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भाग 25 : कालीचरण का सामना
Piyashi Atma · Psychological Horror · 12 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 25 of 25
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 12 min
- Words
- 2273
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 25 : कालीचरण का सामना
15 नवंबर 2026। पूर्णिमा।
दस दिन बीत गए।
आरोही और दुर्गा हर दिन मंत्र पढ़तीं। सुबह और शाम। दुर्गा की शक्ति धीरे-धीरे जाग रही थी। पहले दिन कुछ भी नहीं। दूसरे दिन एक हल्की सी झनझनाहट हाथों में। पाँचवें दिन दुर्गा को अपनी बहन गुड़िया की आवाज़ सुनाई देने लगी। सातवें दिन उसने अपनी नानी का आशीर्वाद महसूस किया।
और कल रात दुर्गा ने अपने हाथ से एक दिये को बिना छुए हिला दिया।
तेरहवीं शक्ति।
अब वह पूरी जागी थी।
रामप्रसाद बाबा और भास्करानंद बाबा ने मिलकर हवेली का पूरा नक्शा बनाया। कल की एक और यात्रा से। दिन में। जब कालीचरण अंदर सोया रहता।
हवेली में तीन मंज़िलें। ऊपर कालीचरण का कमरा। बीच में एक बड़ा हॉल — जिसमें देवीदास की मूर्ति। नीचे तहख़ाना — जहाँ रानी थी। और तहख़ाने से एक सुरंग निकलती थी — गंगा तक। जो शायद कालीचरण अपनी शिकारों को छिपाने के लिए इस्तेमाल करता।
रोहित ने अपने लैपटॉप से हवेली के पुराने प्लान भी ढूँढ़े थे। 1830 के अंग्रेज़ी दस्तावेज़। तब हवेली एक व्यापारी की थी। जो अफ़ीम का व्यापार करता था। बाद में 1878 में — जब कालीचरण ने अपनी माँ को मारा — तब यह हवेली उसकी हो गई। किसी अजीब तरीक़े से।
आठवाँ तांत्रिक कृष्णानंद भी टीम में जुड़ गया। सत्तर साल का। पर बहुत शक्तिशाली। रामप्रसाद बाबा का पुराना मित्र।
अब टीम में — आरोही, दुर्गा, बाबा (भास्करानंद), रामप्रसाद बाबा, कृष्णानंद बाबा, और रोहित। छह लोग।
बच्चों के लिए — शीला, मुनिया, मीना, गोलू — पंडित जी के साथ। सुरक्षित। पिछले दस दिनों में गोलू पूरा ठीक हुआ। मीना पहली बार हँसने लगी। और मुनिया अपनी माँ के साथ ख़ुश।
सुबह छह बजे। हवन।
धर्मशाला के पीछे आँगन में एक कुंड। आग जलाई।
छहों बैठे।
रामप्रसाद बाबा ने मंत्र शुरू किए।
"ॐ गंगा माता, आज हम तेरे पुत्र कालीचरण को मारने जा रहे हैं। हमें आशीर्वाद दो।"
आग नीली हुई।
फिर पीली।
फिर हरी।
एक क्षण के लिए हवा में बारह चेहरे दिखे।
रुक्मिणी। तुलसी। लक्ष्मी। कौशल्या। पार्वती। कमला। राधा। चंपा। जानकी। सुनीता। रोहिणी। मीरा।
बारह बहनें।
आरोही की आँखों में आँसू।
रुक्मिणी ने कहा, "दीदी, हम आ गईं। पूर्णिमा की रात। मालती माँ का आशीर्वाद तेरे साथ।"
मालती की आत्मा भी दिखी। पीछे।
"बच्ची, आज तेरे साथ बहुत बड़ी शक्ति। मुझे विश्वास है।"
फिर सारी आत्माएँ हवा में विलीन हो गईं। पर एक ऊर्जा आग में रह गई।
आरोही ने कहा, "बाबा, अब हम तैयार।"
दोपहर। सब ने आराम किया।
रात में लड़ाई थी।
दुर्गा ने अपनी बेटी की तस्वीर हाथ में ली। बहुत देर तक देखा।
