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एपिसोड 3 — वह औरत

firoj saifi · Ghost Stories · 16 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
Horror, mystery
Chapter
3 of 3
Category
Ghost Stories
Reading time
16 min
Words
3051
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रात के 2 बजकर 13 मिनट।

घर बिल्कुल शांत था।

इतना शांत कि अर्जुन को अपनी साँसों की आवाज़ भी बहुत तेज़ लग रही थी।

उसके सामने फर्श पर आरव की घड़ी पड़ी थी।

घड़ी की सुइयाँ वहीं रुकी थीं।

2:13।

अर्जुन ने घड़ी उठाई।

उसके पीछे खुदे शब्द अभी भी साफ़ थे—

“पहला दरवाज़ा खुल गया।”

अर्जुन ने धीरे से कहा—

“कौन-सा दरवाज़ा?”

कोई जवाब नहीं।

उसने कमरे के चारों तरफ देखा।

आरव गायब था।

कुछ सेकंड पहले तक वह उसके सामने खड़ा था।

अब…

कुछ नहीं।

अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।

गलियारा खाली था।

लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

वे निशान कमरे से बाहर जा रहे थे।

अर्जुन ने टॉर्च जलाई और उनके पीछे चल पड़ा।

पैरों के निशान सीढ़ियों तक गए।

फिर नीचे।

फिर मुख्य हॉल तक।

और वहाँ जाकर अचानक गायब हो गए।

अर्जुन ने चारों तरफ रोशनी घुमाई।

कुछ नहीं।

फिर उसे एक धीमी आवाज़ सुनाई दी।

“अर्जुन…”

वह पलटा।

हॉल के दूसरे छोर पर एक औरत खड़ी थी।

सफेद कपड़े।

लंबे बाल।

चेहरा बालों से ढका हुआ।

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—

“आप कौन हैं?”

औरत ने धीरे से सिर उठाया।

“तुम्हें मुझे पहचानना चाहिए।”

अर्जुन ने उसकी तरफ टॉर्च की रोशनी की।

औरत के चेहरे का आधा हिस्सा दिखाई दिया।

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

“माँ?”

औरत ने मुस्कुराया।

“हाँ, बेटा।”

अर्जुन उसके पास जाने लगा।

लेकिन अचानक उसे आरव की बात याद आई—

“वह माँ नहीं है।”

अर्जुन वहीं रुक गया।

औरत ने हाथ बढ़ाया।

“आओ।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

औरत की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

“तुम अपनी माँ से डरते हो?”

“आप मेरी माँ नहीं हैं।”

कुछ सेकंड तक औरत बिल्कुल शांत रही।

फिर उसने अपने बाल पीछे किए।

अर्जुन ने पहली बार उसका पूरा चेहरा देखा।

चेहरा उसकी माँ का था।

लेकिन आँखें…

आँखें बिल्कुल काली थीं।

उनमें सफेद हिस्सा नहीं था।

अर्जुन पीछे हट गया।

औरत ने धीरे से कहा—

“तुम्हें किसने बताया कि मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

“आरव ने?”

अर्जुन चौंक गया।

“हाँ।”

औरत हँसी।

एक ऐसी हँसी जो इंसानी नहीं लग रही थी।

“आरव…”

उसने नाम को ऐसे दोहराया जैसे किसी पुराने दुश्मन का नाम हो।

“तुम अभी भी उस पर भरोसा करते हो?”

अर्जुन ने पूछा—

“वह मेरा भाई है।”

औरत की आँखें चमक उठीं।

“क्या तुम्हें यकीन है?”

“हाँ।”

“तो फिर उसे ढूँढो।”

औरत पीछे हटने लगी।

“कहाँ?”

