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एपिसोड 7 — सातवीं आहुति: धड़कन

Pretika · Yakshini Stories · 17 मिनट

Writer
Pretika
Story
वामिका — उल्टी साधना
Chapter
7 of 10
Category
Yakshini Stories
Reading time
17 min
Words
3275
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

दिल की धड़कन एक ढोल है जिसे वक़्त बजाता है। हर इंसान के सीने में वक़्त का एक नौकर बैठा है, जो दिन-रात, सोते-जागते, बिना थके उस ढोल पर थाप देता रहता है — एक, दो, एक, दो — और हर थाप के साथ इंसान को याद दिलाता है कि उसके पास गिनी हुई थापें हैं। मैंने वक़्त से उसका ढोल छीन लिया। उस नौकर को निकाल दिया। और उस ढोल पर अपनी ताल रख दी — इतनी धीमी, इतनी पुरानी, कि उसे सुनने के लिए किसी को बारह सौ बरस तक ठहरना पड़े।
पुणे से लौटने के बाद की पहली रात मेहर सो नहीं पाई, और तीन बजे के आसपास, जब निरव उसकी बगल में उस काली, सपनों से ख़ाली नींद में पड़ा था जो अब उसकी हर रात थी — आँखें खुली, पुतलियाँ स्थिर, साँस धीमी — उसने अपनी पुरानी नर्स वाली आदत से, बिना सोचे, उसकी कलाई पकड़ी और अपनी दो उँगलियाँ उसकी नाड़ी पर रखीं। कुछ नहीं। उसने उँगलियाँ थोड़ी खिसकाईं, थोड़ा ज़ोर से दबाया, और गिनने लगी, दिल में, जैसे ICU में गिनती थी — एक… दो… तीन… चार… पंद्रह… बीस… तीस… कुछ नहीं। उसकी कलाई गरम थी, उसकी साँस चल रही थी, पर उसकी नसों में कोई थाप नहीं थी। मेहर ने उसकी गर्दन पर उँगलियाँ रखीं, जबड़े के ठीक नीचे, जहाँ कैरोटिड धमनी होती है और जहाँ मौत के सबसे आख़िरी पलों में भी हल्की सी धड़कन बची रहती है। चालीस सेकंड। पचास। और तब — एक बार — बहुत धीमे, बहुत गहराई से, जैसे किसी बहुत बड़े कुएँ की तली में कोई पत्थर गिरा हो — एक थाप। और फिर दोबारा सन्नाटा।
वो उठी, अपने बैग से स्टेथोस्कोप निकाला — वही पुराना, नीली ट्यूब वाला, जिस पर उसने नर्सिंग कॉलेज के पहले साल में अपना नाम खुरचा था — और उसे उसके सीने पर, बाईं ओर, दिल के ठीक ऊपर रखा, और आँखें बंद करके सुना। और जो उसने सुना, वो धड़कन नहीं थी। वो बारिश थी। उसके सीने के भीतर, उसकी पसलियों के पिंजरे में, जहाँ दिल होना चाहिए था, वहाँ बारिश गिर रही थी — धीमी, लगातार, पत्थरों पर गिरती हुई, जैसे किसी मंदिर की छत से पानी टपक रहा हो — और उस बारिश के बीच, बहुत दूर, बहुत धुँधली, पायलों की आवाज़ थी, किसी के नंगे पैरों के चलने की, और उसके साथ किसी औरत का गुनगुनाना, कोई ऐसी धुन जो किसी भाषा में नहीं थी, जो लोरी भी लगती थी और विलाप भी। मेहर ने स्टेथोस्कोप अपने कानों से ऐसे खींचा जैसे वो जल रहा हो, और बाथरूम की ओर भागी, और उसके ठंडे टाइलों वाले फ़र्श पर बैठकर, दरवाज़ा अंदर से बंद करके, अपने घुटनों को छाती से भींचे हुए, सुबह तक काँपती रही। उसने रोने की कोशिश की, पर आँसू नहीं आए। कुछ डर इतने बड़े होते हैं कि उनमें आँसुओं के लिए भी जगह नहीं बचती।
