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भाग 30 : प्रचंडी का अंत और आगे की राह
Piyashi Atma · Psychological Horror · 15 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 30 of 30
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2944
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 30 : प्रचंडी का अंत और आगे की राह
प्रचंडी की हवेली।
अंदर।
आरोही, बाबा, माँ, अंजलि — चार लोग।
सामने — प्रचंडी। और तीन बंधी बच्चियाँ।
रिया। प्रिया। इशिता।
तीनों के गले में हरा धागा। प्रचंडी की अंगूठी से जुड़ा। तीनों की जान अंगूठी में।
प्रचंडी ने अपनी हरी अंगूठी उठाई।
"बेटी, एक क़दम आगे बढ़ी, तो तीनों मरेंगी।"
आरोही रुक गई।
बाबा ने कान में कहा — "बेटी, धैर्य। पहले उसे बात में लगाओ।"
आरोही ने एक साँस ली। फिर आगे बढ़ी। एक क़दम।
प्रचंडी ने कहा, "बेटी, रुक।"
आरोही रुकी। पर उसने प्रचंडी को देखा।
"प्रचंडी, तूने अपने ही जुड़वाँ भाई को मारा। 1888 में।"
प्रचंडी ने चौंककर देखा।
"तू कैसे जानती है?"
आरोही ने कहा, "मेरे दादा ने डायरी लिखी थी। 1958 में। तेरे बारे में।"
प्रचंडी ने कहा, "बेटी, तेरे दादा — कमलेश शर्मा? मैं उन्हें पहचानता हूँ। 1958 में वे यहाँ आए थे। पर मुझे नहीं मिले।"
आरोही ने कहा, "प्रचंडी, तू 141 साल से मार रहा है। जुड़वाँ बच्चियाँ। सैकड़ों।"
प्रचंडी ने कहा, "बेटी, यह मेरी साधना। मेरे गुरु देवीदास ने दी।"
आरोही ने कहा, "प्रचंडी, देवीदास मर चुका। पिछले साल। मैंने मारा।"
प्रचंडी ने चौंककर देखा।
"क्या?"
आरोही ने कहा, "और कालीचरण भी। और रुद्रनाथ भी। सब मरे। तू अकेला। अगला।"
प्रचंडी के चेहरे पर पहली बार डर।
"बेटी, तू झूठ बोल रही है।"
आरोही ने कहा, "प्रचंडी, नहीं। सच।"
बाबा ने आगे बढ़कर कहा, "प्रचंडी, मैं भास्करानंद। रामनाथ बाबा का शिष्य। 145 साल का। मैंने वीरभद्र मारा। भैरवदास मारा। अब तेरी बारी।"
प्रचंडी ने बाबा को देखा।
"भास्करानंद। बहुत बरस पहले सुना था तेरे बारे में। पर तू अब भी ज़िंदा?"
बाबा ने कहा, "हाँ। और तेरे अंत तक ज़िंदा।"
प्रचंडी ने अपनी अंगूठी को कसकर पकड़ा।
फिर उसने एक तेज़ मंत्र पढ़ा।
तीन बच्चियों के गले के धागे तेज़ हुए।
तीनों की चीखें।
अंजलि दौड़ी।
"रिया! प्रिया!"
पर प्रचंडी ने अपनी शक्ति चलाई। अंजलि पीछे गिरी।
आरोही ने अपने तीन ताबीज़ छाती पर लगाए।
फिर अपने बैग से एक चीज़ निकाली।
एक पुरानी छोटी लकड़ी की मूर्ति। जो उसने रत्नपुर से लाई थी। मालती की मूर्ति।
आरोही ने कहा, "मालती दीदी, आपकी मदद।"
मूर्ति गरम हुई।
फिर हवा में एक आकृति। मालती की आत्मा।
प्रचंडी ने चौंककर देखा।
"मालती? यह कौन?"