उसने आईने की तरफ इशारा किया।

“जहाँ वह हमेशा से था।”

फिर वह अचानक गायब हो गई।

अर्जुन कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।

फिर उसने देखा…

हॉल की दीवार पर वही पुराना आईना मौजूद था।

लेकिन वह टूटा हुआ नहीं था।

बिल्कुल नया।

साफ़।

और उसके अंदर…

आरव खड़ा था।

---

1. आईने के अंदर

आरव ने काँच के दूसरी तरफ से हाथ उठाया।

अर्जुन उसके पास गया।

“आरव!”

आरव ने कुछ कहा, लेकिन आवाज़ नहीं आई।

अर्जुन ने काँच पर हाथ रखा।

आरव ने भी हाथ रखा।

दोनों के हाथों के बीच काँच था।

अर्जुन ने पूछा—

“तुम ठीक हो?”

आरव ने सिर हिलाया।

फिर उसने पीछे देखने के लिए इशारा किया।

अर्जुन ने आईने के अंदर देखा।

पीछे एक लंबा गलियारा था।

लेकिन वह गलियारा उस घर में नहीं था।

या शायद…

था।

आईने के अंदर का घर बिल्कुल वैसा ही था।

बस बहुत पुराना।

दीवारों पर काली नमी।

फर्श पर पानी।

छत से लटकते बल्ब।

और हर कमरे में आईने।

छोटे।

बड़े।

टूटे हुए।

कुछ उल्टे।

कुछ दीवारों पर।

कुछ जमीन पर।

हर आईने में अलग-अलग लोग दिखाई दे रहे थे।

एक बूढ़ा आदमी।

एक बच्ची।

एक महिला।

एक सैनिक।

एक युवक।

कुछ रो रहे थे।

कुछ चिल्ला रहे थे।

और कुछ सिर्फ अर्जुन को देख रहे थे।

आरव ने काँच पर लिखा—

“ये सब यहाँ फँसे हैं।”

अर्जुन ने पूछा—

“कितने लोग?”

आरव ने सिर हिलाया।

वह संख्या नहीं बता सकता था।

फिर उसने एक और शब्द लिखा—

“बहुत।”

अर्जुन ने पूछा—

“तुम बाहर क्यों नहीं आ सकते?”

आरव ने अपनी हथेली दिखाई।

उसकी हथेली पर काली नसें फैल रही थीं।

फिर उसने अपना सीना दिखाया।

वहाँ भी वही निशान थे।

अर्जुन डर गया।

“तुम्हारे साथ क्या हुआ?”

आरव ने जवाब नहीं दिया।

उसने आईने के नीचे की तरफ इशारा किया।

वहाँ एक छोटा-सा वाक्य लिखा था—

“जिसने अंदर कदम रखा, उसका प्रतिबिंब बाहर रह जाता है।”

अर्जुन ने धीरे-धीरे पढ़ा।

“तो…”

उसने आरव की तरफ देखा।

“तुम्हारा प्रतिबिंब बाहर है?”

आरव ने सिर हिलाया।

अर्जुन की रीढ़ में ठंड उतर गई।

“कहाँ?”

आरव ने उसकी तरफ इशारा किया।

अर्जुन ने पीछे देखा।

हॉल खाली था।

फिर उसकी नजर आईने पर गई।

आईने में अर्जुन खड़ा था।

लेकिन…

उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।

अर्जुन पीछे हट गया।

आरव ने जोर से काँच पर हाथ मारा।

धड़ाम!

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

आरव चिल्ला रहा था—

लेकिन आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी।

फिर आईने के अंदर एक परछाईं दिखाई दी।

आरव उसके पीछे छिप गया।

एक लंबी आकृति।

बहुत लंबी।

मानव जैसी।

लेकिन उसके हाथ जमीन तक पहुँच रहे थे।

वह धीरे-धीरे आरव के पीछे खड़ी हो गई।

अर्जुन ने डरते हुए पूछा—

“ये क्या है?”

