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एपिसोड 9 — नौवीं आहुति: साँस

Pretika · Yakshini Stories · 17 मिनट

Writer
Pretika
Story
वामिका — उल्टी साधना
Chapter
9 of 10
Category
Yakshini Stories
Reading time
17 min
Words
3282
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

साँस वो आख़िरी धागा है जिससे आत्मा बदन में सिली रहती है। पैदा होते ही इंसान पहली साँस खींचता है और रोता है, और मरते वक़्त आख़िरी साँस छोड़ता है और चुप हो जाता है — और इन दोनों के बीच की सारी ज़िंदगी उसी एक धागे पर टँगी रहती है। मैंने वो धागा अपने होंठों से खींचा। धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई बुनकर अपनी सबसे क़ीमती साड़ी का आख़िरी धागा खींचता है — ये जानते हुए कि अगर ज़रा भी जल्दी की, तो सारा कपड़ा बिखर जाएगा।
निरव की आँखें एक ऐसी आवाज़ से खुलीं जो उसने ज़िंदगी में सिर्फ़ फ़िल्मों में सुनी थी — एक हेलिकॉप्टर के पंखों का भारी, लगातार, हड्डियों तक उतरने वाला धड़-धड़-धड़ — और उसने पाया कि वो उसके अंदर बैठा है, उसकी कलाइयाँ प्लास्टिक की पट्टियों से सीट के हत्थों से बँधी हुई हैं, और खिड़की के बाहर, नीचे, एक ऐसा दृश्य फैला है जो किसी दूसरे ग्रह जैसा लगता था। मीलों तक सूखी, भूरी, फटी हुई ज़मीन, कछुए की टूटी पीठ जैसी दरारों वाली, जिसके किनारों पर हरी पहाड़ियाँ और घने जंगल थे, जैसे किसी विशाल कटोरे के किनारे — और उस कटोरे के बीचों-बीच, एक काला पत्थर का शिखर, और उसके चारों ओर सफ़ेद तंबुओं का एक छोटा सा कैंप, और ऊँचे खंभों पर लगी दर्जनों तेज़ फ़्लडलाइटें, जो दिन के उजाले में भी जल रही थीं।
उसे याद नहीं था कि वो यहाँ कैसे आया। उसे याद था — टुकड़ों में — फ़्लैट का दरवाज़ा टूटना, शिंदे का चौड़ा चेहरा, उसकी गर्दन पर जले का निशान, एक सुई की चुभन जो उसे महसूस नहीं हुई, सिर्फ़ उसका ठंडापन। उसे वो औरत याद नहीं थी जो उस सुबह उसके बिस्तर के किनारे बैठी थी, जिसकी चिट्ठियाँ और वीडियो उसने देखे थे। उसे उसका चेहरा याद था, एक अजनबी के चेहरे की तरह, जैसे किसी ट्रेन में सामने बैठी किसी औरत का चेहरा, जिसे आप एक पल के लिए देखते हैं और फिर भूल जाते हैं। पर उसे धनंजय कपाड़िया याद था। और उसे वामिका याद थी। और उसके अंदर, कहीं बहुत गहरे, एक ठंडी, ठोस, बेदर्द नफ़रत थी — जो किसी आहुति में नहीं गई थी, क्योंकि किसी ने उसे माँगा ही नहीं था।