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सातवीं रात वामिका पहली बार धीमे आई। न कोई झटका, न कोई जल्दबाज़ी। बारिश रुकी, और वो बालकनी के दरवाज़े से अंदर आई, और निरव के पास बिस्तर पर लेट गई, उसकी बगल में, बिल्कुल उस तरह जैसे कोई पत्नी बरसों की शादी के बाद अपने पति के पास लेटती है — बिना किसी माँग के, बिना किसी अदा के — और उसने अपना सिर उसकी छाती पर रख दिया, कान उसके दिल के ऊपर, और बहुत देर तक बस सुनती रही। मेहर गेस्ट रूम में थी। उसने ख़ुद वहाँ जाने का फ़ैसला किया था, और निरव ने उसे रोका नहीं था, और इस बात पर उसे बाद में सबसे ज़्यादा शर्म आई।
"तुम्हारा दिल बहुत जल्दी-जल्दी बोलता है," वामिका ने कहा, "जैसे उसके पास कहने को बहुत कुछ हो और वक़्त बहुत कम। इंसानों के दिल ऐसे ही होते हैं। हमेशा भागते हुए।" उसने अपना सिर उठाया, और उसका हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख दिया, अपनी काँसे जैसी, ठंडी, भीगी चमड़ी पर, बाईं ओर। "अब मेरा सुनो।"
निरव ने इंतज़ार किया। दस सेकंड। बीस। पचास। उसकी हथेली के नीचे कुछ नहीं था, सिर्फ़ ठंडक, चिकनाई, और एक हल्का सा उभार। और फिर — एक मिनट के बाद — एक थाप। इतनी गहरी, इतनी भारी, कि वो उसकी हथेली से होती हुई उसकी कलाई में, उसकी बाँह में, उसके कंधे में, उसके अपने सीने तक गूँज गई, जैसे किसी विशाल मंदिर का घंटा बहुत दूर बजा हो और उसकी आवाज़ पत्थरों से होती हुई ज़मीन के नीचे तक उतर गई हो। "एक मिनट में एक बार," वामिका ने कहा, "बारह सौ बरस से। इतने धीमे दिल से किसी को चाहना बहुत थकाने वाला होता है, निरव। हर धड़कन के बीच इतना इंतज़ार।" उसने उसके होंठों के पास अपने होंठ लाए। "सातवीं दोगे? अपनी धड़कन? ताकि मेरा दिल अकेला न धड़के?"
और उसने हाँ कहा, और इस बार कोई झिझक नहीं थी, और वो उसके ऊपर आई, और उसने अपनी छाती उसकी छाती से सटा दी, दिल से दिल, और निरव ने अपने सीने के अंदर कुछ बदलते महसूस किया — उसका दिल, जो सारी ज़िंदगी भागता रहा था, धीमा होने लगा, जैसे कोई दौड़ता हुआ घोड़ा किसी के धीरे से लगाम खींचने पर रुकता है — सत्तर, पचास, तीस, दस — और हर धीमी होती थाप के साथ उसके बदन में एक अजीब सी, गहरी, नदी जैसी शांति उतरती गई, और उनके बदन उसी धीमी लय में हिलने लगे, एक थाप पर एक लहर, जैसे समंदर साँस लेता है — और जब उसका दिल आख़िरकार उसके दिल की लय में आ गया — एक मिनट में एक बार, उसी पल, एक साथ — तो उस एक थाप में इतना कुछ था कि निरव को लगा उसका पूरा बदन किसी घंटे की तरह बज उठा है, और वो आवाज़ उसकी हड्डियों में, उसकी नसों में, उसके होंठों तक गूँजती रही, और वो उसके नाम से ज़्यादा गहरी कोई चीज़ पुकार रहा था — वो नया नाम, जिसे सिर्फ़ वो जानती थी।
