Pretika › Ghost Stories › Horror, mystery

एपिसोड 2 — आईने

firoj saifi · Ghost Stories · 17 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
Horror, mystery
Chapter
2 of 3
Category
Ghost Stories
Reading time
17 min
Words
3253
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

कमरे में काँच के सैकड़ों टुकड़े बिखरे पड़े थे।

लेकिन अजीब बात यह थी कि आईना टूटने के बाद भी दीवार पर उसका प्रतिबिंब मौजूद था।

वह किसी काँच पर नहीं था।

वह सीधे दीवार के अंदर दिखाई दे रहा था।

और उसके भीतर…

अर्जुन खड़ा था।

वही चेहरा।

वही कपड़े।

वही आँखें।

बस एक फर्क था।

आईने के अंदर वाला अर्जुन मुस्कुरा रहा था।

असली अर्जुन पीछे हट गया।

उसकी साँस तेज़ हो चुकी थी।

“तुम कौन हो?”

दीवार के अंदर खड़ा दूसरा अर्जुन धीरे-धीरे आगे आया।

उसने अपना हाथ दीवार पर रखा।

“तुम्हें सच में कुछ याद नहीं?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मुझे कुछ याद नहीं।”

दूसरा अर्जुन मुस्कुराया।

“तो फिर याद दिलाना पड़ेगा।”

अचानक कमरे का तापमान गिर गया।

अर्जुन के मुँह से भाप निकलने लगी।

पीछे खड़ी उसकी माँ जैसी दिखने वाली औरत गायब हो चुकी थी।

कमरे में सिर्फ अर्जुन और उसका प्रतिबिंब था।

फिर दीवार के अंदर से आवाज़ आई—

“तेरा नाम अर्जुन नहीं है।”

अर्जुन का चेहरा जम गया।

“क्या?”

“तुम्हारा नाम…”

दूसरा अर्जुन धीरे-धीरे मुस्कुराया।

“आरव है।”

---

1. पहली याद

अर्जुन पीछे हटते हुए दीवार से जा टकराया।

“झूठ।”

दूसरा अर्जुन कुछ नहीं बोला।

दीवार के अंदर का दृश्य अचानक बदल गया।

अब वहाँ वही पुराना घर दिखाई दे रहा था।

लेकिन घर नया था।

दीवारों पर ताज़ा पेंट।

खिड़कियों पर परदे।

आँगन में एक लाल साइकिल।

और सामने…

दो छोटे बच्चे।

दोनों बिल्कुल एक जैसे।

एक बच्चा कैमरे की तरफ देखकर हँस रहा था।

दूसरा उसके पीछे खड़ा था।

अर्जुन की साँस रुक गई।

“ये…”

उसने धीरे से कहा—

“मैं हूँ।”

दूसरे बच्चे ने कैमरे की तरफ देखकर कहा—

“मेरा नाम अर्जुन है।”

उसके पीछे खड़ा बच्चा बोला—

“और मेरा आरव।”

अर्जुन के सिर में तेज़ दर्द हुआ।

उसने दोनों हाथ सिर पर रख लिए।

कुछ आवाज़ें उसके दिमाग में गूँजने लगीं।

“अर्जुन, आरव… खाना ठंडा हो रहा है!”

माँ की आवाज़।

फिर बच्चों की हँसी।

फिर बारिश।

फिर चीख।

फिर आईना।

अर्जुन घुटनों के बल गिर पड़ा।

“नहीं…”

उसकी आँखों के सामने बचपन के दृश्य तेजी से बदलने लगे।

दोनों भाई एक ही कमरे में सो रहे थे।

दोनों एक ही स्कूल की ड्रेस पहनते थे।

एक ही टिफिन।

एक ही कमरा।

लेकिन उनके स्वभाव बिल्कुल अलग थे।

अर्जुन हमेशा डरपोक था।

आरव हमेशा बहादुर।

आरव को पुरानी चीज़ों में दिलचस्पी थी।

उसे वह पुराना आईना बहुत पसंद था।

वह अक्सर उसके सामने खड़ा होकर अपने प्रतिबिंब से बातें करता था।

माँ उसे रोकती थी।

“आरव, उस आईने के पास मत जाया करो।”

आरव हँसता।

“क्यों?”

