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एपिसोड 5 — पाँचवीं आहुति: प्रतिबिंब

Pretika · Yakshini Stories · 14 मिनट

Writer
Pretika
Story
वामिका — उल्टी साधना
Chapter
5 of 10
Category
Yakshini Stories
Reading time
14 min
Words
2636
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

आईना इंसान का सबसे पुराना गवाह है। वो देखता है कि तुम अकेले में कैसे रोते हो, किसके नाम पर मुस्कुराते हो, रात के तीन बजे किसकी तस्वीर देखकर अपने होंठ काटते हो। वो सब देखता है और कभी कुछ नहीं कहता, पर वो रहता है — एक सबूत की तरह। मैंने उसका गवाह छीन लिया, ताकि आगे जो होने वाला था, उसे कोई न देखे। सिवाय मेरे। पर उस रात मुझसे एक ग़लती हुई। मैंने एक और आदमी का गवाह रख लिया — एक ऐसे आदमी का, जिसे मैंने नहीं मारा था।
"अकेले नहीं हो" — धनंजय कपाड़िया ने उसके बाद कुछ और नहीं कहा। उसने बस धूप से हटकर फिर से अपनी परछाईं-रहित रोशनी में क़दम रखा, अनार की प्लेट अपनी ओर खींची, और एक ऐसी आवाज़ में, जैसे किसी मुलाज़िम को छुट्टी दे रहा हो, कहा, "पाँचवीं के बाद फिर मिलेंगे। तब तुम्हारे पास और बेहतर सवाल होंगे।" और निरव को — उसकी सारी नई निडरता के बावजूद — शिंदे की चौड़ी हथेली अपनी पीठ पर महसूस हुई, जो उसे दरवाज़े की ओर धकेल रही थी, और वो लिफ़्ट में उतरते हुए, शीशे की दीवारों से घिरा, मालाबार हिल के बादलों के बीच से नीचे गिरते हुए, पहली बार सोच रहा था कि इस कहानी में वो अकेला आदमी नहीं है जिसके साथ कुछ हो रहा है। वो किसी और की कहानी का एक पन्ना है।
उसने उसी दोपहर इरफ़ान को सब बता दिया — सब कुछ, बिना कुछ छुपाए — परछाईं का अलग होकर बालकनी से उँडेल जाना, स्वाद का धागे की तरह खिंचना, वो सपना, वो मूर्तिकार का पिघलता चेहरा, वामिका का नाम, कुबेर का श्राप, और आज सुबह धूप में खड़े दो परछाईं-रहित आदमी। इरफ़ान, जो ज़िंदगी भर हर चीज़ को वेवलेंथ और पिक्सेल में नापता आया था, जो हर रमज़ान में रोज़े रखता था पर जिन्न-भूतों की कहानियों पर हँसता था, बहुत देर तक चुप बैठा रहा, अपनी चाय के ठंडे होते कप को घूरता रहा, और फिर बोला, "भाई, अगर तू मुझे ये सब एक हफ़्ते पहले बताता, तो मैं तुझे सीधे किसी साइकियाट्रिस्ट के पास ले जाता। पर मैंने उस लिस्ट पर वो गीली स्याही अपनी आँखों से देखी है। और मैंने कल तेरा अँगूठा देखा। तो ठीक है। मान लिया। अब बता, करना क्या है?"