आरव ने दोनों हाथों से सिर ढक लिया।

अचानक पूरे आईने पर धुंध छा गई।

और उस धुंध पर उँगली से शब्द लिखे गए—

“मत देखो।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

लेकिन तब तक…

बहुत देर हो चुकी थी।

---

2. पुराने घर का इतिहास

अर्जुन ने उसी रात घर की लाइब्रेरी खोजनी शुरू की।

उसे यकीन था कि इस घर में पुराने रिकॉर्ड होंगे।

शायद कोई डायरी।

कोई दस्तावेज़।

कुछ ऐसा जो उसे समझा सके कि यह आईना कहाँ से आया।

लाइब्रेरी में सैकड़ों किताबें थीं।

अधिकतर किताबें नमी से खराब हो चुकी थीं।

एक लकड़ी की अलमारी के पीछे उसे लोहे का छोटा संदूक मिला।

ताला लगा था।

अर्जुन ने अपने बैग से चाकू निकाला।

ताला तोड़ने में कुछ मिनट लगे।

संदूक खुला।

अंदर पुराने कागज़।

कुछ तस्वीरें।

और एक काली डायरी।

डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

“डॉ. देवेंद्र शर्मा।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

उसके पिता का नाम…

देवेंद्र शर्मा था।

उसने डायरी खोल दी।

पहला पन्ना।

“मैंने आज पहली बार उसे देखा।”

अगला।

“वह सिर्फ आईना नहीं है।”

अगला।

“उसमें किसी और जगह की छवि दिखाई देती है।”

अगला।

“मैंने उससे बात की।”

अर्जुन के हाथ काँप रहे थे।

उसने अगला पन्ना पलटा।

“उसने मुझे मेरे मर चुके पिता की आवाज़ में जवाब दिया।”

फिर—

“वह मेरी हर याद जानता है।”

अर्जुन पढ़ता गया।

डायरी के अनुसार, उसके पिता को यह आईना एक पुराने पहाड़ी मंदिर के नीचे मिला था।

वहाँ पत्थर पर कुछ शब्द लिखे थे।

“दर्पण द्वार नहीं है। दर्पण भूख है।”

देवेंद्र ने इस चेतावनी को नजरअंदाज किया।

उसने प्रयोग शुरू किए।

पहले चूहों पर।

फिर छोटे जानवरों पर।

फिर…

इंसानों पर।

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

उसने पन्ना पलटा।

एक सूची थी।

नाम।

उम्र।

तारीख।

और हर नाम के सामने एक शब्द।

“अंदर।”

कुछ नामों पर लिखा था—

“वापस आया।”

कुछ पर—

“नकल।”

और कुछ के सामने…

“अज्ञात।”

अर्जुन की नजर आखिरी दो नामों पर रुकी।

आरव शर्मा — उम्र 10 — अंदर।

अर्जुन शर्मा — उम्र 10 — वापस आया।

अर्जुन ने डायरी नीचे गिरा दी।

उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था।

उसने फौरन आखिरी पन्ना खोला।

वहाँ उसके पिता की लिखावट में एक वाक्य था—

“अगर दोनों बच्चे एक साथ बाहर आ जाएँ, तो समझ लेना कि उनमें से कोई एक मेरा बेटा नहीं है।”

अर्जुन के हाथ ठंडे पड़ गए।

---

3. असली बच्चा कौन?

तभी पीछे से आवाज़ आई।

“तुमने डायरी पढ़ ली।”

अर्जुन पलटा।

आरव दरवाज़े पर खड़ा था।

लेकिन इस बार वह आईने के अंदर नहीं था।

वह कमरे के अंदर था।

अर्जुन ने उसे घूरा।

“तुम यहाँ कैसे आए?”

आरव चुप रहा।

अर्जुन ने डायरी उठाई।

“ये क्या है?”

आरव ने कहा—

“पापा ने बहुत गलतियाँ की थीं।”

“तुम मुझे सच क्यों नहीं बताते?”