बाबा ने कहा, "प्रचंडी, तेरे गुरु देवीदास की पहली पत्नी। जिसे उसने बलि दी थी। अब मुक्त। पर एक चेतावनी दे रही।"
मालती ने कहा, "प्रचंडी, मैं तुझे एक बार माफ़ करने आई। अगर तू तीन बच्चियों को छोड़ दे और आत्मसमर्पण कर दे — मैं तुझे शांति दिलाऊँगी। तू मरेगा। पर शांति से।"
प्रचंडी ने हँसा।
"मालती, तू पागल। मैं क्यों समर्पण करूँ?"
मालती ने कहा, "क्योंकि तेरा भाई प्रताप तुझसे मिलना चाहता है।"
प्रचंडी की आँखें फैलीं।
"प्रताप?"
तभी हवा में एक और आकृति। एक आदमी। तीस के आसपास। प्रचंडी जैसा। पर आँखों में शांति।
प्रताप की आत्मा।
139 साल के बाद।
प्रचंडी काँप गया।
पहली बार 145 साल में।
एक तांत्रिक। जिसने सैकड़ों बच्चों को मारा। पर अपने भाई के सामने काँप गया।
प्रचंडी ने अपने भाई को देखा।
"प्रताप... भाई..."
प्रताप ने कहा, "प्रचंड, मेरे भाई। तूने मुझे मारा। 139 साल पहले। मैं तुझसे नाराज़ था। बहुत। पर अब मैं तुझे माफ़ करता हूँ।"
प्रचंडी की आँखों में आँसू।
पहली बार।
"प्रताप, भाई... मुझे माफ़ कर।"
प्रताप ने कहा, "प्रचंड, माफ़ किया। पर अब तेरा अंत। तू मेरे साथ चल। शांति की जगह।"
प्रचंडी ने कहा, "प्रताप, पर मैंने बहुत पाप किए। मैं तेरे साथ नहीं आ सकता।"
प्रताप ने कहा, "भाई, ईश्वर सब को माफ़ करता है। अगर तू सच्चे मन से पछताए।"
प्रचंडी की आँखों से आँसू।
"प्रताप, मुझे बहुत अफ़सोस। मैंने तुझे मारा। तेरी बेटी को छिपाया। उसके परिवार पर श्राप डाला। सब को मारा। मैं क्यों करता रहा?"
प्रताप ने कहा, "भाई, तांत्रिक की शक्ति एक बार मिल जाए, तो छोड़ना मुश्किल। तू एक बुरे रास्ते पर चल पड़ा। पर आज रास्ता बदल।"
प्रचंडी ने कहा, "प्रताप, तेरी बेटी सरस्वती... वह कैसी थी?"
प्रताप ने कहा, "प्रचंड, मेरी बेटी बहुत सुंदर थी। बहुत बुद्धिमान। पर बरसों तक तेरी छाया में जीई। तूने उसकी नानी की सपने में मौतें देखने की शक्ति दी। पर वह उससे डरती रही। मेरे पोतियाँ भी। मेरी परनाती हसीना ने कहा था — 'मेरी शक्ति एक दिन मेरे परिवार की एक लड़की के पास आएगी।' वह इशिता है। यहाँ बंधी। तेरी हवेली में।"
प्रचंडी ने इशिता की तरफ़ देखा।
पहली बार ग़ौर से।
"यह... मेरे भाई की परनाती?"
प्रताप ने कहा, "हाँ प्रचंड। तेरे ख़ुद के ख़ून की। तू अपनी ही परनाती को मारने वाला था।"
प्रचंडी की आँखों में एक अजीब सी छाया।
फिर आँसू।
"प्रताप, भाई। मुझे कहीं ले चल। मैं यह नहीं कर सकता।"
प्रचंडी ने अपनी अंगूठी की तरफ़ देखा।
फिर आरोही की तरफ़।
"बेटी, अंगूठी तोड़ दे। पर पहले धागा तोड़ना। तीनों को बचाना।"
आरोही ने चौंककर देखा।
"तू सचमुच..."