"अगर धनंजय भी इससे गुज़रा है," निरव ने कहा, "तो वो नौवीं तक पहुँचा था — उसने ख़ुद मुझसे कहा था, सपने में, कि कोई नौवीं तक पहुँचा था। और वो ज़िंदा है। मतलब कोई रास्ता है। कोई तरीक़ा जिससे बचा जा सकता है।" और इरफ़ान ने सिर हिलाया, और उस रात लैब में अकेले रुकने का फ़ैसला किया, क्योंकि चालीसवें पत्ते की पीठ पर उसे एक ऐसी परत दिखी थी जिसे अब तक किसी भी वेवलेंथ ने पूरी तरह नहीं खोला था, और उसका मानना था कि अल्ट्रावायलेट फ़्लोरेसेंस में, रात भर की लंबी एक्सपोज़र के साथ, वो खुल जाएगी। "तू घर जा," उसने कहा, "मेहर के पास। वो डरी हुई है, यार। तू उसके साथ रह।"
निरव को बाद में ज़िंदगी भर — अगर उसे उसके बाद कोई ज़िंदगी कहा जा सके — ये वाक्य याद रहा। "तू घर जा।"
✦ ✦ ✦
मेहर उस रात कुछ बदली हुई थी। पिछली रात के बाद, उस पायल की आवाज़ के बाद, उन अदृश्य उँगलियों के रोंगटों के बाद, उसने शक करना छोड़ दिया था — अब वो सिर्फ़ डरी हुई थी, और डर इंसान को अक्सर उस चीज़ से और मज़बूती से चिपका देता है जिसे वो खोने से डर रहा हो। उसने निरव के लिए खाना बनाया, ये जानते हुए भी कि उसे स्वाद नहीं आएगा, और जब उसने बिना कुछ बोले चुपचाप खाया, तो मेहर ने मेज़ के पार हाथ बढ़ाकर उसकी उँगलियाँ पकड़ लीं और बस पकड़े रही। और उस रात, बिस्तर पर, वो उसके पास खिसक आई, उसकी छाती पर अपना सिर रखा, और बहुत धीरे से बोली, "मुझे नहीं पता वो कौन है, निरव। मुझे नहीं पता वो क्या है। पर मैं तुम्हें उसे नहीं दूँगी। सुन रहे हो? नहीं दूँगी।" और उसने उसे चूमा — इस बार सज़ा नहीं, दावा नहीं, बल्कि कुछ ऐसा जो किसी वादे जैसा था — और निरव ने उसे अपनी बाहों में भर लिया, और उसने चाहा, पूरे दिल से चाहा, कि वो उसे उतना ही महसूस कर सके जितना वो उसे करती थी।
उनके बेडरूम की एक दीवार पर पूरे क़द का, फ़र्श से छत तक का, स्लाइडिंग वार्डरोब था, जिसके दोनों दरवाज़ों पर आईने लगे थे, और मेहर ने हमेशा कहा था कि उसे ये आईना पसंद नहीं, कि रात में ये कमरे को दोगुना बड़ा और दोगुना अकेला बना देता है — पर उस रात, बेडसाइड लैंप की पीली रोशनी में, निरव की बाहों में, मेहर ने उस आईने की ओर देखा, शायद ख़ुद को उसके साथ देखने के लिए, शायद ये यक़ीन करने के लिए कि वो सच में वहाँ है, उसका है, इस कमरे में।
आईने में मेहर थी। अपने बिखरे बालों के साथ, अपनी आधी बंद आँखों के साथ, अपनी बाहें हवा में किसी को लपेटे हुए। पर वहाँ कोई नहीं था जिसे वो लपेटे हुए थी। आईने में उसकी बाहें ख़ाली हवा को थामे थीं। निरव वहाँ नहीं था। बिस्तर पर उसकी जगह चादर की सिलवटें थीं, उसके वज़न से दबा हुआ तकिया था — पर वो ख़ुद नहीं।
मेहर की साँस गले में अटक गई। और तब आईने में कुछ हिला। मेहर के प्रतिबिंब के पीछे, उसकी पीठ के पीछे, बिस्तर पर, एक और आकृति उभरी — पहले धुँधली, फिर साफ़ — घुटनों के बल बैठी एक औरत, जिसके घुटनों तक लंबे, भीगे बाल आईने के शीशे पर पानी की लकीरें छोड़ रहे थे, और उसने अपनी दोनों बाहें पीछे से मेहर के प्रतिबिंब की कमर के चारों ओर लपेट दीं, उसी तरह जैसे कोई प्रेमी लपेटता है, और अपनी ठोड़ी मेहर के प्रतिबिंब के कंधे पर टिका दी, और आईने के भीतर से, सीधे मेहर की आँखों में देखते हुए, मुस्कुराई। और मेहर ने — असली मेहर ने, इस तरफ़ की मेहर ने — अपनी कमर पर दो ठंडी, गीली बाहों का दबाव महसूस किया। अपने कंधे पर किसी ठोड़ी का वज़न। अपने कान के पास किसी की साँस।
