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भाग 26 : कोलकाता की तैयारी
Piyashi Atma · Psychological Horror · 12 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 26 of 27
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 12 min
- Words
- 2348
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 26 : कोलकाता की तैयारी
20 दिसंबर 2026। दिल्ली।
बनारस से लौटे एक महीना हो चुका था।
आरोही घर पर थी। दिल्ली में। सर्दी का मौसम। धुँआ। धुँध। पर घर में गर्मी। पिताजी, माँ, और आरोही।
पिताजी को कुछ नहीं बताया गया था। पर पिताजी अब पूछते नहीं। शायद वे समझ गए थे। पर उन्होंने ख़ामोशी चुनी।
माँ ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, तेरा रंग उतरा है। खाना ठीक से खा।"
आरोही ने कहा, "माँ, मैं ठीक हूँ।"
पर माँ जानती थीं — आरोही रात को ठीक से सोती नहीं। रानी की चीख़ें अभी भी उसे सुनाई देतीं। और अगले शिष्य की चिंता।
पिछले महीने में आरोही ने बहुत कुछ किया था। अपने पीएचडी विभाग को बताया — विषय बदल रहा है। नए प्रस्ताव लिखे। रत्नपुर का इतिहास। मालती। बारह बहनें। सब।
प्रोफ़ेसर ने कहा था, "आरोही, यह एक बहुत बड़ा विषय है। पर तू कर सकती है। मुझे विश्वास।"
आरोही ने रत्नपुर पर पहले तीन अध्याय लिखे। रोहित ने बहुत मदद की। इंटरनेट से। तस्वीरें। दस्तावेज़।
पर अभी भी दिन-रात एक ही चिंता।
रुद्रनाथ। कोलकाता। गर्भवती स्त्रियाँ।
आरोही ने बाबा से पूछा था — रुद्रनाथ की अगली शिकार कब? बाबा ने कहा था — "बेटी, रुद्रनाथ की अगली अमावस 2028 में। पर वह हर महीने भी छोटी बलि देता है। कोई गर्भवती महिला जो कहीं की नहीं। घर से भागी हुई। बेसहारा।"
तो एक-एक महीना कीमती था।
दुर्गा और रानी अभी बनारस में थीं। रामप्रसाद बाबा के साथ। दुर्गा को रामप्रसाद बाबा ने अपनी बेटी की तरह अपना लिया था। दोनों — दुर्गा और रानी — उनकी झोपड़ी में रह रही थीं।
आरोही ने कल दुर्गा को फ़ोन किया था।
दुर्गा ने कहा, "दीदी, रानी अब बेहतर। खाना खाती है। हँसती है। पर रात को सपने। कालीचरण के।"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, वक़्त लगेगा। पर ठीक हो जाएगी।"
दुर्गा ने कहा, "दीदी, हम कब कोलकाता जाएँगे?"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, तू नहीं आएगी। तू रानी के साथ रहेगी।"
दुर्गा ने कहा, "दीदी, पर मेरी शक्ति..."
आरोही ने कहा, "दुर्गा, तेरी बेटी को अभी तेरी ज़रूरत ज़्यादा। तू यहीं रह। मैं और कोई तेरहवीं ढूँढ़ूँगी। कोलकाता में।"
दुर्गा ने कहा, "अच्छा दीदी।"
रोहित रत्नपुर लौट गया था। स्कूल की छुट्टियाँ ख़त्म। पर उसने कहा था — "दीदी, फ़ोन पर मदद करूँगा। इंटरनेट से।"
बाबा दिल्ली में थे। आरोही के साथ। एक होटल में। बाबा ने पिताजी से एक बार मुलाक़ात की। पिताजी ने बाबा को सम्मान दिया।
बाबा ने कहा था, "बेटा (पिताजी को), तुम्हारी बेटी एक बड़ी विद्वान है। मैं उसे कुछ पुरानी पांडुलिपियाँ दिखाऊँगा। पीएचडी में मदद।"
पिताजी ने कहा था, "बाबा, धन्यवाद।"
पर पिताजी की आँखों में एक अजीब सी छाया थी। जैसे वे जानते थे — बात इससे बड़ी है।
शाम को आरोही और बाबा एक कैफ़े में बैठे।
बाबा ने कहा, "बेटी, कोलकाता जाने से पहले हमें रुद्रनाथ के बारे में सब जानना होगा।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप कितना जानते हैं?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मैं 1970 में एक बार कोलकाता गया था। रुद्रनाथ को ढूँढ़ने। पर वह बहुत चालाक। मुझे मिला नहीं। पर मैंने कुछ लोगों से बात की।"
"क्या पता चला?"
