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एपिसोड 4 — सातवाँ चेहरा

firoj saifi · Ghost Stories · 16 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
Horror, mystery
Chapter
4 of 5
Category
Ghost Stories
Reading time
16 min
Words
3068
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रात के ठीक 2 बजकर 13 मिनट थे।

देवगढ़ की पहाड़ियों पर घना कोहरा उतर चुका था।

पुराना घर दूर से किसी मरे हुए जानवर की तरह दिखाई दे रहा था—बड़ा, खामोश और अंधेरे में डूबा हुआ।

लेकिन उस घर की दूसरी मंज़िल की एक खिड़की में अब भी रोशनी थी।

अंदर अर्जुन खड़ा था।

उसके सामने दीवार पर लगा आईना काला पड़ चुका था।

कुछ सेकंड पहले तक उसमें सैकड़ों चेहरे दिखाई दे रहे थे।

अब कुछ भी नहीं था।

सिर्फ काला शीशा।

अर्जुन ने अपना हाथ आईने पर रखा।

ठंड।

इतनी ठंड कि उसकी उँगलियाँ सुन्न होने लगीं।

उसने हाथ तुरंत पीछे खींच लिया।

पीछे से आवाज़ आई—

“अर्जुन…”

वह पलटा।

कोई नहीं।

फिर आवाज़ आई—

“अर्जुन…”

इस बार आवाज़ बहुत पास थी।

उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

आईने के काले शीशे में अब एक चेहरा दिखाई दे रहा था।

आरव का चेहरा।

लेकिन आरव अकेला नहीं था।

उसके पीछे छह और चेहरे थे।

सात बच्चे।

सभी की उम्र लगभग दस साल।

सभी के चेहरे एक जैसे।

सभी अर्जुन को देख रहे थे।

अर्जुन पीछे हट गया।

“तुम लोग कौन हो?”

सबसे आगे खड़े बच्चे ने होंठ हिलाए।

आवाज़ नहीं आई।

फिर अचानक बाकी छह बच्चों ने एक साथ बोलना शुरू किया।

“हम वो हैं… जिन्हें तुम भूल गए।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“मैंने तुम्हें कभी देखा तक नहीं।”

सातों बच्चे एक साथ मुस्कुराए।

“यही तो चाहते थे हम।”

अचानक आईने पर एक दरार पड़ी।

चटाक!

अर्जुन पीछे हट गया।

दरार फैलती गई।

लेकिन आईना टूटा नहीं।

दरार के बीच से एक छोटी-सी आँख दिखाई दी।

एक इंसानी आँख।

वह अर्जुन को घूर रही थी।

फिर आँख के अंदर एक दृश्य उभरा।

एक पुराना कमरा।

एक मेज।

उस पर सात छोटी धातु की प्लेटें।

हर प्लेट पर एक नंबर।

1

2

3

4

5

6

7

और कमरे के बीच में खड़ा था…

देवेंद्र शर्मा।

अर्जुन के पिता।

उसके सामने सात बच्चे खड़े थे।

लेकिन वे बच्चे अर्जुन और आरव जैसे नहीं थे।

अलग-अलग चेहरे।

अलग-अलग कपड़े।

अलग-अलग उम्र।

देवेंद्र ने एक काली किताब खोली।

“आज आखिरी परीक्षण है।”

बच्चों में से एक रोने लगा।

“हमें घर जाना है।”

देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

“तुम घर जा चुके हो।”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“नहीं…”

देवेंद्र मुस्कुराया।

“अब यह तुम्हारा घर है।”

अर्जुन ने आईने की तरफ देखते हुए फुसफुसाया—

“नहीं…”

दृश्य बदल गया।

एक बच्चा आईने के सामने खड़ा था।

देवेंद्र ने उसका हाथ पकड़ा।

आईने में बच्चे का प्रतिबिंब दिखाई दिया।

फिर…

प्रतिबिंब ने बच्चे की नकल करना बंद कर दिया।

बच्चा दाएँ हाथ को उठाता था।

प्रतिबिंब बाएँ हाथ को उठाता।

बच्चा पीछे हटता।

प्रतिबिंब आगे आता।

फिर प्रतिबिंब मुस्कुराया।

असली बच्चा रो पड़ा।

देवेंद्र ने कहा—

“यही है।”

अचानक आईने के अंदर से हाथ निकला।

बच्चे को पकड़ लिया।

और खींचकर अंदर ले गया।

अर्जुन ने चीखकर कहा—

“बस!”

