Pretika › Yakshini Stories › वामिका — उल्टी साधना
एपिसोड 6 — छठी आहुति: नाम
Pretika · Yakshini Stories · 17 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- वामिका — उल्टी साधना
- Chapter
- 6 of 10
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3288
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
नाम एक रस्सी है जिससे दुनिया इंसान को बाँधे रखती है। माँ उसी रस्सी से उसे खाने पर बुलाती है, दोस्त उसी से उसे हँसी में खींचते हैं, औरतें उसी को रात में फुसफुसाकर उसे अपना बनाती हैं, और मौत भी, जब आती है, तो पहले नाम ही पुकारती है। मैंने वो रस्सी काट दी। अब दुनिया उसे पुकारना चाहे भी तो नहीं पुकार सकती। अब सिर्फ़ मेरी ज़बान उसे बुला सकती है — एक ऐसे नाम से जो किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा जा सकता, किसी पत्थर पर नहीं खोदा जा सकता, और किसी दूसरी औरत के होंठों पर कभी नहीं आ सकता।
इरफ़ान को अगले दिन दोपहर में मरीन लाइंस के बड़े क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, बारिश में, और उसकी अम्मी, एक छोटी सी, सफ़ेद दुपट्टे वाली औरत, जो पूरे वक़्त चुप रहीं और एक भी आँसू नहीं बहाया, आख़िर में निरव के पास आईं और उसका हाथ पकड़कर बोलीं, "वो तुम्हारी बहुत बातें करता था, बेटा। कहता था तू पुराने पत्तों को ऐसे पढ़ता है जैसे वो बोल रहे हों।" और निरव उनसे कुछ नहीं कह पाया, क्योंकि उसके गले में एक ऐसा पत्थर अटका था जिसका कोई नाम नहीं था — दुख नहीं, क्योंकि दुख के लिए दर्द चाहिए, और दर्द उससे छिन चुका था; अपराध-बोध भी नहीं, पूरी तरह नहीं — बस एक भारीपन, एक ठंडा, बेजान वज़न, जैसे किसी ने उसके सीने में गीली मिट्टी भर दी हो। उसने क़ब्र पर मिट्टी डाली, और जब मुट्ठी भर गीली मिट्टी उसकी उँगलियों से फिसलकर गड्ढे में गिरी, तो उसे एक पल के लिए लगा कि क़ब्र के पास जमा बारिश के छोटे से गड्ढे के पानी में, जहाँ सबके प्रतिबिंब हिल रहे थे, इरफ़ान का चेहरा भी था — खड़ा, सबके बीच, अपनी ही क़ब्र को देखता हुआ।
"सुधा" — एक नाम, और उसके पीछे का चेहरा निरव के पास पहले से था, उस पीली पड़ चुकी 1984 की तस्वीर में, मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी वो दुबली-पतली, चश्मे वाली, छोटे बालों वाली औरत जिसके हाथ में नोटबुक थी। डॉक्टर सुधा रानडे। उसे ढूँढ़ने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा — डेक्कन कॉलेज, पुणे की रिटायर्ड एपिग्राफ़िस्ट, शिलालेखों की विशेषज्ञ, जिनके 1970 और 80 के दशक के पेपर आज भी पढ़ाए जाते थे, और जिन्होंने 1985 के बाद से एक भी पेपर नहीं लिखा था, एक भी कॉन्फ़्रेंस में नहीं गई थीं, एक भी इंटरव्यू नहीं दिया था। डेक्कन कॉलेज के एक पुराने चपरासी ने, जिससे निरव ने फ़ोन पर बात की, बस इतना बताया कि "मैडम बहुत साल पहले बीमार हो गई थीं, आँखों की कोई तकलीफ़… अब किसी से मिलती नहीं, शिवाजीनगर की एक पुरानी सोसाइटी में अकेली रहती हैं।"