बाबा ने कहा, "बेटी, रुद्रनाथ कोलकाता के पुराने हिस्से में रहता है। कालीघाट के पास। बड़ी सी हवेली में। पर वह हर कुछ साल में जगह बदलता है। इसलिए मुझे नहीं पता कि अब कहाँ।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हमें ढूँढ़ना होगा।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। और यह बहुत मुश्किल। रुद्रनाथ की एक ख़ास बात — वह अस्पतालों के पास घूमता है। जहाँ गर्भवती स्त्रियाँ आती हैं। वह उन्हें बहला-फुसलाकर ले जाता है।"
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
"बाबा, तो हम अस्पतालों के पास शुरू करेंगे।"
बाबा ने कहा, "हाँ बेटी।"
रात। आरोही घर पर।
पिताजी टीवी देख रहे थे। समाचार।
अचानक एक ख़बर।
"कोलकाता के एक बड़े अस्पताल के पास तीन गर्भवती महिलाएँ पिछले महीने ग़ायब हुईं। पुलिस जाँच कर रही है। किसी बड़े रैकेट का शक।"
आरोही चौंकी।
तीन।
एक महीने में।
रुद्रनाथ।
आरोही ने पिताजी की तरफ़ देखा।
पिताजी ने आरोही को देखा।
फिर बोले, "बेटी, यह देश बहुत बड़ा। और बहुत सी बुराइयाँ।"
आरोही ने कहा, "जी पिताजी।"
पिताजी ने कहा, "बेटी, अगर कोई ऐसी बुराई तुझे दिखे — तो सावधान रहना। कुछ बुराइयाँ इंसान की नहीं। कुछ और की।"
आरोही ने चौंककर पिताजी को देखा।
पिताजी क्या जानते थे?
क्या माँ ने कुछ बता दिया था?
पिताजी ने कहा, "बेटी, मैं दिल का मरीज़ हूँ। पर मूर्ख नहीं। मैंने देखा है — तू और तेरी माँ बदल गईं। कुछ हुआ। मुझे नहीं पता क्या। पर मैं जानता हूँ — तू कुछ कर रही है। कुछ बड़ा। कुछ अच्छा।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"पिताजी, आप को बताना मुश्किल।"
पिताजी ने कहा, "बेटी, बताना मत। पर वादा कर — सावधान रहेगी। मेरे लिए। और अपनी माँ के लिए।"
आरोही ने पिताजी को गले लगाया।
"वादा पिताजी।"
पिताजी की आँखों से आँसू।
"बेटी, तेरी माँ ने मुझे कुछ बताया नहीं। पर मुझे पता है — उसने भी कुछ सहा। रत्नपुर में। तुम दोनों जब लौटीं, तेरी माँ की आँखों में एक अजीब सा दर्द था। जो पहले नहीं था।"
आरोही ने कहा, "पिताजी, माँ बहुत बहादुर हैं।"
पिताजी ने कहा, "बेटी, हाँ। और तू भी।"
पिताजी ने कहा, "एक बात। मेरे पिताजी — तेरे दादा — भी ऐसे थे। कुछ छुपाते थे। कहीं जाते थे। रात-रात भर। मैं छोटा था। पूछता था — 'बाबा, कहाँ?' वे कहते — 'बेटा, एक बड़ा काम है। भगवान का।' मुझे कभी नहीं बताया। पर वे बहुत अच्छे इंसान थे।"
आरोही ने पूछा, "पिताजी, दादा क्या करते थे?"