प्रचंडी ने कहा, "हाँ। 139 साल बाद मुझे शांति चाहिए।"
आरोही ने बाबा की तरफ़ देखा।
बाबा ने कहा, "बेटी, मंत्र पढ़। धागा टूट जाएगा।"
आरोही ने मंत्र पढ़ा — जो शिखा ने सिखाया था।
"ॐ जगदंबे मुक्ति दे। बेटियों का बंधन तोड़।"
तीन धागे टूटे।
तीनों बच्चियों की आँखें खुलीं।
रिया और प्रिया रोने लगीं।
अंजलि दौड़ी उनके पास।
तीनों को गले लगाया।
इशिता ने आरोही की तरफ़ देखा।
"दीदी, आप आ गईं।"
आरोही ने कहा, "इशिता, मैं आ गई।"
फिर आरोही ने प्रचंडी की तरफ़ देखा।
प्रचंडी ने अपनी अंगूठी उतारकर आरोही को दी।
"बेटी, तोड़ दे।"
आरोही ने अंगूठी ली।
अपने हाथ में।
फिर ज़मीन पर पटकी।
अंगूठी टूटी।
हरा पत्थर चूर-चूर हुआ।
प्रचंडी का शरीर धीरे-धीरे राख हुआ।
पर उसकी आत्मा।
प्रताप ने पकड़ा।
दोनों जुड़वाँ भाई। एक साथ।
139 साल बाद।
हवा में उठे।
फिर ग़ायब।
मालती की आत्मा भी।
पर मालती ने पहले आरोही से कहा — "बच्ची, तू अपने भाई-बहन को याद रखना। हम सब तेरे साथ।"
फिर वह भी ग़ायब।
हवेली अब ढहने लगी।
बाबा ने कहा, "बेटियों, बाहर!"
आरोही, बाबा, माँ, अंजलि, रिया, प्रिया, इशिता — सात लोग — दौड़े।
बाहर।
कमला आंटी दौड़ती हुई आईं।
"इशिता!"
इशिता ने अपनी माँ को गले लगाया।
"माँ, मैं ज़िंदा हूँ।"
कमला आंटी रोने लगीं।
हवेली ढह गई।
रेगिस्तान में धूल उड़ी।
फिर शांति।
लौटते वक़्त। कार में।
रिया और प्रिया अपनी बहन अंजलि के गोद में। सो रही थीं।
इशिता आरोही के पास।
आरोही ने कहा, "इशिता, तेरे पास शक्ति है। तेरहवीं।"
इशिता ने कहा, "दीदी, हाँ। पर मुझे नहीं सिखाई गई।"
आरोही ने कहा, "इशिता, तुझे मैं सिखाऊँगी। कुछ महीने बाद। जब तू बड़ी हो जाए। सोलह की। तब।"
इशिता ने कहा, "दीदी, धन्यवाद।"
आरोही ने कहा, "इशिता, एक बात। हमें एक आख़िरी शिष्य को मारना है। महाकाल। तमिलनाडु में।"
इशिता ने कहा, "दीदी, मैं आ सकती हूँ?"
आरोही ने कहा, "इशिता, अभी नहीं। तेरी माँ को तेरी ज़रूरत।"
इशिता ने सिर हिलाया।
रात। जयपुर।
अंजलि के घर।
रिया और प्रिया अपनी माँ मंजू आंटी के साथ। हँस रही थीं। पहली बार पिछले हफ़्ते के बाद।
मंजू आंटी ने आरोही के पैर छुए।
"बेटी, तूने मेरा परिवार बचाया।"
आरोही ने कहा, "आंटी, यह मेरा फ़र्ज़।"
अंजलि ने कहा, "बहन, तू मेरी बहन। हमेशा।"
आरोही ने अंजलि को गले लगाया।
अगले दिन। सुबह।
आरोही, बाबा, माँ दिल्ली लौट रहे थे।
ट्रेन में। खिड़की से बाहर देखते हुए।
बाबा ने कहा, "बेटी, अब एक आख़िरी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, महाकाल।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर बहुत मुश्किल। तमिलनाडु दूर। भाषा नहीं आती। और महाकाल सबसे शक्तिशाली शिष्य।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कब जाएँगे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, कुछ महीने। मुझे पहले तमिलनाडु के कुछ लोगों से बात करनी होगी। जो महाकाल के बारे में जानते हों।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप कैसे हैं?"