दृश्य बंद हो गया।

आईना फिर काला हो गया।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर पीछे से किसी ने कहा—

“अब तुम्हें सब कुछ जानना पड़ेगा।”

अर्जुन ने मुड़कर देखा।

वही आदमी खड़ा था जिसे उसने कुछ देर पहले घर के बाहर देखा था।

काले कपड़े।

लगभग पचास साल की उम्र।

हाथ में पुराना चमड़े का बैग।

चेहरा थका हुआ।

लेकिन आँखें बेहद सतर्क।

अर्जुन ने तुरंत पूछा—

“तुम कौन हो?”

आदमी ने जवाब नहीं दिया।

उसने कमरे को देखा।

फिर टूटा हुआ आईना।

फिर अर्जुन।

“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

अर्जुन ने गुस्से में कहा—

“ये मेरा घर है।”

आदमी ने धीरे से सिर हिलाया।

“नहीं।”

“क्या मतलब?”

“यह कभी तुम्हारा घर था।”

अर्जुन उसके करीब गया।

“तुम मेरे पिता को जानते थे?”

आदमी के चेहरे पर हल्की घबराहट आई।

“हाँ।”

“कौन हो तुम?”

आदमी ने कुछ सेकंड सोचा।

फिर बोला—

“मेरा नाम कबीर है।”

अर्जुन चुप रहा।

कबीर ने अपना बैग खोला।

उसमें पुराने कागज़, तस्वीरें और कुछ रिकॉर्डिंग थीं।

उसने एक फोटो अर्जुन की तरफ बढ़ाई।

अर्जुन ने फोटो ली।

तस्वीर देखकर उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं।

तस्वीर में उसके पिता थे।

उनके साथ…

एक जवान आदमी।

अर्जुन ने तुरंत कबीर की तरफ देखा।

“ये तुम हो?”

कबीर ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“तुम मेरे पिता के साथ क्या कर रहे थे?”

“उन्हें रोकने की कोशिश।”

“लेकिन तुमने उन्हें रोका क्यों नहीं?”

कबीर ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि मैं डर गया था।”

“किससे?”

कबीर ने आईने की तरफ देखा।

“उससे।”

---

2. कबीर का सच

कबीर ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया।

“हमें यहाँ ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्यों?”

“क्योंकि 2:13 के बाद यह घर जागता है।”

अर्जुन ने घड़ी देखी।

2:14।

“तो अब?”

कबीर ने कहा—

“अब हमें जल्दी करनी होगी।”

“आरव कहाँ है?”

कबीर चुप रहा।

“तुम उसे जानते हो?”

“हाँ।”

“वह जिंदा है?”

कबीर ने सीधा जवाब नहीं दिया।

“वह जो तुमने देखा… वह पूरा आरव नहीं था।”

अर्जुन की आँखों में डर उतर आया।

“तो क्या है?”

“याद।”

“क्या?”

“आरव की याद।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मुझे समझ नहीं आ रहा।”

कबीर ने कहा—

“आईने के अंदर समय नहीं चलता। वहाँ यादें शरीर की जगह ले लेती हैं। जो लोग अंदर जाते हैं, उनकी यादें धीरे-धीरे अलग होकर जीवित हो जाती हैं।”

“तो आरव…”

“उसका शरीर शायद बहुत पहले खत्म हो चुका है।”

अर्जुन कुछ नहीं बोला।

कबीर ने आगे कहा—

“लेकिन उसकी याद अब भी वहाँ है।”

अर्जुन ने पूछा—

“और जो मेरे सामने था?”

कबीर ने कहा—

“वह आरव की याद थी।”

“तो मेरा भाई कहाँ है?”

कबीर ने पहली बार उसकी आँखों में देखकर कहा—

“शायद तुम्हारे अंदर।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“नहीं।”

“तुम्हें याद है जब तुम दस साल के थे?”

“कुछ-कुछ।”

“तुम्हें याद है उस रात क्या हुआ?”

“नहीं।”

“क्योंकि तुम्हारी यादें पूरी तरह तुम्हारी नहीं हैं।”

कबीर ने एक पुरानी रिकॉर्डिंग निकाली।

उसमें शोर था।

फिर एक आदमी की आवाज़।

देवेंद्र।

“अगर प्रयोग सफल हुआ तो बच्चा अपनी मूल चेतना के साथ वापस आएगा।”

फिर एक महिला की आवाज़—

“और अगर असफल हुआ?”