पिताजी ने कहा, "बेटी, पता नहीं। पर मरने से पहले उन्होंने मुझे एक चीज़ दी। कहा — 'बेटा, इसे संभालकर रख। एक दिन तेरी बेटी काम आएगी।' मैंने रखा। पर कभी नहीं दिया। क्योंकि मुझे लगा — यह बकवास होगी।"
पिताजी उठे। अपनी अलमारी की तरफ़ गए। एक पुरानी डिबिया निकाली। आरोही को दी।
आरोही ने डिबिया खोली।
अंदर एक तांबे का ताबीज़।
बहुत पुराना। शायद 100 साल।
आरोही की आँखें फैलीं।
ताबीज़ पर एक निशान।
त्रिकोण।
पर आँख नहीं।
एक फूल।
रामनाथ बाबा का चिह्न।
आरोही ने बाबा से इसके बारे में सुना था।
तो दादा भी...
आरोही ने पिताजी की तरफ़ देखा।
"पिताजी, दादा कहाँ के थे?"
पिताजी ने कहा, "बेटी, दादा एक साधु के शिष्य थे। बचपन में उन्हें एक बाबा ने पढ़ाया। बहुत बूढ़े बाबा। रामनाथ नाम। पर दादा ने बाद में शादी की। और सामान्य जीवन जिया। पर उनकी शक्ति कभी नहीं गई।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
तो दादा — रामनाथ बाबा के एक शिष्य थे।
देवराज बाबा। भास्करानंद बाबा। और अब...
आरोही के दादा — कमलेश शर्मा।
बाबा तीन शिष्य थे।
आरोही ने बाबा को फ़ोन किया।
"बाबा, एक बड़ी बात पता चली। मेरे दादा भी रामनाथ बाबा के शिष्य थे।"
बाबा ने चौंककर कहा, "बेटी, यह कैसे?"
आरोही ने सब बताया।
बाबा ने कहा, "बेटी, मुझे नहीं पता था। रामनाथ गुरुजी के तीन शिष्य? मुझे लगा — दो। मैं और देवराज।"
आरोही ने कहा, "बाबा, शायद तीसरा। कमलेश शर्मा। मेरे दादा।"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह तो बहुत बड़ी बात। तू आ। मेरे पास। अभी।"
आरोही होटल पहुँची। बाबा से मिली।
आरोही ने ताबीज़ दिखाया।
बाबा ने ग़ौर से देखा।
"बेटी, यह रामनाथ गुरुजी का चिह्न। सही है।"
आरोही ने कहा, "बाबा, तो मेरे दादा भी..."
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर वे बरसों तक शांत रहे। शादी करके सामान्य जीवन। हो सकता है, रामनाथ गुरुजी ने उन्हें कोई ख़ास काम दिया हो। कोई ख़ास शिकार।"
आरोही ने कहा, "बाबा, मेरे दादा 2015 में मरे। तब मैं 15 साल की थी।"
बाबा ने कहा, "बेटी, तो अब उनकी शक्ति तेरे पास आ गई। यह ताबीज़ तेरा। तू पहन।"
आरोही ने ताबीज़ पहना।
एक अजीब सी शक्ति उसकी छाती में उठी।
अब उसके पास तीन ताबीज़ थे। भगवती दादी का। बाबा का हार। और अब दादा का।
तीन शक्तियाँ।
बाबा ने कहा, "बेटी, अब तू और मज़बूत। कोलकाता जाने के लिए तैयार।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कब जाएँगे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, नए साल के बाद। जनवरी में। तब तक तैयारी।"
अगले दिन। सुबह।
आरोही ने अपने दादा की डायरी ढूँढ़ी। पिताजी की अलमारी में। और मिली।
पुरानी। बहुत पुरानी। शायद 80 साल।
आरोही ने पहला पन्ना पढ़ा।
"1946 - मेरे गुरु रामनाथ बाबा ने मुझे एक विशेष काम दिया। मुझे एक शिष्य की तलाश करनी थी। जिसका नाम — रुद्रनाथ। कोलकाता में।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
तो दादा रुद्रनाथ की तलाश में थे!