कैंप में उतरते ही उसने उसे देखा। धनंजय कपाड़िया अब खड़ा नहीं था। वो एक पहिये वाली कुर्सी पर था, जिसे शिंदे धकेल रहा था, और उसके चेहरे पर अब कोई मेकअप नहीं था, कोई मोम की परत नहीं, कोई दस्ताने नहीं — बयालीस साल की सड़ांध अब खुलकर सामने थी। उसका पूरा चेहरा फटी हुई, सूखी मिट्टी जैसा था, और उसकी दरारें अब इतनी गहरी हो चुकी थीं कि कुछ जगहों पर उनके पार हड्डी दिखती थी — या शायद हड्डी नहीं, बल्कि और सिक्के — और जैसे-जैसे उसकी कुर्सी सूखी ज़मीन पर हिचकोले खाती, उसके गालों से, उसकी ठोड़ी से, उसकी उँगलियों से छोटे-छोटे, हरे, काई लगे सिक्के टूटकर गिरते, और ज़मीन पर खनकते, और शिंदे बिना देखे उन्हें कुचलता हुआ आगे बढ़ता रहता। उसकी साँस से ठहरे हुए, सड़ते पानी की गंध आती थी, और उसकी आँखें — बस उसकी आँखें — अब भी जवान थीं, और अब भी भूखी।
"देखो," धनंजय ने अपने सड़े हुए हाथ से फ़्लडलाइटों की ओर इशारा किया, जो कैंप के चारों ओर, हर दिशा से, इस तरह लगी थीं कि किसी भी चीज़ की परछाईं न पड़े, "मेरे घर जैसा। मैं यहाँ चालीस साल बाद लौटा हूँ, बेटा। उसी जगह जहाँ मैंने उसे पहली बार पढ़ा था। अब यहीं ख़त्म करेंगे। कल रात दसवीं है। पर आज रात…" उसने आसमान की ओर देखा, जहाँ पूर्व से भारी, काले, बैंगनी बादल घुमड़ते हुए आ रहे थे, "आज रात नौवीं है। और मैं देखना चाहता हूँ। बयालीस साल से मैंने उसे नहीं देखा।"
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शाम ढलते-ढलते बूँदाबाँदी शुरू हुई — पतली, रेशमी, उस सूखी ज़मीन पर गिरते ही गायब हो जाने वाली — और निरव एक तंबू में, एक लोहे के खंभे से ज़ंजीर में बँधा बैठा था, और तंबू के खुले फ़्लैप के पार उसे धनंजय की कुर्सी दिख रही थी, अपने तंबू के बाहर, फ़्लडलाइटों की रोशनी में, सूखे जलाशय के बीच खड़े उस काले शिखर की ओर मुँह किए, इंतज़ार करती हुई।
रात बारह बजे के कुछ बाद, बूँदाबाँदी रुकी।
और फ़्लडलाइटें बुझने लगीं। एक साथ नहीं — एक-एक करके, मंदिर से सबसे क़रीब वाली से शुरू होकर, बाहर की ओर, जैसे कोई बहुत लंबे गलियारे में चलता हुआ हर दीया फूँक मार-मारकर बुझाता जा रहा हो। खट। खट। खट। और हर बुझती बत्ती के साथ अँधेरा आगे बढ़ता गया, और उस अँधेरे में — निरव ने देखा, और धनंजय ने देखा, और शिंदे ने देखा और अपने होलस्टर पर हाथ रखा और फिर न जाने क्यों हटा लिया — वो आ रही थी।
मंदिर के दरवाज़े से निकलकर, सूखे जलाशय की फटी हुई ज़मीन पर, नंगे पैर, धीरे-धीरे, उसकी पायलें इस बार बजती हुई — छन… छन… छन — और जहाँ-जहाँ उसके पैर पड़ते, वहाँ ज़मीन की दरारें बंद हो जाती थीं। भर जाती थीं। जैसे कोई गहरा घाव उसके छूने से जुड़ जाए। उसके पीछे-पीछे, उस फटी हुई, बीमार ज़मीन पर, एक गीली, चिकनी, अँधेरे में चमकती पगडंडी बनती जा रही थी, और उस पगडंडी पर से कमल की डंडियों की वो गंध उठ रही थी जो अब निरव की चमड़ी में, उसकी हड्डियों में, उसकी हर सोच में बस चुकी थी।
