Pretika › Yakshini Stories › वामिका — उल्टी साधना
एपिसोड 8 — आठवीं आहुति: स्मृति
Pretika · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- वामिका — उल्टी साधना
- Chapter
- 8 of 10
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3209
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
याद इंसान की सबसे ज़िद्दी चीज़ है। तुम उसका स्वाद ले लो, उसकी धड़कन ले लो, उसका नाम तक मिटा दो — याद फिर भी किसी कोने में बैठी रहती है, किसी पुराने गाने की तरह, किसी ख़ुशबू की तरह, और एक दिन अचानक सिर उठाकर पुकारती है। जब तक उसे उस दूसरी औरत की याद रहती, मैं उसकी ज़िंदगी में दूसरी रहती। और मैं बारह सौ बरस में बहुत कुछ रह चुकी हूँ — देवी, दासी, डायन, ख़ज़ाना। पर दूसरी औरत कभी नहीं। वो मैं नहीं रह सकती थी।
निरव सुबह छह बजे घर लौटा, भीगा हुआ, और मेहर को उसने किचन की खिड़की के पास खड़ा पाया, एक कप चाय हाथ में लिए जो कब की ठंडी हो चुकी थी, बाहर के धूसर आसमान को देखते हुए। उसने उसकी ओर देखा, और उसकी आँखों में सवाल था — "कहाँ थे?" — पर उसने पूछा नहीं, और निरव ने बताया भी नहीं। उसने बस वो कहा जो कहना था, बिना किसी भूमिका के, क्योंकि उसके पास भूमिका बाँधने का वक़्त नहीं बचा था: "आज रात वो तुम्हें ले जाएगी, मेहर। मेरे अंदर से। मैं तुम्हें भूल जाऊँगा।"
मेहर ने चाय का कप बहुत धीरे से स्लैब पर रखा, इतनी सावधानी से, जैसे वो किसी टूटने वाली चीज़ को रख रही हो — और शायद रख रही थी। वो कुछ देर चुप खड़ी रही। उसने रोया नहीं, चीख़ी नहीं, कोई सवाल नहीं किया। उसने बस अपनी हथेली से अपने चेहरे को एक बार ऊपर से नीचे पोंछा, जैसे कोई नींद से जागता है, और फिर उसकी ओर मुड़ी, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो ICU की नर्सों की आवाज़ में तब आती है जब किसी मरीज़ के पास गिनती के घंटे बचे हों और रोने का वक़्त बाद के लिए रखना पड़े। "कितने बजे?"
"जब बारिश रुकेगी। रात में। पता नहीं कितने बजे।"
"ठीक है," उसने कहा, और अपना फ़ोन उठाकर अस्पताल में फ़ोन किया, और कहा कि उसकी तबियत ख़राब है, वो आज नहीं आएगी, और फ़ोन रखकर उसकी ओर देखा। "तो हमारे पास एक दिन है।"
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उन्होंने वो दिन उस तरह बिताया जैसे कोई ऐसा आदमी अपना आख़िरी दिन बिताता है जिसे पता हो कि कल उसे फाँसी है — हर चीज़ को बहुत ग़ौर से देखते हुए, हर पल को जान-बूझकर जीते हुए, और हर पल के बीच एक ठंडी गिनती चलती हुई।
वो सबसे पहले उस ईरानी कैफ़े गए, कोलाबा की उस पुरानी गली में, जहाँ लकड़ी की कुर्सियाँ थीं, संगमरमर की गोल मेज़ें, दीवार पर एक धुँधला आईना और एक बूढ़े पारसी मालिक की तस्वीर, और वो उसी कोने वाली मेज़ पर बैठे जहाँ तीन साल पहले मेहर ने उसके काग़ज़ों पर चाय गिराई थी — उसके प्राकृत नोट्स, जिन पर वो तीन हफ़्ते से काम कर रहा था — और फिर माफ़ी माँगते-माँगते उसके सामने बैठ गई थी, और दो घंटे बैठी रही थी, और जब वो उठी थी तो उसके नोट्स तो