“क्योंकि वह अच्छा आईना नहीं है।”

“आईना अच्छा या बुरा कैसे हो सकता है?”

माँ के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

लेकिन पिता के पास था।

एक रात उन्होंने दोनों बच्चों को बुलाया।

“मेरी बात ध्यान से सुनो।”

दोनों बच्चे सामने बैठे।

पिता ने कहा—

“इस घर में कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिनके बारे में सवाल नहीं पूछे जाते।”

आरव ने पूछा—

“क्यों?”

पिता ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि कुछ जवाब इंसान को बदल देते हैं।”

उस रात पिता ने दोनों बच्चों को घर के पुराने हिस्से में ले जाकर एक बंद कमरे के सामने खड़ा किया। दरवाज़े पर जंग लगी कुंडी थी और उसके ऊपर सफेद रंग से एक अजीब निशान बना था—एक आँख, जिसके बीचोंबीच लंबी दरार थी।

“यह कमरा कभी मत खोलना,” पिता ने कहा।

अर्जुन ने डरते हुए पूछा, “अंदर क्या है?”

पिता ने जवाब नहीं दिया।

आरव ने दरवाज़े के नीचे से आती ठंडी हवा महसूस की। हवा में मिट्टी, गीले लोहे और किसी पुराने इत्र जैसी गंध मिली हुई थी।

“क्या आईना अंदर है?” आरव ने पूछा।

पिता का चेहरा अचानक पीला पड़ गया।

उन्होंने दोनों बच्चों के कंधे पकड़ लिए।

“अगर कभी अंदर से तुम्हारी अपनी आवाज़ सुनाई दे… तो जवाब मत देना।”

“क्यों?” आरव ने फिर पूछा।

पिता ने धीमे स्वर में कहा—

“क्योंकि वह आवाज़ तुम्हारी नहीं होगी।”

---

2. वर्तमान

अर्जुन ने आँखें खोलीं।

वह फर्श पर पड़ा था।

उसके सामने टूटा हुआ आईना था।

लेकिन दीवार अब सामान्य थी।

कोई प्रतिबिंब नहीं।

कोई बच्चा नहीं।

कोई आवाज़ नहीं।

अर्जुन उठने की कोशिश करने लगा।

उसका सिर भारी था।

तभी उसे जेब में कुछ महसूस हुआ।

उसने हाथ डालकर एक पुरानी चीज़ निकाली।

एक छोटी धातु की चाबी।

चाबी पर नंबर लिखा था—

13

अर्जुन ने उसे ध्यान से देखा।

उसे याद नहीं था कि यह चाबी उसकी जेब में कैसे आई।

फिर ऊपर से आवाज़ आई।

ठक… ठक… ठक…

अर्जुन ने ऊपर देखा।

सीढ़ियों के ऊपर कोई चल रहा था।

वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

हर कदम के साथ आवाज़ साफ होती गई।

ठक…

ठक…

ठक…

ऊपर पहुँचकर उसे एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

गलियारे के दोनों तरफ कमरे थे।

ज्यादातर दरवाज़े खुले थे।

लेकिन सबसे आखिर में एक दरवाज़ा बंद था।

उस पर पीतल की छोटी प्लेट लगी थी।

13

अर्जुन ने अपनी जेब से चाबी निकाली।

कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा।

फिर ताले में डाल दी।

क्लिक।

दरवाज़ा खुल गया।

अंदर बच्चों का कमरा था।

दो बिस्तर।

दो अलमारियाँ।

एक लकड़ी की मेज।

दीवार पर बच्चों की ड्रॉइंग।

और एक कोने में…

दो छोटे कैमरे।

अर्जुन की नजर एक पुराने फोटो एल्बम पर पड़ी।

उसने उसे उठाया।

पहले पन्ने पर तस्वीर थी।

दो बच्चे।

नीचे लिखा था—

“अर्जुन और आरव — उम्र 6 वर्ष।”