बाबा ने कहा, "बेटी, थका हुआ। पर एक आख़िरी लड़ाई। फिर मेरा काम पूरा।"
आरोही ने बाबा का हाथ पकड़ा।
"बाबा, आप कहीं नहीं जाएँगे। मुझे आपकी बहुत ज़रूरत।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हम सब को एक दिन जाना है। तुम्हें भी। मुझे भी। पर जब जाएँगे, तो शांति से।"
आरोही की आँखों में आँसू।
दिल्ली पहुँचकर।
आरोही घर पर।
पिताजी और माँ ने गले लगाया।
पिताजी ने कहा, "बेटी, तू ठीक?"
आरोही ने कहा, "जी पिताजी।"
पिताजी ने कहा, "बेटी, अब कब जाएगी?"
आरोही ने कहा, "पिताजी, एक आख़िरी बार। तमिलनाडु।"
पिताजी ने कहा, "बेटी, तेरे दादा भी वहाँ गए थे। एक बार। 1965 में।"
आरोही ने चौंककर देखा।
"पिताजी, दादा तमिलनाडु भी गए?"
पिताजी ने कहा, "बेटी, हाँ। पर वे बीमार पड़ गए। लौट आए। कहा — 'यह लड़ाई मेरी नहीं। कोई और लड़ेगा।'"
आरोही ने कहा, "पिताजी, मुझे उनकी डायरी में लिखा हुआ मिला। सिर्फ़ रुद्रनाथ के बारे में।"
पिताजी ने कहा, "बेटी, दादा की एक और डायरी है। मेरे पास। तमिलनाडु की। मैंने कभी नहीं खोली।"
पिताजी ने अपनी अलमारी से एक पुरानी डायरी निकाली।
आरोही को दी।
रात। आरोही अपने कमरे में।
दादा की तमिलनाडु डायरी खोली।
पहला पन्ना।
"1965 - तमिलनाडु। मेरा गुरु रामनाथ बाबा 1913 में मरे। उन्होंने कहा था — 'कमलेश, अगर तू कोलकाता के बाद तमिलनाडु जा सका, तो अच्छा।' 52 साल बाद मैं आया।"
"1965 - मैंने महाकाल के बारे में सुना है। असली नाम — महाकालेश्वर पिल्लई। 1870 में पैदा। तमिलनाडु के एक ब्राह्मण परिवार से। 1895 में देवीदास से मिला। बड़ी बहनों की बलि की साधना ली।"
आरोही ने आगे पढ़ा।
"1965 - महाकाल की एक बड़ी बहन थी। नाम — मीनाक्षी पिल्लई। 1866 में पैदा। बहुत सुंदर। बहुत बुद्धिमान। पर 1900 में एक अजीब मौत। परिवार ने कहा — 'बीमारी।' पर सच — महाकाल की पहली बलि।"
"1965 - मीनाक्षी की एक बेटी। नाम — यमुना। यमुना की भी बेटी। सब को अजीब सी शक्ति। पर सब मरीं। जल्दी।"
"1965 - मैंने यमुना की पोती को ढूँढ़ा। नाम — कावेरी पिल्लई। मदुरई में। पर वह मुझसे मिलना नहीं चाहती थी। कहा — 'मेरा परिवार बरसों से इस श्राप में। मुझे शांति चाहिए।' मैं लौट आया।"
"1965 - मैं बीमार पड़ गया। मलेरिया। दिल्ली लौटा। दो महीने बिस्तर पर। ठीक होकर सोचा — तमिलनाडु फिर जाऊँगा। पर कभी नहीं जा पाया।"
आरोही ने डायरी बंद कर दी।
तो दादा तमिलनाडु में एक तेरहवीं की वंशज को छोड़कर आए थे।
कावेरी पिल्लई। मदुरई में। 1965 में।
अब वह शायद 80-90 की होगी।
या मर चुकी हो।
पर उसकी वंशज ज़िंदा होगी। शायद।
आरोही ने बाबा को फ़ोन किया।
