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भाग 29 : जयपुर की जुड़वाँ बहनें

Piyashi Atma · Psychological Horror · 15 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
29 of 29
Category
Psychological Horror
Reading time
15 min
Words
2993
Language
Hindi (हिंदी)
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तेरहवीं अमावस
भाग 29 : जयपुर की जुड़वाँ बहनें
25 जनवरी 2027। जयपुर।
आरोही, माँ, और भास्करानंद बाबा जयपुर पहुँचे। सुबह की ट्रेन से। दिल्ली से जयपुर — पाँच घंटे।
ट्रेन में आरोही ने बाबा से पूछा — "बाबा, प्रचंडी के बारे में बताइए।"
बाबा ने कहा, "बेटी, प्रचंडी सबसे अजीब शिष्य। वह अपनी बलि दो बार लेता है। एक जुड़वाँ बच्ची। और उसका जुड़वाँ भाई या बहन। दोनों एक साथ।"
आरोही ने कहा, "बाबा, तो एक बार में दो बच्चे मरते हैं।"
बाबा ने कहा, "हाँ। और यह हर 13 साल पर एक बड़ी बलि। पर छोटी बलियाँ भी हर कुछ महीने में।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कितने मरे होंगे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, अनगिनत। मुझे पता नहीं। पर 141 साल में शायद 300।"
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
तीन सौ जुड़वाँ बच्चियाँ। सिर्फ़ प्रचंडी की।
जयपुर स्टेशन। धूप। हवा में रेत की गंध। सर्दियों की जयपुर की सुबह — पर अभी भी उतनी ठंडी नहीं जितनी दिल्ली की।
एक जवान महिला उनका इंतज़ार कर रही थी।
तीस के आसपास। सफ़ेद सूट। आँखों में चिंता। बालों में तेज़ी से उगते सफ़ेद बाल — शायद पिछले हफ़्ते की चिंता से।
अंजलि।
आरोही ने कहा, "अंजलि जी?"
अंजलि ने आरोही को गले लगाया।
"बहन, धन्यवाद। आप आ गईं।"
अंजलि ने माँ और बाबा को नमस्कार किया।
"चलिए, मेरे घर।"
चारों टैक्सी में बैठे।
रास्ते में अंजलि ने बताया।
"बहन, मेरी जुड़वाँ बहनें — रिया और प्रिया। दोनों छह साल की। पिछले हफ़्ते ग़ायब हो गईं। स्कूल जाते वक़्त। मेरी माँ के सामने से। एक अजनबी आदमी। लंबा। काले कपड़े। अपने साथ ले गया।"
आरोही ने कहा, "अंजलि जी, वह आदमी कैसा दिखता था?"
अंजलि ने कहा, "मेरी माँ ने बताया — बहुत लंबा। काला। बड़ी दाढ़ी। हाथ में एक अंगूठी। हरे पत्थर की।"
आरोही ने बाबा की तरफ़ देखा।
बाबा ने कहा, "बेटी, यह प्रचंडी है। हरा पत्थर उसकी अंगूठी। हर शिष्य का पत्थर अलग रंग। देवीदास लाल। कालीचरण लाल। दुर्जन लाल। रुद्रनाथ नीला। प्रचंडी हरा। महाकाल का — मुझे नहीं पता।"
अंजलि ने कहा, "बाबा, आप कौन?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मैं भास्करानंद। 145 साल का तांत्रिक।"
अंजलि की आँखें फैलीं।
"क्या?"
बाबा ने कहा, "बेटी, हैरान मत हो। मेरे साथ चलो।"
अंजलि का घर। एक पुरानी हवेली। जयपुर के पुराने हिस्से में।
अंदर एक बुज़ुर्ग महिला। अंजलि की माँ। साठ के आसपास। पर आँखों में गहरा दुख।
अंजलि ने कहा, "माँ, यह आरोही जी।"
माँ ने आरोही के पैर छुए।
"बेटी, मेरी बेटियों को बचा लीजिए।"
आरोही ने माँ को उठाया।
"आंटी, हम कोशिश करेंगे।"
आंटी का नाम मंजू। पूर्व में एक स्कूल टीचर। अब रिटायर्ड। पर बहुत बुद्धिमान।
आरोही ने पूछा, "आंटी, आप को बच्चियों के अपहरण के बारे में क्या पता है?"
मंजू आंटी ने कहा, "बेटी, कुछ नहीं। पर एक बात। मेरी दादी हमेशा एक कहानी सुनाती थीं। हमारे परिवार में एक श्राप है। हर पचास-सौ साल में जुड़वाँ बच्चे मरते हैं। मेरी दादी की बहनें भी जुड़वाँ थीं। दोनों बचपन में मरीं। मेरी दादी ने कहा — 'यह श्राप है।' मुझे लगा — बकवास। पर अब..."
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
"आंटी, आप के परिवार में यह श्राप बरसों से।"
मंजू आंटी ने कहा, "बेटी, हाँ। मेरी दादी की माँ की बहनें भी। सब जुड़वाँ। सब बच्ची में मरीं। बरसों पहले। मेरी दादी की जुड़वाँ बहनें — कमला और विमला — 1938 में मरीं। छह साल की उम्र में। एक ही दिन। रहस्यमय। कोई बीमारी नहीं। पर सुबह दोनों मरी मिलीं।"
आरोही ने कहा, "आंटी, यह भी प्रचंडी।"
मंजू आंटी ने कहा, "बेटी, फिर मेरी माँ ने जुड़वाँ बच्चियाँ नहीं जनी। दो बहनें अकेली। मैं और कमला। अलग-अलग साल की।"
आरोही ने कहा, "आंटी, फिर आपको भी नहीं।"
मंजू आंटी ने कहा, "बेटी, हाँ। पर मेरी बड़ी बेटी — अंजलि — के बाद, मुझे अचानक जुड़वाँ हुईं। दस साल बाद। मैंने कभी नहीं सोचा था।"
आरोही ने कहा, "आंटी, यह प्रचंडी की चाल। हर पीढ़ी में एक बार जुड़वाँ लाना। बलि के लिए।"
मंजू आंटी की आँखों में आँसू।
अंजलि ने कहा, "आरोही जी, हम क्या करें?"
बाबा ने कहा, "बेटी मंजू, यह प्रचंडी का काम। 141 साल से आपके परिवार में। शायद और भी।"
मंजू आंटी की आँखों में आँसू।
अंजलि ने कहा, "आरोही जी, हम क्या करें?"
आरोही ने कहा, "अंजलि, पहले हमें एक बात जाननी होगी। आप के परिवार में — पिछले सौ साल में — जुड़वाँ बच्चों के जन्म के अलावा — क्या कोई ऐसी लड़की या महिला हुई जिसकी अजीब सी शक्ति हो? जो कुछ देख सकती हो? कुछ जान सकती हो?"
मंजू आंटी ने कुछ सोचा।
फिर बोलीं — "बेटी, एक बात है। मेरी नानी। वे सपने में लोगों की मौत देखती थीं। कहती थीं — 'फ़लाँ आदमी मरेगा।' और वह मर जाता। सब उन्हें डायन कहते थे। पर वे साधारण थीं। पर उन्होंने एक बार कहा था — 'मंजू, मेरी शक्ति एक दिन तुम्हारे परिवार की एक लड़की के पास आएगी।'"
आरोही ने कहा, "आंटी, तो शायद अंजलि..."
मंजू आंटी ने कहा, "अंजलि नहीं। कोई और।"
आरोही ने पूछा, "और कौन?"
मंजू आंटी ने कहा, "बेटी, मुझे नहीं पता।"
दोपहर। आरोही और बाबा घर के पीछे बरामदे में।
बाबा ने कहा, "बेटी, हमें प्रचंडी को ढूँढ़ना होगा। पर पहले तेरहवीं शक्ति। अंजलि नहीं। तो कौन?"
आरोही ने कहा, "बाबा, मंजू आंटी के परिवार में और कोई?"
बाबा ने कहा, "पूछते हैं।"
दोनों वापस अंदर।
मंजू आंटी से पूछा।
मंजू आंटी ने कहा, "बेटी, मेरी दो बहनें हैं। एक बड़ी। जयपुर में। एक छोटी। अजमेर में। और मेरी दो बेटियाँ। बड़ी — अंजलि। छोटी — रिया और प्रिया। मेरी बहन की बेटियाँ भी। कई।"
आरोही ने पूछा, "आपकी बहनों की बेटियाँ — कोई अजीब शक्ति?"
मंजू आंटी ने कहा, "एक है। मेरी छोटी बहन की बेटी। अजमेर में। इशिता। पंद्रह साल की। पर बहुत अजीब। बचपन से। कहती है — 'मुझे बहुत लोग दिखते हैं। जो मर चुके।' उसकी माँ बहुत परेशान। डॉक्टरों को ले गई। पर कुछ नहीं मिला।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"आंटी, हम इशिता से मिलेंगे।"
मंजू आंटी ने कहा, "बेटी, आज ही जाओ। अजमेर पास है। दो घंटे।"
शाम के चार बजे। आरोही, बाबा, माँ, और अंजलि अजमेर पहुँचे।
मंजू आंटी की छोटी बहन — कमला आंटी — का घर।
एक पुराना घर। लेकिन गर्म।
कमला आंटी ने चौंककर देखा।
"अंजलि! तू यहाँ?"
अंजलि ने कहा, "मौसी, यह आरोही जी। दिल्ली से। मेरी बहनों को ढूँढ़ने में मदद करेंगी।"
कमला आंटी ने सिर हिलाया।
फिर आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, आप जादूगर?"
आरोही ने कहा, "आंटी, नहीं। पर मुझे कुछ शक्ति मिली है। और मुझे इशिता से मिलना है।"
कमला आंटी की आँखों में एक अजीब सी छाया।
"बेटी, इशिता... वह बहुत परेशान है। मैंने आपको फ़ोन में नहीं बताया। पर..."
अंजलि ने पूछा, "मौसी, क्या हुआ?"
कमला आंटी ने रोना शुरू किया।
"बेटी, इशिता कल रात से ग़ायब है। मैंने पुलिस में शिकायत की। पर..."
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"आंटी, क्या हुआ था?"
कमला आंटी ने कहा, "बेटी, इशिता ने कल शाम कहा — 'माँ, मुझे एक बूढ़ा आदमी दिख रहा है। बरसों से। पर आज उसने बात की। कहा — मेरी दो और छोटी बहनें मरने वाली हैं। मुझे उन्हें बचाने जाना होगा।' मैंने रोका। कहा — 'बेटी, तू पागल नहीं। मत जा।' पर वह रात को भाग गई। मैंने सुबह देखा।"
आरोही ने कहा, "आंटी, इशिता कहाँ गई?"
कमला आंटी ने कहा, "बेटी, मुझे नहीं पता। पर एक चीज़ छोड़ी।"
कमला आंटी ने एक कागज़ निकाला।
आरोही ने पढ़ा।
"माँ, मुझे जाना है। एक बूढ़ा आदमी दिख रहा है। कहता है — रिया और प्रिया ख़तरे में। मैं उन्हें बचाऊँगी। मुझे मत ढूँढ़ो। मैं ठीक हूँ। — इशिता।"
आरोही ने बाबा की तरफ़ देखा।
बाबा ने कहा, "बेटी, इशिता के पास तेरहवीं शक्ति है। वह अकेली नहीं जा सकती। प्रचंडी उसे भी मारेगा।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हमें उसे ढूँढ़ना होगा।"
अंजलि ने कहा, "आरोही जी, इशिता को दिखने वाला बूढ़ा आदमी..."
बाबा ने कहा, "बेटी, वह बूढ़ा आदमी असली था। कोई सहायक आत्मा। शायद प्रचंडी का जुड़वाँ भाई। जो 1888 में मरा।"
आरोही ने चौंककर कहा, "बाबा, प्रचंडी का जुड़वाँ भाई?"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह मुझे कल की डायरी में पढ़ना है। तेरे दादा ने शायद कुछ लिखा हो।"
रात। कमला आंटी के घर।
आरोही ने अंजलि से पूछा, "अंजलि, प्रचंडी कहाँ हो सकता है?"
अंजलि ने कहा, "बहन, मुझे नहीं पता।"
बाबा ने कहा, "बेटी, प्रचंडी राजस्थान में है। पर कहाँ, नहीं पता। मुझे 1975 में एक बार सुराग मिला था — वह पुष्कर के पास एक पुरानी हवेली में रहता है। पर तब भी नहीं पहुँच पाया।"
आरोही ने कहा, "पुष्कर।"
बाबा ने कहा, "हाँ। पुष्कर मंदिरों की नगरी। बहुत पुराना। बहुत सी तांत्रिक वहाँ थे। और आज भी हैं।"
आरोही ने कहा, "तो कल पुष्कर।"
बाबा ने कहा, "हाँ बेटी।"
रात के बारह बजे।
आरोही अपने कमरे में। सो नहीं पा रही थी।
रिया, प्रिया — छह साल की जुड़वाँ। कहीं क़ैद।
इशिता — पंद्रह साल की। अकेली। ख़तरे में।
आरोही ने अपने तीन ताबीज़ छाती से लगाए।
फिर सोचा।
पिछले शिष्यों में हर एक की मौत उसकी अपनी माँ / बहन / पत्नी की आत्मा से हुई।
प्रचंडी। उसकी माँ या बहन कौन?
आरोही ने बाबा से पूछा था।
बाबा ने कहा — "बेटी, मुझे नहीं पता।"
तो हमें ढूँढ़ना होगा।
आरोही ने माँ को देखा। माँ भी नहीं सो पा रही थीं।
माँ ने कहा, "बेटी, सोच रही हूँ। तुझे रत्नपुर की याद आ रही?"
आरोही ने कहा, "हाँ माँ। कल रात मीरा दिखी थी सपने में। कह रही थी — 'दीदी, तेरे साथ हूँ।'"
माँ ने कहा, "बेटी, वे सब तेरे साथ। हर पल।"
आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।
फिर आरोही ने अपनी दादा की डायरी निकाली। जो साथ में लाई थी।
पन्ने पलटे।
एक जगह — 1958 में लिखा।
"मुझे प्रचंडी के बारे में कुछ पता चला। असली नाम — प्रचंड सिंह। जोधपुर के एक ठाकुर परिवार से। 1860 में पैदा हुआ। 1886 में देवीदास से मिला। जुड़वाँ बच्चों की बलि की साधना ली। उसके पिता — ठाकुर उदय सिंह — ने उसे बचपन में एक बुरा तंत्र सिखाया। प्रचंड का एक बड़ा भाई था — प्रताप सिंह। दोनों जुड़वाँ थे। पर जब प्रचंड ने तांत्रिक बनना शुरू किया, प्रताप ने मना किया। प्रचंड ने अपने भाई को मार दिया। 1888 में। यह पहली बलि थी।"
आरोही की आँखें फैलीं।
तो प्रचंडी का जुड़वाँ भाई प्रताप था। जिसे उसने ख़ुद मारा।
पहला जुड़वाँ बच्चा जो उसने मारा — उसका ख़ुद का भाई।
आरोही ने आगे पढ़ा।
"1959 - प्रचंड के जुड़वाँ भाई प्रताप की भी एक बेटी थी। जिसे प्रताप ने मरने से पहले छिपा दिया। कहा — 'मेरे भाई से बचाना।' प्रताप की बेटी बड़ी हुई। शादी की। बच्चे हुए। एक श्राप के साथ। हर पीढ़ी में एक लड़की — तांत्रिक शक्ति की।"
"1960 - मैंने प्रताप की बेटी को ढूँढ़ा। नाम — सरस्वती। जयपुर में। बहुत डरी। उसने कहा — 'मुझे मेरा चाचा प्रचंड नहीं चाहिए। मुझे मेरे परिवार को शांति से जीने दो।' मैंने कहा — 'बहन, पर तेरी शक्ति...' उसने कहा — 'बंद रखो। मेरी बेटियों को छूने मत दो।'"
"1961 - सरस्वती की एक बेटी थी। हसीना। उसे कुछ थोड़ी शक्ति। पर उसने भी छिपाया। मैं दिल्ली लौटा। सोचा — शायद एक दिन कोई और परिवार का इसे जगाएगा।"
आरोही ने कहा, "बाबा को दिखाना है।"
आरोही ने बाबा के कमरे में जाकर डायरी दिखाई।
बाबा ने पढ़ा।
फिर कहा, "बेटी, तो प्रताप की वंशज — शायद अंजलि का परिवार।"
आरोही ने कहा, "क्या?"
बाबा ने कहा, "बेटी, सोच। मंजू आंटी की नानी की सपने में मौतें देखने की शक्ति। इशिता की मरे लोगों को देखने की शक्ति। यह प्रताप की शक्ति। और इशिता — शायद तेरहवीं शक्ति की मालिक।"
आरोही ने कहा, "बाबा, और मंजू आंटी की नानी का नाम?"
बाबा ने कहा, "बेटी, सोच लो।"
आरोही ने मंजू आंटी के पास जाकर पूछा — "आंटी, आप की नानी का नाम?"
मंजू आंटी ने कहा, "बेटी, हसीना। पर हमारे परिवार में लोग हसा कहते थे।"
आरोही ने बाबा की तरफ़ देखा।
बाबा ने सिर हिलाया।
तो सचमुच।
अंजलि का परिवार — प्रताप की वंशज।
प्रचंडी का ख़ुद का परिवार।
आरोही ने कहा, "बाबा, तो प्रचंडी अपने ही परिवार को मार रहा है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। और हर 13 साल पर जुड़वाँ बच्चे। रिया और प्रिया अगली।"
आरोही ने कहा, "और इशिता — जो अभी अकेली जा रही है — प्रचंडी की जुड़वाँ भाई की वंशज।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। और शायद प्रचंडी को यह भी पता। इसीलिए वह पुष्कर में तैयार बैठा है। इशिता आएगी। रिया और प्रिया पास में। तीनों को एक साथ मारने का प्लान।"
आरोही ने कहा, "तो हमें अभी जाना होगा।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। कल सुबह।"
26 जनवरी। सुबह चार बजे।
आरोही, बाबा, माँ, अंजलि, और कमला आंटी — पाँच लोग — कार से पुष्कर की तरफ़।
कार में सब चुप। बहुत सुबह। और भारी माहौल।
अंजलि गाड़ी चला रही थी। कमला आंटी अगल में। पीछे आरोही, माँ, बाबा।
रास्ते में सूरज उगा। रेगिस्तान की रौशनी। नारंगी। लाल। फिर पीली।
आरोही ने कहा, "अंजलि, इशिता कैसे बच्ची है?"
अंजलि ने कहा, "बहन, वह बहुत मासूम। पर बहुत गहरी। बचपन से मुझे बताती थी — 'दीदी, मुझे कुछ दिखता है।' मैंने कभी नहीं माना। मुझे बहुत अफ़सोस।"
आरोही ने कहा, "अंजलि, चिंता मत कर। हम उसे बचाएँगे।"
कमला आंटी ने कहा, "बेटी, इशिता मेरी इकलौती बेटी। मेरा पति दस साल पहले मर गया। तब से मैं और इशिता। अगर उसे कुछ हुआ..."
आरोही ने कहा, "आंटी, कुछ नहीं होगा।"
बाबा ने कहा, "आंटी, एक बात। जब हम प्रचंडी को मारेंगे — शायद उसका जुड़वाँ भाई प्रताप की आत्मा भी आएगी। जैसे कालीचरण के लिए उसकी माँ आई। रुद्रनाथ के लिए उसकी बहन आई। हर शिष्य के अंत में उसके परिवार का ख़ून चाहिए।"
अंजलि ने कहा, "बाबा, तो हम प्रताप की वंशज हैं। हम भी उसके ख़ून हैं।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर हम इंसान हैं। हमें आत्मा नहीं। प्रताप की आत्मा ख़ुद आएगी। शायद।"
आरोही ने कहा, "बाबा, अगर नहीं आई तो?"
बाबा ने कहा, "बेटी, तब हमें प्रताप को बुलाना होगा। तंत्र से। एक विशेष मंत्र है। जो मैं जानता हूँ।"
आरोही ने कहा, "बाबा, अच्छा।"
पुष्कर एक छोटा शहर। मंदिरों की नगरी। एक बड़ा तालाब। जिसके चारों तरफ़ घाट। सुबह की धूप। सफ़ेद मंदिर। पीली दीवारें।
पुष्कर में ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर। बहुत पवित्र। पर बरसों से यहाँ तांत्रिक भी रहे।
बाबा ने कहा, "बेटी, यहाँ ब्रह्मा जी का मंदिर है। हमें पहले वहाँ जाकर आशीर्वाद लेना चाहिए।"
पाँच लोग ब्रह्मा मंदिर पहुँचे।
अंदर पूजा की। ब्रह्मा जी के सामने हाथ जोड़े।
आरोही ने कहा, "ब्रह्मा जी, मुझे शक्ति दीजिए। तीन जुड़वाँ जीवन बचाने के लिए। और एक बच्ची इशिता की।"
फिर पाँचों बाहर आए।
पर पुष्कर के बाहर की तरफ़ — एक पुरानी हवेली। जो लगभग ग़ायब सी।
बाबा ने कहा, "बेटी, वहाँ।"
आरोही ने ग़ौर से देखा।
पहले कुछ नहीं दिखा। बस रेगिस्तान।
फिर उसने अपने तीन ताबीज़ छाती पर लगाए।
हवेली दिखी।
पीली मिट्टी की। बहुत पुरानी। शायद 200 साल। ऊँची दीवारें। एक बड़ा दरवाज़ा। खिड़कियाँ छोटी।
चारों तरफ़ रेगिस्तान। कोई घर नहीं। कोई पेड़ नहीं। बस एक ऊँट कहीं दूर।
अलग-थलग।
बाबा ने कहा, "बेटी, यह प्रचंडी की हवेली।"
अंजलि ने कहा, "बहन, मुझे भी दिख रही है। पर धुँधली।"
बाबा ने कहा, "बेटी अंजलि, तू भी अंजलि तू भी परिवार से। थोड़ी शक्ति तेरे पास भी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, अंदर घुसना होगा।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर सावधान। इशिता शायद पहले पहुँच चुकी। और अगर प्रचंडी ने उसे पकड़ लिया, तो..."
आरोही ने कहा, "बाबा, चलिए।"
पाँच लोग हवेली की तरफ़।
पर दरवाज़े पर एक निशान।
एक त्रिकोण। बीच में एक जुड़वाँ चेहरा।
प्रचंडी का चिह्न।
आरोही ने चौंककर देखा।
"बाबा, यह..."
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। जुड़वाँ का चिह्न। एक चेहरा जो दो में बँटा।"
आरोही ने अपने बैग से छुरी निकाली।
अंजलि ने कहा, "बहन, मुझे भी कुछ दो।"
आरोही ने अंजलि को एक ताबीज़ दिया — जो उसने रामप्रसाद बाबा से लिया था।
"अंजलि, यह पहन। तेरी रक्षा।"
अंजलि ने पहना।
कमला आंटी ने कहा, "बेटी, मैं भी अंदर आऊँगी। मेरी बेटी इशिता वहाँ।"
बाबा ने कहा, "आंटी, आप बाहर रहिए। अगर हम भागे, तो आप हमें ले जाइए।"
कमला आंटी ने सिर हिलाया।
माँ ने कहा, "बेटी, मैं तेरे साथ।"
आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।
"माँ, हिम्मत।"
चारों — आरोही, बाबा, माँ, अंजलि — दरवाज़े की तरफ़।
बाबा ने मंत्र पढ़ा।
दरवाज़ा खुला। लकड़ी की एक ज़ोरदार आवाज़। जैसे कोई बुज़ुर्ग साँस।
अंदर अँधेरा।
चारों घुसे। पहले बाबा। फिर आरोही। फिर माँ। फिर अंजलि।
अंदर एक अजीब सी गंध। बंद कमरे की। धुँए की। और कुछ और।
खून की।
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
खून की गंध।
बच्चियों की।
पर तभी हवेली के अंदर की रोशनी जल गई। ख़ुद ब ख़ुद।
नीली रोशनी।
आरोही ने ग़ौर से देखा।
अंदर एक बड़ा हॉल।
बीच में एक ऊँची चौकी। उस पर बैठा एक आदमी।
तीस के आसपास दिख रहा था। पर आँखें बहुत पुरानी। हरी। प्रचंडी।
काला कुर्ता। लंबा। बालों में सफ़ेदी। पर चेहरे पर जवानी।
और उसके पास...
तीन बच्चियाँ।
रिया। प्रिया। और इशिता।
तीनों बंधी थीं।
तीनों की आँखों में शून्यता।
पर एक बात अजीब।
तीनों के गले में एक ही रंग का धागा। हरा।
आरोही ने ग़ौर से देखा।
धागा प्रचंडी की अंगूठी से जुड़ा था।
तीनों बच्चियों की जान अंगूठी से बंधी।
बाबा ने कहा, "बेटी, ग़ौर से। अगर अंगूठी टूटी, तो तीनों की जान..."
आरोही ने कहा, "बाबा, तो कैसे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, पहले धागा तोड़ना होगा। अंगूठी को छूने से पहले।"
प्रचंडी ने आरोही को देखा।
"आ गईं तेरहवीं। मैं इंतज़ार में था।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
तो प्रचंडी को पता था।
प्रचंडी ने कहा, "बेटी, तू सोच रही है — इशिता को कैसे बचाऊँ? रिया, प्रिया को कैसे बचाऊँ? पर एक बात। मेरी अंगूठी मेरा नाम नहीं। मेरे भाई का नाम है। प्रताप। मेरा जुड़वाँ भाई। जिसे मैंने 1888 में मारा। उसका नाम मेरी अंगूठी में। और उसकी शक्ति से मेरी शक्ति।"
आरोही ने चौंककर देखा।
तो प्रचंडी की अंगूठी में उसके भाई का नाम।
जिसे उसने मारा।
पर उसका बदला भाई ही ले सकता है।
(भाग 29 समाप्त। भाग 30 में जारी...)

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