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

उसने दूसरा पन्ना पलटा।

उम्र 7 वर्ष।

तीसरा।

उम्र 8 वर्ष।

हर तस्वीर में दोनों भाई साथ थे।

फिर अचानक…

एक पन्ना खाली था।

उसके नीचे सिर्फ तारीख लिखी थी।

23 सितंबर 1998।

अर्जुन ने अगला पन्ना पलटा।

उस पर कोई तस्वीर नहीं थी।

सिर्फ एक वाक्य लिखा था।

“एक बच्चा घर से बाहर गया।”

अर्जुन ने अगला पन्ना पलटा।

“एक बच्चा आईने के पीछे रह गया।”

उसके हाथ से एल्बम गिर गया।

लेकिन एल्बम का पिछला कवर खुला रह गया था। उसके भीतर एक पतली काली पट्टी चिपकी थी। अर्जुन ने उसे खींचकर निकाला। वह किसी पुराने कैमरे की फिल्म जैसी थी।

फिल्म पर छोटे-छोटे फ्रेम बने थे।

पहले फ्रेम में दोनों बच्चे आईने के सामने खड़े थे।

दूसरे में आरव आईने को छू रहा था।

तीसरे में अर्जुन पीछे हट रहा था।

चौथे फ्रेम में आईने के भीतर एक तीसरा चेहरा दिखाई दे रहा था।

अर्जुन ने फिल्म को रोशनी के सामने किया।

उसका दिल बैठ गया।

तीसरा चेहरा उसकी माँ का नहीं था।

वह चेहरा बिल्कुल उसका अपना था।

लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

फिल्म के आखिरी फ्रेम के नीचे लाल स्याही से लिखा था—

“जिसे अंदर जाना था, वह पहले से अंदर था।”

अर्जुन ने फिल्म तुरंत छोड़ दी।

उसी क्षण कमरे के कोने में रखा एक कैमरा अपने आप चालू हो गया।

उसकी लाल बत्ती जल उठी।

फिर कैमरे से एक धीमी आवाज़ निकली—

“रिकॉर्डिंग शुरू।”

अर्जुन ने कैमरे को उठाकर फर्श पर पटक दिया।

कैमरा टूट गया।

लेकिन उसकी स्क्रीन पर आखिरी तस्वीर अब भी चमक रही थी।

उस तस्वीर में अर्जुन कमरे के बीच खड़ा था।

और उसके ठीक पीछे…

आरव खड़ा था।

---

3. आवाज़

कमरे में किसी बच्चे की हँसी गूँजी।

अर्जुन ने तुरंत पीछे देखा।

कोई नहीं।

फिर वही हँसी।

इस बार बिस्तर के नीचे से।

अर्जुन धीरे-धीरे झुका।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं।

उसने टॉर्च नीचे की।

कुछ नहीं।

फिर अचानक एक हाथ बाहर आया।

अर्जुन पीछे गिर गया।

बिस्तर के नीचे से एक छोटा लड़का रेंगकर बाहर आया।

वही चेहरा।

वही आँखें।

वही बच्चा।

आरव।

अर्जुन ने उसे घूरते हुए कहा—

“तुम…”

आरव उठकर खड़ा हो गया।

उसने अपने कपड़ों की धूल झाड़ी।

“तुम्हें बहुत देर लगी।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“तुम असली हो?”

आरव ने हल्की मुस्कान दी।

“तुम्हारे लिए ये सवाल बहुत देर से आया है।”

“तुम आईने के अंदर थे।”

“हाँ।”

“फिर बाहर कैसे आए?”

आरव ने कमरे के कोने की तरफ देखा।

वहाँ दीवार पर एक छोटा-सा आईना लगा था।

“मैं पूरी तरह बाहर नहीं आया।”

अर्जुन ने पूछा—

“तो तुम क्या हो?”

आरव ने उसकी आँखों में देखा।

“तुम्हारा भाई।”

अर्जुन चुप रहा।

“बीस साल से मैं यहाँ हूँ।”

“कैसे?”

“वक्त वहाँ अलग चलता है।”

“कहाँ?”