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वो लोग अगली दोपहर पुणे निकलने वाले थे, और निरव ने नहाने के लिए गीज़र चलाया था, और बाथरूम गरम भाप से भर गया था, और तभी — दोपहर के ढाई बजे, दिन के उजाले में, जब ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था — बाहर की बारिश रुक गई।
शावर का पानी भी रुक गया। नल खुला था, पर उसमें से एक बूँद नहीं गिर रही थी, जैसे पानी को किसी ने बीच हवा में थाम लिया हो। और भाप से भरे आईने पर, जिसमें अब निरव का कोई चेहरा नहीं बनता था, एक उँगली चलने लगी — अंदर से, शीशे के उस पार से — और उल्टे, आईने में लिखे हुए अक्षर उभरने लगे, वही लिपि, वही ब्राह्मी जैसी उलटी लिखावट जो उन ताड़ के पत्तों पर थी, और निरव ने, जिसे अब उल्टे अक्षर पढ़ने के लिए उन्हें सीधा करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती थी, उन्हें पढ़ा: "आज दिन में आई हूँ। क्योंकि रात तक तुम भाग जाते।"
और फिर वो उसके पीछे थी — भाप के बीच, उसकी नंगी पीठ से सटी, उसकी ठंडी गीली चमड़ी उसकी गरम गीली चमड़ी पर, उसके बाल उन दोनों को लपेटे हुए — और उसके हाथ धीरे-धीरे उसकी छाती पर फिसल रहे थे, और उसने अपने होंठ उसके कान के पीछे रखे, वहाँ जहाँ चमड़ी सबसे पतली होती है, और बहुत धीरे से उसका नाम लिया — "निरव" — जैसे कोई किसी चीज़ को आख़िरी बार चखता है। "ये नाम मुझे दे दो," उसने कहा, "छठी आहुति। तुम्हारा नाम।"
और पहली बार, छह रातों में पहली बार, निरव ने झिझक महसूस की। दर्द नहीं था उसके पास, डर भी नहीं — वो दोनों छिन चुके थे — पर कहीं बहुत गहरे, किसी ऐसी जगह जहाँ तक उसकी आहुतियों का हाथ नहीं पहुँचा था, कुछ काँपा। "नाम?" उसने कहा, "फिर… फिर मैं कौन रहूँगा?"
उसने उसे अपनी ओर घुमाया। भाप में उसका चेहरा धुँधला था, पर उसकी आँखें — वो नदी की तली वाले काले पत्थर — साफ़ थीं, और उनमें कोई हँसी नहीं थी, कोई छल नहीं, बस एक गहरी, पुरानी, थकी हुई ईमानदारी। "मेरा," उसने कहा। "तुम मेरे रहोगे। और मैं तुम्हें एक नया नाम दूँगी। ऐसा नाम जो बारह सौ बरस में मैंने किसी को नहीं दिया। जो सिर्फ़ मैं जानूँगी, और सिर्फ़ मैं पुकारूँगी।" उसने उसके होंठ चूमे, धीरे से, और फिर उसकी गर्दन, और फिर उसकी छाती पर, दिल के ठीक ऊपर, और वहाँ अपनी ज़बान की नोक से कुछ लिखा — कोई अक्षर, कोई आकृति, जो उसकी चमड़ी पर एक पल के लिए सोने की लकीर की तरह चमका और फिर भीतर समा गया। "कहो," उसने फुसफुसाया।
"हाँ।"