आरोही ने कहा, "दुर्गा, हम रानी को बचाएँगे।"
दुर्गा ने कहा, "दीदी, अगर मैं आज मर जाऊँ, तो मेरी बेटी की देखभाल कौन करेगा?"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, तू नहीं मरेगी। और अगर कुछ हो, तो मैं तेरी बेटी की माँ बनूँगी।"
दुर्गा ने आरोही का हाथ पकड़ा।
"दीदी, धन्यवाद।"
शाम के आठ बजे। रात की शुरुआत।
पूर्णिमा का चाँद पूरा। बड़ा। पीला-सफ़ेद।
छहों गंगा में डुबकी लगाने गए। पूरी टीम।
गंगा का पानी ठंडा। पर एक अजीब सी शक्ति।
आरोही ने डुबकी लगाई। एक बार। दो बार। तीन बार।
तीसरी बार जब सर बाहर आया, आरोही ने महसूस किया — उसके अंदर बारह बहनों की शक्ति। एक साथ। जागी हुई।
दुर्गा ने भी डुबकी लगाई।
तीसरी बार जब वह बाहर आई, उसकी आँखों में एक चमक। जो पहले नहीं थी।
तेरहवीं शक्ति जग गई थी।
दोनों तेरहवीं। एक साथ।
रात के दस बजे। सब हवेली की तरफ़ चले।
छह लोग। पर हवा में हल्केपन।
कालीचरण की हवेली की पिछली दीवार तक पहुँचे।
बाबा ने कहा, "बेटी, अब योजना।"
आरोही ने सिर हिलाया।
बाबा ने कहा, "पहला काम — दीवार तोड़ना। जहाँ खिड़की है। रामप्रसाद और मैं मंत्र से तोड़ेंगे। तुम, दुर्गा, और रोहित घुसेंगे।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप बाहर क्यों?"
बाबा ने कहा, "बेटी, हम बूढ़े हैं। अंदर हम तेरा बोझ। हम बाहर से रक्षा-चक्र बनाएँगे। ताकि कालीचरण भाग न सके।"
आरोही ने कहा, "अच्छा।"
बाबा ने कहा, "कृष्णानंद हवेली के सामने वाले दरवाज़े पर रहेगा। ताकि कालीचरण उधर से भागे तो पकड़ ले।"
कृष्णानंद बाबा ने सिर हिलाया।
बाबा ने कहा, "रोहित, तू अंदर घुसने के बाद रानी को ढूँढ़ना। तहख़ाने में। और उसे बाहर लाना। सुरंग से। जो गंगा तक जाती है।"
रोहित ने कहा, "जी बाबा।"
बाबा ने कहा, "दुर्गा, तू आरोही के साथ। तुम दोनों कालीचरण से लड़ोगी।"
दुर्गा ने सिर हिलाया।
रात के ग्यारह बजे।
रामप्रसाद बाबा और भास्करानंद बाबा ने मंत्र शुरू किया।
हवेली की पिछली दीवार में एक दरार आई।
फिर दरार बढ़ी।
फिर एक छेद।
आरोही, दुर्गा, और रोहित अंदर घुसे।
तहख़ाना।
अँधेरा।
आरोही ने अपनी टॉर्च जलाई।
चारों तरफ़ हड्डियाँ। छोटे-छोटे कंकाल। बच्चों के।
रोहित की आँखों में आँसू।
"दीदी, यहाँ..."
आरोही ने कहा, "रोहित, हिम्मत। रानी को ढूँढ़।"
रोहित एक तरफ़ चला। टॉर्च से रास्ता देखता। हड्डियों को बचाकर।
तहख़ाना बड़ा था। कई कोठरियाँ। हर कोठरी में कुछ न कुछ।
एक कोठरी में — पुरानी हड्डियाँ। शायद 50 साल पुरानी।
दूसरी में — कालीचरण की पुरानी शिकारों की चीज़ें। छोटे कपड़े। खिलौने। एक टूटी हुई गुड़िया।
तीसरी में — कालीचरण की तांत्रिक चीज़ें। किताबें। बर्तन। खोपड़ियाँ।
रोहित एक-एक कोठरी देखता गया।
फिर एक कोठरी। सबसे अंदर की।
दरवाज़ा बंद।
रोहित ने खटखटाया।
एक धीमी सी बच्ची की आवाज़।
"कौन?"
रोहित की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"रानी?"
"हाँ..."