आरव ने आईने की तरफ इशारा किया।

“उस तरफ।”

अर्जुन ने काँपती आवाज़ में पूछा—

“आईने के पीछे क्या है?”

आरव की मुस्कान गायब हो गई।

“घर।”

“कौन-सा घर?”

“यही घर।”

अर्जुन उलझ गया।

आरव ने समझाया—

“जो घर तुम देख रहे हो, वह बाहर वाला घर है।”

“और अंदर?”

“अंदर भी यही घर है।”

“तो फर्क क्या है?”

आरव ने धीरे से कहा—

“अंदर वाला घर कभी खत्म नहीं होता।”

अर्जुन ने आईने के पास जाकर उसे गौर से देखा। उसमें कमरे का प्रतिबिंब था, लेकिन कुछ चीज़ें उलटी नहीं थीं। मेज पर रखा कैमरा आईने में भी उसी दिशा में पड़ा था। दीवार पर बनी बच्चों की ड्रॉइंग में एक खिड़की थी, जबकि असली दीवार पर कोई खिड़की नहीं थी।

“यह कमरा अलग है,” अर्जुन ने कहा।

आरव ने सिर हिलाया।

“हर आईना अंदर जाने का रास्ता नहीं होता। कुछ सिर्फ देखने के लिए होते हैं। कुछ सुनने के लिए। और कुछ…”

“कुछ क्या?”

“कुछ तुम्हें बदलने के लिए होते हैं।”

अर्जुन ने आईने की सतह पर उँगली रखी।

काँच बर्फ जैसा ठंडा था।

अचानक उसकी उँगली के नीचे से हल्की धड़कन महसूस हुई।

जैसे आईना काँच नहीं, किसी जीवित चीज़ की त्वचा हो।

अर्जुन ने हाथ झटके से पीछे खींच लिया।

आईने के भीतर आरव का प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।

लेकिन असली आरव नहीं मुस्कुरा रहा था।

---

4. आईने का नियम

आरव ने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।

“हमें जल्दी करनी होगी।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसने तुम्हें देख लिया है।”

“किसने?”

आरव ने जवाब नहीं दिया।

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मुझे सच बताओ।”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“इस घर में आईना पहले नहीं था।”

“फिर?”

“उसे तुम्हारे पिता लेकर आए थे।”

अर्जुन चौंका।

“मेरे पिता?”

“हाँ।”

“कहाँ से?”

“एक पुराने मंदिर से।”

अर्जुन ने अविश्वास से कहा—

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

आरव ने धीरे से कहा—

“उन्होंने सोचा था कि आईना उनकी बीमारी ठीक कर सकता है।”

“क्या?”

“तुम्हारे पिता मर रहे थे।”

अर्जुन के चेहरे पर दर्द आ गया।

उसे अपने पिता की कोई स्पष्ट याद नहीं थी।

सिर्फ कुछ धुँधली तस्वीरें।

एक अस्पताल।

एक आदमी।

माँ रो रही थी।

और फिर…

खालीपन।

आरव बोला—

“पापा को एक आदमी मिला था।”

“कौन?”

“उसने कहा था कि आईना इंसान की आत्मा को शरीर से अलग कर सकता है।”

अर्जुन ने डरते हुए पूछा—

“क्यों?”

“क्योंकि मौत के बाद आत्मा को वापस लाया जा सकता है।”

अर्जुन चुप हो गया।

आरव ने आगे कहा—

“लेकिन पापा को नहीं पता था कि आईना आत्मा को वापस नहीं लाता।”

“फिर?”

“वह…”

आरव रुक गया।

“वह किसी और को अंदर से बाहर लाता है।”

कमरे में अचानक तापमान गिर गया।

खिड़की अपने आप खुल गई।

तेज़ हवा अंदर आई।

आरव ने फौरन खिड़की बंद की।

“वह सुन रही है।”

“कौन?”

“जिसे तुमने माँ समझा था।”

अर्जुन ने उसे देखा।

“वह मेरी माँ नहीं थी?”

आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“तो मेरी माँ कहाँ है?”

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

“वह भी अंदर है।”

अर्जुन ने दीवार पर बने पुराने निशान को देखा।

“पापा ने यह सब क्यों किया?”

