Pretika › Yakshini Stories › वामिका — उल्टी साधना
एपिसोड 4 — चौथी आहुति: दर्द
Pretika · Yakshini Stories · 13 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- वामिका — उल्टी साधना
- Chapter
- 4 of 10
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2565
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
दर्द इंसान का सबसे पुराना पहरेदार है। वो उसे आग से दूर रखता है, ऊँचाई से दूर रखता है, ग़लत औरतों से दूर रखता है। जब तक इंसान को दर्द होता है, वो लौट सकता है। मुझे ऐसा आदमी नहीं चाहिए था जो लौट सके। मुझे ऐसा आदमी चाहिए था जो मेरे लिए किसी भी आग में उतर जाए, और जलते हुए भी मुस्कुराए। तो मैंने उसका पहरेदार मार दिया।
ये एक मामूली सा हादसा था, उस तरह का जो पांडुलिपियों के साथ काम करने वालों के साथ साल में दो-चार बार हो ही जाता है। निरव सर्जिकल स्कैलपेल से जापानी टिशू पेपर का एक पतला टुकड़ा काट रहा था, जिसे ताड़ के एक फटे हुए पत्ते के पीछे चिपकाकर उसकी दरार को जोड़ना था, और उसका ध्यान एक पल के लिए भटका — उसे लगा था कि लैब की शीशे की दीवार के पार, बाहर की बारिश में, कोई खड़ा है — और स्कैलपेल की धार फिसली और उसके बाएँ अँगूठे की गद्दी में गहरी, हड्डी तक उतर गई। उसने नीचे देखा। ख़ून की एक मोटी, गहरी लाल धार उसके अँगूठे से निकलकर हथेली पर फैल रही थी, और उसकी कलाई से होती हुई मेज़ पर टपक रही थी, और स्कैलपेल अब भी उसकी चमड़ी में आधा धँसा हुआ था।
और उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।
न कोई चुभन, न कोई जलन, न वो तेज़, सफ़ेद, सब कुछ रोक देने वाली सनसनी जो हर इंसान अपने बचपन से जानता है। उसे अँगूठे में स्कैलपेल का होना महसूस हो रहा था — उसका ठंडापन, उसकी धातु, उसका दबाव — जैसे किसी ने उसके हाथ पर एक चम्मच रख दी हो। पर दर्द नहीं। वो बस बैठा देखता रहा, एक अजीब सी जिज्ञासा से, जैसे वो किसी और का हाथ हो, और तब उसने देखा कि उसके ख़ून की एक बूँद मेज़ पर रखे उस फटे हुए ताड़ के पत्ते पर गिरी है — और पत्ते ने उसे सोख लिया है। उस तरह नहीं जैसे कोई काग़ज़ पानी सोखता है, धीरे-धीरे फैलाकर, बल्कि उस तरह जैसे सूखी, फटी हुई ज़मीन पहली बूँद को पीती है — एक झटके में, पूरी की पूरी, बिना कोई निशान छोड़े। और पत्ते पर लिखे उल्टे अक्षर, जो सामान्य रोशनी में कभी नहीं दिखते थे, एक पल के लिए हल्के से चमके, लाल-सुनहरी चमक, जैसे राख के नीचे दबा कोई अंगारा साँस ले।
"अबे पागल है क्या!" इरफ़ान की चीख़ ने उसे होश में लाया, और इरफ़ान दौड़ता हुआ आया, स्कैलपेल बाहर खींचा, उसका अँगूठा रुमाल में लपेटकर ज़ोर से दबाया, और तब जाकर उसने निरव का चेहरा देखा — जो बिल्कुल शांत था, बिल्कुल बेपरवाह, और जिस पर एक हल्की सी, सपनीली मुस्कान थी — और इरफ़ान का हाथ काँप गया। "तुझे… तुझे दर्द नहीं हो रहा?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ किसी बच्चे जैसी थी। निरव ने अपने लिपटे हुए अँगूठे को देखा, फिर इरफ़ान को, और बहुत धीरे से, जैसे कोई राज़ बता रहा हो, कहा: "पता है इरफ़ान, मुझे ज़िंदगी में पहली बार किसी चीज़ से डर नहीं लग रहा। किसी भी चीज़ से नहीं।"
✦ ✦ ✦
मेहर ने उस शाम उसके अँगूठे पर बँधी पट्टी देखी और बिना कुछ कहे उसे खोल दिया, और घाव देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया, क्योंकि वो इतना गहरा था कि उसमें टाँके लगने चाहिए थे, और निरव उसे ऐसे लिए घूम रहा था जैसे कोई खरोंच हो। उसने उसके घाव के किनारों को अपने अँगूठे से दबाया — ज़ोर से, जितना कोई नर्स किसी मरीज़ का दर्द जाँचने के लिए दबाती है, और फिर उससे भी ज़्यादा ज़ोर से — और निरव ने पलक तक नहीं झपकाई। फिर वो अंदर गई, अपना मेडिकल किट लाई, और उसमें से एक सेफ़्टी पिन निकालकर उसकी हथेली में चुभोई, फिर उसकी कलाई में, फिर उसके पैर के तलवे में, फिर उसकी गर्दन पर — और हर बार निरव ने कहा कि उसे छुआ जाना महसूस हो रहा है, बस चुभन नहीं।
"तुम्हें न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाना होगा," मेहर ने कहा, और उसकी आवाज़ पेशेवर थी, पर उसके हाथ काँप रहे थे, "कल सुबह। मेरे अस्पताल में। मैं अपॉइंटमेंट लेती हूँ। ये नसों का मामला हो सकता है, स्पाइनल कॉर्ड का, कुछ भी, निरव, ये मज़ाक़ नहीं है—"
"कोई डॉक्टर इसे ठीक नहीं कर सकता, मेहर।"
"तो कौन कर सकता है? बताओ मुझे! पिछले दस दिन से तुम… तुम कोई और हो! तुम खाना नहीं खाते, तुम सोते हो तो आँखें खुली रखते हो, बिस्तर पर किसी और औरत के बाल मिलते हैं, और अब तुम्हें दर्द नहीं होता! तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो, और जो भी वो है, वो तुम्हें अंदर से खा रहा है, और मैं बैठी देख रही हूँ!" उसकी आवाज़ टूट गई, और आँसू उसकी पलकों पर आकर अटक गए, और निरव ने उसे देखा — उस औरत को जिसने तीन साल पहले एक ईरानी कैफ़े में उसके काग़ज़ों पर चाय गिराई थी और फिर माफ़ी माँगने के बहाने दो घंटे उसके सामने बैठी रही थी — और उसके अंदर कुछ टूटा, और उसने वो कह दिया जो वो दस दिन से नहीं कह पा रहा था।
"एक औरत आती है, मेहर। जब बारिश रुकती है।"
मेहर का थप्पड़ इतनी ज़ोर से पड़ा कि निरव का सिर एक ओर घूम गया। उसके गाल पर मेहर की उँगलियों के लाल निशान उभर आए। और निरव ने धीरे से अपना सिर वापस घुमाया, और मेहर की ओर देखा — और मुस्कुराया। कोई दर्द नहीं, कोई ग़ुस्सा नहीं, कोई शर्मिंदगी नहीं। बस एक शांत, ख़ाली, लगभग प्यार भरी मुस्कान। और मेहर एक क़दम पीछे हट गई, और उसके चेहरे पर जो डर था, वो उस थप्पड़ से भी गहरा था, क्योंकि आठ साल ICU में काम करने के बाद वो जानती थी कि इंसान दर्द पर कैसी प्रतिक्रिया देता है, और ये — ये इंसानी नहीं था। "मैंने कल रात एक मरे हुए आदमी को बोलते सुना, निरव," उसने फुसफुसाकर कहा, "एक औरत की आवाज़ में। उसने मेरा नाम लिया। उसने कहा कि तुम्हारे सपने अब उसके पास हैं।" और उसके बाद वो दोनों बहुत देर तक कुछ नहीं बोले, क्योंकि पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि वो दोनों एक ही चीज़ से डर रहे थे — और वो चीज़ उन दोनों के बीच, उसी कमरे में, शायद उसी वक़्त, खड़ी सुन रही थी।
✦ ✦ ✦
उस रात जो हुआ, उसे मेहर बाद में कभी ठीक से समझा नहीं पाई — न ख़ुद को, न किसी और को। वो झगड़ा था जो अचानक किसी और चीज़ में बदल गया, उस तरह जैसे कभी-कभी ग़ुस्सा और भूख एक ही नस में दौड़ते हैं और तय नहीं कर पाते कि बाहर किस रास्ते से निकलें। उसने उसे धक्का दिया, और वो दीवार से टकराया और हँसा, और उसने उसे फिर धक्का दिया, और फिर पता नहीं कब उसकी मुट्ठियाँ उसकी कमीज़ के कॉलर को खींच रही थीं, उसे अपनी ओर, और उसके होंठ उसके होंठों पर थे — एक चुंबन जिसमें प्यार कम और सज़ा ज़्यादा थी, एक दावा, एक ज़िद कि ये आदमी अब भी मेरा है। और निरव ने उसे उठाया और बिस्तर पर ले गया, और उसमें एक ऐसी बेलगाम, बेपरवाह ताक़त थी जो मेहर ने उसमें पहले कभी नहीं देखी थी — वो ऐसे आदमी की तरह उसे छू रहा था जिसे किसी चीज़ का डर न हो, न उसे चोट पहुँचने का, न ख़ुद को।
मेहर ने उसके कंधे पर अपने दाँत गड़ाए — पहले प्यार में, फिर जानबूझकर, ज़ोर से, और ज़ोर से, इस उम्मीद में कि वो कराहेगा, चौंकेगा, रुकेगा, कि उसे कुछ महसूस होगा, कि वो वापस इंसान बनेगा — और उसकी ज़बान पर ख़ून का नमकीन स्वाद आया, और उसने अपना मुँह हटाकर देखा कि उसके दाँतों ने उसकी चमड़ी में एक अर्धचंद्र काट दिया था, जिससे ख़ून रिस रहा था — और निरव हँस रहा था। धीरे, गहराई से, ऐसे जैसे किसी ने उसे गुदगुदी की हो। और उस हँसी को सुनकर मेहर के अंदर एक साथ दो चीज़ें जागीं — एक ठंडा, हड्डियों तक उतर जाने वाला डर, और उसके नीचे, उससे भी गहरी, एक ऐसी भूख जिस पर उसे ख़ुद शर्म आई।
और फिर बारिश रुकी।
और इस बार मेहर ने सुना।
पायल। घुँघरू। बहुत धीमे, बहुत दूर से आते हुए, जैसे कोई लंबे गलियारे के उस पार नंगे पैर चल रहा हो — छन… छन… छन… — और हर छन के साथ आवाज़ पास आती गई, कमरे के दरवाज़े तक, दरवाज़े के अंदर, बिस्तर के पैताने तक, और फिर रुक गई। मेहर को कुछ दिखा नहीं। कमरे में बेडसाइड लैंप की पीली रोशनी थी, और उसमें कोई नहीं था। पर कमरे का तापमान अचानक इतना गिरा कि उसकी साँस के साथ भाप निकलने लगी, और उसकी बाहों के रोएँ खड़े हो गए, और उसे अपनी गर्दन के पीछे, बालों के बीच, किसी की साँस महसूस हुई — ठंडी, गीली, और हल्की सी मुस्कान से भरी हुई।
और फिर उसने निरव को देखा, जो उसके नीचे लेटा था, और जो अब उसे नहीं देख रहा था। वो उसके कंधे के ऊपर, हवा में, किसी को देख रहा था — और उसकी आँखों में वो नशा था जो मेहर ने कभी अपने लिए नहीं देखा था। उसका सिर पीछे झुका, उसके होंठ खुले, जैसे किसी ने उन्हें चूमा हो — पर वहाँ कोई नहीं था — और मेहर ने अपनी आँखों के सामने, उसकी छाती की चमड़ी पर, रोंगटे खड़े होते देखे — पर बेतरतीब नहीं, बल्कि एक आकार में। पाँच लंबी रेखाओं में। उँगलियों के आकार में। जैसे कोई अदृश्य हाथ उसकी छाती पर धीरे-धीरे नीचे की ओर फिसल रहा हो, और उसके पीछे-पीछे उसकी चमड़ी काँपती जा रही हो। निरव की साँस टूटी, उसकी पीठ बिस्तर से ऊपर उठी, एक झटके में, जैसे किसी ने उसके भीतर कोई तार खींचा हो — और मेहर, जो अब भी उसके ऊपर थी, उसे पकड़े थी, उसके बदन की हर हरकत को अपने बदन में महसूस कर रही थी — उसने उसे हवा में किसी से फुसफुसाते सुना, इतना धीमा कि शब्द मुश्किल से बने: "हाँ… चौथी… हाँ…"
"किसे हाँ कह रहे हो?" मेहर ने चीख़कर पूछा, और उसके आँसू निरव के चेहरे पर गिरे, "निरव! किसे?! किससे बात कर रहे हो?!"