आरोही ने आगे पढ़ा।
"1947 - मैं कोलकाता पहुँचा। बड़ा शहर। बहुत भीड़। मुझे रुद्रनाथ के बारे में कुछ नहीं मालूम। सिर्फ़ नाम। मैंने अस्पतालों के पास घूमना शुरू किया। क्योंकि रामनाथ गुरुजी ने कहा था — 'वह गर्भवती स्त्रियों का शिकार करता है।'"
"1948 - एक साल हो गया। कोई सुराग नहीं। मुझे लगा — शायद वह मर चुका है। पर एक दिन एक अस्पताल के पास एक अजीब सा आदमी दिखा। लंबा। काले कपड़े। मैंने पीछा किया। पर वह ग़ायब हो गया।"
"1949 - मैंने कोलकाता के कई पंडितों से पूछा। सब चुप। कुछ ने कहा — 'रुद्रनाथ का नाम मत लेना।' सब डरे हुए।"
"1950 - एक बूढ़े साधु ने मुझे बताया — रुद्रनाथ की एक बहन है। जिसे उसने बचपन में एक अलग परिवार को दे दिया। ताकि वह उसकी दुनिया से दूर रहे।"
आरोही ने आगे पढ़ा।
पन्ना-पन्ना पढ़ा।
दादा ने 1946 से 1955 तक कोलकाता में रुद्रनाथ को ढूँढ़ा। कई बार क़रीब पहुँचे। पर हर बार रुद्रनाथ भाग गया।
फिर 1955 में एक पंक्ति —
"आज मैंने रुद्रनाथ की एक कमज़ोरी जानी। उसका असली नाम रुद्र प्रताप सिंह। बंगाल के एक ज़मींदार का बेटा। 1882 में देवीदास ने उसे अपना शिष्य बनाया। पर रुद्रनाथ की एक बहन थी। जिसे उसने बचाया था। तांत्रिक बनने से पहले।"
आरोही की आँखें फैलीं।
रुद्रनाथ की एक बहन।
"1955 - बहन का नाम राधा प्रताप सिंह। रुद्रनाथ ने उसे बचपन में एक अलग परिवार को दे दिया। ताकि वह उसकी दुनिया से दूर रहे। राधा 1876 में पैदा हुई। बचपन में एक साधु परिवार को दी गई। वहाँ पली-बढ़ी। शादी की। बच्चे हुए। रुद्रनाथ ने उसे कभी नहीं बुलाया। पर राधा को उसकी पूरी शक्ति दी।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
तो रुद्रनाथ की बहन को उसकी सारी शक्ति दी गई थी?
आरोही ने आगे पढ़ा।
"1956 - राधा का परिवार अभी भी कोलकाता में है। मैंने उन्हें ढूँढ़ा। बड़ी बेटी - सुजाता प्रताप। वह अब 20 साल की। और उसमें रुद्रनाथ की शक्ति। पर वह अच्छे लोगों में। वह अपनी शक्ति से लोगों की मदद करती है।"
आरोही ने कहा, "तो सुजाता या उसकी वंशज..."
"1957 - मैंने सुजाता से मिलना ज़रूरी समझा। पर मैं पहले नहीं मिल पाया। रुद्रनाथ ने मुझे पहचान लिया। मुझे भागना पड़ा। मैं दिल्ली लौट आया। पर सुजाता का पता याद रखा। शायद एक दिन कोई और आ जाएगा।"
आरोही ने डायरी बंद कर दी।
तो दादा ने रुद्रनाथ की बहन की वंशज को नहीं मिल पाए।
पर उन्होंने पता याद रखा।
आरोही ने पिताजी से पूछा।
पिताजी ने कहा, "बेटी, दादा का एक पुराना पता की डायरी है। कहीं है।"
पिताजी ने ढूँढ़ी। मिली।
आरोही ने पन्ने पलटे।
एक जगह — "सुजाता प्रताप। श्यामबाज़ार, कोलकाता। 12/A, तांतीबागान लेन।"
आरोही की आँखें फैलीं।
एक पता।
70 साल पुराना।
पर एक शुरुआत।
आरोही ने बाबा को फ़ोन किया।
"बाबा, मेरे दादा ने रुद्रनाथ की बहन की वंशज का पता छोड़ा है। कोलकाता में। सुजाता प्रताप। श्यामबाज़ार।"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह बहुत बड़ी बात। शायद सुजाता की वंशज अभी भी वहाँ हो। और शायद वह रुद्रनाथ की शक्ति की मालिक।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हम जनवरी में जाएँगे।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ।"
रात। आरोही ने अपनी नोटबुक निकाली। लिखा —
"मिशन 2 — रुद्रनाथ — कोलकाता।
पता — 12/A, तांतीबागान लेन, श्यामबाज़ार।
संपर्क — सुजाता प्रताप (शायद अब मर चुकी) की वंशज।
दादा की डायरी — मददगार।
दादा — कमलेश शर्मा — रामनाथ बाबा के तीसरे शिष्य।
अगला क़दम — जनवरी 2027। कोलकाता।
टीम — मैं, बाबा। शायद रोहित।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
बाहर दिसंबर की ठंडी रात।
पर आरोही के अंदर एक नई गर्मी।
दादा।
जो 2015 में गए।
पर उनकी मदद अभी भी उसके साथ।
आरोही ने ताबीज़ छाती से लगाया।
दादा की उपस्थिति।
आरोही ने अपनी माँ से पूछा — "माँ, आप को दादा के बारे में क्या पता?"