देवेंद्र—

“तो उसकी जगह प्रतिबिंब ले लेगा।”

अर्जुन ने रिकॉर्डिंग बंद कर दी।

“मेरे साथ क्या हुआ था?”

कबीर ने कहा—

“तुम वापस आए।”

“और आरव?”

“वह अंदर रह गया।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हें चुना था।”

अर्जुन ने गुस्से में पूछा—

“क्यों?”

कबीर ने धीरे से कहा—

“क्योंकि आरव ने प्रयोग से पहले ही कुछ देख लिया था।”

“क्या?”

कबीर ने जवाब दिया—

“आईने के अंदर का असली मालिक।”

अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।

“कौन?”

कबीर ने कहा—

“उसका नाम कोई नहीं लेता।”

---

3. सातवाँ कमरा

कबीर ने अर्जुन को नीचे चलने को कहा।

दोनों पुराने घर के बेसमेंट में पहुँचे।

सीढ़ियाँ नम थीं।

दीवारों पर काई जमी थी।

नीचे पहुँचते ही अर्जुन को एक अजीब गंध आई।

जली हुई लकड़ी और पुराने खून जैसी।

कबीर ने अपनी टॉर्च जलाई।

सामने सात दरवाज़े थे।

हर दरवाज़े पर एक नंबर।

1 से 7।

अर्जुन की धड़कन तेज़ हो गई।

“ये वही कमरे हैं?”

कबीर ने सिर हिलाया।

“तुम्हारे पिता ने सात लोगों पर प्रयोग किया था।”

“सात?”

“हाँ।”

“लेकिन डायरी में…”

“तुम्हारे पिता ने डायरी में बहुत कुछ नहीं लिखा।”

कबीर ने पहला दरवाज़ा खोला।

अंदर खाली कमरा था।

सिर्फ एक कुर्सी।

दूसरा कमरा।

एक बिस्तर।

तीसरा।

दीवार पर बच्चों की तस्वीरें।

चौथा।

एक पुराना कैमरा।

पाँचवाँ।

खाली।

छठा।

दीवार पर काले हाथों के निशान।

अर्जुन ने सातवें दरवाज़े की तरफ देखा।

उस पर कोई नंबर नहीं था।

सिर्फ एक शब्द लिखा था—

“वापसी।”

कबीर ने कहा—

“यह मत खोलना।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्यों?”

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने इसे कभी नहीं खोला।”

“तो अंदर क्या है?”

“मुझे नहीं पता।”

अर्जुन ने दरवाज़े के पास जाकर कान लगाया।

अंदर से आवाज़ आ रही थी।

बहुत धीमी।

एक बच्चा गिन रहा था।

“एक…”

रुकावट।

“दो…”

फिर—

“तीन…”

अर्जुन ने पीछे देखा।

कबीर ने कहा—

“हमें जाना होगा।”

लेकिन अर्जुन दरवाज़े से दूर नहीं हुआ।

आवाज़ जारी थी।

“चार…”

“पाँच…”

“छह…”

फिर कुछ सेकंड की चुप्पी।

और फिर—

“सात…”

अचानक अंदर से दस्तक हुई।

ठक।

कबीर पीछे हट गया।

फिर दूसरी।

ठक।

अर्जुन ने पूछा—

“कौन है?”

अंदर से आवाज़ आई।

बहुत परिचित।

“मैं हूँ।”

अर्जुन जम गया।

“आरव?”

कबीर ने फुसफुसाकर कहा—

“नहीं।”

अंदर से फिर आवाज़ आई।

“भैया…”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

“आरव!”

उसने दरवाज़े का हैंडल पकड़ लिया।

कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मत खोलो!”

अर्जुन ने उसे धक्का दिया।

“वह मेरा भाई है!”

“नहीं!”

“तुम्हें कैसे पता?”

कबीर ने कहा—

“क्योंकि आरव तुम्हें कभी भैया नहीं कहता था।”

अर्जुन रुक गया।

“क्या?”

“वह तुम्हें हमेशा अर्जुन कहता था।”

दरवाज़े के अंदर कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

फिर वही आवाज़ आई।

लेकिन अब उसका स्वर बदल चुका था।

“तुम्हें अभी भी याद नहीं?”

