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भाग 28 : रुद्रनाथ का अंत

Piyashi Atma · Psychological Horror · 13 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
28 of 29
Category
Psychological Horror
Reading time
13 min
Words
2483
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 28 : रुद्रनाथ का अंत
रुद्रनाथ ने अपनी नीली आँखें उठाईं। तीनों को देखा।
"शिखा। तू आ गई। अपनी दीदी से मिलने। पर यह लोग कौन?"
शिखा ने कहा, "रुद्रनाथ, आज तेरा अंत।"
रुद्रनाथ हँसा। एक भारी हँसी।
"बेटी, तू सोचती है — तेरी शक्ति मेरे बराबर? मैं तेरी नानी का भाई हूँ। मेरे पास 145 साल का अनुभव। और तेरे पास?"
शिखा ने कहा, "मेरे पास मेरी नानी की चूड़ी।"
रुद्रनाथ की आँखें फैलीं।
पहली बार डर।
"नहीं। वह चूड़ी मैंने जला दी थी। 1950 में। राधा के मरने के बाद।"
शिखा ने कहा, "नहीं रुद्रनाथ। मेरी नानी ने तुझे धोखा दिया। असली चूड़ी बचाई। मुझ तक पहुँची।"
रुद्रनाथ ने अपनी अंगूठी की तरफ़ देखा। नीला पत्थर हल्का हो रहा था। शक्ति कम।
पर वह हारा नहीं।
फिर उसने अपने शिष्यों को इशारा किया।
"मारो! सब को!"
पाँच शिष्य उठे। हाथ में तलवारें। लंबी। पुरानी। उनके चेहरे भी अजीब। जैसे वे भी तंत्र-मंत्र से बंधे थे। इंसान नहीं। कुछ और।
आरोही ने अपनी छुरी निकाली। जो देवीदास के तहख़ाने से लाई थी।
बाबा ने अपने हाथ हवा में उठाए।
एक तेज़ नीली रोशनी।
पहला शिष्य पीछे गिरा। जमीन पर।
दूसरा भागा।
बाकी तीन ने आरोही की तरफ़ हमला किया।
आरोही ने ताबीज़ छाती पर लगाया। एक मंत्र पढ़ा।
"ॐ मालती माँ, मेरी रक्षा।"
एक तेज़ पीली रोशनी आरोही के चारों तरफ़।
तीन शिष्य पीछे गिरे।
पर तभी।
रुद्रनाथ ने अपनी शक्ति चलाई।
गर्भवती स्त्रियाँ खड़ी हुईं। सब की आँखों में अजीब सी शून्यता। जैसे मंत्रों से बंधी। न इंसान न भूत।
रुद्रनाथ ने कहा, "आ जाओ। मेरी बहनों। इन तीन को मारो।"
पंद्रह स्त्रियाँ आरोही की तरफ़ बढ़ीं।
पर धीमे-धीमे। जैसे ख़ुद नहीं आना चाहतीं।
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"शिखा दीदी, इन्हें कैसे रोकें? हम इन्हें मार नहीं सकते।"
शिखा ने कहा, "बेटी, इन्हें मारना नहीं। ये मंत्रों से बंधी हैं। इनका बंधन तोड़ना होगा।"
शिखा ने एक तेज़ मंत्र पढ़ा।
"ॐ जगदंबे मुक्ति दे। बेटियों का बंधन तोड़।"
एक हरी रोशनी।
पंद्रह स्त्रियों की आँखें बदलीं। शून्यता गई। जागरूकता आई।
एक ने कहा, "मैं... मैं कहाँ हूँ?"
दूसरी ने कहा, "मेरे बच्चे..."
तीसरी रोने लगी।
रुद्रनाथ चीखा, "नहीं! मेरी शक्ति!"
बाबा ने कहा, "बेटी आरोही, अभी अंगूठी!"