बर्बाद हो चुके थे पर उसके फ़ोन में एक नया नंबर था। उन्होंने बन-मस्का मँगाया और ईरानी चाय, और मेहर ने अपना कप जानबूझकर उसी तरह टेढ़ा किया, और थोड़ी सी चाय मेज़ पर गिराई, और दोनों हँसे, और निरव ने उस हँसी को, उस गिरती चाय को, मेहर की उस टेढ़ी मुस्कान को, अपने अंदर कहीं बहुत गहरे दबाने की कोशिश की, जैसे कोई गिलहरी सर्दियों के लिए दाने छुपाती है — इस उम्मीद में कि शायद कोई एक दाना बच जाए।
फिर वो मरीन ड्राइव गए, बारिश में, बिना छाते के, और दीवार पर बैठे, उसी जगह के पास जहाँ पिछली रात वामिका उसके साथ बैठी थी — ये बात निरव ने मेहर को नहीं बताई — और मेहर ने अपना फ़ोन निकालकर उसकी वीडियो बनानी शुरू की, और कहा, "कुछ बोलो। अपने लिए। कल वाले अपने लिए।" और निरव ने कैमरे में देखा और कहा, "सुनो। ये लड़की जो ये वीडियो बना रही है, इसका नाम मेहर है। ये ICU में नर्स है। ये अपनी चाय में तीन चम्मच चीनी डालती है और मेरी चाय को 'बच्चों वाली' कहती है। इसे बारिश पसंद है पर छाता लेकर चलना नहीं। इसके बाएँ कान के पीछे एक छोटा सा तिल है जो इसे नहीं पता कि मुझे पता है। तुम इससे प्यार करते हो। तुमने तीन साल पहले इससे प्यार करना शुरू किया था और एक दिन भी बंद नहीं किया। अगर तुम्हें ये याद नहीं है, तो ये तुम्हारी ग़लती नहीं है। पर इसे जाने मत देना। कुछ भी हो। इसे जाने मत देना।"
मेहर ने वीडियो बंद किया और फ़ोन को बहुत देर तक अपनी मुट्ठी में भींचे रखा, और फिर बोली, बिना उसकी ओर देखे, "तुम्हें पता है सबसे बुरा क्या है? मैं तुम्हारा नाम भी नहीं ले सकती। तुम कल सुबह उठोगे, और मैं तुम्हें पुकारना चाहूँगी, तुम्हें बताना चाहूँगी कि तुम कौन हो, और मेरे पास तुम्हें बुलाने के लिए एक शब्द भी नहीं होगा।" उसकी आवाज़ टूटी। "तुम मुझे भूल जाओगे, और मैं तुम्हें पुकार भी नहीं पाऊँगी। हम दोनों एक-दूसरे के लिए… अजनबी हो जाएँगे। दो तरफ़ से।"
घर लौटकर निरव ने चिट्ठियाँ लिखीं। अपने आप को। तीन, चार, पाँच — पीले लीगल पैड के पन्नों पर, जल्दी-जल्दी, बिगड़ती लिखावट में — हर एक में वही बातें अलग तरह से, जैसे कोई एक ही मंत्र को अलग-अलग लिपियों में उतारता है ताकि कोई एक तो बचा रहे। उसने उन्हें अपने तकिये के नीचे रखा, अपने बटुए में, अपनी जेब में, फ़्रिज के दरवाज़े पर चिपकाया, बाथरूम के आईने पर — उस आईने पर जिसमें अब उसका चेहरा नहीं बनता था। और मेहर ने उसके फ़ोन का वॉलपेपर बदला — उन दोनों की गोवा वाली तस्वीर, बीच पर, सूरज डूबते हुए — और उसके नीचे एक लाइन लिखी: "ये तुम्हारी है। और तुम इसके।"
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दोपहर ढल रही थी जब मेहर उसके पास आई, और उसने बिना कुछ कहे उसकी कमीज़ के बटन खोले, एक-एक करके, धीरे-धीरे, जैसे वो पहली बार खोल रही हो, या आख़िरी बार — और शायद दोनों ही सच थे। और इस बार उसमें कोई ग़ुस्सा नहीं था, कोई दावा नहीं, कोई सज़ा नहीं। बस एक अथाह, डरी हुई कोमलता। उसने उसे बिस्तर पर लिटाया, और उसके ऊपर झुकी, और उसके चेहरे को अपनी उँगलियों से छुआ — उसकी भौंहों को, उसकी पलकों को, उसकी बाईं भौंह के उस कटे निशान को, उसके होंठों को — जैसे कोई अंधा आदमी किसी चेहरे को याद करता है, हाथों से, ताकि वो उसकी आँखों के बजाय उसकी उँगलियों में रहे।
