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एपिसोड 1 — वह घर
firoj saifi · Ghost Stories · 16 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- Horror, mystery
- Chapter
- 1 of 3
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3022
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
प्रस्तावना
हर घर में एक आईना होता है।
लोग उसमें अपना चेहरा देखते हैं।
बाल ठीक करते हैं।
कपड़े सँवारते हैं।
कभी-कभी खुद को देखकर मुस्कुराते हैं।
लेकिन अगर किसी आईने में…
आपका चेहरा आपको देखने के बजाय आपको देख रहा हो, तो?
अगर आप उसके सामने खड़े हों और आपका प्रतिबिंब वही करे जो आप कर रहे हैं…
लेकिन एक दिन…
वह आपकी नकल करना बंद कर दे?
अगर आप अपना हाथ नीचे रखें और आईने वाला हाथ ऊपर उठा दे?
अगर आप मुस्कुराएँ नहीं…
फिर भी आपका प्रतिबिंब मुस्कुराए?
और सबसे डरावनी बात…
अगर आईने के अंदर वाला इंसान आपसे बाहर आने की नहीं…
आपको अंदर आने की विनती करे?
शायद आप उस आईने को तोड़ देंगे।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
क्योंकि कुछ आईने काँच से नहीं बने होते।
कुछ आईने…
दरवाज़े होते हैं।
ऐसे दरवाज़े, जिन्हें एक बार खोलने के बाद बंद करना आसान नहीं होता।
यह कहानी है एक ऐसे ही आईने की।
एक ऐसे घर की…
जहाँ बीस साल पहले एक बच्चा गायब हुआ था।
सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ एक बच्चा गायब हुआ था।
लेकिन उस घर की दीवारें कुछ और कहती थीं।
उनके मुताबिक…
दो बच्चे गायब हुए थे।
और उनमें से एक…
कभी घर से बाहर निकला ही नहीं।
---
बीस साल पहले
23 सितंबर 1998।
रात के 2 बजकर 13 मिनट।
पहाड़ों के बीच एक पुराना घर बारिश में घिरा हुआ था।
घर शहर से बहुत दूर था।
इतना दूर कि आसपास कई किलोमीटर तक कोई पड़ोसी नहीं था।
घर के चारों तरफ घना जंगल था।
उस रात हवा इतनी तेज़ चल रही थी कि पुराने पेड़ घर की खिड़कियों से टकरा रहे थे।
ऊपर दूसरी मंज़िल पर एक कमरे की बत्ती जल रही थी।
कमरे में दस साल का एक बच्चा बिस्तर पर बैठा था।
उसका नाम था…
आरव।
आरव की आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं।
उसकी माँ ने उसे कुछ मिनट पहले ही कमरे में बंद किया था।
बाहर से उसकी माँ की आवाज़ आई थी—
“आरव, दरवाज़ा मत खोलना।”
आरव ने पूछा था—
“माँ, बाहर कौन है?”
कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया।
फिर उसकी माँ ने कहा—
“कोई नहीं।”
लेकिन आरव जानता था…
उसकी माँ झूठ बोल रही थी।
क्योंकि दरवाज़े के ठीक बाहर किसी के पैरों की आवाज़ आ रही थी।
धीरे-धीरे।
एक कदम।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
ठक…
ठक…
ठक…
आरव ने कंबल अपने सिर तक खींच लिया।
आवाज़ बंद हो गई।
कमरे में फिर शांति हो गई।
तभी उसकी नजर कमरे के कोने में रखे बड़े आईने पर पड़ी।
आईने के ऊपर एक सफेद चादर पड़ी थी।
माँ ने हमेशा उसे उस आईने से दूर रहने के लिए कहा था।
“उसके सामने कभी अकेले मत खड़ा होना।”
आरव को कभी समझ नहीं आया कि क्यों।
उसने धीरे से कंबल हटाया।
आईने की तरफ देखा।
चादर बिल्कुल स्थिर थी।
फिर…
चादर के नीचे से किसी चीज़ ने उसे अंदर से पकड़ लिया।
आरव की आँखें फैल गईं।
चादर पर एक हाथ की आकृति उभर आई।
एक छोटी हथेली।
जैसे कोई बच्चा दूसरी तरफ से चादर पकड़ रहा हो।
आरव बिस्तर से उतर गया।
वह धीरे-धीरे आईने की तरफ बढ़ा।
उसने चादर का कोना पकड़ा।
फिर खुद से बोला—
“सिर्फ देखूँगा…”
उसने चादर थोड़ा हटाया।
आईने में कमरा दिखाई दिया।
बिस्तर।
खिड़की।
टेबल।
दीवार।
सब कुछ वैसा ही था।
लेकिन…
आईने में बिस्तर पर कोई बैठा हुआ था।
आरव पलटकर बिस्तर की तरफ देखने लगा।
बिस्तर खाली था।
उसने फिर आईने में देखा।
वहाँ एक बच्चा बैठा था।
दस साल का।
गीले बाल।
सफेद चेहरा।
और…
वह बिल्कुल आरव जैसा दिखता था।
आरव के हाथ से चादर छूट गई।
आईने वाला बच्चा धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
आरव पीछे हट गया।
आईने के अंदर वाला बच्चा भी आगे बढ़ा।
लेकिन वह कमरे में नहीं था।
वह आईने के दूसरी तरफ था।
दोनों आमने-सामने खड़े थे।
आरव ने काँपते हुए पूछा—
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं तुम हूँ।”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
बच्चे ने फिर कहा—
“मैं वही हूँ जो तुम्हें बनना था।”
आरव कुछ समझ नहीं पाया।
तभी बच्चे ने आईने पर हाथ रखा।
“दरवाज़ा खोलो।”
आरव ने पीछे हटते हुए कहा—
“नहीं।”
“डरते हो?”