आरोही ने अपनी चूड़ी निकाली। शिखा की नानी की चूड़ी।
रुद्रनाथ की तरफ़ बढ़ी।
रुद्रनाथ ने अपने हाथ हवा में उठाए।
एक तेज़ नीली रोशनी।
आरोही पीछे गिरी।
पर उठी।
अपने तीन ताबीज़ छाती पर लगाए।
एक — भगवती दादी का।
दो — भास्करानंद बाबा का।
तीन — दादा कमलेश का।
तीन शक्तियाँ। एक साथ।
एक तेज़ पीली-नीली-हरी रोशनी।
फिर आगे बढ़ी।
रुद्रनाथ ने और शक्ति चलाई।
पर आरोही रुकी नहीं।
बाबा और शिखा भी उसके साथ। पीछे से मंत्र पढ़ते।
तीनों की शक्ति मिलकर।
रुद्रनाथ कमज़ोर हुआ।
रुद्रनाथ ने चीखा, "यह कैसे! तीन ताबीज़! तीन शक्तियाँ! तू सिर्फ़ मालती की वंशज नहीं!"
आरोही ने कहा, "रुद्रनाथ, हाँ। मैं मालती की। और रामनाथ बाबा के तीन शिष्यों की। तेरहवीं और तीन गुरुओं की शक्ति एक साथ।"
रुद्रनाथ की आँखें फैलीं।
पहली बार पूरा डर।
आरोही रुद्रनाथ के क़रीब पहुँची।
रुद्रनाथ ने अपनी अंगूठी को छिपाने की कोशिश की।
पर आरोही ने चूड़ी अंगूठी पर पहनाई।
एक तेज़ धमाका।
चूड़ी और अंगूठी दोनों टूटीं।
रुद्रनाथ ने चीखा।
पर उसका शरीर धीरे-धीरे राख नहीं हुआ। कालीचरण की तरह।
बल्कि एक और चीज़ हुई।
हवा में एक बूढ़ी महिला उभरी।
राधा।
रुद्रनाथ की बहन।
जो 1876 में पैदा हुई। 1950 में मरी।
राधा ने अपने भाई को देखा।
"रुद्र, मेरे भाई।"
रुद्रनाथ की आँखों में आँसू।
"राधा, दीदी..."
राधा ने कहा, "भाई, तूने मुझे बचपन में अलग परिवार को दिया। ताकि मैं तेरी दुनिया से दूर रहूँ। मैं समझी नहीं थी क्यों। मैं तुझसे नाराज़ थी बरसों तक।"
रुद्रनाथ ने कहा, "दीदी, मुझे तांत्रिक बनना था। पर मैं तुझे बचाना चाहता था। इसीलिए तुझे दूर किया।"
राधा ने कहा, "भाई, हाँ। पर तूने मुझे नहीं बचाया। तूने बहुत से लोगों को मारा। मेरे परिवार को भी दूर से देखता रहा। मुझ पर अपनी शक्ति डाली। मेरी बेटियों पर। मेरी नातिन पर। तेरे कारण मेरे परिवार में एक श्राप चला।"
रुद्रनाथ ने कहा, "दीदी, मुझे माफ़ कर।"
राधा ने कहा, "भाई, मैं तुझे माफ़ करती हूँ। पर आज तेरा अंत। मेरे साथ चल।"
रुद्रनाथ ने कहा, "दीदी, पर मैंने बहुत पाप किए। मुझे कहाँ ले जाओगी?"
राधा ने कहा, "भाई, कहीं। पर तेरे साथ तेरी माँ भी होगी। हमारी माँ। जो 1890 में मरी थीं। तुझसे नाराज़ थीं। पर अब तुझे माफ़ कर देंगी। मेरे साथ।"
रुद्रनाथ की आँखों में आँसू।
पहली बार 150 साल में।
"दीदी, मुझे शांति चाहिए।"
राधा ने अपने भाई का हाथ पकड़ा।
दोनों की आत्माएँ हवा में उठीं।
रुद्रनाथ का शरीर धीरे-धीरे राख हुआ।
पर उसकी आत्मा शांत। बहन के साथ।
आरोही ने देखा।
एक अजीब सी शांति।
क्या हर शिष्य के अंत में इसी तरह उसकी माँ या बहन उसे लेने आती है?