निरव उसे चख नहीं सकता था, उसका दर्द महसूस नहीं कर सकता था, उसका दिल अब एक मिनट में एक बार धड़कता था और उसका अपना कोई प्रतिबिंब भी नहीं था जिसमें वो उन दोनों को एक साथ देख सके। पर वो उसे छू सकता था। और उसने उसे छुआ — उस तरह जैसे कोई आदमी किसी ऐसी चीज़ को छूता है जिसे वो कुछ ही घंटों में खोने वाला है — उसकी गर्दन को, उसके कंधों को, उसकी पीठ की उस लंबी घाटी को, उसकी कमर के उस मोड़ को, जहाँ उसकी हथेली तीन साल से ठीक बैठती आई थी — और हर छुअन के साथ वो अपने आप से कहता रहा: याद रखो, इसे याद रखो, ये याद रखो। और मेहर ने उसका हाथ उठाकर अपने सीने पर रखा, बाईं ओर, जहाँ उसका दिल तेज़, जवान, इंसानी रफ़्तार से धड़क रहा था — एक, दो, एक, दो, एक, दो — और उसकी आँखों में देखकर फुसफुसाई, "मेरी धड़कन ले लो। उधार। जब तक तुम्हारी वापस न आए।" और उस शाम जो हुआ, वो धीमा था, बहुत धीमा, इतना धीमा कि बाहर की बारिश भी उसके मुक़ाबले जल्दबाज़ी में लगती थी, और उसमें आँसू थे, दोनों तरफ़ से, और उसमें एक ऐसी गहरी, टूटी हुई मिठास थी जो सिर्फ़ उन्हीं चीज़ों में होती है जिन्हें हम आख़िरी बार कर रहे होते हैं — और जब वो उसकी बाहों में सोई, तो उसके होंठ उसके कान के पास थे, और वो बार-बार कुछ कहने की कोशिश कर रही थी, उसका नाम, और हर बार वो नाम उसके होंठों तक आकर पानी की तरह बह जाता था।
✦ ✦ ✦
रात ग्यारह बजकर बावन मिनट पर बारिश रुकी।
वो दोनों लिविंग रूम में थे, सोफ़े पर, एक-दूसरे का हाथ थामे, सारी बत्तियाँ जलाए हुए, जैसे कोई तूफ़ान का इंतज़ार कर रहा हो। और जब बारिश का शोर एकदम से बंद हुआ, और घड़ी की टिक-टिक रुक गई, और फ़्रिज की भनभनाहट ख़ामोश हो गई, तो मेहर ने निरव का हाथ इतनी ज़ोर से भींचा कि उसके नाख़ून उसकी चमड़ी में धँस गए — और उसे कुछ महसूस नहीं हुआ।
और इस बार, मेहर ने उसे देखा।
वामिका ने उसे देखने दिया — ये मेहर को बाद में समझ आया — क्योंकि वो जानबूझकर, धीरे-धीरे, बालकनी के परदे से निकली, जैसे कोई मंच पर आती है, और उसकी पायलें इस बार बज रही थीं — छन… छन… छन — और मेहर ने उसे पूरा देखा, सिर से पाँव तक, पहली बार, और उसकी साँस उसके गले में ही रुक गई। क्योंकि उसने उससे किसी राक्षसी की उम्मीद की थी, किसी डायन की, किसी सड़ी-गली लाश की — और जो उसके सामने खड़ी थी, वो इतनी सुंदर थी कि उसे देखना किसी ऐसे चीज़ को देखने जैसा था जिसे देखने की इजाज़त इंसानी आँखों को नहीं है। उसकी चमड़ी का वो पुराना, सुनहरा, दीये-की-लौ-वाला काँसा। उसके घुटनों तक लंबे बाल, जिनसे पानी टपक रहा था और फ़र्श पर गिरते ही सुनहरी धूल बन जाता था। उसकी कमर की वो लचक जो मेहर ने सिर्फ़ मंदिरों की मूर्तियों में देखी थी। और उसकी आँखें — मेहर ने एक पल के लिए उन आँखों में देखा, और उसे डॉक्टर सुधा की वो बात याद आई — "उसके बाद मैं दुनिया में और कुछ नहीं देखना चाहती थी" — और उसने समझा कि उस बूढ़ी औरत ने अपनी आँखें क्यों फोड़ ली थीं।