“हाँ।”
आईने वाला बच्चा मुस्कुराया।
“तुम्हें मुझसे नहीं डरना चाहिए।”
“तो किससे डरना चाहिए?”
उसकी मुस्कान अचानक गायब हो गई।
उसने धीरे से पीछे देखा।
आईने के अंधेरे हिस्से में…
एक औरत खड़ी थी।
लंबे काले बाल।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
बच्चे ने फुसफुसाकर कहा—
“उससे।”
अचानक कमरे की बत्ती बुझ गई।
आरव चीख पड़ा।
“माँ!”
दरवाज़ा खुला।
उसकी माँ दौड़ती हुई अंदर आई।
उसने तुरंत आरव को पकड़ लिया।
“आईने को मत देखना!”
लेकिन आरव उसकी तरफ नहीं देख रहा था।
उसकी नजर आईने पर थी।
चादर फर्श पर पड़ी थी।
आईना खाली था।
माँ ने बेटे का चेहरा अपने हाथों में लिया।
“तुमने उसे देखा?”
आरव रोते हुए बोला—
“वो मेरे जैसा था।”
माँ की आँखों में डर उतर आया।
“उसने तुमसे बात की?”
आरव ने सिर हिलाया।
“उसने कहा कि वो मैं है।”
माँ कुछ सेकंड चुप रही।
फिर उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।
“तुम्हारे पापा कहाँ हैं?”
आरव ने पूछा।
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
फिर अचानक नीचे से एक जोरदार आवाज़ आई।
धड़ाम!
माँ ने आरव का हाथ पकड़ा।
“हम अभी इस घर से निकलेंगे।”
“पापा?”
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
“तुम्हारे पापा अब हमारे साथ नहीं हैं।”
“कहाँ गए?”
माँ ने दरवाज़ा खोला।
“बस मेरे साथ चलो।”
वे दोनों सीढ़ियों से नीचे भागने लगे।
नीचे का हॉल अंधेरे में था।
माँ ने मुख्य दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।
दरवाज़ा नहीं खुला।
उसने जोर लगाया।
फिर जोर से खींचा।
कुछ नहीं हुआ।
आरव रोने लगा।
“माँ…”
तभी दूसरी मंज़िल से एक आवाज़ आई।
“माँ…”
दोनों रुक गए।
आवाज़ आरव की थी।
माँ ने धीरे-धीरे ऊपर देखा।
आरव उसके साथ ही खड़ा था।
फिर ऊपर से आवाज़ आई—
“माँ, मुझे बचाओ!”