क्या यह इनकी सज़ा भी है और मुक्ति भी?
आरोही को कुछ समझ नहीं आया।
पर मन में एक विचार आया — शायद बुरे लोगों को भी उनके परिवार वालों की सज़ा और माफ़ी मिलनी चाहिए। इंसान इंसान का हिसाब नहीं कर सकता। परिवार का ख़ून ही असली न्याय।
हवेली अब बदल रही थी।
छत से पत्थर गिरने लगे।
बाबा ने कहा, "बेटी, भागना होगा।"
आरोही ने पंद्रह गर्भवती स्त्रियों को देखा।
"शिखा दीदी, इन्हें कैसे बचाएँ?"
शिखा ने कहा, "बेटी, एक-एक करके निकालेंगे।"
आरोही और शिखा ने पंद्रह स्त्रियों को एक-एक करके दरवाज़े की तरफ़ ले जाना शुरू किया।
पर हवेली तेज़ी से ढह रही थी।
छत से बड़े-बड़े पत्थर गिर रहे थे। दीवारें हिल रही थीं। कहीं-कहीं आग लगी थी। मंत्रों की आग। नीली।
बाबा ने कहा, "बेटियों, जल्दी!"
एक स्त्री गिर गई। घबराहट से।
आरोही ने उसे उठाया।
"बहन, चलो। हम बाहर हैं।"
पर हवेली और तेज़ ढहने लगी।
आठ स्त्रियाँ बाहर। सात अंदर।
छत का एक बड़ा पत्थर गिरने वाला था।
पर एक बात हुई।
एक तेज़ हवा।
राधा की आत्मा फिर आई।
"बेटियों, मैं मदद करती हूँ।"
राधा ने अपने हाथ हवा में उठाए।
हवेली का ढहना रुक गया। कुछ पल के लिए। पत्थर हवा में लटके रहे। जैसे किसी ने रोक दिया हो।
आरोही ने कहा, "राधा जी, धन्यवाद।"
राधा ने कहा, "बेटी, जल्दी। सब को निकालो। मेरी शक्ति सिर्फ़ कुछ पल।"
आरोही और शिखा ने तेज़ी से सब को बाहर निकाला।
पंद्रह स्त्रियाँ। बाहर।
फिर तीनों — आरोही, बाबा, शिखा।
बाहर आते ही राधा की आत्मा ने अपनी शक्ति हटा ली।
हवेली पूरी तरह ढह गई।
एक बड़ा धमाका।
धूल हवा में उड़ी।
फिर शांति।
राधा की आत्मा दिखी एक क्षण के लिए।
"बेटियों, धन्यवाद। मेरे परिवार को मुक्त करने के लिए।"
फिर राधा हवा में विलीन हो गई।
बाहर।
पंद्रह गर्भवती स्त्रियाँ बैठी थीं। रो रही थीं। पर आँखों में जागरूकता।
एक ने कहा, "मैं छह महीने से यहाँ। मेरा नाम मीता। मेरे पति ने मुझे मार दिया था। मैं भागकर आई। रुद्रनाथ ने कहा — 'यहाँ रह। सुरक्षित।' पर..."