"तो तुम हो," वामिका ने कहा, मेहर की ओर देखते हुए, और उसकी आवाज़ में कोई नफ़रत नहीं थी, कोई जलन नहीं — बस एक गहरी, थकी हुई जिज्ञासा, जैसे कोई नदी किसी ऐसे पत्थर को देखती है जो बरसों से उसके रास्ते में पड़ा हो, "वो जिसे वो भूल नहीं पाता। सात रातें मैं उसके पास आई, और हर रात, हर आहुति के बाद, उसके अंदर कहीं एक कोने में तुम बैठी रहीं। चाय गिराती हुई।"
"वो मेरा है," मेहर ने कहा, और उठकर निरव के सामने खड़ी हो गई, उसके और उस चीज़ के बीच, और उसकी आवाज़ काँप रही थी पर वो पीछे नहीं हटी।
"वो किसी का नहीं था," वामिका ने कहा, "जब तक उसने मुझे पढ़ा नहीं।"
"तुम उसे ले जाओ जहाँ ले जाना है," मेहर ने कहा, और अब उसके आँसू बह रहे थे, पर उसकी आवाज़ में एक ज़िद थी, "पर मैं उसकी याद में रहूँगी। तुम सब कुछ ले लो, पर उसके अंदर कहीं न कहीं मैं—"
"याद ही तो ले रही हूँ, मेहर।" वामिका ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो लगभग दया जैसा था। "यही तो आठवीं है।"
मेहर पलटी, निरव की ओर। "मना कर दो," उसने फुसफुसाया, उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर, "मना कर दो, बस इतना कहो नहीं, तुम कर सकते हो, वो ज़बरदस्ती नहीं ले सकती, वो हर बार पूछती है, तो मना कर दो—"
"कर सकता है," वामिका ने शांति से कहा, और मेहर के पीछे से आकर सोफ़े की पीठ पर हाथ टिकाए खड़ी हो गई, "कोई भी कर सकता है। डोंगरपाड़ा में एक मछुआरा था, भीमा। उसने पहली रात मुझे अपनी परछाईं दी, और दूसरी रात दरवाज़ा बंद करके आग जलाकर बैठ गया, और मना कर दिया। मैंने ज़बरदस्ती नहीं की। मैं ज़बरदस्ती कर ही नहीं सकती — यही तो मेरा श्राप है।" उसने मेहर की ओर झुककर, उसके कान के पास, बहुत धीरे से कहा: "पर अधूरी साधना किसी को ज़िंदा नहीं छोड़ती, मेहर। मना करने वाला सुबह नहीं देखता। वो जलाशय के बीच में मिला था। मुस्कुराता हुआ।"
मेहर जम गई। उसने निरव की ओर देखा — उसके उस चेहरे की ओर, जिसे उसने अभी कुछ घंटे पहले अपनी उँगलियों से याद किया था — और उसने देखा कि वो उसे देख रहा है, और उसकी आँखों में वो नशा नहीं था जो पिछली रातों में होता था, बल्कि एक सवाल था। वो उससे पूछ रहा था। उसे फ़ैसला करने दे रहा था।
और मेहर, जो आठ साल से ICU में मरीज़ों को ज़िंदा रखने के लिए लड़ती आई थी, जिसने ऐसे परिवारों को देखा था जो किसी को जाने देने के बजाय वेंटिलेटर पर रखना चुनते थे, चाहे वो इंसान उन्हें पहचान पाए या नहीं — उसने अपनी सारी ज़िंदगी का सबसे मुश्किल वाक्य बोला।
"हाँ कहो," उसने फुसफुसाया। "हाँ कहो। ज़िंदा रहो। मुझे भूल जाओ, पर ज़िंदा रहो।"
निरव ने उसे देखा, बहुत देर तक, जैसे वो उसकी हर लकीर को पढ़ रहा हो, और फिर वामिका की ओर मुड़ा, और कहा — "हाँ।"