“क्योंकि तुम्हें याद नहीं रहना चाहिए।”

“क्यों?”

आरव ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि अगर तुम्हें सब याद आ गया…”

वह रुक गया।

“तो तुम बदल जाओगे।”

अर्जुन ने कहा—

“मैं पहले ही बदल चुका हूँ।”

आरव ने सिर झुका लिया।

“नहीं।”

“तो कौन बदला?”

आरव ने धीरे से कहा—

“तुम नहीं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अर्जुन ने डायरी का आखिरी पन्ना उसके सामने कर दिया।

“यहाँ लिखा है कि जो बच्चा वापस आया… वह नकल हो सकता है।”

आरव ने कहा—

“हाँ।”

“तो क्या मैं…”

वह वाक्य पूरा नहीं कर पाया।

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“मैं तुम्हें कुछ दिखाता हूँ।”

उसने अपनी जेब से एक पुरानी फोटो निकाली।

तस्वीर में दो बच्चे थे।

अर्जुन और आरव।

लेकिन आरव ने तस्वीर के पीछे लिखा एक वाक्य दिखाया।

“जिस बच्चे की परछाईं नहीं थी, वही बाहर गया।”

अर्जुन ने तस्वीर को रोशनी में देखा।

दोनों बच्चे दीवार के सामने खड़े थे।

एक की परछाईं साफ़ थी।

दूसरे की…

नहीं थी।

अर्जुन ने तस्वीर अपने चेहरे के करीब की।

“ये कौन है?”

आरव ने कहा—

“तुम।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“नहीं…”

“उस रात तुमने आईने में कदम रखा था।”

“फिर?”

“तुम वापस नहीं आए।”

“तो?”

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

“जो बाहर आया…”

वह रुक गया।

“वह तुम्हारी शक्ल में कुछ और था।”

अर्जुन के चेहरे पर डर फैल गया।

“तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”

आरव ने कहा—

“क्योंकि मुझे लगा था कि शायद…”

“शायद क्या?”

“शायद तुम्हारे अंदर अब भी मेरा भाई बचा हो।”

अर्जुन ने धीरे से पूछा—

“और अगर नहीं?”

आरव ने जवाब नहीं दिया।

तभी कमरे की दीवार पर टंगी घड़ी अपने आप चलने लगी।

टिक…

टिक…

टिक…

सुइयाँ तेजी से घूमने लगीं।

और फिर रुक गईं।

2:13।

आरव का चेहरा बदल गया।

“वह आ गई।”

“कौन?”

“वही औरत।”

---

4. माँ का कमरा

घर की सबसे ऊपर वाली मंज़िल से एक आवाज़ आई।

एक महिला रो रही थी।

“अर्जुन…”

अर्जुन ने ऊपर देखा।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मत जाना।”

लेकिन अर्जुन ने हाथ छुड़ा लिया।

“अगर वह मेरी माँ है तो?”

“वह नहीं है।”

“तुम्हें कैसे पता?”

आरव ने जवाब दिया—

“क्योंकि मेरी माँ…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मेरी माँ मर चुकी है।”

अर्जुन ने उसे देखा।

“तो वो कौन है?”

आरव ने कहा—

“वह उस औरत की आवाज़ है जिसने हमारे परिवार को खत्म किया।”

दोनों ऊपर गए।

सबसे ऊपर एक दरवाज़ा था।

दरवाज़े पर कोई नंबर नहीं था।

बस लकड़ी पर एक निशान बना था।

एक आईना।

अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।

कमरे में सिर्फ एक बिस्तर था।

दीवार पर पुराने खिलौने।

एक कुर्सी।

और सामने…

एक बहुत बड़ा आईना।

आईने के सामने उसकी माँ बैठी थी।

पीठ उनकी तरफ।

अर्जुन की आँखें भर आईं।

“माँ…”

औरत ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

“बेटा।”

अर्जुन आगे बढ़ा।

आरव पीछे रह गया।

“तुम मुझे याद करती हो?”