बाद में, जब बारिश अब भी रुकी हुई थी और दुनिया ठहरी हुई थी, वो उसकी बाँह पर सिर रखे लेटी रही, और बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोली, बिना उसकी ओर देखे, जैसे कोई ऐसी बात कह रही हो जो उसने कभी किसी से नहीं कही: "धनंजय ने मुझे कभी देखा नहीं। नौ रातें वो मेरे पास आया, और एक बार भी उसने मेरी आँखों में नहीं देखा। वो मेरे बदन में सोना देखता था। मेरे होंठों में ठेके। मेरी कमर में ख़ज़ाने। हर आहुति के बाद वो पूछता — अब क्या मिलेगा? कभी नहीं पूछा — तुम कौन हो।" उसने उसकी ओर देखा। "तुमने मुझे पढ़ा, निरव। उस पहली रात, उस लैब में। तुमने मुझे ऐसे पढ़ा जैसे मैं कोई कविता हूँ, कोई प्रार्थना। बारह सौ बरस में पहली बार किसी ने मुझे इस तरह आवाज़ दी। तुम्हें पता भी नहीं था कि तुम क्या कर रहे हो, और फिर भी तुमने… मुझे प्यार से पढ़ा।"
"वो क्या चाहता है?" निरव ने पूछा, हालाँकि उसे पता था।
उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा था जो निरव ने किसी यक्षिणी की आँखों में होने की उम्मीद नहीं की थी। डर। "अगर दसवीं रात उसने तुम्हारा ख़ून अपने ख़ून में मिला लिया," उसने फुसफुसाया, "तो मैं उसकी हो जाऊँगी। प्रेमी की तरह नहीं। ज़ंजीर में बँधी कुतिया की तरह। हमेशा के लिए। जो वो कहेगा, मैं करूँगी। जिसे वो कहेगा, मैं मारूँगी। जिसके पास वो भेजेगा, मैं जाऊँगी। और बारह सौ बरस का मेरा इंतज़ार — एक ऐसे आदमी की तिजोरी बनकर ख़त्म होगा जिसने मुझे कभी देखा तक नहीं।" उसकी एक बूँद — आँसू था या उसके बालों का पानी, निरव नहीं कह सकता था — उसकी बाँह पर गिरी, और वो ठंडी नहीं थी। गरम थी। इंसानी आँसू की तरह गरम।
और निरव ने, जो सात रातों से अपनी ज़िंदगी के टुकड़े उसे देता आया था, उस रात पहली बार महसूस किया कि वो उसकी रक्षा करना चाहता है। इस चीज़ की, इस औरत की, इस श्राप की, जो उससे सब कुछ छीन रही थी — वो उसे किसी और के हाथों में नहीं जाने देना चाहता था। और उस एहसास के साथ ही, गेस्ट रूम की दीवार के उस पार, एक औरत के सिसकने की दबी हुई आवाज़ आई, जिसे निरव ने सुना और अनसुना कर दिया।
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अगली सुबह निरव ने फ़्लैट के लॉफ़्ट से वो पुराना स्टील का ट्रंक उतारा, जिसे उसने अपनी माँ की मौत के बाद तेरह साल पहले बंद किया था और फिर कभी खोलने की हिम्मत नहीं की थी। उसमें माँ की साड़ियाँ थीं, नेफ़थलीन की गोलियों की तेज़ गंध के साथ, उनकी चूड़ियों का एक डिब्बा, उनकी पुरानी डायरियाँ, और सबसे नीचे, एक भूरे लिफ़ाफ़े में, रबर बैंड से बँधा काग़ज़ों का एक गट्ठा।