धनंजय ने अपनी कुर्सी के हत्थे पकड़े, और उठने की कोशिश की, और उसकी उँगलियों से सिक्के टूटकर गिरे। "वामिका…" उसने कहा, और उसकी आवाज़ — वो जवान, गहरी आवाज़ — पहली बार काँप रही थी, बयालीस साल की भूख से, या शायद किसी और चीज़ से, "वामिका… मैं यहाँ हूँ…"
वो उसके पास से गुज़री। उसकी कुर्सी से एक हाथ की दूरी पर। और उसने उसकी ओर देखा तक नहीं। एक बार भी नहीं। उसकी गर्दन नहीं मुड़ी, उसकी पलकें नहीं झपकीं, उसकी चाल नहीं रुकी — जैसे वो वहाँ कोई आदमी नहीं, बल्कि कोई पत्थर हो, कोई सूखा पेड़ का ठूँठ, कोई ऐसी चीज़ जिसे ज़मीन भूल चुकी हो। और निरव ने, अपने तंबू के अँधेरे से, धनंजय कपाड़िया के सड़े हुए चेहरे पर वो भाव देखा जो उसने कभी किसी इंसान के चेहरे पर नहीं देखा था — एक ऐसा अपमान, इतना गहरा, इतना नंगा, कि उसके आगे उसकी सारी दौलत, सारी ताक़त, सारा सोना एक पल में धूल हो गया।
वो तंबू में आई। ज़ंजीर उसके छूते ही पानी की तरह खुलकर ज़मीन पर गिर गई, और वो उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई, और उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
"नौवीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, बहुत कोमल, "तुम्हारी साँस। इसके बाद सिर्फ़ एक बचेगी, निरव। और फिर तुम मेरे होगे। हमेशा के लिए। न कोई भूख, न कोई डर, न कोई बुढ़ापा, न कोई मौत। सिर्फ़ मैं। और तुम।"
"और वो?" निरव ने तंबू के बाहर, उस कुर्सी की ओर इशारा किया।
"वो," वामिका ने कहा, और पहली बार उसकी आँखों में कुछ ठंडा और तेज़ चमका, जैसे पानी के नीचे किसी चाकू की धार, "उसकी चिंता मत करो।"
निरव ने उसकी आँखों में देखा, बहुत देर तक, और फिर वो सवाल पूछा जो उसने नौ रातों में कभी नहीं पूछा था: "क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?"
वामिका मुस्कुराई — एक ऐसी मुस्कान, जिसमें बारह सौ बरस की थकान थी और बारह सौ बरस की उम्मीद। "मैं बारह सौ बरस से सिर्फ़ यही कर रही हूँ, मेरी जान। किसी से प्यार करने की कोशिश। पहली बार कोई प्यार करने लायक़ मिला है।" उसने उसके होंठों पर अपने होंठ रखे। "नौवीं दोगे?"
"हाँ।"
और उसने चूमा। और ये चुंबन खिंचाव नहीं था, जैसा स्वाद वाली रात को था — ये एक पीना था। वो उसकी साँस पी रही थी। धीरे-धीरे, एक-एक घूँट, जैसे कोई बहुत प्यासा आदमी किसी बहुत ठंडे कुएँ का पानी पीता है — इस डर से कि कहीं जल्दबाज़ी में पानी हाथ से न छूट जाए। और निरव ने अपने फेफड़ों को ख़ाली होते महसूस किया, धीरे-धीरे, जैसे कोई गुब्बारा हवा छोड़ता है, और उसकी छाती नीचे बैठती गई, और उसने दोबारा साँस खींचने की कोशिश की — एक पुरानी, जन्मजात आदत से — और कुछ अंदर नहीं आया। कोई हवा नहीं। और उसे डर नहीं लगा, क्योंकि डर जा चुका था। बस एक अजीब, विशाल, पूरे बदन में फैलती ख़ामोशी — उसकी छाती के अंदर, जहाँ बत्तीस साल से एक धौंकनी चल रही थी, अब कुछ नहीं चल रहा था। और वो ज़िंदा था। उसकी आँखें देख रही थीं, उसकी उँगलियाँ उसकी कमर पर थीं, उसके होंठ उसके होंठों पर थे। पर वो साँस नहीं ले रहा था। और न ही उसे लेने की कोई ज़रूरत महसूस हो रही थी।