औरत मुस्कुराई।

“हर दिन।”

“तुम यहाँ कितने साल से हो?”

“बहुत लंबे समय से।”

“मुझे क्यों नहीं बचाया?”

औरत की आँखों से आँसू निकल आए।

“मैंने कोशिश की थी।”

“किससे?”

“तुम्हारे पिता से।”

अर्जुन रुक गया।

“पापा ने क्या किया था?”

औरत ने आईने की तरफ देखा।

“उन्होंने सोचा कि मौत को हराया जा सकता है।”

“और?”

“उन्होंने अपने बच्चों में से एक को चुना।”

अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“किसे?”

औरत ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें।”

आरव अचानक कमरे में आगे आया।

“झूठ!”

औरत ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखें काली हो गईं।

“तुम बीच में मत बोलो।”

आरव पीछे हट गया।

अर्जुन ने पूछा—

“पापा ने मुझे क्यों चुना?”

औरत ने कहा—

“क्योंकि तुम कमजोर थे।”

अर्जुन की आँखों में गुस्सा आ गया।

“क्या?”

“तुम्हें बचाना आसान था।”

“और आरव?”

“आरव…”

औरत मुस्कुराई।

“आरव को उन्होंने आईने में जाने दिया।”

अर्जुन ने आरव की तरफ देखा।

“क्यों?”

आरव चुप था।

औरत बोली—

“क्योंकि तुम्हारे पिता को एक शरीर चाहिए था।”

“किसके लिए?”

औरत ने आईने की तरफ देखा।

आईने के अंदर अब एक तीसरा चेहरा दिखाई दे रहा था।

एक बूढ़ा आदमी।

अर्जुन उसे पहचानता था।

उसका पिता।

देवेंद्र शर्मा।

वह आईने के अंदर से मुस्कुरा रहा था।

अर्जुन की साँस रुक गई।

“पापा…”

आईने के अंदर बूढ़े आदमी ने अपना हाथ उठाया।

फिर उसने होंठ हिलाए।

“बेटा…”

अर्जुन आगे बढ़ा।

आरव ने उसे रोकने की कोशिश की।

“मत छूना!”

लेकिन अर्जुन ने आईने पर हाथ रख दिया।

काँच ठंडा था।

फिर…

आईने के अंदर उसके पिता ने भी अपना हाथ उसके हाथ पर रखा।

काँच के दोनों तरफ हाथ जुड़ गए।

देवेंद्र ने कहा—

“तुम्हें वापस लाने के लिए मुझे एक दूसरा शरीर बनाना पड़ा।”

अर्जुन काँप गया।

“दूसरा शरीर?”

देवेंद्र मुस्कुराया।

“तुम्हारा भाई।”

आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

“पापा…”

देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने अपना काम पूरा कर दिया।”

“कौन-सा काम?”

“उसे वापस लाना।”

आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं…”

देवेंद्र ने कहा—

“अब आईना बंद होगा।”

अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

सारे आईने काले पड़ गए।

माँ की आवाज़ चीख में बदल गई।

“अर्जुन! पीछे हटो!”

अर्जुन ने आईने से हाथ हटाया।

बहुत देर हो चुकी थी।

उसकी हथेली पर काली रेखाएँ फैलने लगीं।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं!”

अर्जुन ने दर्द से चीखते हुए पूछा—

“मेरे साथ क्या हो रहा है?”