अर्जुन पीछे हट गया।

दरवाज़े के नीचे से काला धुआँ निकलने लगा।

कबीर ने अर्जुन को खींच लिया।

“भागो!”

दोनों सीढ़ियों की तरफ दौड़े।

पीछे से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

फिर…

किसी के दौड़ने की आवाज़।

धड़… धड़… धड़…

अर्जुन ने पीछे नहीं देखा।

लेकिन कबीर ने देखा।

और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“वह आ गया।”

“कौन?”

कबीर ने जवाब नहीं दिया।

सीढ़ियों के ऊपर पहुँचते ही उसने लोहे का दरवाज़ा बंद कर दिया।

कुछ सेकंड बाद…

अंदर से जोरदार प्रहार हुआ।

धड़ाम!

फिर दूसरा।

धड़ाम!

फिर तीसरा।

धड़ाम!

कबीर ने कहा—

“यह दरवाज़ा ज्यादा देर नहीं टिकेगा।”

अर्जुन ने पूछा—

“कौन है?”

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हारा पहला प्रतिबिंब।”

---

4. अर्जुन की दूसरी जिंदगी

दोनों लाइब्रेरी में पहुँचे।

कबीर ने पुराने दस्तावेज़ों का एक बंडल निकाला।

“इन्हें देखो।”

अर्जुन ने कागज़ खोला।

यह अस्पताल की रिपोर्ट थी।

तारीख—

24 सितंबर 1998।

नाम—

अर्जुन शर्मा।

उम्र—

10 वर्ष।

स्थिति—

“होश में, लेकिन पहचान संबंधी समस्या।”

अर्जुन ने नीचे देखा।

डॉक्टर की टिप्पणी—

“बच्चा खुद को अर्जुन कहता है, लेकिन परिवार की कुछ यादें पहचान नहीं पा रहा।”

अर्जुन ने अगला पन्ना खोला।

वहाँ एक फोटो थी।

अस्पताल के बिस्तर पर वही बच्चा।

लेकिन उसके हाथ पर पट्टी थी।

अर्जुन ने पूछा—

“यह मैं हूँ?”

कबीर ने कहा—

“हाँ।”

“फिर समस्या क्या थी?”

कबीर ने दूसरी रिपोर्ट दिखाई।

“रोगी कभी-कभी ऐसी भाषा में बोलता है जिसे परिवार पहचान नहीं पाता।”

अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

“कौन-सी भाषा?”

कबीर ने कहा—

“वही जो आईने के अंदर इस्तेमाल होती है।”

अर्जुन चुप हो गया।

फिर उसने अगली रिपोर्ट पढ़ी।

“रोगी रात 2:13 पर बार-बार एक ही वाक्य बोलता है।”

नीचे वह वाक्य लिखा था—

“वह मुझे बाहर आने नहीं देगा।”

अर्जुन की उँगलियाँ काँपने लगीं।

“मैंने ये कब कहा?”

कबीर ने कहा—

“हर रात।”

“कितने दिन?”

“सात दिन।”

“फिर?”

“आठवें दिन तुमने वह बात कहना बंद कर दी।”

“क्यों?”

कबीर ने कहा—

“क्योंकि उस रात तुमने पहली बार मुस्कुराकर कहा था…”

वह रुक गया।

“क्या?”

कबीर ने धीरे से कहा—

“अब मैं बाहर हूँ।”

अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

---

5. बाहर कौन आया था?

कबीर ने एक और तस्वीर निकाली।

उसमें अर्जुन अस्पताल से बाहर निकल रहा था।

उसके साथ उसकी माँ थी।

लेकिन पीछे…

एक छोटी-सी परछाईं थी।

आरव की।

अर्जुन ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

“वह यहाँ कैसे?”

कबीर ने कहा—

“यही रहस्य है।”

“क्या वह मेरे साथ बाहर आया था?”

“नहीं।”

“तो फिर उसकी परछाईं क्यों?”

कबीर ने कहा—

“क्योंकि तुम दोनों की आत्माएँ पूरी तरह अलग नहीं हुई थीं।”

अर्जुन ने पूछा—

“मतलब?”

“तुम्हारे पिता ने जो प्रयोग किया था, उसमें दो चेतनाएँ आपस में जुड़ गई थीं।”

“मेरी और आरव की?”