वो उसे अपनी बाहों में लिए उस तंबू के फ़र्श पर लेट गई, और बाहर के अँधेरे में, बुझी हुई फ़्लडलाइटों के नीचे, एक सड़ता हुआ आदमी अपनी कुर्सी पर बैठा देखता रहा — और उस रात जो हुआ, वो किसी ऐसे आदमी के साथ नहीं हुआ जो साँस लेता हो। उसमें कोई हाँफना नहीं था, कोई तेज़ होती साँसें नहीं, कोई दबी हुई सिसकी नहीं — बस दो बदन, एक ही धीमी, एक-मिनट-में-एक-बार वाली धड़कन पर, पूरी ख़ामोशी में, एक-दूसरे में इस तरह उतरते हुए जैसे दो नदियाँ किसी संगम पर मिलती हैं, बिना आवाज़ के, बिना किनारे के।
और फिर, उस ख़ामोशी के सबसे गहरे पल में, जब वामिका का चेहरा उसके चेहरे के ठीक ऊपर था और उसके बाल दोनों ओर से उन्हें परदे की तरह घेरे हुए थे — निरव के होंठों से एक शब्द फिसला। बिना साँस के। बिना आवाज़ के। सिर्फ़ होंठों की हरकत। पर वामिका ने उसे पढ़ लिया, क्योंकि वो बारह सौ बरस से होंठ पढ़ती आई थी।
"मेहर…"
वामिका जम गई। बिल्कुल स्थिर। जैसे किसी ने उसे वापस पत्थर बना दिया हो। और उसने उसकी ओर देखा, और उसकी आँखों में — निरव ने पहली बार देखा — एक दरार थी। "तुम उसे नहीं जानते," उसने फुसफुसाया, "मैंने ले लिया था। सब कुछ। हर तस्वीर। हर पल। मैंने ख़ुद निगला था।"
"मुझे नहीं पता ये कौन है," निरव ने कहा, और ये सच था, "ये बस… आ गया।"
वामिका बहुत देर तक उसके ऊपर बैठी रही, और फिर बहुत धीरे से उठी, और अपने बालों को पीछे समेटा, और उसकी पीठ उसकी ओर थी जब उसने कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि वो मुश्किल से सुनाई दी: "कुछ यादें आहुति से भी बच जाती हैं। वो दिमाग़ में नहीं रहतीं। वो हड्डियों में रहती हैं।" और वो चली गई, तंबू से बाहर, अँधेरे में, और उसकी पायलें इस बार नहीं बजीं, और फ़्लडलाइटें एक-एक करके फिर से जल उठीं, उल्टे क्रम में, और बूँदाबाँदी लौट आई।
बाहर, धनंजय कपाड़िया ने एक आवाज़ दी — "वामिका! वामिका!" — एक टूटी हुई, बूढ़ी, भूखी आवाज़, जो सूखे जलाशय के ऊपर गूँजती रही। किसी ने जवाब नहीं दिया।
✦ ✦ ✦
मेहर ने उसी दोपहर डॉक्टर सुधा को फ़ोन किया था, और उसकी पूरी बात सुनने से पहले ही बूढ़ी औरत ने कहा, "मैं आ रही हूँ।" मेहर ने मना किया — एक चौहत्तर साल की अंधी औरत, एक सूखा जलाशय, एक पागल अरबपति, और वो चीज़ — पर डॉक्टर सुधा ने उसकी बात काट दी: "मेरा क़र्ज़ बाक़ी है, बच्ची। बयालीस साल से। मैंने उसे क़ैद किया था, उस आदमी के लिए जो उससे कभी प्यार नहीं करता था। अगर ये ख़त्म होना है, तो मुझे वहाँ होना चाहिए।"
