PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 27 : कोलकाता की रात

Piyashi Atma · Psychological Horror · 10 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
27 of 27
Category
Psychological Horror
Reading time
10 min
Words
1889
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

7 जनवरी 2027। कोलकाता।

आरोही और भास्करानंद बाबा ट्रेन से कोलकाता पहुँचे। रोहित नहीं आ सका। स्कूल की परीक्षा। पर उसने कहा था — "दीदी, मैं इंटरनेट से मदद करूँगा।"

हावड़ा स्टेशन। भीड़। शोर। एक बड़ा शहर। ट्रेन से उतरते ही ठंडी नमी हवा में। बंगाल की मछली की गंध। कहीं दूर से हिंदी और बंगाली की मिली-जुली आवाज़ें।

आरोही ने बाबा की तरफ़ देखा।

बाबा ने कहा, "बेटी, कोलकाता बहुत पुराना शहर। तंत्र यहाँ बहुत ज़्यादा। कालीघाट। दक्षिणेश्वर। कई मंदिर। कई साधु। कुछ अच्छे। कुछ बुरे। पर यहाँ की काली माँ बहुत शक्तिशाली। अगर हम सच्चे मन से पुकारें, तो मदद मिलेगी।"

आरोही ने कहा, "बाबा, हम पहले कालीघाट जाकर आशीर्वाद लेंगे।"

बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर पहले सुजाता का पता ढूँढ़ें।"

टैक्सी लेकर वे श्यामबाज़ार पहुँचे। तांतीबागान लेन।

गली संकरी। पुरानी। पर लोग बहुत। कई दुकानें। मिठाइयाँ। कपड़े। मछली। एक कोने में एक पुरानी हवेली। 12/A। दो मंज़िला। पर पुरानी। मरम्मत की ज़रूरत।

आरोही ने खटखटाया।

एक बूढ़ी महिला ने दरवाज़ा खोला। सफ़ेद बालों की। सत्तर के आसपास। हरा सूट। आँखों पर चश्मा।

आरोही ने बंगाली में कहा (जो उसने पिछले महीने थोड़ी सीखी थी) —

"नमस्कार। सुजाता प्रताप का घर?"

बूढ़ी महिला ने चौंककर देखा।

"तुम कौन?"

आरोही ने कहा, "मैं दिल्ली से। कमलेश शर्मा की पोती।"

बूढ़ी महिला की आँखों में एक अजीब सी हलचल।

"कमलेश?"

आरोही ने कहा, "जी। दादा। 2015 में मर गए।"

बूढ़ी महिला ने कहा, "अंदर आओ।"

अंदर घर छोटा था। पर साफ़। एक कमरे में। बूढ़ी महिला ने आरोही और बाबा को बैठाया।

चाय बनाई। दी।

फिर कहा, "बेटी, मेरा नाम गीता प्रताप। सुजाता मेरी माँ थीं। 1985 में मरीं। मैंने कमलेश शर्मा का नाम बहुत सुना। मेरी माँ कहती थीं — 'कमलेश एक अच्छे आदमी थे। एक बार आए। मुझसे मिलना चाहते थे। पर मैं तब बीमार थी। मिल नहीं पाईं।' मेरी माँ ज़िंदगी भर उस मुलाक़ात की इंतज़ार में रहीं।"

आरोही की आँखों में आँसू।

"आंटी, आपकी माँ की क्या शक्ति थी?"

गीता ने चौंककर देखा।

"बेटी, तुम कैसे जानती हो?"

आरोही ने कहा, "आंटी, मेरे दादा ने डायरी में लिखा था। आपकी नानी राधा को रुद्रनाथ की शक्ति दी गई थी। और आपकी माँ को भी।"

गीता ने आँखें बंद कीं।

फिर कहा, "बेटी, मेरी माँ के पास बहुत शक्ति थी। पर उन्होंने कभी इस्तेमाल नहीं की। कहती थीं — 'यह शक्ति बुराई से आई। मैं इसे सोई रहने दूँगी।'"

"आंटी, और आप?"

गीता ने कहा, "बेटी, मेरे पास शक्ति नहीं। मेरी माँ ने मुझसे कहा था — 'गीता, तेरे पास कुछ नहीं। तेरी बहन के पास शायद।'"

आरोही ने पूछा, "आपकी बहन?"

गीता ने कहा, "हाँ बेटी। मेरी छोटी बहन — शिखा। पर वह दस साल पहले घर से भाग गई। उसे मानसिक रूप से अशांत मानते थे। कहती थी — 'मुझे कुछ दिखता है।' 'मुझे कुछ सुनाई देता है।' हम सब को लगा — पागल है। पर वह भागकर..."

आरोही ने पूछा, "कहाँ?"

गीता ने कहा, "कालीघाट के पास। एक मंदिर में। मैं कभी नहीं गई मिलने। पर लोगों ने कहा — वह वहीं है। एक साधुनी बन गई है।"

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

तो शिखा — गीता की बहन — के पास तेरहवीं शक्ति होगी।

बाबा ने कहा, "गीता जी, आप की बहन को हम मिलेंगे।"

गीता ने कहा, "बाबा, आप उससे जो चाहें कहें। पर मुझसे कहें — 'गीता तुझसे मिलना चाहती है। मुझे माफ़ कर दे। मैंने तुझे पागल कहा।'"

आरोही ने कहा, "आंटी, ज़रूर।"

गीता ने आरोही से पूछा, "बेटी, तुम यहाँ क्यों आईं? दादा की डायरी के लिए?"

आरोही ने कहा, "आंटी, मुझे आप के भाई रुद्रनाथ को मारना है।"

गीता चौंकी।

"मेरे भाई? मेरा कोई भाई नहीं।"

आरोही ने कहा, "आंटी, रुद्रनाथ आप की नानी राधा का भाई था। जिसने बचपन में राधा को अलग परिवार को दे दिया था। रुद्रनाथ अभी भी ज़िंदा है। 145 साल का। और वह गर्भवती स्त्रियों को मारता है।"

गीता की आँखों में डर।

"बेटी, तुम मज़ाक़ कर रही हो?"

आरोही ने कहा, "नहीं आंटी।"

आरोही ने अपने बैग से दादा की डायरी निकाली। गीता को दिखाई।

गीता ने पढ़ी।

फिर रोने लगीं।

"बेटी, मैं इतने साल कुछ नहीं जानती थी। मेरा परिवार..."

आरोही ने कहा, "आंटी, चिंता मत कीजिए। यह हमारा फ़र्ज़।"

शाम। आरोही और बाबा कालीघाट की तरफ़।

बहुत बड़ा मंदिर। भीड़। तीर्थयात्री। पंडे।

बाबा ने कहा, "बेटी, यहाँ बहुत सी बुरी शक्तियाँ हैं। सावधान।"

आरोही ने अपने तीन ताबीज़ छाती से लगाए।

पास में एक और छोटा मंदिर। एक साधुनी वहाँ बैठी थी।

चालीस साल की। सफ़ेद कपड़े। सफ़ेद बाल।

आरोही ने पूछा, "आप शिखा?"

साधुनी ने आरोही की तरफ़ देखा।

फिर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक।

"तुम आ गईं। मैं बरसों से इंतज़ार में थी।"

आरोही ने चौंककर देखा।

"आप जानती थीं?"

शिखा ने कहा, "हाँ। मुझे सपने आते थे। एक लड़की आएगी। दिल्ली से। मालती के ख़ून की। और मैं उसकी मदद करूँगी।"

आरोही ने कहा, "मैं आरोही हूँ।"

शिखा ने आरोही के पैर छुए।

फिर बोली, "बेटी, मैं तेरे लिए बरसों से तैयार हूँ। मेरी शक्ति। मेरा ज्ञान। सब तेरा।"

बाबा ने कहा, "शिखा बेटी, तुम्हारी बहन गीता तुम्हें याद करती हैं।"

शिखा की आँखों में आँसू।

"मेरी दीदी..."

आरोही ने कहा, "शिखा दीदी, आपकी दीदी ने कहा — 'मुझे माफ़ कर।' उन्होंने आपको पागल कहा। पर वे शर्मिंदा हैं।"

शिखा ने कहा, "बेटी, मेरी दीदी को कहना — 'मैंने माफ़ किया। पर मैं अपना काम पूरा करके ही घर आऊँगी।'"

आरोही ने पूछा, "शिखा दीदी, आप बचपन से ऐसी थीं?"

शिखा ने कहा, "बेटी, हाँ। मैं छह साल की थी जब मुझे पहला सपना आया। एक बूढ़े आदमी का। जो मेरी माँ का भाई था। पर मैंने माँ से पूछा — 'माँ, यह आदमी कौन?' माँ ने कहा — 'बेटी, तेरा कोई मामा नहीं। यह सपना बकवास।' पर सपने बंद नहीं हुए। बड़ी होकर मुझे और भी दिखने लगा। मैं कहती — 'माँ, यह देखो। यह सुनो।' सब हँसते। कहते — 'शिखा पागल।' मेरे पिताजी ने मुझे डॉक्टर के पास ले गए। दवाइयाँ दीं। पर मुझे बुरा लगता था।"

आरोही की आँखों में आँसू।

"शिखा दीदी, फिर आप भागीं?"

शिखा ने कहा, "बेटी, हाँ। एक दिन मैं कालीघाट आई। यहाँ एक बूढ़ी साधुनी मिलीं। बोलीं — 'बेटी, तू पागल नहीं। तेरे पास शक्ति है। पर तुझे समझ नहीं। मेरे साथ रह। मैं तुझे सिखाऊँगी।' मैं दस साल उनके साथ रही। उन्होंने मुझे सब सिखाया। मंत्र। शक्ति। ध्यान। पर तीन साल पहले वे मर गईं। तब से मैं अकेली इस मंदिर की देखभाल करती हूँ।"

आरोही ने कहा, "शिखा दीदी, वह साधुनी..."

शिखा ने कहा, "बेटी, हाँ। उन्होंने मुझे कहा था — 'शिखा, एक दिन एक लड़की आएगी। जिसे तेरी मदद चाहिए। तब तक तू तैयार रह।'"

रात। शिखा ने आरोही और बाबा को अपने मंदिर में ठहराया।

छोटा मंदिर था। पर पवित्र।

रात को आरोही ने पूछा, "शिखा दीदी, आप को रुद्रनाथ के बारे में क्या पता?"

शिखा ने कहा, "बेटी, बहुत कुछ। मुझे उसके सपने आते हैं। हर रात। वह एक बड़ी हवेली में रहता है। पर हवेली दिखती नहीं। तांत्रिक मंत्र से छिपाई हुई है। सिर्फ़ रुद्रनाथ के करीबी लोग देख सकते हैं।"

आरोही ने पूछा, "कहाँ है हवेली?"

शिखा ने कहा, "गंगा के किनारे। बाबूघाट के पास। पर वहाँ जाकर देखने से नहीं दिखेगी। हमें अंदर से जाना होगा।"

बाबा ने कहा, "शिखा बेटी, अंदर से कैसे?"

शिखा ने कहा, "बाबा, एक तरीक़ा है। रुद्रनाथ हर पूर्णिमा को अपने पास कुछ लोगों को बुलाता है। नए शिष्य ढूँढ़ने के लिए। कुछ गर्भवती स्त्रियों को भी। बहाना बनाकर — 'मेरे पास आओ। मैं तुम्हें आशीर्वाद दूँगा।' कुछ जाती हैं। कुछ बच जाती हैं।"

आरोही ने कहा, "तो हम भी जाएँगे?"

शिखा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर सावधानी से। मैं तुझे रास्ता दिखाऊँगी।"

आरोही ने पूछा, "अगली पूर्णिमा कब?"

बाबा ने कहा, "बेटी, 12 जनवरी। पाँच दिन बाद।"

अगले दिन। आरोही और शिखा।

शिखा ने आरोही को अपनी शक्ति दिखाई।

एक दिये को बिना छुए हिलाया।

एक फूल को बिना छुए गिराया।

एक बूँद पानी को हवा में रोका।

आरोही ने चौंककर देखा।

"शिखा दीदी, आप बहुत शक्तिशाली हैं।"

शिखा ने कहा, "बेटी, मेरी शक्ति सोई हुई थी। पर तेरे आने से जागी। हम दोनों की शक्ति एक साथ — रुद्रनाथ के लिए बहुत।"

आरोही ने कहा, "शिखा दीदी, मुझे भी सिखाइए।"

शिखा ने कहा, "बेटी, तेरी शक्ति मुझसे अलग। तू मालती के ख़ून की। मैं राधा के। पर हम दोनों तेरहवीं।"

आरोही ने कहा, "दीदी, हम मिलकर सीखेंगे।"

पाँच दिन बीत गए।

आरोही ने शिखा से बहुत कुछ सीखा। नए मंत्र। नई तकनीकें। रुद्रनाथ की हवेली के बारे में।

बाबा ने भी मदद की।

रोहित ने इंटरनेट से रुद्रनाथ के बारे में ढूँढ़ा। कुछ ख़बरें मिलीं। कोलकाता में पिछले दस साल में कम से कम 50 गर्भवती स्त्रियाँ ग़ायब हुई थीं। सब बेसहारा। कोई नहीं पूछता।

आरोही की आँखों में आँसू।

50 औरतें।

पर आज अंत।

12 जनवरी 2027। पूर्णिमा।

रात के आठ बजे। आरोही, बाबा, और शिखा बाबूघाट पहुँचे।

गंगा। ठंडी। शांत।

शिखा ने कहा, "बेटी, यहाँ से हवेली दिखेगी। ग़ौर से देख।"

आरोही ने अपने ताबीज़ छाती पर लगाए।

फिर आँखें बंद कीं।

फिर खोलीं।

गंगा के किनारे एक बड़ी हवेली दिख रही थी।

जो पहले नहीं थी।

काली। भव्य। पर बुरी।

रुद्रनाथ की हवेली।

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

बाबा ने कहा, "बेटी, तैयार?"

आरोही ने सिर हिलाया।

तीनों हवेली की तरफ़ चले।

हवेली के पास एक अजीब सी हवा। ठंडी। पर बदबूदार। जैसे कहीं दूर लाशें पड़ी हों।

आरोही ने अपने तीन ताबीज़ पकड़े।

शिखा ने कहा, "बेटी, अंदर घुसते ही एक बड़ा हॉल आएगा। वहाँ रुद्रनाथ बैठा होगा। कई शिष्य होंगे। पर हमें ग़ौर से देखना होगा — गर्भवती स्त्रियाँ कौन-कौन हैं। उन्हें बचाना होगा।"

आरोही ने कहा, "शिखा दीदी, कितनी होंगी?"

शिखा ने कहा, "बेटी, शायद पाँच। शायद दस। पिछली पूर्णिमा को पंद्रह थीं। उनमें से पाँच अगले महीने मरीं। तीन को बाबा उनके परिवार वालों तक पहुँचाए। बाक़ी की जानकारी नहीं।"

आरोही ने कहा, "आज सब को बचाएँगे।"

शिखा ने कहा, "बेटी, हिम्मत रख।"

बाबा ने कहा, "एक बात याद रखो। रुद्रनाथ की एक अंगूठी है। नीले पत्थर की। उसकी बहन राधा का नाम खुदा है। वह उसकी कमज़ोरी।"

आरोही ने कहा, "बाबा, वह हमारे पास कहाँ से आएगी?"

शिखा ने कहा, "बेटी, मेरे पास है।"

शिखा ने अपने बैग से एक छोटा सा डिब्बा निकाला। खोला।

अंदर एक पुरानी चूड़ी। कांच की। नीली।

शिखा ने कहा, "यह मेरी नानी राधा की चूड़ी। मरने से पहले उन्होंने मेरी माँ को दी। मेरी माँ ने मुझे। यह — रुद्रनाथ की अंगूठी की जोड़ी। दोनों टूटने पर रुद्रनाथ मरेगा।"

आरोही ने कहा, "शिखा दीदी, आप बहुत तैयार।"

शिखा ने कहा, "बेटी, हाँ। 10 साल की तैयारी।"

तीनों हवेली के दरवाज़े पर पहुँचे।

एक बड़ा लकड़ी का दरवाज़ा। बंद।

पर दरवाज़े के पास एक छेद।

एक पंडा वहाँ खड़ा था।

पंडे ने पूछा, "कौन?"

शिखा ने कहा, "मैं शिखा। रुद्रनाथ बाबा से मिलने आई।"

पंडे ने कहा, "कौन तुम्हारे साथ?"

शिखा ने कहा, "मेरी बहन। और मेरे गुरु।"

पंडे ने चेक किया। फिर दरवाज़ा खोला।

तीनों अंदर घुसे।

हवेली अंदर बड़ी थी। बहुत बड़ी।

बड़ा हॉल। बीच में एक ऊँची चौकी। उस पर बैठा एक आदमी। तीस के आसपास। पर आँखें बहुत पुरानी। जैसे कालीचरण की थीं। पर लाल नहीं। नीली।

रुद्रनाथ।

चारों तरफ़ करीब पंद्रह गर्भवती स्त्रियाँ बैठी थीं। सब कमज़ोर। भूखी। पर आँखों में एक अजीब सी शून्यता। जैसे मंत्रों से बंधी हों।

और कुछ शिष्य।

आरोही ने ग़ौर से देखा।

रुद्रनाथ की उँगली में नीले पत्थर की अंगूठी।

तेरहवीं की लड़ाई शुरू।
(भाग 27 समाप्त। भाग 28 में जारी...)

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