आरव ने माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“मैंने नहीं कहा।”
माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।
ऊपर सीढ़ियों के पास…
एक छोटा बच्चा खड़ा था।
बिल्कुल आरव जैसा।
उसने नीचे देखकर मुस्कुराया।
फिर बोला—
“आप गलत वाले को लेकर जा रही हो।”
माँ चीख पड़ी।
उसने आरव को उठाया और खिड़की की तरफ भागी।
लेकिन उससे पहले ही…
पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
और फिर…
घड़ी ने 2 बजकर 13 मिनट बजाए।
---
वर्तमान
दिल्ली।
23 सितंबर 2026।
शाम के 7 बजकर 42 मिनट।
एक छोटे से फोटो स्टूडियो में कंप्यूटर स्क्रीन की रोशनी के सामने एक युवक बैठा था।
उसका नाम था अर्जुन शर्मा।
उम्र 28 साल।
पेशे से फोटोग्राफर।
अर्जुन को पुरानी जगहों की तस्वीरें लेने का शौक था।
खंडहर।
पुरानी हवेलियाँ।
सुनसान चर्च।
छोड़ी हुई फैक्ट्रियाँ।
ऐसी जगहें जहाँ बाकी लोग जाने से डरते थे…
अर्जुन को वहाँ कैमरा लेकर घूमने में मज़ा आता था।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसे एक ही सपना बार-बार आ रहा था।
एक घर।
एक लंबा गलियारा।
और एक आईना।
हर बार सपने में वह आईने के सामने खड़ा होता था।
आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई देता था।
लेकिन जैसे ही अर्जुन बोलने की कोशिश करता…
प्रतिबिंब उसके होंठों को हिलाए बिना कुछ कहता।
हर बार एक ही बात।
“तुम मुझे क्यों छोड़ गए?”
अर्जुन हमेशा उसी वक्त जाग जाता।
आज भी उसकी मेज पर कॉफी ठंडी हो चुकी थी।
उसका दोस्त कबीर स्टूडियो में आया।
“भाई, घर नहीं जाना?”
अर्जुन ने स्क्रीन से नजर हटाए बिना कहा—
“बस ये फोटो खत्म कर रहा हूँ।”
कबीर उसके पीछे आकर खड़ा हो गया।
“तू पिछले तीन घंटे से यही फोटो एडिट कर रहा है।”
अर्जुन ने स्क्रीन पर नजर डाली।
“कुछ अजीब है इसमें।”
“क्या?”
“देख।”
स्क्रीन पर एक पहाड़ी जंगल की तस्वीर थी।
अर्जुन ने फोटो ज़ूम की।
पेड़ों के बीच एक पुराना घर दिखाई दे रहा था।
कबीर ने कहा—
“सुंदर है।”
अर्जुन चुप रहा।
“सुंदर?”
कबीर ने पूछा।
“तुझे इसमें कुछ दिख नहीं रहा?”
“घर दिख रहा है।”
“खिड़की देख।”
कबीर ने ज़ूम किया।
दूसरी मंज़िल की खिड़की में कोई खड़ा था।
एक आदमी।
अंधेरे में उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
कबीर ने कहा—
“शायद कोई आदमी है।”
अर्जुन ने तस्वीर की तारीख खोली।
उसकी उँगलियाँ रुक गईं।
23 सितंबर 1998।
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“क्या हुआ?”
अर्जुन ने धीमी आवाज़ में कहा—
“ये फोटो मैंने नहीं खींची।”
“तो?”
“ये मेरे कंप्यूटर में आई कैसे?”
कबीर ने हँसते हुए कहा—
“किसी ने भेजी होगी।”
“किसने?”
“पता नहीं।”
अर्जुन ने फाइल की जानकारी खोली।
फोटो का स्थान भी दर्ज था।
शिमला से लगभग 70 किलोमीटर दूर।
एक गाँव।
देवगढ़।
अर्जुन ने स्क्रीन की तरफ देखते हुए कहा—
“मैंने इस जगह की तस्वीर कभी नहीं ली।”
तभी उसका फोन बजा।
अनजान नंबर।
उसने कॉल उठाई।
“हैलो?”
दूसरी तरफ कोई आवाज़ नहीं थी।
“कौन बोल रहा है?”
कुछ सेकंड बाद…
बहुत धीमी आवाज़ आई।
“तुम्हें घर याद है?”
अर्जुन का चेहरा बदल गया।
“कौन-सा घर?”
“देवगढ़।”
अर्जुन खड़ा हो गया।
“आप कौन हैं?”
“तुम्हें वहाँ जाना होगा।”
“क्यों?”
दूसरी तरफ कुछ सेकंड शांति रही।
फिर आवाज़ आई—
“क्योंकि वह तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”
कॉल कट गई।
अर्जुन ने तुरंत नंबर पर वापस कॉल किया।
एक मशीन की आवाज़ आई—
“यह नंबर मौजूद नहीं है।”
कबीर ने पूछा—
“कौन था?”