चिट्ठियाँ। 1993 की। मोटे क्रीम काग़ज़ पर, फ़ाउंटेन पेन से लिखी हुई — वही काग़ज़, वही पेन, वही लिखावट जो निरव ने बारह दिन पहले उस लकड़ी के बक्से के साथ आई चिट्ठी में देखी थी। हर चिट्ठी के आख़िर में सिर्फ़ एक अक्षर — "डी."। पहली चिट्ठियाँ प्रेम-पत्र थीं, छोटे, नाप-तौलकर लिखे हुए, जैसे कोई ठेके की शर्तें लिखता है। बाद वाली छोटी होती गईं। आख़िरी वाली में सिर्फ़ तीन पंक्तियाँ थीं: "बच्चा रखना तुम्हारा फ़ैसला है। उसका ख़र्च मेरा। उसकी पढ़ाई मेरी मर्ज़ी से होगी।" उसके साथ एक तस्वीर थी — किसी ऑफ़िस पार्टी की, 1993 की तारीख़ वाली — जिसमें एक बहुत सुंदर, बहुत शांत, लंबी चोटी वाली जवान औरत एक चालीस-पैंतालीस साल के आदमी के बगल में खड़ी थी, जिसका चेहरा चिकना और बेदाग़ था और जिसकी आँखें ठीक वैसी ही थीं जैसी आज, बत्तीस साल बाद भी थीं।
और उसके नीचे बैंक के काग़ज़ात थे। निरव के स्कूल की फ़ीस — "कपाड़िया एजुकेशन ट्रस्ट, एनॉनिमस स्कॉलर प्रोग्राम"। उसका संस्कृत में एमए — वही ट्रस्ट। फ़्लोरेंस में पांडुलिपि-संरक्षण का वो डिप्लोमा, जिसकी स्कॉलरशिप उसे "किसी गुमनाम दानदाता" से मिली थी और जिसके लिए उसने उस साल भगवान का शुक्रिया अदा किया था — वही ट्रस्ट। उसके पहले रिसर्च असिस्टेंटशिप की सिफ़ारिश — वही ट्रस्ट। अनंत्या लैब में उसकी नौकरी का ऑफ़र लेटर — जिस पर नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक हस्ताक्षर था। "डी.के."। निरव ने अपनी पूरी ज़िंदगी को उन काग़ज़ों में फैले देखा, और उसे समझ आया कि उसकी ज़िंदगी में एक भी मोड़ ऐसा नहीं था जिसे उसने ख़ुद चुना हो। उसकी हर पढ़ाई, हर स्कॉलरशिप, हर नौकरी, पुरानी लिपियों से उसका ये जुनून, उन्हें ज़ोर से पढ़ने की ये आदत — सब किसी ने बनाया था। बत्तीस साल तक, धीरे-धीरे, एक सुनार की तरह जो सोने को पीट-पीटकर एक ख़ास आकार देता है। उसे एक ऐसा आदमी बनाया गया था जो एक दिन ताड़ के कुछ पत्ते उठाएगा और उन्हें प्यार से, ज़ोर से, पढ़ेगा।
गट्ठे में सबसे आख़िर में एक और लिफ़ाफ़ा था, बंद, जिस पर उसकी माँ की गोल, सधी हुई लिखावट में लिखा था: "निरव के लिए — जब वो पच्चीस का हो जाए।" पच्चीस। उसकी माँ उन्नीस पर चली गई थी। निरव ने उसे खोला। उसमें सिर्फ़ एक पन्ना था, और उसकी तारीख़ उनकी मौत से ठीक आठ दिन पहले की थी: "बेटा, अगर कभी कोई धनंजय कपाड़िया तुम्हें कोई पुरानी चीज़ पढ़ने को दे — कोई किताब, कोई पत्थर, कोई पत्ता — तो उसे मत पढ़ना। ज़ोर से तो बिल्कुल नहीं। मैं तुम्हें वजह नहीं बता सकती। उसने कहा है कि अगर मैंने तुम्हें कुछ भी बताया, तो… बस मत पढ़ना। वादा करो। — माँ।" निरव को दर्द नहीं हुआ, क्योंकि दर्द उसके पास था ही नहीं। पर वो उस पन्ने को उस वक़्त तक पकड़े बैठा रहा जब तक उसकी उँगलियों के नीचे का काग़ज़ उसकी हथेली की नमी से गल नहीं गया।