और उसने उसके कान में उसका नया नाम कहा। और निरव ने बाद में कई बार कोशिश की कि उसे याद करे, दोहराए, लिखे — पर वो कोई शब्द नहीं था जो ज़बान पर आ सके। वो एक आवाज़ थी, जैसे पानी किसी गहरी, अँधेरी गुफ़ा में धीरे-धीरे भरता है और दीवारों से टकराकर गूँजता है — और उसे सुनते ही निरव के घुटने काँप गए, और वो उसकी बाहों में गिर पड़ा, और भाप में, उस रुकी हुई बूँदों वाले शावर के नीचे, जो कुछ उसके बाद हुआ, वो किसी इंसानी बाथरूम में नहीं, बल्कि किसी नदी के भीतर हुआ लगा — धीमा, गहरा, बहाव की तरह, जिसमें कोई किनारा नहीं था।
और फिर शावर का पानी गिरा। एक साथ। पूरे ज़ोर से। और वो अकेला था।
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असर तुरंत शुरू हुआ। पर इतनी चुपचाप, इतनी साधारण चीज़ों में, कि पहले तो किसी ने ग़ौर ही नहीं किया।
बिल्डिंग के नीचे वॉचमैन, रामदीन, जो पाँच साल से हर सुबह उसे "गुड मॉर्निंग निरव साहब" कहता आया था, उसने उस दोपहर गाड़ी की चाबी लेते वक़्त उसे ऊपर से नीचे तक देखा और विनम्रता से पूछा, "जी, आप किस फ़्लैट में जाना चाहते हैं?" निरव ने कहा, तेईस सौ चार, मेरा फ़्लैट। रामदीन ने रजिस्टर देखा, फिर उसे देखा, फिर मेहर को, जिसने कहा, "रामदीन भैया, ये मेरे… ये…" — और वो रुक गई। उसका मुँह खुला, जैसे कोई शब्द बोलने के लिए, और कुछ नहीं निकला। उसने दोबारा कोशिश की — "ये… न… नि…" — और शब्द उसके होंठों तक आकर ऐसे फिसल गया जैसे साबुन की गीली टिकिया उँगलियों से फिसलती है।
गाड़ी में, एक्सप्रेसवे पर, बारिश और घाटों के धुँधलके के बीच, निरव ने अपना फ़ोन देखा। उसके व्हाट्सऐप पर उसका अपना नाम ग़ायब था — प्रोफ़ाइल पर सिर्फ़ एक ख़ाली जगह। मेहर के फ़ोन में, जहाँ तीन साल से उसका नंबर एक दिल वाले इमोजी के साथ सेव था, अब सिर्फ़ लिखा था "Unknown"। उसने अपने बटुए से लैब का आईडी कार्ड निकाला — उसकी तस्वीर थी, उसका ब्लड ग्रुप था, उसका एम्प्लॉई नंबर था, और नाम वाली जगह पर एक सफ़ेद, बेदाग़ ख़ालीपन था, जैसे वहाँ कभी कुछ छपा ही न हो। उसने अपने आधार कार्ड की फ़ोटोकॉपी निकाली। वही। उसने अपनी पुरानी डायरी खोली, जिसके पहले पन्ने पर उसने कॉलेज में अपना नाम सुंदर अक्षरों में लिखा था — वहाँ भी सिर्फ़ ख़ाली पन्ना।
मेहर गाड़ी चला रही थी, और टोल प्लाज़ा से ठीक पहले उसने अचानक गाड़ी किनारे रोकी, और स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोने लगी — एक टूटा हुआ, अंदर से आता रोना, जैसा निरव ने उसे तीन साल में कभी रोते नहीं देखा था। "मैं तुम्हारा नाम नहीं ले पा रही," उसने सिसकते हुए कहा, "मुझे पता है वो क्या है, वो मेरे दिमाग़ में है, मैं उसे देख सकती हूँ, पर वो… वो ज़बान पर नहीं आता। जैसे कोई उसे मेरे मुँह से छीन ले रहा हो। हर बार।" उसने बैग से एक पेन निकाला और अपनी बाईं हथेली पर लिखने की कोशिश की — बड़े, साफ़ अक्षरों में — और निरव ने देखा कि स्याही उसकी चमड़ी पर टिक ही नहीं रही थी। वो ऐसे बह रही थी जैसे मोम पर पानी, बूँद बनकर, और उसकी कलाई से होती हुई गाड़ी की सीट पर टपक रही थी, और उसकी हथेली पर कुछ नहीं बचा था, सिवाय एक हल्की, नीली, बेमानी लकीर के।
"मैं अब भी यहीं हूँ, मेहर," निरव ने कहा, और उसका हाथ पकड़ा।
"पता है," उसने कहा, और उसकी आँखें उसके चेहरे पर ऐसे घूमीं जैसे कोई किसी ऐसे चेहरे को याद रखने की कोशिश कर रहा हो जो धीरे-धीरे धुँधला हो रहा हो, "बस… बस मुझे नहीं पता कि तुम्हें बुलाऊँ कैसे।"
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शिवाजीनगर की वो सोसाइटी साठ के दशक की थी — चार मंज़िला, पीली पड़ चुकी, बारिश से काली हुई दीवारों वाली, जिसके आँगन में गुलमोहर का एक विशाल पेड़ था — और डॉक्टर सुधा रानडे का फ़्लैट ग्राउंड फ़्लोर पर था, सबसे आख़िरी कोने में, और बाहर से ही समझ आ जाता था कि वो बाक़ी फ़्लैटों जैसा नहीं है, क्योंकि उसकी हर खिड़की का काँच अंदर से काले पेंट से पुता हुआ था, मोटी परत में, जैसे कोई वहाँ किसी भी रोशनी को, किसी भी प्रतिबिंब को घुसने नहीं देना चाहता था। उन्होंने घंटी बजाई, और दरवाज़ा उनके दूसरी बार बजाने से पहले ही खुल गया।
वो चौहत्तर साल की थीं, उस तस्वीर वाली औरत से बहुत छोटी और बहुत दुबली, सफ़ेद सूती साड़ी में, और उनकी आँखों पर काला चश्मा था — और जब उन्होंने चश्मा उतारा, तो मेहर के मुँह से एक दबी हुई आवाज़ निकली, क्योंकि उनकी पलकें बंद थीं, हमेशा के लिए, और उनके ऊपर और नीचे पुराने, सफ़ेद पड़ चुके, टेढ़े-मेढ़े निशान थे, जैसे किसी ने किसी नुकीली चीज़ से, जानबूझकर, बहुत पहले… "डरो मत, बच्ची," डॉक्टर सुधा ने कहा, और उनकी आवाज़ में अजीब सी शांति थी, "ये मैंने ख़ुद किया था। बहुत साल पहले। ताकि मुझे उसे दोबारा देखना न पड़े।" उन्होंने हवा में सूँघा, जैसे कोई कुत्ता किसी गंध को पहचानता है, और उनका चेहरा एक पल के लिए सिकुड़ा। "कमल की डंडियाँ," उन्होंने फुसफुसाया, "और भीगा पत्थर। तुम उसे अपने साथ लाए हो, बेटा। उसकी ख़ुशबू तुम्हारी चमड़ी में है। अंदर आ जाओ। मैं बयालीस साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी। तुम्हारा नहीं — जो भी आता। पानी चला गया था। मुझे पता था वो भी लौट आएगी।"
अंदर का फ़्लैट अँधेरा था, और ठंडा, और किताबों से भरा — दीवार से दीवार तक, फ़र्श से छत तक, शिलालेखों के फ़ोटोग्राफ़, प्राकृत के शब्दकोश, ताड़ के पत्तों की पुरानी प्रतियाँ — और हर वो चीज़ जो कभी कुछ प्रतिबिंबित कर सकती थी, ढकी हुई थी: ड्रेसिंग टेबल का आईना काले कपड़े से, स्टील की अलमारी पुराने अख़बारों से, यहाँ तक कि पानी के गिलास भी मिट्टी के थे। डॉक्टर सुधा ने उन्हें बैठाया, और चाय नहीं पूछी, और सीधे बोलना शुरू किया, जैसे बयालीस साल से ये शब्द उनके गले में रुके हुए थे और अब उन्हें बाहर आने का रास्ता मिल गया हो।
"1984 में मैं अड़तीस की थी," उन्होंने कहा, "और तमसा घाटी के उस मंदिर का सर्वे करने गई थी, डूबने से पहले। और वहाँ मेरी मुलाक़ात धनंजय से हुई — बाँध का कॉन्ट्रैक्टर, जवान, सुंदर, और इतना भूखा कि उसकी भूख कमरे में घुसते ही महसूस होती थी। उस मंदिर के गर्भगृह में, पत्थर की उस औरत के पैरों के पास, एक आले में ताड़ के वो पत्ते रखे थे। कोई डिब्बा नहीं, कोई सील नहीं — बस पत्ते, जैसे किसी ने उन्हें पढ़े जाने के लिए छोड़ा हो। मैंने धनंजय को ऊपर वाली कुबेर-स्तुति पढ़कर सुनाई, और वो हँसा, और बोला, सोने के देवता की स्तुति है? मुझे सुनाओ, शायद कुछ मिल जाए। और एक रात, जब मैं सो रही थी, वो उन पत्तों को टॉर्च की रोशनी में लेकर बैठा, और उनमें छुपी उल्टी लिखावट ढूँढ़ ली — वो पढ़ना जानता था, थोड़ा-बहुत, उसके पिता संस्कृत के मास्टर थे — और उसने उसे ज़ोर से पढ़ा। मज़ाक़ में। नशे में।"
"और वो आई," निरव ने कहा।
"वो आई।" डॉक्टर सुधा की बंद पलकें काँपीं। "और तुम्हें पता है सबसे भयानक बात क्या थी? उसे डर नहीं लगा। उसे मज़ा आया। हर आहुति के साथ उसे कुछ मिलता था — यक्षिणी कुबेर की दासी होती है, बेटा, और उसके हाथ जहाँ पड़ते हैं वहाँ सोना उगता है। परछाईं दी, और अगले हफ़्ते उसके पुश्तैनी खेत में हल चलाते वक़्त मुग़ल सिक्कों से भरा एक घड़ा निकला। स्वाद दिया, और उसे दिल्ली से एक ऐसा ठेका मिला जिसके लिए बड़ी-बड़ी कंपनियाँ लड़ रही थीं। दर्द दिया, और उसने एक ही रात में जुए में तीन पीढ़ियों की दौलत जीत ली। उसने उससे कभी प्यार नहीं किया। एक बार भी नहीं। वो उसके पास एक तिजोरी की तरह जाता था, एक खदान की तरह। और वो… वो ये जानती थी, और फिर भी हर रात आती थी, क्योंकि उसका श्राप यही है — उसे आना ही होता है।"
"नौवीं के बाद वो डर गया," डॉक्टर सुधा ने कहा, "क्योंकि दसवीं मौत थी, और मौत के बदले मिलने वाले वरदान में सोना नहीं था — सिर्फ़ वो थी। हमेशा के लिए। और धनंजय को औरत हमेशा के लिए नहीं चाहिए थी, उसे सोना चाहिए था। वो मेरे पास आया, रोता हुआ, पैरों पर गिरता हुआ। और मैंने — ईश्वर मुझे माफ़ करे — मैंने उन पत्तों में एक चीज़ ढूँढ़ निकाली थी, एक आख़िरी श्लोक, सबसे छुपी हुई परत में, जो साधना को तोड़ने का तरीक़ा बताता था। उल्टी साधना को उल्टा पढ़ना। आख़िरी अक्षर से पहले अक्षर तक। उससे वो उसी चीज़ में क़ैद हो जाती है जो उसने ख़ुद लिखी थी। बाँध के फाटक बंद होने से एक रात पहले, हमने ये किया — उसी गर्भगृह में। मैंने पढ़ा। उसने सुना। और वो आई — आख़िरी बार — उसे दसवीं के लिए बुलाने, और जैसे-जैसे मैं पढ़ती गई, वो सिकुड़ती गई, पत्तों की ओर खिंचती गई, जैसे धुआँ किसी बोतल में… और उसने मुझे देखा।" डॉक्टर सुधा की आवाज़ टूट गई। "उसने आख़िरी बार मुझे देखा, पत्तों में समाते हुए। उसकी आँखों में… मैं तुम्हें नहीं बता सकती उनमें क्या था। उसके बाद मैं दुनिया में और कुछ नहीं देखना चाहती थी। कुछ भी नहीं। उसी रात, वापस अपने तंबू में, मैंने… मैंने अपने लिए ये फ़ैसला किया।"
उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने पत्तों को ताँबे के एक डिब्बे में बंद किया, सीसे से उसका मुँह सील किया, और उस पर अपने ख़ून में भिगोया हुआ लाल धागा बाँधा, और उसे पत्थर की उस औरत के पैरों में रख दिया, और अगली सुबह फाटक बंद हुए, और पानी आया, और घाटी डूब गई। "पर धनंजय ने अपनी नौ आहुतियाँ वापस नहीं माँगीं," उन्होंने कहा, "वो नौ वरदान अपने पास रख लिए — सोना, बेख़ौफ़ी, कभी थकने वाला बदन, कभी न बूढ़ा होने वाला चेहरा। उसने सोचा वो जीत गया। पर पत्तों में एक और बात लिखी थी, जो मैंने उसे कभी नहीं बताई। जो आहुतियाँ अधूरी रह जाएँ, वो चालीस बरस में सड़ने लगती हैं। अंदर से। जैसे पानी में पड़ा फल। बयालीस साल हो गए, बेटा। धनंजय कपाड़िया अंदर से सड़ रहा है। और उसे वो दसवीं चाहिए — अब किसी भी क़ीमत पर। पिछले साल मैंने रेडियो पर सुना कि कपाड़िया इन्फ़्रा ने तमसा बाँध का रखरखाव का ठेका ले लिया है। और इस साल जलाशय सूख गया। तुम्हें लगता है ये बारिश की कमी से हुआ? उसने फाटक खोले थे। उसने पानी बहाया था। उसने वो डिब्बा वापस निकलवाया।"
"पर मुझे क्यों?" निरव ने पूछा, वही सवाल जो वो धनंजय से पूछ चुका था, "वो ख़ुद उसे पढ़ सकता था। या किसी और से पढ़वा सकता था।"
डॉक्टर सुधा बहुत देर तक चुप रहीं, और फिर उन्होंने अपना चेहरा ठीक निरव की ओर घुमाया — बंद पलकों से, पर इतने सटीक ढंग से, जैसे वो उसे देख रही हों — और पूछा, "तुम्हारी माँ का नाम क्या था, बेटा?"
"कामिनी। कामिनी सहगल। वो… मैं उन्नीस साल का था जब उनकी डेथ हो गई। हार्ट फ़ेल।"
कमरे में एक ऐसा सन्नाटा उतरा कि मेहर को अपनी साँस शोर लगने लगी। डॉक्टर सुधा का हाथ, जो कुर्सी के हत्थे पर था, धीरे-धीरे काँपने लगा। "कामिनी सहगल," उन्होंने फुसफुसाया, "1993 में धनंजय की पर्सनल सेक्रेटरी थी। बहुत सुंदर लड़की। बहुत शांत। उस साल अचानक नौकरी छोड़कर शहर से चली गई थी, और किसी ने कभी नहीं पूछा क्यों। मैं जानती थी क्यों। उस वक़्त मैं धनंजय से आख़िरी बार मिली थी, और उसने ख़ुद हँसते हुए बताया था। वो… वो माँ बनने वाली थी।"
निरव को कुछ महसूस नहीं हुआ। दर्द नहीं था उसके पास। पर उसके सीने में, जहाँ वामिका ने सुबह अपनी ज़बान से कोई अक्षर लिखा था, कुछ ठंडा फैलने लगा, धीरे-धीरे, जैसे बर्फ़ का पानी किसी दरार में।
"अब सुनो," डॉक्टर सुधा ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक सख़्त हो गई, बूढ़ी नहीं, बल्कि वैसी जैसी चालीस साल पहले किसी क्लासरूम में रही होगी, "पत्तों में लिखा है कि दसवीं आहुति, मृत्यु, ख़ून के रास्ते चुराई जा सकती है। जिसकी साधना हो रही है, अगर दसवीं रात उसका ख़ून किसी ऐसे के ख़ून से मिलाया जाए जो उसी रक्त का हो — बाप, भाई — तो वो दूसरा आदमी दसवीं आहुति अपने नाम कर सकता है। मौत उसकी हो जाती है, अमरता उसकी, और साधना पूरी होने से यक्षिणी उसकी बँध जाती है। प्रेमी की तरह नहीं। दासी की तरह। धनंजय तुम्हें बचाने नहीं लाया, बेटा। उसने तुम्हें बनाया है। अपनी सीढ़ी की तरह।"
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जब वो जाने के लिए उठे, डॉक्टर सुधा ने मेहर की कलाई पकड़ ली — अचानक, कसकर, इतनी ताक़त से कि मेहर चौंक गई — और उसके हाथ में एक पुराना, कई बार तह किया हुआ, पीला पड़ चुका काग़ज़ ठूँस दिया। "वो श्लोक है," उन्होंने फुसफुसाया, "उल्टा पाठ। मैंने बयालीस साल पहले इसे अपने हाथ से उतारा था। जब वक़्त आए, और तुम्हें पता चल जाएगा कब आया है — तो पढ़ना। पर याद रखना, बच्ची। जो इसे पढ़ता है, वो भी कुछ खोता है। मैंने अपनी आँखें खोईं। तुम क्या खोओगी, ये मुझे नहीं पता।"
फिर उन्होंने मेहर की कलाई छोड़ दी, और अपना चेहरा धीरे-धीरे कमरे के सबसे अँधेरे कोने की ओर घुमाया — वो कोना जहाँ एक काले कपड़े से ढकी ड्रेसिंग टेबल खड़ी थी — और मेहर और निरव दोनों ने देखा कि उस काले कपड़े के किनारे से पानी टपक रहा था, धीरे-धीरे, फ़र्श पर एक गीला गोला बनाता हुआ, और कोने से कमल की डंडियों की वो गंध इतनी गाढ़ी होकर फैल रही थी कि साँस लेना मुश्किल हो गया।
"वो यहीं खड़ी है, है ना?" डॉक्टर सुधा ने कहा, और उनके होंठों पर एक थकी हुई, लगभग राहत भरी मुस्कान थी, "मुझे उसकी ख़ुशबू आ रही है। बयालीस साल बाद।" और फिर, उस ख़ाली कोने की ओर, बहुत धीमे, बहुत साफ़, उन्होंने कहा: "माफ़ करना।"
और उस कोने से, काले कपड़े के पीछे से, एक औरत की हँसी आई — धीमी, नरम, बिल्कुल बेरहम — और इस बार, मेहर ने भी उसे सुना।
"और एक बात," डॉक्टर सुधा ने, अपना चेहरा कोने से हटाए बिना, निरव से कहा, "वो चालीसवाँ पत्ता जो तुम्हारी लैब से चोरी हुआ — उस पर धनंजय के नाम के बगल में जो दूसरा नाम लिखा है, गवाह की तरह, वो मेरा है। मुझे उसने ख़ुद लिखवाया था, उस रात। मुझे लगता है तुम्हारा दोस्त उसे पढ़ चुका था। इसीलिए वो ज़िंदा नहीं रहा।" उन्होंने एक लंबी साँस ली। "अब जाओ। और सुनो, बेटा — तुम उसे अब भी सबसे बड़ा ख़तरा समझ रहे हो। वो नहीं है। वो सिर्फ़ वही कर रही है जो उसका श्राप कहता है। असली भूख किसी और के पेट में है।"
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