माँ ने कहा, "बेटी, ज़्यादा नहीं। मैंने उन्हें कम देखा। शादी के बाद वे बीमार पड़ गए। दस साल बिस्तर पर रहे। पर मैं जानती हूँ — वे बहुत गहरे इंसान थे। बहुत सी बातें छुपाते थे।"
आरोही ने कहा, "माँ, दादा और नाना एक ही परिवार से थे। दोनों भाई। पर एक अच्छा। एक बुरा।"
माँ ने कहा, "हाँ बेटी। दादा अच्छे। पंडित बुरे।"
आरोही ने कहा, "माँ, एक बात। मेरे परिवार में यह सब कहाँ से आया? रामनाथ बाबा। तांत्रिक। शिष्य।"
माँ ने कहा, "बेटी, मुझे भी नहीं पता। पर शायद यह बहुत पुराना है। शायद हमारे पूर्वजों से।"
आरोही ने कहा, "माँ, मुझे लगता है — हर पीढ़ी में हमारे परिवार में कोई एक होता है। जो ये लड़ाइयाँ लड़ता है। मेरे दादा। शायद उनके पिताजी। शायद उनके पिताजी। और अब मैं।"
माँ ने कहा, "बेटी, शायद।"
आरोही ने माँ को गले लगाया।
"माँ, मुझे डर लगता है।"
माँ ने कहा, "बेटी, डर लगना ठीक है। पर तू आगे बढ़।"
रात के बारह बजे।
आरोही अपने कमरे में।
बाबा ने कहा था — नए साल के बाद कोलकाता।
पर आरोही का मन कह रहा था — जल्दी जाना चाहिए।
गर्भवती स्त्रियाँ हर दिन मर रही थीं।
रुद्रनाथ हर दिन नई शिकार खोज रहा था।
आरोही ने अपना फ़ोन उठाया।
बाबा को संदेश।
"बाबा, नए साल का इंतज़ार क्यों? हम पहले क्यों नहीं जा सकते?"
बाबा का जवाब आया।
"बेटी, तू सही कह रही। जल्दी जाना चाहिए। पर कुछ तैयारी बाक़ी। 5 जनवरी को चलेंगे।"
आरोही ने कहा, "ठीक बाबा।"
फिर आरोही ने अपनी दादी की एक तस्वीर देखी। दीवार पर।
दादी। जो 1990 में मरीं। जब आरोही पैदा भी नहीं हुई थी।
पर तस्वीर में उनकी आँखें आरोही की तरफ़ थीं।
आरोही ने तस्वीर के सामने खड़े होकर कहा —
"दादी, आप मेरे साथ रहिए। मुझे शक्ति दीजिए।"
तस्वीर की आँखों में एक हल्की सी चमक।
फिर आरोही ने सो जाने की कोशिश की।
पर नींद नहीं।
पंद्रह दिन।
फिर कोलकाता।
फिर रुद्रनाथ।
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