अर्जुन ने फोन टेबल पर रख दिया।
“पता नहीं।”
“तू देवगढ़ गया है कभी?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
कबीर ने स्क्रीन की तरफ देखा।
“फिर वहाँ की फोटो तेरे कंप्यूटर में क्यों है?”
अर्जुन के पास जवाब नहीं था।
उसी समय…
कंप्यूटर स्क्रीन अपने आप बंद हो गई।
कुछ सेकंड बाद स्क्रीन फिर जली।
इस बार फोटो नहीं थी।
सिर्फ एक काली स्क्रीन।
और उस पर सफेद अक्षरों में एक वाक्य लिखा था—
“आज रात 11:30 बजे घर पहुँचो।”
कबीर पीछे हट गया।
“ये क्या है?”
अर्जुन ने कंप्यूटर बंद कर दिया।
“मैं जा रहा हूँ।”
“कहाँ?”
“देवगढ़।”
कबीर ने उसे घूरा।
“पागल हो गया है?”
अर्जुन ने बैग उठाया।
“मुझे जवाब चाहिए।”
“और अगर वहाँ कुछ हुआ तो?”
अर्जुन दरवाज़े तक गया।
फिर रुककर बोला—
“तो कम से कम मुझे पता होगा कि मैं किस चीज़ से भाग रहा हूँ।”
---
पहाड़ों की ओर
रात के 9 बजकर 18 मिनट।
अर्जुन की कार पहाड़ी रास्ते पर दौड़ रही थी।
बारिश शुरू हो चुकी थी।
सड़क खाली थी।
मोबाइल में नेटवर्क धीरे-धीरे गायब हो गया।
जीपीएस पर रास्ता दिखाई दे रहा था।
देवगढ़ — 18 किलोमीटर।
अर्जुन ने रेडियो चलाया।
पहले सिर्फ खरखराहट आई।
फिर एक पुराना गाना बजने लगा।
अर्जुन ने गाने को सुनते ही रेडियो बंद कर दिया।
उसकी माँ यही गाना गाया करती थी।
उसे याद आया…
बचपन में उसकी माँ उसे सुलाते समय यही धुन गुनगुनाती थी।
अर्जुन ने खुद से कहा—
“ये सिर्फ संयोग है।”
लेकिन फिर पीछे की सीट से आवाज़ आई।
“भैया…”
अर्जुन ने जोर से ब्रेक लगाया।
कार सड़क के बीच रुक गई।
उसने पीछे देखा।
सीट खाली थी।
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
अर्जुन ने कार के अंदर की लाइट जलाई।
कुछ नहीं।
उसने दरवाज़ा लॉक किया।
कुछ देर बैठा रहा।
फिर इंजन दोबारा स्टार्ट किया।
लेकिन कार स्टार्ट नहीं हुई।
उसने फिर कोशिश की।
कुछ नहीं।
तभी सामने की धुंध में…
एक बच्चा सड़क के बीच खड़ा दिखाई दिया।
दस साल के करीब।
सफेद कपड़े।
नंगे पैर।
अर्जुन ने हॉर्न बजाया।
बच्चा नहीं हिला।
अर्जुन कार से बाहर निकला।
“बेटा?”
बच्चा धीरे-धीरे उसकी तरफ देखने लगा।
अर्जुन का दिल धड़कना भूल गया।
उस बच्चे का चेहरा…
अर्जुन जैसा था।
बच्चा मुस्कुराया।
“आपको बहुत देर हो गई।”
अर्जुन एक कदम पीछे हट गया।
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने सड़क के किनारे जंगल की तरफ इशारा किया।
“घर वहीं है।”
अर्जुन ने एक पल के लिए नजर हटाई।
फिर वापस देखा।
बच्चा गायब था।
सड़क खाली थी।
अर्जुन तुरंत कार में बैठा।
इस बार इंजन पहली कोशिश में स्टार्ट हो गया।
उसने पीछे देखने की हिम्मत नहीं की।
---
वह घर
रात के 11 बजकर 26 मिनट।
अर्जुन आखिरकार देवगढ़ पहुँच गया।
गाँव लगभग सुनसान था।
दो-तीन पुराने घर।
एक बंद दुकान।
एक टूटी हुई सड़क।
और आगे…
घना जंगल।
जीपीएस बंद हो चुका था।
लेकिन उसके कंप्यूटर की तस्वीर में जो घर था…
वही रास्ता उसके सामने था।
अर्जुन ने कार रोक दी।
घर अंधेरे में खड़ा था।
ऊपर की एक खिड़की खुली थी।
अर्जुन ने कैमरा उठाया।
तस्वीर लेने के लिए बटन दबाया।
क्लिक।
कैमरे की स्क्रीन पर तस्वीर आई।