पायल की आवाज़ फिर आई — इस बार हँसी की तरह, खनकती हुई — और दूर जाती हुई, कमरे से बाहर, गलियारे में, बालकनी की ओर, और फिर बाहर बारिश लौट आई, पूरे ज़ोर से, और तापमान वापस चढ़ गया, और निरव की आँखें बंद हो गईं, और वो गहरी, सपनों से ख़ाली, काली नींद में डूब गया। और मेहर बहुत देर तक उसके ऊपर बैठी रही, उसके कंधे पर अपने ही दाँतों के ख़ूनी निशान को देखती रही, और तब उसने देखा कि वो निशान भर रहा है। उसकी आँखों के सामने। ख़ून रुक रहा था, चमड़ी जुड़ रही थी, और उस निशान के ठीक ऊपर, जहाँ किसी ने चूमा होगा, उसकी चमड़ी पर सोने की धूल जैसी एक हल्की सी चमक थी, जो बेडसाइड लैंप की रोशनी में टिमटिमा रही थी।
✦ ✦ ✦
अगली सुबह निरव बिना किसी अपॉइंटमेंट के "अंबर" पहुँचा, और इस बार उसे किसी से डर नहीं लगा — न तीन लिफ़्टों से, न चार गार्डों से, न उस लंबे आदमी से जिसकी गर्दन पर जले का निशान था और जिसने उसका रास्ता रोकने की कोशिश की थी। निरव ने बस उसकी आँखों में देखा, बिना पलक झपकाए, और कुछ ऐसा रहा होगा उसकी आँखों में, कुछ ऐसी पूरी, बेदाग़ निडरता, कि उस आदमी ने — जिसका नाम, जैसा बाद में निरव को पता चला, शिंदे था — एक पल झिझककर रास्ता छोड़ दिया।
धनंजय कपाड़िया नाश्ते की मेज़ पर था, और उसके सामने एक सफ़ेद प्लेट में अनार के लाल, चमकते दाने रखे थे, पर उसने उनमें से एक भी नहीं खाया था — वो बस उन्हें चाँदी के एक छोटे चम्मच से इधर-उधर सरका रहा था, जैसे कोई बच्चा उस खाने से खेलता है जिसका स्वाद उसे याद नहीं। निरव को देखकर वो ज़रा भी चौंका नहीं। "आओ, बेटा," उसने कहा, "मुझे लगा था तुम आज आओगे। चौथी रात के बाद सब आते हैं। डर चला जाता है, तो सवाल आ जाते हैं।"
"आपने ये डिब्बा मुझे ही क्यों भेजा?" निरव ने कहा, बिना बैठे, बिना किसी भूमिका के, "पूरे देश में सौ लोग हैं जो ये पत्ते पढ़ सकते थे। आपने मुझे चुना। क्यों?"