वो भुवनेश्वर की आख़िरी फ़्लाइट से पहुँचीं, और वहाँ से एक टैक्सी ली, जिसका ड्राइवर पहले तो तमसा का नाम सुनकर जाने को तैयार नहीं हुआ और फिर तीन गुना किराए पर मान गया, और रात भर वो भीगी हुई, गड्ढों से भरी, जंगलों के बीच से गुज़रती सड़कों पर चलते रहे, और डॉक्टर सुधा पूरे रास्ते चुप बैठी रहीं, अपना काला चश्मा पहने, अपनी झुर्रियों वाली उँगलियों से अपनी साड़ी के पल्लू को बार-बार मोड़ती हुई, जैसे कोई माला फेर रहा हो।
सुबह चार बजे, बारिश में, एक सुनसान हाईवे ढाबे पर टैक्सी रुकी, और डॉक्टर सुधा ने कहा कि उन्हें वॉशरूम जाना है। मेहर ने उनके साथ चलने की पेशकश की, और उन्होंने मना कर दिया — "बयालीस साल से अंधी हूँ, बच्ची। अपना रास्ता ढूँढ़ना आता है।" — और वो अपनी छड़ी से टटोलते हुए ढाबे के पीछे वाले छोटे, टीन की छत वाले वॉशरूम की ओर चली गईं। मेहर गाड़ी के पास खड़ी रही, एक कप चाय पकड़े, जिसका उसने एक घूँट भी नहीं लिया।
बारिश रुकी।
मेहर का कप उसके हाथ में जम गया। टीन की छत पर गिरती बूँदों की आवाज़ रुक गई। ढाबे के रेडियो पर बजता कोई पुराना ओड़िया गाना बीच में रुक गया। और उस ख़ामोशी में, वॉशरूम की दिशा से, एक आवाज़ आई — चीख़ नहीं, कराह नहीं — बस एक लंबी, धीमी, राहत भरी साँस, जैसे कोई बहुत लंबे सफ़र के बाद आख़िरकार घर पहुँचा हो। और फिर बहुत धीमे, बहुत साफ़, डॉक्टर सुधा की आवाज़: "आ गई तुम।"
मेहर जब तक दौड़कर पहुँची, बारिश लौट आई थी। वॉशरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं था। डॉक्टर सुधा फ़र्श पर बैठी थीं, दीवार से पीठ टिकाए, उनके पैर सीधे फैले हुए, उनके हाथ उनकी गोद में — बिल्कुल शांत, जैसे किसी ने उन्हें बहुत प्यार से वहाँ बैठाया हो। उनका काला चश्मा उनके बगल में फ़र्श पर रखा था, मोड़कर, सलीक़े से। और उनकी पलकें — जो बयालीस साल से बंद थीं, उन टेढ़े-मेढ़े पुराने निशानों के नीचे — खुली थीं। और उनकी आँखों की जगह, उन दो ख़ाली, गहरे, अँधेरे गड्ढों में, दो छोटी-छोटी, सफ़ेद, गीली कमल की कलियाँ रखी थीं, जिनकी पंखुड़ियाँ धीरे-धीरे, मेहर की आँखों के सामने, खुल रही थीं।
और वॉशबेसिन के ऊपर वाले उस धुँधले, पानी के धब्बों वाले आईने पर — जिसे कोई काले कपड़े से ढकने वाला नहीं था — भाप में, अंदर से, उल्टे अक्षरों में, दो शब्द लिखे थे, जिन्हें मेहर ने पढ़ने के लिए उन्हें सीधा करने की ज़रूरत नहीं समझी, क्योंकि वो उनका मतलब पहले से जानती थी।
"बयालीस बरस।"