आरव रोते हुए बोला—

“वह तुम्हें अंदर खींच रहा है।”

आईने के अंदर से अर्जुन के पिता ने हाथ बढ़ाया।

फिर दूसरा हाथ।

फिर पूरा शरीर।

ऐसा लग रहा था जैसे वह काँच से बाहर निकल रहा हो।

अर्जुन पीछे हटता गया।

लेकिन उसके पैर जमीन से चिपक चुके थे।

देवेंद्र बाहर आने लगा।

उसका चेहरा आधा इंसान था।

आधा काँच जैसा।

आरव ने पास पड़ी लोहे की कुर्सी उठाई।

“अर्जुन, आँखें बंद करो!”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

आरव ने पूरी ताकत से आईने पर कुर्सी मारी।

धड़ाम!

आईने में दरार पड़ी।

देवेंद्र की चीख गूँजी।

आरव ने दूसरी बार मारा।

धड़ाम!

आईना टूटने लगा।

तीसरी बार…

चटाक!

आईना पूरी तरह टूट गया।

अर्जुन जमीन पर गिर पड़ा।

कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं हुई।

फिर…

एक छोटे बच्चे की आवाज़ आई।

“भैया…”

अर्जुन ने आँखें खोलीं।

उसके सामने आरव खड़ा था।

लेकिन आरव की आँखें पूरी तरह काली थीं।

उसके पीछे…

उसकी माँ खड़ी थी।

और माँ के पीछे…

देवेंद्र।

तीनों एक साथ अर्जुन को देख रहे थे।

आरव ने धीरे से कहा—

“अब तुम्हें चुनना होगा।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्या?”

आरव ने कहा—

“तुम बाहर रहोगे…”

वह कुछ सेकंड रुका।

“…या हम।”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगा।”

आरव मुस्कुराया।

“तुमने यही बात बीस साल पहले भी कही थी।”

अर्जुन जम गया।

“मुझे कुछ याद नहीं…”

आरव की मुस्कान गायब हो गई।

“यही तो समस्या है।”

अचानक कमरे की दीवार पर एक नया आईना दिखाई दिया।

उसमें एक दृश्य चल रहा था।

दस साल का अर्जुन।

दस साल का आरव।

उनकी माँ।

उनके पिता।

और फिर…

वही रात।

लेकिन इस बार दृश्य में कुछ ऐसा दिखाई दिया जो पहले नहीं दिखा था।

छोटा अर्जुन खुद आईने के सामने खड़ा था।

वह रो रहा था।

आरव उसका हाथ पकड़ रहा था।

और तभी…

छोटे अर्जुन ने आरव को धक्का दे दिया।

आरव आईने के अंदर गिर गया।

अर्जुन बाहर रह गया।

फिर छोटे अर्जुन ने आईने की तरफ देखा।

और मुस्कुराया।

अर्जुन वर्तमान में पीछे हट गया।

“नहीं…”

वह दृश्य जारी रहा।

छोटा अर्जुन अपने पिता की तरफ गया।

देवेंद्र ने उसके सिर पर हाथ रखा।

और कहा—

“अब कोई तुम्हें कभी पहचान नहीं पाएगा।”

दृश्य खत्म हो गया।

अर्जुन की आँखों में डर भर गया।

आरव ने धीमी आवाज़ में कहा—

“तुमने मुझे नहीं बचाया था।”

“तुमने मुझे अंदर भेजा था।”

अर्जुन रो पड़ा।

“मुझे याद नहीं था…”

“क्योंकि उसने तुम्हारी यादें मिटा दी थीं।”

“किसने?”

आरव ने आईने की तरफ देखा।

“जिसे तुम माँ समझ रहे थे।”

अर्जुन ने पीछे देखा।

वह औरत अब मुस्कुरा रही थी।

उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

माँ का चेहरा गायब हुआ।

उसकी जगह एक बिल्कुल अलग चेहरा दिखाई दिया।

बहुत बूढ़ा।

बहुत सफेद।

आँखें गहरी।

होंठों पर अस्वाभाविक मुस्कान।

उसने कहा—

“मुझे पहचानने में तुम्हें बीस साल लग गए।”

अर्जुन काँप गया।

“तुम कौन हो?”