वामिका ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया — उसी तरह जैसे मेहर ने कुछ पल पहले लिया था — और उसे चूमा। और मेहर ने, जो उनसे एक हाथ की दूरी पर खड़ी थी, सब देखा। उसने देखा कि उनके होंठों के बीच, उस चुंबन में, कुछ चमक रहा था — कुछ पतला, सुनहरा, धागे जैसा — और उस धागे में, जैसे किसी पुरानी फ़िल्म की रील में, तस्वीरें थीं, छोटी-छोटी, चमकती हुई, एक के बाद एक खिंचती हुई: एक ईरानी कैफ़े, एक गिरी हुई चाय, एक टेढ़ी मुस्कान; गोवा का एक बीच, डूबता सूरज, रेत पर लिखा एक नाम जिसे लहर मिटा रही थी; एक अस्पताल का कॉरिडोर, एक थकी हुई लड़की नाइट शिफ़्ट के बाद किसी के कंधे पर सो रही थी; एक किचन, एक कप, तीन चम्मच चीनी; एक बिस्तर, एक लाल सिल्क की नाइटी, बाएँ कान के पीछे एक छोटा सा तिल — और मेहर ने देखा कि उन सब तस्वीरों में वो थी। वो ख़ुद। हर एक में। और वो सारी तस्वीरें निरव के होंठों से निकलकर वामिका के होंठों में समा रही थीं, एक के बाद एक, और हर तस्वीर के जाने के साथ निरव की आँखों में कुछ बुझ रहा था, जैसे कोई एक-एक करके किसी बड़े घर की बत्तियाँ बुझा रहा हो।
आख़िरी तस्वीर आज दोपहर की थी। उसका हाथ, मेहर के सीने पर। "मेरी धड़कन ले लो। उधार।" और वो भी चली गई।
बाहर बारिश लौट आई। वामिका नहीं थी। और निरव सोफ़े पर था, आँखें बंद, सिर पीछे टिका हुआ, सोता हुआ — और मेहर उसके पैरों के पास फ़र्श पर बैठ गई, और उसका घुटना पकड़कर, बिना आवाज़ के, रोने लगी।
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सुबह वो जागा, और मेहर बिस्तर के किनारे बैठी थी, पूरी रात की जागी, सूजी हुई आँखों के साथ, उसके जागने का इंतज़ार करती हुई। उसने आँखें खोलीं, छत की ओर देखा, और फिर सिर घुमाकर उसे देखा। और उसके चेहरे पर पहले हैरानी आई, फिर एक हल्की सी शर्म, और उसने अपनी नंगी छाती पर चादर खींच ली, और बहुत विनम्रता से, जैसे कोई किसी अनजान होटल के कमरे में किसी अनजान औरत को देखकर पूछता है, बोला:
"माफ़ कीजिए… आप कौन?"
मेहर ने कुछ नहीं कहा। उसने बस तकिये के नीचे से पहली चिट्ठी निकाली और उसे पकड़ा दी। उसने उसे पढ़ा — उसकी आँखें पंक्तियों पर चलीं — और उसने अपनी लिखावट पहचानी, और उसके माथे पर एक शिकन आई, और उसने दूसरी चिट्ठी माँगी, और तीसरी, और मेहर ने उसे फ़ोन दिया, और उसने वो वीडियो देखा — ख़ुद को, मरीन ड्राइव की दीवार पर, बारिश में, कैमरे में देखकर बोलते हुए: "तुम इससे प्यार करते हो… इसे जाने मत देना…" — और उसने वीडियो ख़त्म होने के बाद फ़ोन नीचे रखा, और मेहर की ओर देखा, और उसकी आँखों में ईमानदारी थी, और दया, और एक बहुत गहरा, बहुत सच्चा अफ़सोस — और कुछ नहीं। कोई पहचान नहीं। कोई चिंगारी नहीं। "मुझे… मुझे बहुत अफ़सोस है," उसने कहा, "मुझे यक़ीन है कि ये सब सच है। ये मेरी लिखावट है, मेरी आवाज़ है। पर मैं… मैं आपको नहीं जानता। मुझे कुछ महसूस नहीं हो रहा। जैसे किसी और की ज़िंदगी की वीडियो देख रहा हूँ।"
मेहर उठी और बाथरूम में चली गई और दरवाज़ा बंद किया, और आईने में देखा — उस आईने में जिस पर निरव की एक चिट्ठी चिपकी थी, "ये मेहर है। तुम इससे प्यार करते हो।" — और उसने उस आईने में अपने चेहरे को देखा, और पहली बार उसे अपना चेहरा किसी अजनबी का लगा। किसी ऐसी औरत का, जो किसी की याद में नहीं रहती।