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अनंत्या लैब पुलिस की सील के पीछे थी, पर निरव को अंदर जाने में कोई दिक़्क़त नहीं हुई, क्योंकि नाम खोने के बाद उसने एक और चीज़ सीखी थी — लोगों की नज़रें उस पर टिकती नहीं थीं। वो उसे देखते, और उनकी नज़र उसके चेहरे पर से ऐसे फिसल जाती जैसे बारिश का पानी शीशे से, और अगले ही पल वो भूल जाते कि उन्होंने किसी को देखा था। जिस चीज़ का नाम न हो, उसे याद रखना मुश्किल होता है। सिक्योरिटी गार्ड ने उसकी ओर देखा, सिर हिलाया, और अपने फ़ोन में लौट गया। लिफ़्ट ने उसके कार्ड को पहचाना नहीं, पर सीढ़ियाँ खुली थीं।
लैब अँधेरी थी, बस बाहर की रोशनी शीशे की दीवार से अंदर आ रही थी, और इरफ़ान वहीं था — हर शीशे में, हर काली स्क्रीन में — खड़ा, इंतज़ार करता हुआ, जैसे कोई गवाह अदालत में अपनी बारी का इंतज़ार करता है। और जब निरव उस बड़ी शीशे की दीवार के सामने खड़ा हुआ, तो इरफ़ान के प्रतिबिंब ने उसे देखा, और धीरे से, बहुत सावधानी से, जैसे कोई मूक अभिनेता, उस रात का खेल खेलना शुरू किया। उसने दिखाया कि वो स्कैनर पर झुका था, फ़ोन कान से लगाए। उसने दिखाया कि वो मुड़ा, दरवाज़े की ओर। उसने अपना हाथ हवा में ऊँचा उठाया — किसी बहुत लंबे आदमी की ऊँचाई दिखाते हुए — और फिर उसी हाथ से अपनी गर्दन के बाईं ओर एक गोला बनाया, जहाँ जले का निशान होता है। फिर उसने अपने दोनों हाथ अपने ही सिर के दोनों ओर रखे — एक ठोड़ी के नीचे, एक सिर के पीछे — और एक झटके से, एक भयानक, सधे हुए झटके से, उसे घुमाया। और फिर वो एक पल के लिए स्थिर हुआ, और उसने अपनी ख़ाली मुट्ठी खोली — जैसे कोई उसमें से कुछ छीन ले गया हो — और स्कैनर की ओर इशारा किया। चालीसवाँ पत्ता।
शिंदे। वो यक्षिणी नहीं थी। वो कभी यक्षिणी थी ही नहीं।
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उसी रात वो "अंबर" पहुँचा, और इस बार उसे किसी ने नहीं रोका — किसी ने उसे देखा ही नहीं, और जिन्होंने देखा, वो भूल गए — और धनंजय कपाड़िया उसी शीशे की दीवार के सामने बैठा था, अँधेरे में, बाहर समंदर पर पड़ती बिजली की चमक में, और उसने बिना मुड़े कहा, "सातवीं के बाद कोई दरवाज़ा नहीं रोकता। मुझे भी नहीं रोकता था।" और फिर वो खड़ा हुआ, और धीरे से, एक-एक उँगली खींचकर, अपने भूरे चमड़े के दस्ताने उतारे।