वह औरत आगे बढ़ी।

“मैंने तुम्हें बनाया है।”

“क्यों?”

“क्योंकि आईना अकेला भूखा था।”

उसने अर्जुन के चेहरे को देखा।

“उसे एक चेहरा चाहिए था।”

“मेरा?”

“नहीं।”

वह मुस्कुराई।

“तुम्हारे भाई का।”

आरव पीछे हट गया।

उसकी आँखों में पहली बार सच्चा डर दिखाई दिया।

औरत ने हाथ उठाया।

पूरा कमरा काँपने लगा।

सभी आईने एक साथ टूट गए।

और हर टूटे हुए टुकड़े में…

एक ही चेहरा दिखाई दे रहा था।

आरव।

अर्जुन ने अपने भाई की तरफ देखा।

आरव ने धीरे से कहा—

“भागो।”

“लेकिन तुम—”

“भागो!”

अर्जुन दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

दरवाज़ा खुला।

वह गलियारे में पहुँचा।

लेकिन गलियारा बदल चुका था।

अब वहाँ दर्जनों दरवाज़े थे।

हर दरवाज़े पर एक नाम लिखा था।

माँ।

पिता।

आरव।

अर्जुन।

और सबसे आखिरी दरवाज़े पर…

कोई नाम नहीं था।

सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

“जिस कमरे में तुम पैदा हुए थे, उसी कमरे में तुम्हारी मौत लिखी गई थी।”

अर्जुन उस दरवाज़े के सामने खड़ा रह गया।

पीछे से कदमों की आवाज़ आने लगी।

ठक…

ठक…

ठक…

अर्जुन ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

गलियारे के अंत में…

एक आदमी खड़ा था।

वह अर्जुन जैसा दिखता था।

लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

उसने कहा—

“अब तुम्हें चुनने की जरूरत नहीं है।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्यों?”

वह आदमी मुस्कुराया।

“क्योंकि मैं चुन चुका हूँ।”

उसने अपना हाथ उठाया।

गलियारे के सभी दरवाज़े एक साथ खुल गए।

हर कमरे से अलग-अलग आवाज़ें आने लगीं।

रोना।

चीखें।

बच्चों की हँसी।

और एक आवाज़…

अर्जुन की माँ की।

“अर्जुन… पीछे मत देखना।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

लेकिन उसके ठीक पीछे किसी ने फुसफुसाया—

“बहुत देर हो चुकी है।”

उसने आँखें खोलीं।

सामने दीवार पर एक आईना था।

आईने में अर्जुन नहीं था।

वहाँ…

आरव खड़ा था।

और आरव के पीछे…

सैकड़ों लोग।

सभी एक साथ अर्जुन को देख रहे थे।

फिर आरव ने होंठ हिलाए—

“अगला दरवाज़ा तुम्हारा है।”

आईना काला हो गया।

और घर के बाहर…

दूर जंगल में…

एक कार की हेडलाइट दिखाई दी।

कोई देवगढ़ पहुँच चुका था।

कोई ऐसा…

जिसे अर्जुन बिल्कुल नहीं जानता था।

कार से एक आदमी उतरा।

उसने घर की तरफ देखा।

फिर अपनी जेब से अर्जुन की एक पुरानी तस्वीर निकाली।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

“अगर अर्जुन वापस आए, तो उसे आईने तक पहुँचने मत देना।”

आदमी ने तस्वीर मोड़ी।

और धीरे से कहा—

“बहुत देर हो चुकी है।”

कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है।

पुराना घर दिखाई देता है।

दूसरी मंज़िल की खिड़की में…

एक बच्चा खड़ा है।

फिर उसके पीछे दूसरा।

फिर तीसरा।

फिर चौथा।

सभी के चेहरे…

एक जैसे हैं।

और सबसे आगे खड़ा बच्चा कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुराता है।

“क्या तुम भी आईने में देखोगे?”

एपिसोड 3 समाप्त।

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