आरोही ने कहा, "बहन, अब सब ठीक।"
एक और स्त्री ने कहा, "मेरा नाम आशा। तीन महीने से। मुझे मेरे गाँव से भगा दिया गया था। बलात्कार से गर्भवती। कोई नहीं मानता था।"
आरोही की आँखों में आँसू।
पंद्रह अलग-अलग कहानियाँ। सब बेसहारा। सब ने रुद्रनाथ पर विश्वास किया।
और सब को रुद्रनाथ ने अपनी बलि बनाना था।
आरोही ने कहा, "बहनों, हम आपकी मदद करेंगे। एक आश्रम है। कोलकाता में। महिलाओं के लिए। शिखा दीदी की जान-पहचान वहाँ।"
शिखा ने कहा, "हाँ बेटियों। मैं तुम सब को वहाँ ले जाऊँगी। जन्म तक तुम्हें आश्रय मिलेगा।"
पंद्रह स्त्रियाँ रोने लगीं।
पर आँसू ख़ुशी के।
रात के तीन बजे।
आरोही, बाबा, शिखा, और पंद्रह स्त्रियाँ आश्रम पहुँचे।
आश्रम की मुख्य पंडिताइन ने चौंककर देखा।
"शिखा! तू इतनी रात? और यह सब?"
शिखा ने कहा, "दीदी, यह पंद्रह बहनें। सब गर्भवती। सब बेसहारा। इनकी देखभाल चाहिए।"
पंडिताइन ने कहा, "शिखा, हम कैसे इतनी को रखेंगे?"
शिखा ने कहा, "दीदी, कोशिश। मैं आपको मदद दूँगी।"
पंडिताइन ने कहा, "अच्छा।"
पंद्रह स्त्रियाँ अंदर गईं।
एक-एक ने आरोही और शिखा के पैर छुए।
एक ने कहा, "बेटी, तूने मेरी और मेरे बच्चे की जान बचाई।"
मीता ने कहा, "बेटी, मैं तेरा नाम कभी नहीं भूलूँगी।"
आशा ने कहा, "बेटी, अगर मेरा बच्चा लड़की हुई, तो मैं उसका नाम आरोही रखूँगी।"
आरोही की आँखों में आँसू।
पंद्रह जीवन बचे। और पंद्रह अनजन्मे बच्चे।
तीस जीवन।
फिर एक और स्त्री आरोही के पास आई। सबसे कमज़ोर। शायद आठ महीने की गर्भवती।
"बेटी, मेरा नाम कमला। बर्दवान से हूँ। पति मर गया। ससुराल ने निकाल दिया। मेरे मायके वालों को भी लगा — मैं अशुभ। कोई नहीं रखता।"
आरोही ने कहा, "कमला दीदी, अब आप यहाँ। सुरक्षित।"
कमला ने कहा, "बेटी, पर बच्चे के बाद?"
आरोही ने शिखा की तरफ़ देखा।
शिखा ने कहा, "कमला बहन, बच्चे के बाद भी आश्रम आपकी देखभाल करेगा। कुछ महीने तक। फिर हम आपको एक काम दिलाएँगे। किसी अच्छे परिवार में।"
कमला ने आँखें बंद कीं।
"बेटी, आप देवी हैं।"
पंडिताइन ने कहा, "शिखा, इन सब का खाना कहाँ से आएगा?"
शिखा ने कहा, "दीदी, मैं इंतज़ाम करती हूँ।"
आरोही ने अपने पर्स से पैसे निकाले। दस हज़ार रुपये। जो उसने अपनी पीएचडी स्कॉलरशिप से बचाए थे।
"आंटी, यह लीजिए। और अगर और चाहिए, तो मैं दिल्ली से भेजूँगी।"
पंडिताइन ने कहा, "बेटी, धन्यवाद।"
आश्रम से लौटते वक़्त शिखा ने आरोही से पूछा —
"बेटी, अब क्या?"
आरोही ने कहा, "शिखा दीदी, अब हम गीता आंटी के पास चलेंगे। आप की दीदी।"
शिखा ने कहा, "बेटी, दस साल बाद। मैं डरती हूँ।"
आरोही ने कहा, "शिखा दीदी, आपकी दीदी आपका इंतज़ार कर रही हैं।"
सुबह। पाँच बजे।
आरोही, बाबा, और शिखा गीता के घर पहुँचे।
आरोही ने खटखटाया।
गीता ने दरवाज़ा खोला।
फिर शिखा को देखा।
आँखें बड़ी हुईं।
"शिखा..."