उसके हाथ हाथ नहीं थे। वो फटी हुई मिट्टी थे। ठीक वैसी मिट्टी जैसी सूखे जलाशय के पेट में होती है — भूरी, सख़्त, और गहरी दरारों से भरी, कछुए की टूटी पीठ जैसी। और उन दरारों के बीच, जहाँ मांस होना चाहिए था, जहाँ ख़ून होना चाहिए था, वहाँ सिक्के थे। पुराने, सोने के सिक्के, पर चमकते नहीं — हरे, काई लगे, ज़ंग जैसी किसी चीज़ से ढके, बरसों से पानी में पड़े सिक्कों की तरह — उसकी चमड़ी के भीतर ऐसे जड़े हुए थे जैसे किसी कीचड़ में दबे। और फिर उसने अपने चेहरे पर हाथ फेरा, कान के पास से, और उसके चेहरे की वो मोम जैसी, चिकनी, बेदाग़ जवानी एक पतली, प्लास्टिक जैसी परत की तरह छिलने लगी — महँगा, बेहतरीन, फ़िल्मी मेकअप — और उसके नीचे वही था। दरारें। गहरी, सूखी, उसकी ठोड़ी से माथे तक फैली हुई। और उनमें, उसके गालों में, उसकी पलकों के नीचे, उसके होंठों के कोनों में — काई लगे सोने के सिक्के। और उसके पूरे बदन से एक गंध उठ रही थी, जिसे निरव ने पहचाना — जलाशय के सूखते हुए किनारों की गंध, ठहरे पानी की, सड़ती मछलियों की, महीनों से बंद किसी कुएँ की।
"बयालीस बरस," धनंजय कपाड़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ अब भी जवान थी, और ये सबसे भयानक बात थी, "नौ वरदान। सोना, बेख़ौफ़ी, जवानी, दौलत, ताक़त। सब कुछ। और हर रात ये मुझे थोड़ा-थोड़ा खा रहे हैं, अंदर से। तुम्हें पता है सड़ना कैसा लगता है, जब दर्द भी न हो? जब तुम्हें पता हो कि तुम्हारे अंदर कुछ गल रहा है, पर तुम उसे महसूस न कर सको? ये सबसे बुरा है, बेटा।" उसने उस शब्द पर ज़ोर दिया। "हाँ। बेटा। मुझे लगता है सुधा ने तुम्हें बता दिया होगा। वो बूढ़ी अंधी चुप रहना कभी नहीं सीखी।"
"तुमने मुझे बनाया," निरव ने कहा, और उसे अपनी आवाज़ बहुत दूर से आती लगी।
"हर हिस्सा।" धनंजय मुस्कुराया, और उसकी दरारों में सिक्के खिसके। "तुम्हारी आवाज़ तक। तुम्हें पता है मैंने कितनी मेहनत की? जब तुम बारह साल के थे, मैंने तुम्हारे स्कूल में संस्कृत श्लोक-पाठ की एक प्रतियोगिता शुरू करवाई। तुम हर साल जीते। मैंने जजों को कभी पैसे नहीं दिए — ज़रूरत ही नहीं पड़ी। तुम्हारी आवाज़ में कुछ था। वो चीज़ जो उसे बुलाती है। जो मेरी आवाज़ में कभी नहीं थी — मैंने उसे पढ़ा था, पर मज़ाक़ में, नशे में, और वो फिर भी आई, पर मुझसे कभी प्यार नहीं किया। तुमसे करेगी — मुझे पता था। और जो उससे प्यार करवा सके, वही उसे पूरी तरह बुला सकता है। दसवीं तक।" उसने अपने दरारों वाले हाथ फैलाए। "तो अब सुनो। मेरे पास एक प्रस्ताव है, और ये उदार है। दसवीं रात, तुम अपना ख़ून मेरे ख़ून में मिलाओगे। मौत मैं ले लूँगा — मेरी ये सड़ांध ख़त्म, मैं अमर, और साधना पूरी होने से वो मेरी हो जाएगी, मेरी ज़ंजीर में। और तुम? तुम आज़ाद। तुम्हारी नौ आहुतियाँ, नौ वरदान — सब तुम्हारे। तुम्हें कभी डर नहीं लगेगा, कभी दर्द नहीं होगा, सोना तुम्हारे पैरों में लोटेगा। तुम इस शहर के सबसे अमीर आदमी बनोगे। मेरे वारिस।"
"और वो?"