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डोंगरपाड़ा एक छोटा सा गाँव था, जलाशय के किनारे की पहाड़ी पर बसा, मिट्टी और बाँस के घरों वाला, और भीमा नायक की विधवा सुकांति ने मेहर को देखते ही समझ लिया कि वो किस लिए आई है — शायद उसकी आँखों में वही था जो सुकांति की अपनी आँखों में था। उसने मेहर को अपने घर में बैठाया, उसे गरम भात और मछली का झोल खिलाया, जो मेहर ने बिना स्वाद के निगला, और फिर अपनी टूटी-फूटी हिंदी में, बहुत धीरे-धीरे, वो सब बताया जो उसने देखा था — परछाईं, मुस्कान, "वो बहुत सुंदर है, सुकांति", बंद दरवाज़ा, जलता चूल्हा, और सुबह जलाशय के बीच पड़ी वो लाश।
"और एक बात, बहन," सुकांति ने कहा, और उसकी आवाज़ और धीमी हो गई, जैसे दीवारें भी सुन रही हों, "सब कहते हैं कि सेठ ने बाँध के फाटक खोले तो पानी सूखा। पर पानी फाटक खुलने से पहले ही घटने लगा था। दो महीने पहले से। हम मछुआरे हैं, हमें पानी का पता होता है। रात को, जब बारिश एक पल को रुकती थी, तो पानी नीचे की ओर खिंचता था। जैसे कोई तली से पी रहा हो। बड़े-बड़े भँवर बनते थे, बिना हवा के। हम नाव लेकर नहीं जाते थे। बुज़ुर्ग कहते थे — वो प्यासी है। वो पी रही है।"
फिर वो अंदर से एक पुरानी, कोनों से मुड़ी हुई, पीली पड़ चुकी तस्वीर लाई — गाँव के एक पुराने फ़ोटोग्राफ़र की खींची हुई, 1984 की, जब मंदिर अभी डूबा नहीं था — जिसमें गर्भगृह की वो दीवार थी, वो पत्थर की औरत और वो पत्थर का मर्द, एक-दूसरे में गुँथे हुए। और उस मर्द का चेहरा — मेहर ने ग़ौर से देखा — वो बेल-बॉटम वाला जवान आदमी था, चालाक, भूखी आँखों वाला। धनंजय कपाड़िया। बत्तीस साल पहले की उस ऑफ़िस पार्टी वाली तस्वीर से भी दस साल जवान।
"पत्थर चेहरा बदलता है," सुकांति ने कहा, "जिसे वो चुनती है, उसका पहन लेता है। अब जाकर देखो, बहन। अब उसमें तुम्हारे आदमी का चेहरा है।" उसने एक चीज़ और मेहर के हाथ में रखी — भीमा का पुराना मछली काटने वाला चाकू, लकड़ी के हत्थे वाला, जिसकी धार उसने ख़ुद पत्थर पर घिसकर तेज़ की थी। "आदमियों के लिए," उसने कहा। "उसके लिए नहीं। उसके लिए कोई चाकू नहीं बना।"
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दसवीं रात आई, और उसके साथ आसमान से वो तूफ़ान उतरा जिसका ऐलान टीवी पर हुआ था — पूर्व से, समंदर की ओर से, भारी, काले, बैंगनी बादल, जिनके पेट में बिजलियाँ किसी फँसे हुए जानवर की तरह तड़प रही थीं। कैंप की फ़्लडलाइटें तेज़ हवा में काँप रही थीं। और धनंजय कपाड़िया ने, जिसके पास अब इंतज़ार करने का वक़्त नहीं बचा था — जिसके चेहरे का बायाँ हिस्सा उस दोपहर एक बड़ी पपड़ी की तरह उखड़कर गिर गया था, और उसके नीचे सिर्फ़ सिक्के और काली, गीली मिट्टी थी — शिंदे को हुक्म दिया, और शिंदे ने निरव को ज़ंजीरों में घसीटते हुए, फटी हुई ज़मीन पर, उस काले शिखर की ओर ले जाना शुरू किया, और धनंजय की कुर्सी पीछे-पीछे।