आरव ने कुछ देर चुप रहकर कहा—

“क्योंकि उन्हें लगा था कि वह सिर्फ अपनी जान बचा रहे हैं।”

“और असल में?”

“उन्होंने घर को एक दरवाज़ा बना दिया।”

“किसके लिए?”

आरव ने धीमे स्वर में कहा—

“उन लोगों के लिए जो मर चुके थे… और उन चीज़ों के लिए जो कभी इंसान थीं ही नहीं।”

अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“क्या पापा भी अंदर हैं?”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“उनकी आवाज़ कभी-कभी आती है।”

“तुमने उनसे बात की?”

“एक बार।”

“उन्होंने क्या कहा?”

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

“उन्होंने कहा था कि अगर अर्जुन वापस आए… तो उसे किसी भी हालत में आईने के सामने अकेला मत छोड़ना।”

अर्जुन ने फुसफुसाकर पूछा—

“क्यों?”

आरव ने उसकी ओर देखा।

“क्योंकि आईना तुम्हें पहचानता है।”

“और अगर वह मुझे पहचानता है तो?”

“तो वह तुम्हें वापस नहीं जाने देगा।”

---

5. माँ

अर्जुन की आँखें भर आईं।

“तुमने उसे देखा?”

आरव ने सिर हिलाया।

“कई बार।”

“वह कैसी है?”

“वही जैसी तुम्हें याद है।”

“वह मुझे पहचानती है?”

आरव ने कहा—

“वह तुम्हें रोज़ पुकारती है।”

अर्जुन के गले में कुछ अटक गया।

“तो मुझे उसे बाहर निकालना होगा।”

आरव ने तुरंत कहा—

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि जो अंदर है… वह बाहर आने के लिए कुछ भी करेगा।”

अर्जुन ने उसे घूरा।

“अगर वो मेरी माँ है तो?”

आरव ने कहा—

“और अगर वो तुम्हारी माँ नहीं हुई तो?”

अर्जुन चुप हो गया।

तभी घर के नीचे से एक महिला की आवाज़ आई।

बहुत धीमी।

बहुत परिचित।

“अर्जुन…”

अर्जुन का शरीर जम गया।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मत जाना।”

फिर आवाज़ आई—

“बेटा…”

अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

“माँ…”

आरव ने जोर से उसका हाथ खींचा।

“वो माँ नहीं है!”

आवाज़ फिर आई।

इस बार बहुत पास से।

“अर्जुन… मुझे बहुत ठंड लग रही है…”

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।

दरवाज़े के नीचे से…

काले पानी जैसी कोई चीज़ अंदर आने लगी।

आरव ने अर्जुन को पीछे खींच लिया।

“वह आ रही है।”

दरवाज़े पर किसी ने धीरे से दस्तक दी।

ठक।

दोनों भाई चुप।

फिर दूसरी दस्तक।

ठक।

फिर तीसरी।

ठक।

और उसके बाद…

एक आवाज़।

“दरवाज़ा खोलो, बेटा।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

वह आवाज़ उसकी माँ की थी।

बिल्कुल वही।

उसी लहजे में।

उसी प्यार के साथ।

लेकिन आरव फुसफुसाया—

“याद रखो…”

“क्या?”

“वह तुम्हें तुम्हारी यादों से बुलाती है।”

दरवाज़े का हैंडल धीरे-धीरे घूमने लगा।

क्लिक।

दरवाज़ा खुलने लगा।

आरव ने अर्जुन का मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया।

दरवाज़ा आधा खुला।

बाहर कोई नहीं था।

गलियारा खाली था।

लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

छोटे-छोटे।

वे निशान धीरे-धीरे कमरे की तरफ आ रहे थे।

और अचानक…

एक बच्ची की आवाज़ आई—

“अर्जुन…”

आरव का चेहरा बदल गया।

“ये कौन है?”