"वो?" धनंजय हँसा। "वो एक यक्षिणी है, बेटा। एक औरत नहीं। एक खदान है। एक तिजोरी जो रात को बोलती है। उसके साथ वही होगा जो किसी भी तिजोरी के साथ होता है। उसे चलाने वाले के हाथ की चाबी होगी।"
"कभी नहीं," निरव ने कहा।
धनंजय कपाड़िया ने अपने दस्ताने वापस उठाए, धीरे-धीरे, एक-एक उँगली में पहनते हुए, और उसके सड़े हुए चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो किसी ऐसे आदमी की होती है जिसने शतरंज का आख़िरी चाल बहुत पहले देख लिया हो। "तुम्हारी माँ ने भी यही कहा था," उसने कहा, "कभी नहीं। वो तुम्हें सब कुछ बता देना चाहती थी। चिट्ठी भी लिख ली थी, मुझे पता चला था।" उसने अपनी उँगलियाँ चटकाईं, और निरव ने सुना कि उसकी हड्डियों की जगह सिक्के खनके। "उन्नीस साल के लड़के की माँ का दिल अचानक रुक जाए, तो कौन सवाल पूछता है? तुम्हारे पास चुनाव है, बेटा। मैं झूठ नहीं बोलूँगा। पर वो चुनाव तुम्हारे पास कभी था ही नहीं।"
✦ ✦ ✦
उस रात निरव घर नहीं लौटा। वो मरीन ड्राइव की दीवार पर बैठा रहा, बारिश में, समंदर को देखता हुआ, जिसकी लहरें पत्थरों पर पछाड़ें खा रही थीं, और तीन बजे, जब बारिश एक पल के लिए रुकी और समंदर की आवाज़ भी रुक गई — लहरें बीच हवा में, सफ़ेद झाग के साथ, जमी हुई — वो उसके बगल में आकर बैठी, दीवार पर, पैर लटकाए, जैसे कोई लड़की अपने प्रेमी के साथ बैठती है।
"तुम्हें उससे नफ़रत है," उसने कहा, बिना पूछे।
"हाँ।"
"अच्छा है।" उसने उसके कंधे पर सिर रखा। "नफ़रत आदमी को ज़िंदा रखती है। दर्द जाने के बाद भी।" फिर वो बहुत देर तक चुप रही, और जब बोली, तो उसकी आवाज़ में वो दुख था जो निरव ने उस पहले सपने में, नदी किनारे, सुना था। "कल आठवीं रात है, निरव। और कल मैं तुमसे वो माँगूँगी जो तुम्हें सबसे ज़्यादा प्यारा है।"
निरव ने उसकी ओर देखा। "क्या?"
"उसकी याद।"
उसे पूछना नहीं पड़ा कि किसकी। "नहीं," उसने कहा, और सात रातों में पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो दर्द जैसा था, भले ही वो उसे महसूस नहीं कर सकता था, "नहीं, कुछ और लो। मेरी आँखें ले लो। मेरी आवाज़ ले लो। कुछ भी। पर मेहर को नहीं।"
वामिका ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया — ठंडे, गीले, काँसे जैसे हाथ — और उसकी आँखों में देखा, और उसकी अपनी आँखों में वो नदी की तली वाले काले पत्थर पहली बार नम थे। "आहुति वही होती है जो चुभे, मेरी जान," उसने कहा। "जो न चुभे, वो सिर्फ़ दान है। और मैं दान नहीं माँगती।"
और समंदर की जमी हुई लहर, बीच हवा में, सफ़ेद झाग समेत, धीरे-धीरे पिघलकर फिर से गिरने लगी।

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