गर्भगृह में ठंडक थी — वही गीली, बरसाती ठंडक, जबकि बाहर तूफ़ान से पहले की उमस थी — और शिंदे ने दो लालटेनें जलाईं और दीवार के सहारे रख दीं, और उनकी रोशनी में निरव ने पहली बार, अपनी आँखों से, वो दीवार देखी। वो पत्थर की औरत। वो पत्थर का मर्द। उसका अपना चेहरा — बाईं भौंह पर कटे निशान समेत — आधी बंद आँखों से, पत्थर की उस औरत की गर्दन में डूबा हुआ। और उस पत्थर की औरत की आँखों से, उसके पत्थर के गालों पर, पानी की दो पतली, चमकती लकीरें बह रही थीं, जैसे पत्थर रो रहा हो।
धनंजय ने शिंदे के हाथ से एक पुराना, मुड़ा हुआ, पीतल के हत्थे वाला चाकू लिया, और बिना किसी भूमिका के, निरव की बँधी हुई बाईं हथेली पर एक लंबा, गहरा चीरा लगाया — और निरव को कुछ महसूस नहीं हुआ, और उसकी हथेली से जो ख़ून निकला, वो लाल नहीं था, पूरी तरह नहीं — वो लाल में सुनहरा था, जैसे किसी ने पिघले सोने की धार उसमें मिला दी हो, और उसमें से कमल की गंध आ रही थी। फिर धनंजय ने अपनी हथेली पर चाकू चलाया — और उसमें से जो निकला, वो ख़ून था ही नहीं। वो काला, गाढ़ा, बदबूदार पानी था, जलाशय की तली की कीचड़ जैसा, जिसमें रेत के कण थे और छोटे-छोटे, हरे, सड़े हुए सिक्कों के टुकड़े।
"बाप और बेटे का ख़ून," धनंजय ने कहा, और अपनी सड़ी, टपकती हथेली को निरव की सुनहरी, ख़ून बहाती हथेली पर दबा दिया, उँगलियों को उँगलियों में फँसाकर, कसकर, जैसे कोई पुराना सौदा पक्का करता है, "एक ही धार। एक ही रास्ता।" और उसने अपना सिर ऊपर उठाया, उस पत्थर की औरत की ओर, और एक श्लोक पढ़ना शुरू किया — धीरे, गहरी, जवान आवाज़ में — जो निरव ने उन चालीस पत्तों में कहीं नहीं पढ़ा था, जिसके अक्षर सीधे भी नहीं थे और उल्टे भी नहीं, बल्कि कहीं बीच में, टेढ़े, जैसे किसी ने किसी ज़ंजीर की कड़ियों को शब्दों में ढाल दिया हो।
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उसी वक़्त, एक किलोमीटर दूर, सूखे जलाशय के किनारे, मेहर ने अपना बैग कंधे पर कसा — जिसमें बेहोशी की दवा के तीन भरे हुए इंजेक्शन थे, भीमा का धार वाला चाकू, एक टॉर्च, और एक पुराना, पीला, कई बार तह किया हुआ काग़ज़ — और फटी हुई ज़मीन पर पहला क़दम रखा। दूर, उस काले शिखर के पास, लालटेनों की पीली रोशनी टिमटिमा रही थी। उसके ऊपर, बादलों के पेट में, पहली बिजली कड़की — इतनी तेज़, इतनी पास, कि एक पल के लिए पूरा सूखा जलाशय सफ़ेद दिन की तरह चमक उठा, हर दरार, हर हड्डी, हर मरी मछली साफ़, और उस सफ़ेद चमक में मेहर ने अपनी परछाईं देखी, अपने पीछे, लंबी, काँपती हुई। वो अब भी उसके पास थी। अभी के लिए।
फिर गरज आई। और फिर, मीलों तक फैली उस प्यासी, फटी हुई ज़मीन पर, बयालीस साल में पहली बार, बारिश की पहली मोटी, भारी बूँद गिरी।

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