रोहित ने ताला तोड़ा। दरवाज़ा खोला।
अंदर एक चारपाई। उस पर एक बच्ची। नौ साल की। बहुत कमज़ोर। पर ज़िंदा।
रोहित के आँखों में आँसू।
"रानी, तेरी माँ यहाँ है।"
आरोही और दुर्गा दूसरी तरफ़।
तहख़ाने के अंत में एक दरवाज़ा। ऊपर की तरफ़।
आरोही ने खोला।
ऊपर सीढ़ियाँ।
दोनों चढ़ीं।
बीच का हॉल।
बड़ा। पत्थर का। छत ऊँची।
बीच में एक मूर्ति। देवीदास की। पर छोटी।
और कोने में एक आदमी बैठा था।
काला। लंबा। दाढ़ी वाला।
कालीचरण।
आरोही ने ग़ौर से देखा।
30 के आसपास दिख रहा था। पर आँखें बहुत पुरानी। लाल।
कालीचरण ने आँखें खोलीं।
"आ गईं दोनों तेरहवीं।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
तो कालीचरण जानता था।
कालीचरण ने कहा, "हाँ, मुझे पता था तुम आओगी। पूर्णिमा की रात। बहुत चालाक।"
आरोही ने कहा, "कालीचरण, आज तेरा अंत।"
कालीचरण हँसा।
"बेटी, अंत तेरा। नहीं मेरा।"
कालीचरण उठा। ऊँचा। लंबा। कपड़े काले। बालों में एक अजीब सी चमक।
आरोही ने ग़ौर से देखा। कालीचरण के पीछे एक और चीज़। एक बड़ा तांबे का बर्तन। जिसमें कुछ काला तरल था। और उसमें से भाप निकल रही थी।
बाबा ने बताया था। यह कालीचरण की शक्ति का स्रोत। अगर वह बर्तन तोड़ा, तो उसकी शक्ति कम।
आरोही ने दुर्गा को इशारा किया। बर्तन की तरफ़।
दुर्गा ने समझा।
कालीचरण ने अपनी अंगूठी दिखाई।
लाल पत्थर। बड़ा। पर पत्थर के अंदर एक धुँआ। हिलता हुआ।
आरोही ने ग़ौर से देखा। पत्थर के अंदर एक चेहरा दिख रहा था। एक बच्ची का।
कोई नई शिकार।
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
कालीचरण ने कहा, "देख बेटी, इस अंगूठी में मेरी पिछली शिकार। गुड़िया की परनतिनी। जो 2014 में मैंने ली। वह अभी भी बंधी है। तेरह साल का बंधन। अगली अमावस को पूरा होगा। तब मैं और शक्तिशाली।"
आरोही ने कहा, "कालीचरण, तेरी अगली अमावस नहीं आएगी।"
कालीचरण ने अपने हाथ हवा में उठाए।
हॉल में हवा तेज़ हुई। पत्थर हिलने लगे। मूर्ति की आँखों से एक लाल रोशनी।
आरोही ने अपने बैग से कालीचरण की माँ का कलश निकाला।
कालीचरण चौंका।
"यह... यह मेरी माँ की राख?"
आरोही ने कहा, "हाँ। जिसे तूने मारा।"
कालीचरण के चेहरे पर पहली बार डर।
"बेटी, वह कलश छोड़। मैं तुझे अच्छा जीवन दूँगा। मेरी शिष्या बना दूँगा। तुझे शक्ति दूँगा। तू भी 200 साल जिएगी। जैसे मैं।"
आरोही ने कहा, "कालीचरण, तू 148 साल से बच्चों को मार रहा है। तुझे कोई शांति नहीं।"
कालीचरण ने अपनी अंगूठी की तरफ़ मंत्र पढ़ा।
अंगूठी से एक तेज़ लाल रोशनी।
पर तभी दुर्गा ने अपने हाथ हवा में उठाए।
एक नीली रोशनी दुर्गा के हाथों से निकली।
तेरहवीं शक्ति।
लाल और नीली रोशनी टकराईं।
हॉल में एक धमाका।
पत्थर गिरे।
कालीचरण पीछे झुका।
कालीचरण ने चीखा, "यह कैसे? एक तेरहवीं भी बहुत। पर दो?"
