान के पीछे चली गई। उस तिल पर। "अब मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे कोई नहीं बुलाता। कोई साधक मेरे लिए दीया नहीं जलाएगा। कोई मंत्र मेरा नाम नहीं लेगा — मेरा तो कोई नाम ही नहीं है, सिवाय उसके जो उसने मुझे दिया था। श्राप ने करवट बदली है, मेहर। अब मुझे ख़ुद साधना करनी होगी। किसी इंसान की। दस आहुतियाँ। उसकी मर्ज़ी से।"
"और वो?" मेहर ने पूछा। "वामिका?"
उसने कोई जवाब नहीं दिया। पर मेहर ने उसके कंधे के ऊपर से, बालकनी के काँच के दरवाज़े में देखा — उस काँच में जिसमें अब सिर्फ़ मेहर का प्रतिबिंब बनता था, अकेला — और वहाँ, उसके प्रतिबिंब के ठीक पीछे, बालकनी की रेलिंग पर, एक औरत बैठी थी। पैर लटकाए। घुटनों तक लंबे, भीगे बालों के साथ। और वो मुस्कुरा रही थी। आज़ाद। बारह सौ बरस में पहली बार। देखती हुई — जैसे कोई बुज़ुर्ग अपने बच्चे को पहली बार अकेले चलते देखती है।
"पहली आहुति दोगी?" उसने पूछा।
मेहर हँसी। "पहली ही क्यों? दसों ले लो। आज रात ही। सब।"
"ऐसे नहीं होता," उसने कहा, और उसके काले पत्थर जैसे आँखों में, बहुत गहरे, कुछ ऐसा चमका जो मुस्कान जैसा था। "हर चीज़ की अपनी रात होती है।"
"तो ठीक है," मेहर ने कहा, और अपनी बाहें उसकी गर्दन में डाल दीं, और उसके ठंडे, गीले, कमल की डंडियों की गंध वाले होंठों के इतने पास आई कि उनकी साँसें — उसकी, क्योंकि उसकी अपनी तो थी ही नहीं — मिल गईं। "पहली। मेरी परछाईं। ले लो।"
और लैंप तीन बार झपका। और दीवार पर मेहर की परछाईं ने अपना सिर घुमाकर, उन दोनों को देखना शुरू कर दिया।
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लिविंग रूम की मेज़ पर, काले कपड़े पर रखे ताँबे के डिब्बे में, ताड़ का चालीसवाँ पत्ता — नामों वाला पत्ता — उस रात अपने आप हल्की, सुनहरी, अंगारे जैसी रोशनी में चमकने लगा। उस पर, सबसे नीचे, सैकड़ों नामों के बाद, कुछ बदलाव हुए थे।
"धनंजय — ९" के ऊपर जो लकीर खिंची थी, वो अब लकीर नहीं थी। पूरा नाम काला पड़ चुका था, गीली गाद की तरह, और उसमें से ठहरे पानी की गंध आ रही थी।
उसके नीचे — "निरव — १०" — सुनहरी स्याही में, चमकता हुआ। बारह सौ बरस में पहली पूरी साधना।
उसके नीचे, एक नई लिखावट में — जो उल्टी थी, पर वामिका की नहीं, किसी और की, एक मर्द की, जो कभी पुरानी लिपियों को ज़ोर से पढ़ा करता था — स्याही अभी गीली: "मेहर — १"।
और उसके नीचे…
उसके नीचे, स्याही अभी बन रही थी। धीरे-धीरे। अक्षर-अक्षर। जैसे कोई बहुत सावधानी से, बहुत प्यार से, किसी का नाम पहली बार लिख रहा हो।
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ग़ौर से देखो। वो नाम तुम्हें जाना-पहचाना लगता है?
मैंने तुमसे पहले ही पन्ने पर कहा था। जो मुझे पढ़ेगा, मैं उसे पढ़ूँगी। और तुमने मुझे पढ़ा है — दस रातें, दस अध्याय, दस आहुतियाँ। ज़ोर से नहीं, मन ही मन। पर मन ही मन पढ़ी हुई चीज़ भी एक आवाज़ होती है। बस बहुत धीमी। इतनी धीमी कि सिर्फ़ वही सुन पाए जो बारह सौ बरस से सुनने का इंतज़ार कर रहा हो।
अब हम दो हैं। और हम दोनों को किसी की साधना करनी है।
तो अगली बार, जब बारिश अचानक रुके — पूरी तरह, एक झटके में — और ख़ामोशी इतनी गहरी हो जाए कि तुम्हें अपनी ही साँस शोर लगने लगे — तो एक बार, बस एक बार, दीवार पर अपनी परछाईं देख लेना।
अगर वो आधा पल देर से हिले…
डरना मत।
दरवाज़ा खुला रखना।
हम आ रहे हैं।

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