"बाबा, दादा ने तमिलनाडु के बारे में लिखा। एक पता है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, अच्छा। पर हम अभी नहीं जाएँगे। पहले तैयारी। और तुझे कुछ आराम चाहिए। तीन शिष्य मारे। तू थकी हुई।"
आरोही ने कहा, "बाबा, एक-दो महीने बाद।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ।"
फरवरी 2027।
आरोही ने अपनी नोटबुक निकाली। लिखा —
"मिशन 3 — प्रचंडी — पूरा।
बचाव — रिया, प्रिया, इशिता।
नई सहायक — इशिता। तेरहवीं शक्ति। अजमेर में। पंद्रह साल की।
अगला — महाकाल। तमिलनाडु। मई शायद।
संपर्क — कावेरी पिल्लई की वंशज। मदुरई में।
दादा की डायरी — तमिलनाडु।
मिशन शेष — 1।
बाबा की स्थिति — कमज़ोर। जल्दी।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
मार्च 2027।
आरोही ने अपनी पीएचडी पर काम किया। रत्नपुर की कहानी। लगभग आधी लिख ली थी।
रोहित ने मदद की। इंटरनेट से। और भगवती दादी ने भी। कहानियाँ बताईं। बचपन की। मीरा की। बारह बहनों की।
आरोही ने कहा — "दादी, मेरी पीएचडी आपकी बेटी मीरा को समर्पित।"
भगवती दादी की आँखों में आँसू।
पार्वती दादी ने भी। रोहित ने भी।
दुर्गा और रानी — बनारस में। रामप्रसाद बाबा के साथ। रानी अब स्कूल जाती थी। पहली बार। मुनिया के साथ। दोनों एक साथ। बहनों की तरह। हँसती हुई। खेलती हुई। जैसे पिछले साल कुछ हुआ ही नहीं था।
शीला भी ठीक थी। दवा से टी.बी. ठीक हो रही थी।
गोलू और मीना अनाथालय में — पर पंडित जी हर हफ़्ते जाते थे। कहानियाँ सुनाते थे।
शिखा — कोलकाता में। गीता के साथ। और अब वह उन पंद्रह गर्भवती स्त्रियों की देखभाल करती थीं। एक बड़ा आश्रम बन गया था। पंद्रह में से आठ बच्चे पैदा हो चुके थे। सब स्वस्थ। सब ख़ुश।
अंजलि — जयपुर में। रिया और प्रिया अब स्कूल जाती थीं। बरसों बाद माँ मंजू की आँखों में शांति।
इशिता — अजमेर में। पर आरोही ने उसे रोज़ फ़ोन किया। मंत्र सिखाए। तेरहवीं शक्ति जगाई। इशिता की माँ कमला ने कहा — "बेटी, तू मेरी दूसरी बेटी। इशिता तुझे बहुत मानती है।"
आरोही ने कहा, "आंटी, मेरी भी बहन।"
अप्रैल 2027।
बाबा की तबीयत बिगड़ी।
145 साल की उम्र।
आरोही उनके पास हर दिन जाती। दिल्ली के होटल में।
बाबा एक चारपाई पर लेटे रहते। साँसें कमज़ोर।
एक दिन बाबा ने कहा, "बेटी, मैं जल्दी जा रहा हूँ। तमिलनाडु से पहले।"
आरोही ने कहा, "बाबा, नहीं। आप ठीक होंगे।"
बाबा ने कहा, "बेटी, नहीं। पर सुन। मैंने अपने एक शिष्य को तमिलनाडु भेजा है। मदुरई। तुझे वहाँ मिलेगा। नाम — अरुण। पचास साल का। तमिल जानता है। तेरी मदद करेगा।"
आरोही ने कहा, "बाबा, धन्यवाद।"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक और बात। महाकाल के लिए। उसकी बहन मीनाक्षी की राख। मदुरई के एक पुराने मंदिर में। मैं कावेरी को ढूँढ़ रहा था। पर उसका पता नहीं मिला। तू ढूँढ़ना।"
आरोही ने बाबा का हाथ पकड़ा।
बाबा ने कहा, "बेटी, एक बात कहनी है। तुझसे मिलकर मेरी ज़िंदगी को अर्थ मिला। मैंने 145 साल बहुत सी बुराइयाँ देखीं। बहुत सी अच्छाइयाँ भी। पर तेरे जैसा कोई नहीं मिला। तू सच में मालती की योग्य वंशज।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"बाबा, आप मेरे पिता जैसे।"
बाबा ने कहा, "बेटी, तू मेरी बेटी जैसी। जो मुझे कभी नहीं मिली।"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक और बात। मेरे मरने के बाद, मेरे शरीर को गंगा में डालना। हरिद्वार में। मेरे गुरु रामनाथ बाबा भी वहीं। और देवराज बाबा। और तेरे दादा। सब एक जगह मिलेंगे।"
आरोही ने कहा, "बाबा, वादा।"
15 अप्रैल 2027।
बाबा गए।
शांति से।
आरोही उनके पास थी।
बाबा के आख़िरी शब्द थे — "बेटी, तूने अच्छा किया। महाकाल भी मरेगा। मैं तुझे आशीर्वाद देता हूँ।"
आरोही की आँखों में आँसू।
145 साल।
एक लंबा सफ़र।
बाबा का शरीर हरिद्वार ले जाया गया। गंगा में।
देवराज बाबा और रामनाथ बाबा के साथ। दादा कमलेश के साथ भी।
चारों गुरु।
एक साथ।
मई 2027।
आरोही ने तमिलनाडु जाने की तैयारी की।
अकेली नहीं। इशिता आना चाहती थी। पर आरोही ने रोका।
"इशिता, अभी नहीं। कुछ साल बाद। जब तू तैयार होगी।"
पर एक और सहायक जुड़ी।
दुर्गा।
रानी को शिखा के आश्रम में रखा। सुरक्षित।
दुर्गा ने कहा, "दीदी, अब मैं आपकी मदद करूँगी। बाबा नहीं। पर मैं तेरहवीं शक्ति की।"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, धन्यवाद।"
जून 2027। मदुरई।
आरोही और दुर्गा मदुरई पहुँचीं। बाबा के शिष्य अरुण के साथ।
अरुण ने कहा, "बेटी, कावेरी पिल्लई अब मर चुकीं। पर उनकी पोती ज़िंदा है। नाम — तारा। तीस साल की। मदुरई के एक कॉलेज में टीचर।"
आरोही ने कहा, "अरुण जी, हमें तारा से मिलना है।"
अरुण ने कहा, "बेटी, पहले मिनाक्षी मंदिर। वहाँ मीनाक्षी की राख है। एक पुजारी के पास।"
आरोही ने सिर हिलाया।
मदुरई का मीनाक्षी मंदिर।
बहुत बड़ा। बहुत पुराना।
अरुण ने आरोही और दुर्गा को मंदिर के पीछे ले जाया।
एक बुज़ुर्ग पुजारी। नब्बे साल के।
अरुण ने तमिल में बात की।
पुजारी ने चौंककर आरोही को देखा।
फिर अंदर गया।
एक पुराना कलश निकाला।
आरोही को दिया।
अरुण ने अनुवाद किया।
"बेटी, यह मीनाक्षी की राख। 1900 में मरी। मेरे पूर्वजों ने बचाई। हमने बरसों से इंतज़ार किया।"
आरोही ने कलश लिया।
अब चौथी बलि की माँ की राख।
बहनों की माँ नहीं। बहन की।
अगले दिन। तारा से मुलाक़ात।
तारा ने चौंककर देखा।
"आप कौन?"
आरोही ने कहा, "मैं आरोही। दिल्ली से। मुझे तेरी मदद चाहिए।"
तारा ने सुनी। सब।
फिर कहा, "बहन, मेरा परिवार बरसों से इस श्राप में। मेरी नानी। मेरी माँ। सब मरीं। मैं अकेली बची। मुझे भी शक्ति है। पर मैंने कभी नहीं जगाई।"
आरोही ने कहा, "तारा, आज जगाओ।"
तारा ने कहा, "बहन, ठीक है।"
महाकाल की खोज शुरू।
आरोही। दुर्गा। तारा। और अरुण।
चार लोग।
महाकाल तमिलनाडु में कहीं। पर कहाँ, पता नहीं।
एक लंबी खोज शुरू।
पर आरोही अब अकेली नहीं।
बाबा नहीं थे। पर उन्होंने बहुत कुछ छोड़ा था।
तीन तेरहवीं।
एक पुराना शिष्य।
और आरोही की अपनी शक्ति।
पाँचवाँ शिष्य महाकाल।
फिर अंत।
पर आरोही जानती थी।
यह अंत नहीं।
देवीदास संहिता में सात शिष्य थे। पर शायद उनके भी शिष्य होंगे। शायद अगली पीढ़ी।
अंधकार कभी पूरा नहीं मरता।
पर रोशनी भी कभी नहीं।
आरोही ने अपने तीन ताबीज़ छाती से लगाए।
फिर सोचा — बाबा भास्करानंद अब नहीं। पर वे उसके साथ। हर पल। जैसे नानी थीं। जैसे देवराज बाबा थे। जैसे दादा कमलेश थे। जैसे मालती थीं।
एक पूरी सेना।
आरोही अकेली नहीं।
कभी नहीं।
आरोही ने अपनी नोटबुक निकाली। एक आख़िरी पंक्ति लिखी —
"तेरहवीं की कहानी — अभी बाक़ी। हर पीढ़ी में एक आएगी। मैं थी। इशिता होगी। और उसके बाद कोई और।"
"पर एक बात — जब तक हम हैं, अंधकार नहीं जीतेगा।"
"बाबा भास्करानंद के नाम — यह मेरा वचन। मैं महाकाल को भी मारूँगी। आपके नाम पर।"
"मालती दीदी के नाम — यह मेरा वचन। मैं आपके ख़ून को शांति दिलाऊँगी।"
"मेरी बारह बहनों के नाम — यह मेरा वचन। आपकी मौत बेकार नहीं गई।"
"रुक्मिणी, तुलसी, लक्ष्मी, कौशल्या, पार्वती, कमला, राधा, चंपा, जानकी, सुनीता, रोहिणी, मीरा — मैं आपको नहीं भूलूँगी। कभी।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
बाहर मदुरई की रात।
पर आरोही के अंदर एक शांति।
लड़ाई जारी।
पर वह अब जानती थी — कैसे लड़ना है।
और उसके साथ बहुत से लोग।
बहुत सी आत्माएँ।
बहुत सी बहनें।
तेरहवीं। और तेरहवीं। और तेरहवीं।
एक ज़ंजीर। जो कभी नहीं टूटेगी।
आरोही ने खिड़की के बाहर देखा।
चाँद।
अगले महीने अमावस।
महाकाल की रात।
पर आज पूर्णिमा।
आरोही की रात।
तेरहवीं की रात।
(भाग 30 समाप्त।
"तेरहवीं अमावस" — पहला सीज़न समाप्त।)
(अगला सीज़न — "तेरहवीं की वापसी" — जल्दी।)
कहानी लिखी गई — प्रीतिका हॉरर चैनल के लिए।
हर उस लड़की के नाम — जिसे कभी अपनी शक्ति पर विश्वास नहीं था।
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