धनंजय मुस्कुराया, और उसकी मोम जैसी चमड़ी उस मुस्कान से ज़रा सी खिंची, और निरव ने ग़ौर किया — या शायद उसे ऐसा लगा — कि उसके होंठ के कोने के पास, जहाँ चमड़ी खिंची, वहाँ एक बहुत पतली, बाल जितनी दरार उभरी, जैसे किसी सूखे तालाब की मिट्टी में पहली दरार पड़ती है, और फिर वापस मिल गई। "मैंने कहा था न, मैं सिर्फ़ डाकिया हूँ," उसने कहा, और उठकर एक दराज़ से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीर निकाली और मेज़ पर रख दी। तस्वीर में एक नदी की घाटी थी, और उस पर बनता हुआ एक विशाल कंक्रीट का बाँध, अधूरा, लोहे के सरियों से भरा, और अग्रभूमि में, नदी के किनारे, वही काले पत्थर का मंदिर — डूबा हुआ नहीं, अभी खड़ा, पूरा — और उसकी सीढ़ियों पर तीन लोग खड़े थे। एक खाकी वर्दी वाला सरकारी अफ़सर, एक दुबली-पतली, चश्मे वाली, छोटे बालों वाली औरत, जिसके हाथ में एक नोटबुक थी, और बीच में, बेल-बॉटम और खुले कॉलर वाली कमीज़ में, एक जवान, हैंडसम, चालाक आँखों वाला आदमी — और निरव ने उन आँखों को पहचान लिया, क्योंकि उसने उन्हें अपने सपने में, उस मूर्तिकार के पिघलते चेहरे पर देखा था।
"1984," धनंजय ने कहा, "तमसा बाँध। मैं उसका कॉन्ट्रैक्टर था। छत्तीस साल का, भूखा, बेवक़ूफ़। और ये" — उसने दस्ताने वाली उँगली से चश्मे वाली औरत को छुआ — "डॉक्टर सुधा रानडे। पुरातत्वविद्। सरकार ने उसे भेजा था, डूबने से पहले मंदिर का सर्वे करने के लिए। मैंने वो मंदिर डूबते देखा था, निरव। अपनी आँखों से। उसके बाद से मैं उस डिब्बे को ढूँढ़ रहा था। बयालीस साल।"
"झूठ," निरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई काँप नहीं था, "आप उसे ढूँढ़ नहीं रहे थे। आपको पता था वो कहाँ है। आपको पता था उसमें क्या है। और आपको पता था कि जो उसे पढ़ेगा, उसके साथ क्या होगा।"
धनंजय ने कोई जवाब नहीं दिया। वो उठा, और धीरे-धीरे चलता हुआ समंदर की ओर खुलने वाली उस विशाल शीशे की दीवार तक गया, और उसी पल, जैसे किसी ने इशारा किया हो, बाहर मानसून के भारी, धूसर बादल एक पल के लिए फटे, और सुबह की एक तिरछी, सुनहरी, बेरहम धूप की पट्टी शीशे से अंदर आई और उस घर के सफ़ेद संगमरमर के फ़र्श पर एक लंबी चमकती पगडंडी की तरह बिछ गई — उस घर में, जहाँ सारी रोशनी इस तरह बनाई गई थी कि कहीं कोई परछाईं न पड़े, पहली बार एक सीधी, असली धूप। और धनंजय कपाड़िया उस धूप में खड़ा हो गया। जानबूझकर। निरव की ओर देखते हुए।
और निरव ने फ़र्श की ओर देखा। धूप की उस सुनहरी पट्टी में, संगमरमर पर, मेज़ की परछाईं थी, कुर्सी की परछाईं थी, अनार की प्लेट की छोटी सी गोल परछाईं थी। और वहाँ, उस धूप के बीचों-बीच, दो आदमी खड़े थे — एक जवान, एक बूढ़ा जो जवान दिखता था — और उन दोनों में से किसी की भी परछाईं नहीं थी।
धनंजय कपाड़िया ने अपने दस्ताने वाले हाथ फैलाए, जैसे किसी को गले लगाने के लिए, और उसकी मोम जैसी मुस्कान पहली बार उसकी आँखों तक पहुँची — और वो आँखें प्यार से नहीं, किसी ऐसी भूख से चमक रही थीं जो बयालीस साल से भूखी थी।
"तुम्हें अकेलापन महसूस नहीं होना चाहिए, बेटा," उसने कहा। "तुम अकेले नहीं हो।"
वामिका — उल्टी साधना · सभी भाग →
और कहानियाँ · More stories
- जिन्न का इश्क़ · Pretika
- हमज़ाद · Pretika
- रजिस्टर · Pretika
- यक्षिणी: कदंब का श्राप · Piyashi Atma