शिखा ने कहा, "दीदी।"
दोनों बहनें एक-दूसरे के गले लगीं।
बहुत देर तक। रोती रहीं।
गीता ने कहा, "शिखा, मुझे माफ़ कर। मैंने तुझे पागल कहा।"
शिखा ने कहा, "दीदी, मैंने माफ़ किया। बरसों पहले।"
आरोही और बाबा दूर बैठे। दोनों बहनों को समय देने के लिए।
बहुत देर तक दोनों बात करती रहीं।
फिर गीता ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, तूने मेरी बहन को वापस लाया। तूने मेरे भाई का श्राप ख़त्म किया। तूने मेरे परिवार को नया जीवन दिया।"
आरोही ने कहा, "आंटी, यह मेरा फ़र्ज़ था।"
गीता ने कहा, "बेटी, तू भगवान की भेजी।"
एक हफ़्ता बाद।
आरोही और बाबा दिल्ली लौट रहे थे। ट्रेन में।
शिखा गीता के पास रह गई। बहन के साथ। पंद्रह साल बाद।
पर उसने कहा था — "बेटी, अगर तुझे कभी मदद चाहिए, मैं आऊँगी। अगले शिष्य के लिए।"
आरोही ने कहा, "शिखा दीदी, धन्यवाद।"
अब बाक़ी दो शिष्य।
प्रचंडी — राजस्थान — जुड़वाँ बच्चे।
महाकाल — तमिलनाडु — बड़ी बहनें।
ट्रेन में। बाबा ने कहा, "बेटी, तूने बहुत अच्छा किया।"
आरोही ने कहा, "बाबा, अब क्या?"
बाबा ने कहा, "बेटी, अगला — राजस्थान। पर वहाँ पहले हमें और तैयारी चाहिए। प्रचंडी जुड़वाँ बच्चों को मारता है। और जुड़वाँ बच्चे बहुत मुश्किल से मिलते हैं।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कब जाएँगे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, कुछ महीने। मार्च में शायद।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप कैसे हैं?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मैं थक रहा हूँ। 145 साल। पर दो शिष्य और। फिर मेरा काम पूरा।"
आरोही ने बाबा का हाथ पकड़ा।
"बाबा, आप जल्दी नहीं जाएँगे। मुझे आपकी ज़रूरत।"
बाबा ने कहा, "बेटी, मैं तेरे साथ जब तक ज़रूरत। पर एक दिन जाना होगा।"
दिल्ली पहुँचकर। रात।
आरोही घर पर।
पिताजी और माँ ने गले लगाया।
पिताजी ने कहा, "बेटी, तू ठीक?"
आरोही ने कहा, "जी पिताजी।"
पिताजी ने कहा, "बेटी, दादा का ताबीज़?"
आरोही ने ताबीज़ दिखाया।
पिताजी की आँखों में आँसू।
"बेटी, तूने अपने दादा का काम पूरा किया। मुझे तुझ पर बहुत गर्व है।"
आरोही ने पिताजी को गले लगाया।
पिताजी ने कहा, "बेटी, एक बात। मेरे पिताजी ने मरने से पहले मुझसे कहा था — 'बेटा, मैं अपना काम पूरा नहीं कर पाया। मैंने कोलकाता में एक शिष्य को नहीं मार सका। एक दिन कोई पूरा करेगा।' मुझे तब नहीं समझ आया। पर आज..."
आरोही ने कहा, "पिताजी, आज दादा का काम पूरा।"
पिताजी ने कहा, "बेटी, हाँ। और दादा तेरे साथ हैं। हर पल।"
माँ भी रो रही थीं।
फिर आरोही ने अपने कमरे में जाकर बैठकर सोचा।
रुद्रनाथ मरा। पर एक बात दिमाग़ में।
रुद्रनाथ की माँ भी 1890 में मरी थीं। पर वे उसे लेने आईं। कालीचरण की माँ भी उसे लेने आईं। देवीदास को — मालती की आत्मा ने रोका था। और दुर्जन को — चंद्रा देवी को मारा था।
हर शिष्य के अंत में उसकी माँ या पत्नी या बहन।
एक ही पैटर्न।
क्या प्रचंडी और महाकाल की माँ या बहन भी होंगी?