वो चीख़ी और पलटी — उसके पीछे सिर्फ़ निरव था, उसे थामे, उसकी आँखों में वो नशा फिर से उतरता हुआ। उसने वापस आईने को देखा — वहाँ सिर्फ़ वो थी, और वो औरत, जो अब भी उसे पीछे से पकड़े हुए थी, और जिसने अब अपनी एक उँगली अपने होंठों पर रखी: श्श्श्श। और फिर आईने के भीतर वो औरत मेहर के कान से हटकर निरव की ओर मुड़ी — जो आईने में था ही नहीं — ख़ाली हवा की ओर, जहाँ निरव का चेहरा होना चाहिए था, और उसके होंठ हिले, और इस बार मेहर ने आवाज़ सुनी — आईने के शीशे के अंदर से, दबी हुई, जैसे पानी के नीचे से कोई बोल रहा हो: "पाँचवीं दोगे? तुम्हारा चेहरा? अब इसकी तुम्हें ज़रूरत नहीं। अब सिर्फ़ मैं तुम्हें देखूँगी।"
"नहीं," मेहर ने फुसफुसाया, निरव की ओर मुड़कर, उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लेकर, "नहीं, निरव, मत कहना, प्लीज़, मेरी तरफ़ देखो, मेरी तरफ़—"
निरव उसकी ओर देख रहा था। पर वो उसे देख नहीं रहा था। उसकी आँखें उसके पार, आईने की ओर थीं, और उसके होंठों से वो शब्द उतनी ही आसानी से निकला जितनी आसानी से कोई नींद में करवट लेता है।
"हाँ।"
आईने पर अंदर से भाप चढ़ी — एक सफ़ेद, धुँधली परत, जो किनारों से शुरू होकर बीच तक फैल गई — और जब वो धीरे-धीरे छँटी, तो आईने में सिर्फ़ मेहर थी। अकेली। अपनी ख़ाली बाहों के साथ। और निरव ने, उसके पीछे बैठे निरव ने, धीरे से अपना सिर घुमाकर आईने में ख़ुद को देखने की कोशिश की, और वहाँ कुछ नहीं था — न उसका चेहरा, न उसके कंधे, न उसके हाथ — और उसने ऐसे सिर हिलाया जैसे कोई छोटी सी बात हो, जैसे कोई बटन खो गया हो, और मेहर को अपनी बाहों में खींचकर सो गया। मेहर नहीं सोई। वो पूरी रात उस आईने को देखती रही, जिसमें वो अकेली लेटी थी, किसी के गले लगी हुई, जो वहाँ नहीं था।
✦ ✦ ✦
रात एक बजकर दस मिनट पर निरव का फ़ोन बजा। इरफ़ान।
"भाई — सुन, सुन, सुन —" इरफ़ान की आवाज़ में वो उत्तेजना थी जो किसी वैज्ञानिक को तब होती है जब उसे कोई ऐसी चीज़ मिल जाए जो उसे मिलनी नहीं चाहिए थी, और उसके नीचे कुछ और, कुछ ठंडा, "UV में खुल गया। चालीसवें पत्ते की पीठ पर। नाम हैं, भाई। सैकड़ों नाम। अलग-अलग लिपियों में — ब्राह्मी, शारदा, देवनागरी, एक तो अंग्रेज़ी में भी है, कैपिटल लेटर्स में, जैसे किसी फ़ौजी ने ख़ुद लिखा हो। और हर नाम के आगे एक नंबर। सुन — कुमारदत्त, तीन। हरिहर भट्ट, पाँच। कैप्टन एडवर्ड व्हिटलॉक, चार। कोई भी छह से आगे नहीं गया, भाई, कोई भी नहीं — सिवाय एक के।" उसने साँस ली। "धनंजय। और उसके आगे नौ लिखा है। और नौ के ऊपर एक लकीर खिंची है, जैसे किसी ने… जैसे किसी ने उसे अधूरा छोड़कर काट दिया हो। वो भागा था, निरव। कपाड़िया भागा था। नौवीं के बाद। और—"
"और?"
"और सबसे नीचे तेरा नाम है। निरव। और उसके आगे का नंबर…" इरफ़ान की आवाज़ धीमी हो गई, जैसे वो उसे देख रहा हो, "भाई, वो मेरी आँखों के सामने बदल रहा है। स्याही हिल रही है। चार था। अभी… अभी पाँच हो गया। अभी, इसी सेकंड। तूने… तूने अभी कुछ दिया है, है ना?"