फिर उसने अपने चेहरे पर पानी डाला, और अपने बैग से वो पुराना, पीला, कई बार तह किया हुआ काग़ज़ निकाला जो डॉक्टर सुधा ने उसकी मुट्ठी में ठूँसा था, और उसे खोला, और उन उल्टे, अजीब, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों को देखा जो वो पढ़ नहीं सकती थी पर जिन्हें वो ज़रूरत पड़ने पर बोल सकती थी — डॉक्टर सुधा ने हर अक्षर के नीचे देवनागरी में उच्चारण लिख दिया था — और उसने तय किया। वो अपने प्रेमी को एक ऐसे आदमी के हाथों नहीं जाने देगी जिसने उसकी ज़िंदगी एक सीढ़ी की तरह बनाई थी। और न ही उस चीज़ के हाथों जिसने उसकी याद निगल ली थी। अगर उसे अपनी याद वापस नहीं मिल सकती, तो भी वो उसे ज़िंदा रखेगी। चाहे वो उसे पहचाने या नहीं।
उसने अस्पताल जाकर अपना लॉकर खाली किया। और जाते-जाते, फ़ार्मेसी के उस कमरे से जहाँ बेहोशी की दवाओं के इंजेक्शन रखे जाते थे, उसने कुछ ऐसी चीज़ें अपने बैग में डालीं जो उसे नहीं डालनी चाहिए थीं, और आठ साल में पहली बार नियम तोड़ते हुए उसके हाथ ज़रा भी नहीं काँपे।
✦ ✦ ✦
जब वो दो घंटे बाद लौटी, फ़्लैट का दरवाज़ा खुला था।
खुला नहीं — टूटा हुआ। चौखट से उखड़ा, एक कब्ज़े पर लटकता हुआ। लिविंग रूम में सोफ़ा पलटा पड़ा था, कॉफ़ी टेबल का शीशा चूर-चूर था, और बालकनी का दरवाज़ा पूरा खुला था, और बारिश अंदर आ रही थी, फ़र्श को भिगोती हुई। निरव कहीं नहीं था। और फ़र्श के बीचों-बीच, एक स्टील की बाल्टी में, कुछ जल रहा था — या जल चुका था — काली, मुड़ी हुई राख, जिसके किनारों पर अब भी पीले लीगल पैड के काग़ज़ के टुकड़े थे, और उन टुकड़ों पर उसकी लिखावट के आधे-अधूरे शब्द — "…मेहर है…", "…जाने मत…", "…प्यार करते…" — उसकी सारी चिट्ठियाँ। किसी ने उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर इकट्ठा किया था — तकिये के नीचे से, बटुए से, फ़्रिज से, आईने से — और जला दिया था। और उस राख के ठीक ऊपर, जैसे किसी ने जानबूझकर रखा हो, एक चीज़ चमक रही थी।
सोने का एक पुराना सिक्का। कुषाण काल का। जिस पर एक औरत पेड़ की डाल पकड़े खड़ी थी, उसकी कमर में एक लचक।
मेहर सिक्का हाथ में लिए नीचे लॉबी में उतरी, वॉचमैन से पूछने कि किसने, कब, कौन आया था — और रामदीन कुछ कह पाता उससे पहले उसकी नज़र लॉबी में टँगे उस टीवी पर पड़ी जिस पर हमेशा कोई न्यूज़ चैनल चलता रहता था, और उस पर एक हेडलाइन रेंग रही थी, जिसके पीछे एक सूखी, फटी हुई, मीलों तक फैली ज़मीन का हवाई शॉट था, और उस ज़मीन के बीच में एक काला शिखर:
"ओडिशा का तमसा जलाशय पूरी तरह सूखा — इतिहास में पहली बार। मौसम विभाग: परसों रात से पूर्वी तट पर इस मानसून की आख़िरी और सबसे भारी बारिश।"
मेहर ने सिक्के को अपनी मुट्ठी में इतनी ज़ोर से भींचा कि उस औरत की आकृति उसकी हथेली में छप गई।
उसे पता था कि वो उसे कहाँ ले गए हैं।
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