क्या उन्हें भी मरने के लिए एक स्त्री ही चाहिए?
आरोही ने अपनी नोटबुक निकाली। लिखा —
"पैटर्न — हर शिष्य को उसकी अपनी माँ / बहन / पत्नी की आत्मा ही मार सकती है। तेरहवीं शक्ति सिर्फ़ मदद करती है। पर असली अंत — परिवार के ख़ून से।"
आरोही ने लिखा —
"मिशन 2 — रुद्रनाथ — पूरा।
बचाव — पंद्रह गर्भवती स्त्रियाँ।
नई सहायक — शिखा प्रताप। तेरहवीं शक्ति। कोलकाता में।
दादा — कमलेश शर्मा — का काम पूरा।
अगला — प्रचंडी। राजस्थान। मार्च।
समय — कुछ महीने। आराम।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
बाहर दिल्ली की रात।
पर आरोही के अंदर एक शांति।
दो शिष्य मरे।
दो बाक़ी।
पर हर जगह मदद।
बनारस में दुर्गा।
कोलकाता में शिखा।
राजस्थान में?
तमिलनाडु में?
आरोही ने आँखें बंद कीं।
अगला पड़ाव।
फिर एक फ़ोन आया।
आरोही ने उठाया।
एक अनजान नंबर।
एक महिला की आवाज़।
"आरोही जी?"
आरोही ने कहा, "जी।"
महिला ने कहा, "मैं जयपुर से बोल रही हूँ। मेरा नाम अंजलि है। मुझे आप के बारे में एक बूढ़े साधु ने बताया। आप को हमारी मदद चाहिए। जल्दी।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"अंजलि जी, क्या हुआ?"
अंजलि ने कहा, "मेरी जुड़वाँ बहनें। छह साल की। पिछले हफ़्ते ग़ायब हो गईं। पुलिस कहती है — कोई अपहरणकर्ता। पर मुझे लगता है — कुछ और। कुछ अजीब।"
आरोही की आँखें फैलीं।
प्रचंडी।
जुड़वाँ बच्चों की बलि।
राजस्थान।
अगला शिष्य।
आरोही ने कहा, "अंजलि जी, मैं जल्दी आऊँगी। कल।"
अंजलि ने कहा, "धन्यवाद बहन।"
फ़ोन कट गया।
आरोही ने पिताजी की तरफ़ देखा।
पिताजी ने कहा, "बेटी, कब?"
आरोही ने कहा, "पिताजी, कल। जयपुर।"
पिताजी ने आह भरी।
फिर बोले, "बेटी, जा। पर सावधान।"
आरोही ने कहा, "जी पिताजी।"
माँ ने कहा, "बेटी, मैं आ रही हूँ। इस बार।"
आरोही ने चौंककर देखा।
"माँ?"
माँ ने कहा, "बेटी, हाँ। तेरे पिताजी की देखभाल हमारी पड़ोसी करेगी। मीना आंटी। मैंने बात कर ली। और मैं अब तेरे साथ हूँ।"
आरोही ने कहा, "माँ, ख़तरा है।"
माँ ने कहा, "बेटी, बरसों पहले भी था। तब भी मैं तेरे साथ थी।"
आरोही ने माँ को गले लगाया।
फिर बाबा को फ़ोन किया।
"बाबा, कल जयपुर। एक फ़ोन आया।"
बाबा ने कहा, "बेटी, अच्छा। मैं तैयार। कल सुबह की ट्रेन।"
आरोही ने फ़ोन बंद कर दिया।
पंद्रह दिन का आराम।
फिर तीसरा शिष्य।
आरोही ने अपने तीन ताबीज़ छाती से लगाए।
"दादा, आप के साथ।"
बाहर एक हल्की सी हवा।
जैसे कोई सुन रहा हो।

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