आरोही ने कहा, "कालीचरण, यह दुर्गा है। गुड़िया की बहन। जिसे तूने बरसों पहले मारा। पर उसकी बहन ज़िंदा। और आज तेरे सामने।"
कालीचरण की आँखों में एक अजीब सी छाया।
"गुड़िया? मुझे याद है। छोटी सी बच्ची। 2014 में। सुशीला की बेटी। पर उसकी बहन... मैंने कभी नहीं देखा।"
दुर्गा ने कहा, "इसीलिए मैं ज़िंदा। तूने मुझे नहीं देखा। पर आज देख। और आज मर।"
दुर्गा ने अपने हाथ फिर उठाए।
एक और नीली रोशनी।
आरोही ने भी अपनी शक्ति का उपयोग किया।
दोनों तेरहवीं की शक्ति एक साथ।
कालीचरण जमीन पर गिरा।
पर उठा।
"बेटियों, तुम अभी तक नहीं जानतीं। मेरी शक्ति सिर्फ़ अंगूठी में नहीं। पूरी हवेली में। इस मूर्ति में। मेरे 148 साल में।"
आरोही ने कहा, "फिर भी। आज तेरा अंत।"
आरोही ने कलश खोला।
"कालीचरण, अपनी माँ का सामना कर।"
कालीचरण ने चीखा।
"नहीं!"
पर आरोही ने राख कालीचरण की तरफ़ फेंकी।
राख हवा में उड़ी।
और कालीचरण की अंगूठी पर लगी।
अंगूठी में एक हलचल।
लाल पत्थर हिलने लगा।
फिर पत्थर टूटा।
अंगूठी टूटी।
एक तेज़ चीख़।
पर कालीचरण की नहीं।
एक और।
एक महिला की।
कालीचरण की माँ गंगा की।
गंगा की आत्मा हवा से उभरी। बूढ़ी महिला। सफ़ेद कपड़ों में।
"कालीचरण! मेरे बेटे! मुझे तूने मारा! अब मेरा हिसाब!"
कालीचरण ने अपनी माँ को देखा।
पहली बार 148 साल में।
उसके चेहरे पर एक अजीब सी छाया।
क्या यह प्यार था? क्या अपराध बोध?
कालीचरण के आँखों में आँसू आए। पहली बार।
कालीचरण ने कहा, "माँ..."
गंगा ने कहा, "बेटा, तूने बहुत बुरा किया। बहुत बच्चे मारे। पर मैं तेरी माँ हूँ। मैं तुझे माफ़ करती हूँ। पर तेरा अंत आज।"
कालीचरण ने कहा, "माँ, तुम्हें कैसे भी शांति नहीं मिली? क्योंकि मैंने..."
गंगा ने कहा, "बेटा, नहीं। तेरी वजह से मैं बंधी नहीं। पर तेरे कारण मैं यहाँ रुक गई। ताकि तुझे रोकने वाला कोई आए, तो मैं मदद कर सकूँ। आज वह आई।"
गंगा ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, धन्यवाद।"
आरोही ने हाथ जोड़े।
गंगा ने अपने हाथ अपने बेटे पर रखे।
एक शांति।
कालीचरण घुटने पर बैठ गया।
रोया।
"माँ, मुझे माफ़ कर। मैंने बहुत बुरा किया।"
गंगा ने कहा, "बेटा, माफ़ किया। पर आज तू मेरे साथ जाएगा। हम दोनों को शांति मिलेगी।"
गंगा ने कालीचरण का हाथ पकड़ा।
दोनों की आत्माएँ हवा में उठीं।
कालीचरण का शरीर धीरे-धीरे राख हुआ। ठीक देवीदास की तरह।
पर कालीचरण की आत्मा शांत। क्योंकि उसकी माँ के साथ थी।
एक क्षण के लिए दोनों की छाया दिखी। एक साथ। और फिर आसमान में उठ गईं।
148 साल का बंधन ख़त्म।
आरोही और दुर्गा ने देखा।
फिर दुर्गा दौड़ी।
"रानी! रानी!"
तभी रोहित नीचे से चीखा।
"दीदी! रानी यहाँ! ज़िंदा!"
दोनों नीचे उतरीं।
तहख़ाने में एक कोने में रानी। एक चारपाई पर। कमज़ोर। पर ज़िंदा।
दुर्गा दौड़कर अपनी बेटी को गले लगाया।
"मेरी बच्ची!"
रानी ने आँखें खोलीं।
"माँ..."
छह साल बाद माँ-बेटी मिलीं।
आरोही की आँखों में आँसू।
रोहित भी रो रहा था।
बाहर बाबा और रामप्रसाद बाबा।
हवेली धीरे-धीरे ढहने लगी।
बाबा ने चीखा, "बेटी, बाहर! जल्दी!"
आरोही, दुर्गा, रानी, और रोहित सुरंग की तरफ़ भागे।
तहख़ाने के दूसरे कोने में एक सुरंग। जो गंगा तक जाती थी।
चारों दौड़े।
पीछे हवेली ढह रही थी।
सुरंग में। दौड़ते हुए।
अंत में — गंगा।
चारों गंगा के किनारे पर आए।
पीछे हवेली पूरी तरह ढह गई।
एक बड़ा धमाका।
धूल हवा में उड़ी।
फिर शांति।
बाबा और रामप्रसाद बाबा भी वहाँ पहुँचे। दूसरे रास्ते से।
कृष्णानंद बाबा भी।
सब मिले।
बाबा ने कहा, "बेटी, हो गया।"
आरोही ने सिर हिलाया।
रानी अपनी माँ की गोद में। सो रही थी। पहली बार शांति से।
आरोही ने कहा, "बाबा, दो हो गए। दुर्जन। कालीचरण। बाक़ी तीन।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर अभी आराम कर। कुछ महीने।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कालीचरण की माँ की आत्मा... उसने अपने बेटे को माफ़ किया।"
बाबा ने कहा, "बेटी, यही माँ का प्यार। जो कभी नहीं मरता।"
रात के दो बजे।
चारों धर्मशाला लौटे। रामप्रसाद बाबा और कृष्णानंद बाबा भी।
रानी अभी भी सो रही थी। दुर्गा के साथ।
आरोही ने अपनी नोटबुक निकाली। लिखा —
"मिशन 1 — कालीचरण — पूरा।
बलि — कोई नहीं। रानी बच गई। रोहित ने बचाया।
नुक़सान — कोई नहीं।
हार — कालीचरण की।
अगला — रुद्रनाथ। कोलकाता।
समय — कुछ महीने। आराम। तैयारी।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
फिर उसने माँ को संदेश भेजा।
"माँ, हो गया। सब ठीक। जल्दी दिल्ली आ रही हूँ।"
माँ का जवाब तुरंत आया। शायद जागी थीं।
"बेटी, मैं इंतज़ार में। सारी रात दुआ की।"
आरोही ने भगवती दादी को भी संदेश किया।
"दादी, हो गया। कालीचरण मरा। रानी बच गई।"
भगवती दादी का जवाब।
"बेटी, धन्यवाद देवी माँ। बारह बहनों को भी।"
फिर आरोही ने पार्वती दादी को।
"दादी, रोहित बहादुर है। उसने एक बच्ची बचाई।"
पार्वती दादी का जवाब।
"बेटी, मेरे पोते पर मुझे गर्व है।"
आरोही ने फ़ोन बंद कर दिया।
पास में दुर्गा और रानी सो रही थीं। एक साथ। छह साल बाद।
रोहित भी सो गया। थका हुआ।
बाबा और रामप्रसाद बाबा बरामदे में। ध्यान में।
कृष्णानंद बाबा अपने आश्रम लौट गए।
आरोही अकेली खिड़की के पास।
बाहर पूर्णिमा का चाँद। पूरा। सुंदर।
गंगा शांत।
एक और लड़ाई जीती।
पर अभी तीन बाक़ी।
रुद्रनाथ — कोलकाता — गर्भवती स्त्रियाँ।
प्रचंडी — राजस्थान — जुड़वाँ बच्चे।
महाकाल — तमिलनाडु — बड़ी बहनें।
आरोही ने आँखें बंद कीं।
बहुत लंबा सफ़र।
पर वह अब जानती थी — वह अकेली नहीं।
हर शहर में कोई तेरहवीं होगी। मालती की छह बहनों में से किसी की वंशज। हर एक की अपनी शक्ति।
बनारस में दुर्गा मिली।
कोलकाता में कौन मिलेगा?
राजस्थान में?
तमिलनाडु में?
एक-एक करके।
एक-एक शिष्य।
एक-एक शिकार को बचाना।
आरोही ने एक गहरी साँस ली।
लंबा सफ़र।
पर वह तैयार।
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