अर्जुन ने पूछा।

आरव ने जवाब नहीं दिया।

फर्श पर एक और पैर का निशान बना।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

जैसे कोई अदृश्य इंसान उनके सामने चल रहा हो।

अचानक वह निशान अर्जुन के पैरों के पास आकर रुक गए।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर…

अर्जुन के कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

“तुमने आरव को नहीं छोड़ा था…”

अर्जुन ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

आवाज़ बोली—

“आरव ने तुम्हें छोड़ा था।”

आरव पीछे हट गया।

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्या मतलब?”

आरव की आँखों में डर था।

वह कुछ कह पाता…

उससे पहले कमरे की दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दी।

और वह परछाईं…

आरव की थी।

लेकिन आरव इस समय दूसरी तरफ खड़ा था।

अर्जुन ने दीवार की तरफ देखा।

परछाईं ने अपना हाथ उठाया।

और दीवार पर लिखा—

“वह तुम्हारा भाई नहीं है।”

अर्जुन ने आरव की तरफ देखा।

आरव की आँखों से आँसू बह रहे थे।

“अर्जुन…”

“तुमने मुझसे क्या छिपाया?”

आरव पीछे हट गया।

“मैं…”

तभी पूरी दीवार पर दरारें पड़ गईं।

कमरे के बीचोंबीच एक काला आईना उभर आया।

उसमें अर्जुन का चेहरा नहीं था।

उसमें बचपन का एक दृश्य चल रहा था।

23 सितंबर 1998।

दो छोटे भाई।

माँ।

पिता।

और वह पुराना आईना।

पिता आईने के सामने खड़े थे।

उन्होंने छोटे अर्जुन को पकड़ा हुआ था।

आरव उनके पीछे रो रहा था।

पिता ने आईने पर हाथ रखा।

और कहा—

“एक को बचाना होगा।”

अर्जुन ने स्क्रीन जैसे दृश्य को देखते हुए फुसफुसाया—

“एक को?”

फिर दृश्य में माँ चीखी।

आरव दौड़कर अर्जुन को पकड़ने लगा।

लेकिन पिता ने उसे पीछे धकेल दिया।

और फिर…

आईने ने अर्जुन को अपने अंदर खींच लिया।

अर्जुन चीखा।

आरव चीखा।

माँ रोती रही।

फिर दृश्य अचानक बंद हो गया।

अर्जुन पीछे हट गया।

उसकी साँसें तेज़ थीं।

“मैं…”

उसने आरव की तरफ देखा।

“मैं आईने के अंदर गया था?”

आरव ने सिर झुका लिया।

“हाँ।”

“फिर बाहर कौन आया?”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में गहरा डर था।

“मैं नहीं जानता।”

अर्जुन की आवाज़ काँप गई।

“तुम नहीं जानते?”

आरव ने धीरे से कहा—

“क्योंकि…”

वह रुक गया।

फिर बोला—

“उस रात घर से जो बच्चा बाहर गया था… वह तुम नहीं थे।”

अर्जुन कुछ नहीं बोला।

आरव पीछे हटता गया।

“मुझे माफ़ कर देना।”

अचानक कमरे की सारी खिड़कियाँ टूट गईं।

हवा का तेज़ झोंका आया।

लाइट बंद हो गई।

और अंधेरे में…

एक आवाज़ गूँजी।

अर्जुन की अपनी आवाज़।

“आरव…”

आरव ने सिर उठाया।

अंधेरे में दो चमकती आँखें दिखाई दीं।

फिर वही आवाज़—

“अब मेरी बारी है।”

अर्जुन ने आरव की तरफ देखा।

आरव गायब था।

सिर्फ फर्श पर उसकी पुरानी घड़ी पड़ी थी।

घड़ी की सुइयाँ रुकी थीं।

2:13।

और घड़ी के पीछे खुदा था—

“पहला दरवाज़ा खुल गया।”

लेकिन घड़ी के नीचे फर्श पर एक और चीज़ पड़ी थी।

एक छोटी, मुड़ी हुई तस्वीर।

अर्जुन ने उसे उठाया।

तस्वीर में दो बच्चे खड़े थे।

एक अर्जुन।

दूसरा आरव।

लेकिन तस्वीर के पीछे किसी ने तीसरे बच्चे का नाम लिखा था—

“अद्वैत।”