घर की खिड़की में कोई खड़ा था।
अर्जुन ने ऊपर देखा।
खिड़की खाली थी।
उसने फिर कैमरे की स्क्रीन देखी।
वहाँ अब भी कोई खड़ा था।
अर्जुन ने तस्वीर डिलीट कर दी।
फिर उसने घर का दरवाज़ा देखा।
दरवाज़ा थोड़ा खुला था।
वह धीरे-धीरे अंदर गया।
हॉल में धूल जमी थी।
दीवारों पर पुरानी तस्वीरें थीं।
लकड़ी की सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं।
और सामने…
एक बहुत बड़ा आईना।
आईना इतना पुराना था कि उसके किनारों पर काला पड़ चुका था।
अर्जुन उसके सामने खड़ा हो गया।
उसने अपना प्रतिबिंब देखा।
सब सामान्य था।
उसने हाथ उठाया।
प्रतिबिंब ने भी हाथ उठाया।
उसने सिर दाईं तरफ झुकाया।
प्रतिबिंब ने भी वही किया।
अर्जुन ने राहत की साँस ली।
“कुछ नहीं है।”
वह मुड़ने लगा।
तभी आईने के अंदर…
उसका प्रतिबिंब वहीं खड़ा रहा।
अर्जुन रुक गया।
धीरे-धीरे उसने पीछे देखा।
असली अर्जुन स्थिर था।
लेकिन आईने वाला अर्जुन…
धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।
अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।
उसने एक कदम पीछे लिया।
प्रतिबिंब ने एक कदम आगे बढ़ाया।
अर्जुन ने फुसफुसाया—
“ये क्या…”
प्रतिबिंब ने अपना हाथ उठाया।
काँच पर हथेली रख दी।
फिर उसने होंठ हिलाए।
आवाज़ नहीं आई।
अर्जुन करीब गया।
“क्या कह रहे हो?”
इस बार आवाज़ आई।
बहुत धीमी।
लेकिन साफ़।
“मुझे यहाँ से निकालो।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“तुम कौन हो?”
प्रतिबिंब की आँखों में आँसू आ गए।
“तुम।”
“मैं?”
“हाँ।”
“तुम मेरे जैसे क्यों दिखते हो?”
प्रतिबिंब ने सिर झुका लिया।
“क्योंकि…”
वह रुक गया।
फिर बोला—
“तुमने मुझे यहाँ छोड़ दिया था।”
अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“मैं कभी यहाँ नहीं आया।”
आईने वाला चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“तुम आए थे।”
“कब?”
“जब तुम दस साल के थे।”
अर्जुन पीछे हट गया।
उसके सिर में अचानक तेज़ दर्द उठा।
कुछ तस्वीरें उसके दिमाग में चमकने लगीं।
बारिश।
एक घर।
एक औरत।
एक बच्चा।
एक आईना।
और…
एक छोटी हथेली।
अर्जुन ने अपना सिर पकड़ लिया।
“नहीं…”
उसे कुछ याद नहीं आ रहा था।
लेकिन उसका शरीर उन यादों को पहचान रहा था।
तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
धड़ाम!
अर्जुन ने ऊपर देखा।
फिर आईने की तरफ।
प्रतिबिंब अब डरा हुआ था।
“वह आ गई।”
“कौन?”
आईने वाले अर्जुन ने पीछे देखा।
उसकी आँखें फैल गईं।
“भागो।”
“कौन आ गई?”
“भागो!”
अर्जुन ने पीछे मुड़कर सीढ़ियों की तरफ देखा।
ऊपर अंधेरा था।
फिर…
सीढ़ियों के ऊपर किसी के खड़े होने की आकृति दिखाई दी।
एक औरत।
लंबे बाल।
सफेद कपड़े।
चेहरा बालों से ढका हुआ।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।
ठक।
ठक।
ठक।
अर्जुन पीछे हटता गया।
औरत रुक गई।
उसने अपना सिर उठाया।
बालों के बीच से दो सफेद आँखें दिखाई दीं।
अर्जुन का गला सूख गया।
औरत ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम वापस आ गए…”
अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—
“आप कौन हैं?”
औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस उसकी तरफ देखती रही।
फिर उसने आईने की तरफ इशारा किया।
अर्जुन ने आईने में देखा।
वहाँ अब सिर्फ उसका प्रतिबिंब नहीं था।
उसके पीछे…
दर्जनों लोग खड़े थे।
पुरुष।
औरतें।
बच्चे।
सबके चेहरे सफेद।
सबकी आँखें अर्जुन पर।
और सबसे पीछे…
एक छोटा बच्चा।
वही बच्चा जो सड़क पर मिला था।
उसने हाथ उठाया।
और आईने के अंदर से काँच पर लिखा—
“भैया, मुझे बाहर निकालो।”
अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।
उसे अचानक अपनी माँ की एक पुरानी बात याद आई।
जब वह छोटा था, माँ ने कभी कहा था—
“अगर कभी तुम्हें इस घर का सपना आए…”
अर्जुन ने तब पूछा था—
“कौन-सा घर?”
माँ ने जवाब नहीं दिया था।
अब उसे समझ आ रहा था…
वह घर उसके सपनों में क्यों आता था।
क्योंकि वह सपना नहीं था।
वह उसकी याद थी।
अर्जुन धीरे-धीरे आईने के पास गया।
उसने काँच पर हाथ रखा।
अंदर वाले बच्चे ने भी अपना हाथ उसके हाथ पर रखा।
दोनों हथेलियों के बीच सिर्फ काँच था।
अर्जुन फुसफुसाया—
“आरव?”
बच्चे की आँखों में आँसू आ गए।
“तुम्हें याद आ गया?”
अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
“आरव…”
तभी पीछे खड़ी औरत चीखी।
आवाज़ इतनी भयानक थी कि पूरे घर की खिड़कियाँ काँप उठीं।
आईने पर अचानक दरारें पड़ने लगीं।
चटाक!
चटाक!
चटाक!
अर्जुन पीछे गिर गया।
आईने में मौजूद सभी लोग एक साथ उसके करीब आने लगे।
फिर…
आईने वाला अर्जुन बाकी सबको पीछे धकेलकर सामने आया।
उसने डरते हुए कहा—
“अर्जुन, मेरी बात सुनो।”
अर्जुन जमीन पर पड़ा था।
“क्या?”
“अगर वह तुम्हें अपना चेहरा दिखाए…”
“तो?”
आईने वाला अर्जुन काँपने लगा।
“तो उसकी आँखों में मत देखना।”
“क्यों?”
उसने धीरे से जवाब दिया—
“क्योंकि फिर तुम पहचान नहीं पाओगे कि असली अर्जुन कौन है।”
अर्जुन ने ऊपर देखा।
सीढ़ियों पर खड़ी औरत अब उसके बिल्कुल पीछे थी।
उसने अर्जुन के कान के पास झुककर फुसफुसाया—
“क्योंकि असली अर्जुन तो बीस साल पहले ही मर चुका था।”
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
और उसी क्षण…
पूरे घर में लगी सभी घड़ियाँ एक साथ चलने लगीं।
टिक…
टिक…
टिक…
फिर सभी घड़ियों की सुइयाँ एक ही समय पर रुक गईं।
2:13।
आईने में खड़ा बच्चा अचानक जोर से चीखा—
“भागो, अर्जुन!”
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
औरत ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रख दिया।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
बाल धीरे-धीरे उसके चेहरे से हटने लगे।
और उस चेहरे को देखते ही…
अर्जुन की चीख निकल गई।
क्योंकि वह चेहरा किसी अजनबी का नहीं था।
वह चेहरा…
उसकी माँ का था।
लेकिन उसकी माँ की मौत…
सोलह साल पहले हो चुकी थी।
माँ ने मुस्कुराकर कहा—
“बेटा… तुमने मुझे इतनी जल्दी कैसे भूल दिया?”
आईना जोरदार आवाज़ के साथ टूट गया।
धड़ाम!!!
पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
कुछ सेकंड बाद…
एक छोटी-सी आवाज़ अंधेरे में गूँजी।
“अब एक ही रास्ता बचा है…”
फिर दूसरी आवाज़ आई।
अर्जुन की अपनी आवाज़।
लेकिन वह उसके पीछे से आ रही थी।
“अंदर आ जाओ।”
अर्जुन धीरे-धीरे पलटा।
उसके पीछे…
आईने का कोई टुकड़ा नहीं था।
फिर भी दीवार पर एक साफ़ आईना दिखाई दे रहा था।
और उसके अंदर…
अर्जुन खुद खड़ा था।
वह मुस्कुरा रहा था।
उसने हाथ बढ़ाया।
और कहा—
“इस बार मैं बाहर आऊँगा।”
एपिसोड 1 समाप्त।
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