निरव ने आईने की ओर देखा, जिसमें वो नहीं था। "हाँ।"
"ठीक है। ठीक है। सुन, मुझे लगता है मुझे पता चल गया कि कपाड़िया कैसे बचा — इस पत्ते पर उसके नाम के बगल में एक और नाम है, छोटे अक्षरों में, जैसे किसी गवाह का, और वो—" और तभी फ़ोन पर बारिश का शोर, जो इरफ़ान की आवाज़ के पीछे लगातार बज रहा था, अचानक बंद हो गया। एक झटके में। और इरफ़ान चुप हो गया, और जब वो फिर बोला तो उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी: "भाई… बारिश रुक गई। और… लैब में कोई है।" एक आवाज़ आई — दरवाज़े के खुलने की? किसी क़दम की? — "कौन है? हेलो? कौन—" और फिर एक आवाज़, जो निरव ने ज़िंदगी में कभी नहीं सुनी थी और फिर कभी भूल नहीं पाया — एक सूखी, भारी, लकड़ी के मोटे टुकड़े के टूटने जैसी आवाज़ — और फिर फ़ोन पर सिर्फ़ सन्नाटा था, और फिर एक लंबी, सपाट टोन।
✦ ✦ ✦
निरव डेढ़ बजे लैब पहुँचा, भीगा हुआ, बिना छाते के, बिना किसी डर के — क्योंकि उसके पास अब डर नहीं था, सिर्फ़ एक ठंडी, सुन्न जल्दबाज़ी — और लॉबी का सिक्योरिटी गार्ड अपनी कुर्सी पर ऐसी गहरी नींद में था कि निरव के झकझोरने पर भी नहीं जागा, और लिफ़्ट चौदहवीं मंज़िल पर खुली, और लैब का शीशे का दरवाज़ा आधा खुला था, और अंदर सारी बत्तियाँ जल रही थीं।
इरफ़ान फ़र्श पर था। स्कैनर वाली मेज़ के पास, पीठ के बल, उसकी आँखें खुली थीं और छत की ओर देख रही थीं, और उसका सिर एक ऐसे कोण पर मुड़ा हुआ था जिस पर कोई ज़िंदा इंसान का सिर नहीं मुड़ सकता — लगभग पूरा पीछे की ओर, जैसे वो अपने ही कंधे के ऊपर से पीछे कुछ देखने की कोशिश कर रहा हो। उसके एक हाथ में अब भी उसका फ़ोन था। उसकी दूसरी मुट्ठी भिंची हुई थी।
पर वो चीज़ जिसने निरव को वहीं दरवाज़े पर जमा दिया, वो इरफ़ान की लाश नहीं थी।
लैब में शीशा ही शीशा था — स्कैनर का चौड़ा, सपाट शीशा, छह बड़ी मॉनिटर स्क्रीनें जो बंद पड़ी थीं और काले आईनों की तरह चमक रही थीं, पांडुलिपियाँ रखने वाली अलमारियों के शीशे के दरवाज़े, और बाहर की ओर खुलने वाली पूरी की पूरी शीशे की दीवार, जिसके पार मुंबई की रात थी। और उन सब में — हर एक शीशे में, हर एक काली स्क्रीन में, हर एक अलमारी के दरवाज़े में — इरफ़ान खड़ा था।
ज़िंदा। सीधा। उसी कपड़ों में। वो उस प्रतिबिंब की दुनिया में, लैब के उसी कमरे में, स्कैनर वाली मेज़ के पास खड़ा था — ठीक उस जगह जहाँ असली दुनिया में उसकी लाश फ़र्श पर पड़ी थी — और वो निरव को देख रहा था। हर शीशे से एक साथ। दर्जनों इरफ़ान, दर्जनों कोणों से, एक ही आँखों से, और उन सब के होंठ हिल रहे थे, एक साथ, एक ही लय में, कोई शब्द बोलते हुए जो कोई आवाज़ नहीं बना रहा था। और फ़र्श पर पड़ी असली लाश का — निरव ने ग़ौर से देखा, और उसका पेट उलट गया — किसी भी शीशे में कोई प्रतिबिंब नहीं था। शीशों में सिर्फ़ ज़िंदा इरफ़ान था, खड़ा हुआ। और फ़र्श पर सिर्फ़ मुर्दा इरफ़ान था, जिसे कोई शीशा नहीं देख रहा था।
स्कैनर ख़ाली था। चालीसवाँ पत्ता — नामों वाला पत्ता — ग़ायब था।
✦ ✦ ✦
पुलिस सुबह चार बजे आई, और उसके बीस मिनट बाद — इतनी जल्दी कि किसी ने बुलाया भी नहीं था — कपाड़िया ग्रुप के दो वकील आए, महँगे सूट और भीगे छातों के साथ, और उन्होंने इंस्पेक्टर से बहुत विनम्रता से बात की, और "कंपनी की ओर से पूरे सहयोग" का वादा किया, और निरव की ओर एक ऐसी नज़र से देखा जैसे कोई किसी गिरवी रखी चीज़ को देखता है। बिल्डिंग का सीसीटीवी देखा गया — रात एक बजकर चार मिनट से एक बजकर सोलह मिनट तक के बारह मिनट पूरी तरह ग़ायब थे। न कोई फ़ुटेज, न कोई एरर, बस एक काली स्क्रीन, जैसे किसी ने उस वक़्त को ही मिटा दिया हो। पोस्टमार्टम की शुरुआती रिपोर्ट में लिखा गया — गर्दन की हड्डी टूटने से मौत, संभवतः किसी भारी वस्तु या गिरने से। इंस्पेक्टर ने लैब के शीशों की ओर एक बार भी नहीं देखा। किसी ने नहीं देखा। वहाँ क्या दिख रहा था, ये सिर्फ़ निरव को पता था। या शायद वो सिर्फ़ उसे ही दिख रहा था।
सुबह साढ़े सात बजे जब वो घर लौटा, मेहर लिविंग रूम में बैठी थी, पूरी रात की जागी हुई, और उसे देखते ही उठकर दौड़ी और उससे लिपट गई, और उसने उसे सब बता दिया — इरफ़ान, फ़ोन, शीशे, नामों की लिस्ट, धनंजय, नौ, भागना — और मेहर ने चुपचाप सब सुना, और फिर बहुत देर बाद बोली, "मुझे अब भी नहीं पता कि मैं यक्षिणियों पर यक़ीन करती हूँ या नहीं, निरव। मैं नर्स हूँ। मैं ख़ून, नसों और ऑक्सीजन लेवल पर यक़ीन करती हूँ।" उसने उसकी आँखों में देखा — और निरव ने सोचा कि वो ये नहीं देख पाएगी, कि कल रात के बाद उसकी पुतलियों में भी कोई प्रतिबिंब नहीं बनता। "पर मैं ये यक़ीन करती हूँ कि इरफ़ान की गर्दन किसी यक्षिणी ने नहीं तोड़ी। किसी आदमी ने तोड़ी है। एक ऐसे आदमी ने, जिसके वकील बिना बुलाए बीस मिनट में पहुँच जाते हैं।"
वो नहाने चली गई, और निरव अकेला लिविंग रूम में खड़ा रहा, बालकनी के बंद काँच के दरवाज़े के सामने, जिसके पार सुबह का धूसर आसमान था, और बारिश, और शहर। और उस काँच में उसे अपना प्रतिबिंब नहीं दिखा — उसे पता था कि नहीं दिखेगा — बस कमरा दिख रहा था, सोफ़ा, लैंप, दीवार पर टँगी मेहर और उसकी गोवा वाली तस्वीर, और उसके खड़े होने की जगह पर एक ख़ाली, पारदर्शी सन्नाटा।
और फिर उस ख़ाली जगह में कोई उभरा।
इरफ़ान। काँच के अंदर, उस प्रतिबिंब वाले कमरे में, ठीक वहाँ खड़ा जहाँ निरव को खड़ा होना चाहिए था — जैसे वो ख़ाली जगह उसे बुला रही हो, जैसे एक गवाह ने दूसरे गवाह की ख़ाली कुर्सी पर बैठने का फ़ैसला कर लिया हो। उसके कपड़े वही थे, उसकी आँखें वही, बस उसका चेहरा — उसका चेहरा बहुत सफ़ेद था, और बहुत शांत। और वो सीधे निरव को देख रहा था। और उसके होंठ हिले, बहुत धीरे, बहुत साफ़, जैसे कोई किसी बहरे को कुछ समझा रहा हो — एक-एक अक्षर अलग-अलग, बिना आवाज़ के — और निरव ने, जिसने ज़िंदगी भर मिटे हुए अक्षरों को पढ़ा था, उन होंठों को पढ़ा।
"सु… धा।"

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