अर्जुन ने नाम पढ़ते ही तस्वीर गिरा दी।

उसी क्षण ऊपर की मंज़िल से एक दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

फिर किसी ने बहुत दूर से पुकारा—

“अर्जुन नहीं…”

कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर आवाज़ दोबारा आई—

“आरव…”

अर्जुन ने काँपते हुए ऊपर देखा।

गलियारे के अंत में बंद कमरा नंबर 13 अब खुला हुआ था।

उसके भीतर घना अंधेरा था।

और उस अंधेरे में…

एक बच्चा खड़ा था।

वह बिल्कुल अर्जुन जैसा दिखता था।

लेकिन उसके हाथ में वही पुरानी धातु की चाबी थी।

चाबी पर नंबर अब 13 नहीं था।

उस पर लिखा था—

14

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

“पहला दरवाज़ा खुल गया।”

फिर उसने पीछे हटकर अंधेरे में रास्ता छोड़ दिया।

अर्जुन ने देखा कि कमरे नंबर 13 के भीतर एक और दरवाज़ा था।

उस दरवाज़े पर कोई नंबर नहीं था।

सिर्फ एक नाम लिखा था—

“माँ।”

अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया।

तभी उसके पीछे टूटा हुआ आईना अपने आप जुड़ने लगा।

काँच के टुकड़े हवा में उठे और एक-दूसरे से चिपकते गए।

कुछ ही सेकंड में आईना फिर से पूरा हो गया।

उसकी सतह पर अर्जुन का प्रतिबिंब दिखाई दिया।

लेकिन प्रतिबिंब के पीछे आरव खड़ा था।

आरव ने काँच के भीतर से अपना हाथ उठाया।

उसके होंठ हिले—

“मत आना।”

अर्जुन ने आईने के पास जाकर हाथ रखा।

इस बार काँच के दूसरी तरफ से किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं।

और फिर आईने के भीतर से उसकी माँ की आवाज़ आई—

“बेटा, अब घर लौट आओ।”

अर्जुन ने हाथ खींचना चाहा।

लेकिन उसकी हथेली काँच से चिपक चुकी थी।

आईने के भीतर का गलियारा फैलने लगा।

कमरा नंबर 13 दूर होता गया।

दीवारें लंबी होती गईं।

और अंधेरे में एक-एक करके कई दरवाज़े दिखाई देने लगे।

हर दरवाज़े पर एक नाम लिखा था।

अर्जुन।

आरव।

माँ।

पिता।

अद्वैत।

सबसे आखिरी दरवाज़े पर कोई नाम नहीं था।

वहाँ सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

“जिसे तुम देख रहे हो, वह तुम्हें देख रहा है।”

अर्जुन ने चीखने की कोशिश की।

लेकिन उसकी आवाज़ बाहर नहीं निकली।

आईने के भीतर खड़ा आरव अचानक उसके पास आया।

उसने काँच पर हथेली रखी और फुसफुसाया—

“अगर तुम अंदर आए… तो बाहर कौन जाएगा?”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

पीछे से किसी ने उसके कान में कहा—

“इस बार चुनाव तुम्हारा होगा।”

आईने की सतह पर दरार पड़ी।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

अर्जुन ने पूरी ताकत से हाथ खींचा।

काँच टूट गया।

कमरा अंधेरे में डूब गया।

जब उसकी आँखें खुलीं, वह फिर कमरे नंबर 13 के बाहर खड़ा था।

गलियारा खाली था।

आईना गायब था।

आरव गायब था।

लेकिन उसकी हथेली पर खून से एक शब्द लिखा था—

“अद्वैत।”

अर्जुन ने काँपते हुए वह नाम पढ़ा।

तभी नीचे से किसी ने दरवाज़ा बंद किया।

धड़ाम।

घर के भीतर सभी घड़ियाँ एक साथ चलने लगीं।

टिक…

टिक…

टिक…

और फिर पूरे घर में एक ही आवाज़ गूँजी—

“दूसरा दरवाज़ा खुलने वाला है।”

एपिसोड 2 समाप्त।

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

Horror, mystery · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories