PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 24 : मणिकर्णिका की हवेली

Piyashi Atma · Psychological Horror · 12 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
24 of 24
Category
Psychological Horror
Reading time
12 min
Words
2270
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

5 नवंबर 2026। सुबह पाँच बजे।

आरोही, बाबा, रोहित, रामप्रसाद बाबा, और दुर्गा — पाँच लोग — मणिकर्णिका घाट की तरफ़ चले।

अभी अँधेरा था। सूरज नहीं उगा था। ठंडी हवा। बनारस की गलियाँ खाली। बस एक दो कुत्ते। और दूर से मुर्दाहर के मंत्रों की आवाज़।

पर मणिकर्णिका पर लाशें जल रही थीं। हमेशा जलती हैं। दिन-रात। जिस दिन आग नहीं जलती, वह दिन बनारस के इतिहास में एक बार भी नहीं आया।

आरोही ने चारों तरफ़ देखा। धुँआ। हवा में जले हुए मांस की गंध। पंडे। डोम। और मुर्दाहर।

एक पंडा एक लाश को गंगा में डुबकी लगवा रहा था। एक और लाश जल रही थी। एक और आ रही थी।

आरोही की आँखों में आँसू।

मणिकर्णिका। मौत की नगरी। हर पल हर घंटे कोई मरता।

बाबा ने कहा, "बेटी, यह जगह बहुत भारी है। यहाँ मत रुकना ज़्यादा।"

आरोही ने सिर हिलाया।

आरोही ने अपना ताबीज़ पकड़ा। और बाबा का हार। दोनों गरम थे। यानी कुछ बुरी शक्ति क़रीब।

बाबा ने कहा, "बेटी, यहाँ बहुत सी बुरी आत्माएँ हैं। इन्हें छूने मत देना।"

दुर्गा ने कहा, "दीदी, कालीचरण की हवेली इस तरफ़।"

दुर्गा आगे-आगे चली।

पाँच लोग मणिकर्णिका के पीछे की तरफ़ मुड़े। एक संकरी गली। जो लगभग ग़ायब सी थी। दीवारें दोनों तरफ़ ऊँची। कहीं कहीं टूटी हुई।

गली में हवा नहीं बह रही थी। एक अजीब सा भारीपन। जैसे कोई अदृश्य चीज़ चारों तरफ़ हो।

आरोही ने ग़ौर से देखा। गली की दीवारों पर कुछ अजीब से निशान। छोटे। लाल रंग के। जैसे बच्चों के हाथों के छापे।

दुर्गा ने कहा, "दीदी, यह मत छूना। यह... बच्चों के हाथों के छापे हैं। जो मरे।"

आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।

गली के अंत में एक बड़ी हवेली।

दो सौ साल पुरानी।

पत्थर की। पर काली। जैसे किसी ने बरसों तक जलाया हो। दीवारें कहीं कहीं टूटी। खिड़कियाँ बंद। कोई रोशनी नहीं।

चारों तरफ़ ऊँची दीवारें। एक बड़ा दरवाज़ा। बंद। बड़ा। पुराना लकड़ी का। जिस पर पीतल के कुंडे। जो हरे पड़ गए थे।

आरोही ने ग़ौर से देखा।

दरवाज़े पर एक अजीब सा निशान था। लाल रंग का। एक त्रिकोण। बीच में एक आँख।

बाबा ने कहा, "बेटी, यह देवीदास का चिह्न है। कालीचरण ने अपने गुरु का चिह्न लगाया है।"

आरोही ने कहा, "बाबा, तो यहीं है।"

बाबा ने कहा, "हाँ।"

आरोही ने हवेली को ग़ौर से देखा। छत पर एक चीज़ थी। एक काली मूर्ति। छोटी। पर उसकी आँखें आरोही की तरफ़ थीं।

बाबा ने कहा, "बेटी, वह मूर्ति उतनी बुरी नहीं। पर वह देखने का काम करती है। कालीचरण जानता है कि कौन आ रहा है, कौन जा रहा है।"

आरोही ने कहा, "तो हम पकड़े गए?"

बाबा ने कहा, "नहीं बेटी। तेरे ताबीज़ और मेरा हार तुझे छिपाता है। तेरहवीं की शक्ति। पर सावधान रह।"

रोहित ने कहा, "दीदी, हम अंदर कैसे जाएँगे?"

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटा, दिन में नहीं। कालीचरण अंदर होगा। हम पहले हवेली के आस-पास देखें। शायद एक कमज़ोर जगह मिले।"

पाँचों ने हवेली के चारों तरफ़ घूमकर देखा।

पीछे की तरफ़ एक छोटी सी खिड़की। ऊँची पर। बहुत ऊँची। पर टूटी हुई।

दुर्गा ने कहा, "दीदी, यह खिड़की तहख़ाने की है। मुझे लगता है।"

आरोही ने कहा, "कैसे पता?"

दुर्गा ने कहा, "दीदी, मैं यहाँ पिछले हफ़्ते आई थी। रानी के लिए। पर अंदर नहीं जा पाई। पर इस खिड़की से मुझे एक बच्चे की चीख़ सुनाई दी। मेरी बेटी की नहीं। किसी और की।"

आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।

"तो अंदर और भी बच्चे हैं?"

दुर्गा ने कहा, "दीदी, शायद।"

बाबा ने कहा, "बेटी, हमें एक योजना बनानी होगी। आज नहीं। कल शायद।"

आरोही ने कहा, "बाबा, कल क्यों? आज रात क्यों नहीं?"

बाबा ने कहा, "बेटी, हमारे पास पूरी तैयारी नहीं। हमें कुछ और चीज़ें चाहिए। और एक विशेष रात। जब कालीचरण की शक्ति सबसे कमज़ोर हो।"

"कब बाबा?"

बाबा ने कहा, "बेटी, पूर्णिमा की रात। जब चाँद पूरा हो। तांत्रिकों की शक्ति सबसे कमज़ोर होती है। अमावस उनकी शक्ति की रात। पूर्णिमा उनकी कमज़ोरी की।"

आरोही ने कहा, "अगली पूर्णिमा कब?"

बाबा ने कहा, "बेटी, 15 नवंबर। दस दिन बाद।"

आरोही ने कहा, "बाबा, दस दिन बहुत ज़्यादा हैं। रानी अंदर मर सकती है।"

बाबा ने कहा, "बेटी, रानी नहीं मरेगी। कालीचरण उसे अगली अमावस तक बचाएगा। पर एक चिंता — इस बीच वह और छोटे बलि दे सकता है।"

आरोही ने कहा, "बाबा, तो हमें दो काम करने होंगे। एक — रानी को बचाना। दूसरा — कालीचरण के हाथ से और बच्चियाँ बचाना।"

बाबा ने कहा, "हाँ बेटी।"

---

लौटते वक़्त रोहित ने कहा, "दीदी, एक बात है।"

"क्या रोहित?"

रोहित ने कहा, "अगर हम कालीचरण को रोकना चाहते हैं, तो हमें उन बच्चों को घाट से हटाना होगा। मुनिया जैसे। दो हफ़्ते के लिए। शायद एक अनाथालय में। शायद किसी सुरक्षित जगह।"

आरोही ने कहा, "अच्छा विचार।"

बाबा ने कहा, "बेटा, तू सही कह रहा है। पर घाट पर सैकड़ों बच्चे हैं। हम सब को नहीं ले जा सकते।"

रोहित ने कहा, "बाबा, कम से कम मुनिया को। और उसकी कुछ सहेलियों को।"

आरोही ने कहा, "हाँ। मुनिया, उसकी माँ, और घाट के दो-चार बच्चों को। हम शीला जी के पास ले चलेंगे। धर्मशाला में। कुछ दिनों के लिए।"

दुर्गा ने कहा, "दीदी, यह अच्छा विचार है।"

---

दोपहर। आरोही और दुर्गा शीला जी के पास गईं।

शीला ने चौंककर देखा।

"बेटी, आप फिर आ गईं?"

आरोही ने कहा, "शीला जी, मुझे आपसे और मुनिया से एक बात करनी है।"

शीला ने कहा, "बताइए।"

आरोही ने कहा, "शीला जी, अगले दो हफ़्ते के लिए आप और मुनिया मेरे साथ धर्मशाला में रहेंगी। मैं आप की सारी ज़रूरतें पूरी करूँगी। और आपकी दवा भी। कालीचरण अभी बहुत सक्रिय है। मुनिया यहाँ सुरक्षित नहीं।"

शीला ने कहा, "बेटी, पर..."

आरोही ने कहा, "शीला जी, कोई पर नहीं। यह मेरी ज़िम्मेदारी है।"

शीला की आँखों में आँसू।

"बेटी, आप भगवान हो।"

मुनिया ने कहा, "दीदी, मेरी सहेलियाँ भी?"

आरोही ने कहा, "मुनिया, कुछ को ले चलेंगे। जो अकेले हैं। जिनके परिवार नहीं।"

मुनिया ने कहा, "दीदी, मीना है। सात साल की। कोई नहीं। और गोलू। छह साल का। बीमार। बीच घाट पर पड़ा रहता है।"

आरोही ने कहा, "मुनिया, दोनों को ले चलेंगे।"

---

शाम तक चार लोग धर्मशाला में — शीला, मुनिया, मीना, गोलू।

धर्मशाला के मालिक पंडित जी ने चौंककर देखा।

"भास्कर, यह क्या?"

बाबा ने कहा, "पंडित जी, अगले दो हफ़्ते के लिए। पैसे मैं दूँगा।"

पंडित जी ने कहा, "भास्कर, तू पैसे मत दे। यह बच्चे हैं। ग़रीब। इनके लिए कुछ करना पुण्य है। मैं कुछ नहीं लूँगा।"

आरोही ने पंडित जी के पैर छुए।

"जी, धन्यवाद।"

पंडित जी ने कहा, "बेटी, एक बात। मैंने अपनी कोठरी से थोड़ी सी जगह बच्चों के लिए ख़ाली की। कुछ पुराने कपड़े भी दिए। और मेरी पत्नी उनके लिए खाना बनाएगी।"

आरोही ने कहा, "पंडित जी, हम भी मदद करेंगे।"

पंडित जी ने कहा, "बेटी, नहीं। यह हमारा काम। तुम अपने बड़े काम पर ध्यान दो।"

शीला ने पंडित जी के पैर छुए।

"पंडित जी, आप देवता हैं।"

पंडित जी ने कहा, "बेटी, मैं भी एक पिता हूँ। मेरी बेटी भी थी। बीस साल पहले चली गई। बीमारी से। इसलिए मुझे बच्चों का दर्द पता है।"

पंडित जी की आँखों में आँसू।

आरोही ने पंडित जी का हाथ पकड़ा।

फिर उन्होंने चारों बच्चों को खाना खिलाया। पंडित जी की पत्नी ने आलू-रोटी बनाई। बच्चे बहुत ख़ुशी से खाए। जैसे कई दिनों से भूखे थे।

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रात। धर्मशाला में सब बैठे थे। एक बड़ा कमरा।

आरोही, बाबा, रोहित, रामप्रसाद बाबा, दुर्गा। और चार नए — शीला, मुनिया, मीना, गोलू।

गोलू बहुत बीमार था। बुख़ार। खाँसी।

आरोही ने बाबा से पूछा, "बाबा, गोलू को कुछ दवा दे सकते हैं?"

बाबा ने कहा, "बेटी, मैं देखता हूँ।"

बाबा ने गोलू के माथे पर हाथ रखा। कुछ बुदबुदाया।

गोलू की आँखें भारी हुईं। सो गया।

बाबा ने कहा, "बेटी, कल तक बेहतर हो जाएगा। मंत्र से।"

आरोही ने कहा, "धन्यवाद बाबा।"

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रात के दस बजे। रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, अब हमें दस दिनों की योजना बनानी होगी।"

आरोही ने अपनी नोटबुक खोली।

"बाबा, बताइए।"

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, पहला काम — कालीचरण की हवेली का पूरा नक्शा। हमें अंदर की जगह पता होनी चाहिए। तहख़ाना कहाँ। मुख्य कमरा कहाँ। कालीचरण का बिस्तर कहाँ।"

आरोही ने लिखा।

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "दूसरा — मंत्र की तैयारी। तुम्हें और दुर्गा को कुछ विशेष मंत्र सीखने होंगे। जो कालीचरण की शक्ति को कमज़ोर करेंगे।"

आरोही ने लिखा।

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "तीसरा — गंगा की राख का सही उपयोग। यह कालीचरण की अंगूठी पर डालनी होगी। ठीक उस पल जब उसकी उँगली खुली हो। मुश्किल काम।"

आरोही ने लिखा।

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "चौथा — दुर्गा की तेरहवीं शक्ति को जगाना। यह सबसे मुश्किल। दुर्गा को अपनी शक्ति नहीं मालूम। पर पूर्णिमा की रात तक जगानी होगी।"

आरोही ने लिखा।

दुर्गा ने पूछा, "दीदी, मेरी शक्ति कैसे जगेगी?"

बाबा ने कहा, "दुर्गा, तुझे रोज़ पूजा करनी होगी। हर सुबह और शाम। एक विशेष मंत्र से। और तुझे अपनी बहन गुड़िया की आत्मा से जुड़ना होगा। दस दिनों में तेरी शक्ति जगेगी।"

दुर्गा ने कहा, "बाबा, मैं सब करूँगी।"

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "पाँचवाँ — कालीचरण के अंदर घुसने की योजना। हवेली में कैसे प्रवेश करें। कौन कहाँ रहे। कौन क्या करे।"

आरोही ने कहा, "बाबा, यह मैं और आप मिलकर सोचेंगे।"

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "छठा — गंगा का साथ। पूर्णिमा की रात हम अगर गंगा में डुबकी लगा लें, तो हमारी शक्ति बढ़ेगी। गंगा माँ की। जो कालीचरण की माँ भी थी।"

आरोही ने कहा, "अच्छा।"

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "सातवाँ — एक हवन। पूर्णिमा की दोपहर। जिसमें हम बारह बहनों को बुलाएँगे। तुझे शक्ति देने के लिए।"

आरोही ने कहा, "बाबा, बारह बहनें अब तो शांति में हैं।"

रामप्रसाद बाबा ने कहा, "हाँ। पर पूर्णिमा की रात वे एक क्षण के लिए वापस आ सकती हैं। तुझे मदद करने के लिए।"

आरोही ने कहा, "अच्छा।"

आठवाँ — एक और तांत्रिक की मदद। रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बनारस में एक और है। जो कालीचरण से नफ़रत करता है। उसका नाम — कृष्णानंद। वह हमारी मदद करेगा।"

आरोही ने कहा, "बाबा, धन्यवाद। इतनी योजना।"

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रात के बारह बजे। आरोही और दुर्गा एक साथ बैठीं।

बाबा ने दोनों को एक मंत्र सिखाया।

"ॐ जगदंबे मालती माँ, तेरहवीं की शक्ति दो। बारह बहनों का ख़ून एक साथ जगे। सारे शत्रुओं का नाश हो।"

आरोही और दुर्गा ने मंत्र दस बार पढ़ा।

एक अजीब सी शक्ति दोनों के अंदर उठी।

दुर्गा ने कहा, "दीदी, मुझे अपने अंदर कुछ नया लग रहा है।"

आरोही ने कहा, "दुर्गा, यह तेरी शक्ति। जो जाग रही है।"

बाबा ने कहा, "बेटी, अब सो जाओ। कल फिर मंत्र। और नक्शा बनाना।"

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6 नवंबर 2026। सुबह।

आरोही उठी।

गोलू पूरी तरह ठीक था। बुख़ार गया। खाँसी गई। मुस्कुरा रहा था।

बाबा का मंत्र चला था।

मुनिया गोलू के साथ खेल रही थी। मीना भी।

आरोही ने कहा, "बच्चे, तुम खुश हो?"

मुनिया ने कहा, "दीदी, यह इतना अच्छा घर है। मैंने कभी ऐसा घर नहीं देखा।"

आरोही की आँखों में आँसू।

तीन बच्चे। जो सड़क पर मर सकते थे। आज सुरक्षित।

पर कालीचरण की हवेली में और भी बच्चे थे।

---

दोपहर। आरोही, बाबा, दुर्गा, रामप्रसाद बाबा फिर से हवेली की तरफ़ गए। रोहित को धर्मशाला में छोड़ा। बच्चों की देखभाल के लिए।

आज दिन में हवेली की जाँच।

बाहर से।

हवेली की पिछली तरफ़। खिड़की के पास। जहाँ दुर्गा ने कल पहचानी थी।

बाबा ने कहा, "बेटी, यहाँ से हम कुछ सुन सकते हैं। अगर अंदर हलचल है।"

आरोही ने अपना कान खिड़की के पास लगाया।

कुछ पल तक कुछ नहीं।

फिर एक धीमी सी रोने की आवाज़।

एक बच्ची की।

आरोही की छाती में एक तेज़ दर्द।

"बाबा, अंदर बच्ची रो रही है।"

बाबा ने कहा, "बेटी, कालीचरण उसे बहुत यातना दे रहा होगा। अपनी शक्ति के लिए।"

दुर्गा ने कहा, "दीदी, यह मेरी बेटी है।"

आरोही ने दुर्गा का हाथ पकड़ा।

"दुर्गा, हिम्मत रख।"

दुर्गा की आँखों से आँसू बहने लगे।

पर तभी एक और आवाज़।

एक आदमी की। भारी।

आरोही ने ग़ौर से सुनी।

"रानी, रो मत। तुझे मैं मारने वाला नहीं। अभी नहीं। पर अगर तूने मंत्र नहीं पढ़ा, तो मार दूँगा।"

आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।

कालीचरण।

अंदर था।

अपनी शिकार को मंत्र पढ़ने पर मजबूर कर रहा था।

रानी की धीमी आवाज़।

"चाचा, मुझे नहीं आता।"

कालीचरण की आवाज़।

"तो सीख। नहीं तो..."

एक झन्नाहट। जैसे किसी ने थप्पड़ मारा।

रानी की चीख़।

दुर्गा ने अपने मुँह पर हाथ रखा। रोकने के लिए।

आरोही ने दुर्गा को खींचा।

"चलो। यहाँ से।"

पाँचों दूर हटे।

पर दुर्गा रो रही थी।

आरोही ने कहा, "दुर्गा, हिम्मत। दस दिन। बस।"

---

रात। आरोही सो नहीं पाई।

रानी की चीख़। दुर्गा के आँसू। मुनिया की मासूम मुस्कान।

और कालीचरण की भारी आवाज़।

आरोही ने आँखें बंद कीं।

एक नई शक्ति उठ रही थी उसके अंदर।

एक क्रोध।

पर एक शांति भी।

क्योंकि इस बार वह अकेली नहीं थी।

बाबा। रामप्रसाद बाबा। दुर्गा। रोहित। शीला। मुनिया। मीना। गोलू।

एक बड़ी टीम।

और नौ दिन बाद पूर्णिमा।

तब कालीचरण का अंत।

आरोही ने खिड़की के बाहर देखा।

बनारस की रात। शांत। पर एक अजीब भारीपन।

आरोही ने अपने फ़ोन पर माँ को संदेश भेजा।

**"माँ, सब ठीक है। पूर्णिमा के बाद बात करूँगी। दस दिन।"**

फिर भगवती दादी को भी।

**"दादी, दुआ करना। दस दिन बाद बड़ी लड़ाई।"**

भगवती दादी का जवाब आया।

**"बेटी, मैं रोज़ मीरा की पायल के साथ बैठकर तेरे लिए दुआ करती हूँ। मीरा भी तेरे साथ है।"**

आरोही की आँखों में आँसू।

फिर पार्वती दादी को भी।

**"दादी, रोहित यहाँ है। ठीक है। सब ठीक।"**

पार्वती दादी का जवाब।

**"बेटी, धन्यवाद। मैं यहाँ अकेली हूँ। पर तेरे लिए और मेरे पोते के लिए दुआ करती हूँ।"**

आरोही ने फ़ोन बंद कर दिया।

बहुत सारी दुआएँ। बहुत सारे परिवार।

पर एक राक्षस।

नौ दिन।

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