“हाँ।”

“तो मेरे अंदर…”

कबीर ने कहा—

“आरव की कुछ यादें हैं।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

उसे अचानक एक दृश्य दिखाई दिया।

बर्फ़।

एक पहाड़।

आरव दौड़ रहा था।

वह चिल्ला रहा था—

“अर्जुन, इधर मत आना!”

फिर एक गुफा।

गुफा के अंदर वही आईना।

आरव उसके सामने खड़ा था।

उसके पीछे कोई और था।

एक बहुत लंबी आकृति।

आरव ने पीछे देखा।

उसकी आँखों में डर।

फिर उसने आईने पर हाथ रखा।

और कहा—

“अगर मैं अंदर गया, तो तुम बच जाओगे।”

दृश्य खत्म हो गया।

अर्जुन ने आँखें खोलीं।

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

कबीर ने पूछा—

“क्या देखा?”

अर्जुन ने कहा—

“आरव ने खुद को कुर्बान किया था।”

कबीर ने कुछ नहीं कहा।

अर्जुन ने पूछा—

“किसके लिए?”

कबीर ने कहा—

“तुम्हारे लिए।”

---

6. आखिरी दरवाज़ा

अचानक ऊपर से जोरदार आवाज़ आई।

खिड़की टूट गई।

कबीर ने बंदूक निकाली।

अर्जुन ने उसे देखा।

“तुम बंदूक लेकर घूमते हो?”

“इस घर के लिए चाकू काफी नहीं।”

“क्या वह आ गया?”

कबीर ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

सीढ़ियों से कदमों की आवाज़ आ रही थी।

धीरे।

बहुत धीरे।

ठक…

ठक…

ठक…

कबीर ने कहा—

“पीछे का रास्ता।”

दोनों भागे।

लेकिन तभी अर्जुन रुक गया।

सामने दीवार पर एक तस्वीर थी।

तस्वीर में उसकी माँ।

उसके पिता।

आरव।

और अर्जुन।

लेकिन इस बार तस्वीर में कुछ अलग था।

अर्जुन के पीछे एक सातवाँ बच्चा खड़ा था।

काला चेहरा।

बिना आँखों के।

अर्जुन ने तस्वीर को छुआ।

तस्वीर में बच्चा धीरे-धीरे सिर घुमाने लगा।

कबीर ने चिल्लाया—

“उसे मत छूना!”

बहुत देर हो चुकी थी।

तस्वीर से एक हाथ बाहर निकला।

अर्जुन को पकड़ लिया।

कबीर ने उसे खींचा।

लेकिन हाथ की पकड़ मजबूत थी।

अर्जुन चीखा।

तभी उसकी जेब से आरव की घड़ी गिर गई।

घड़ी जमीन पर गिरी।

टिक।

उसकी सुइयाँ चलने लगीं।

2:13

फिर अचानक…

2:14

घड़ी चलती रही।

पहली बार।

कबीर ने हैरानी से उसे देखा।

“यह असंभव है।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्या?”

“यह घड़ी तभी चलती है जब…”

“जब क्या?”

कबीर ने कहा—

“आईने के अंदर समय बदलता है।”

दीवार पर एक दरार बनी।

उस दरार से सफेद रोशनी निकली।

और उसके भीतर…

आरव दिखाई दिया।

इस बार वह बिल्कुल साफ था।

“अर्जुन!”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“आरव!”

आरव चिल्लाया—

“दरवाज़ा नंबर सात खोलो!”

कबीर ने कहा—

“नहीं!”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“अगर दरवाज़ा नहीं खुला तो वह हमेशा के लिए बाहर आ जाएगा!”

अर्जुन ने समझ लिया।

“कौन?”

आरव ने कहा—

“वही जिसे तुमने आज तक अपना प्रतिबिंब समझा।”

अचानक पीछे से आवाज़ आई।

“बहुत देर हो चुकी है।”

अर्जुन ने पलटकर देखा।

वही दूसरा अर्जुन।

उसका प्रतिबिंब।

वह सीढ़ियों के नीचे खड़ा था।

उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

“तुमने मुझे बहुत देर तक इंतज़ार कराया।”

अर्जुन पीछे हट गया।

दूसरा अर्जुन आगे आया।

“तुम्हें पता है सबसे मजेदार बात क्या है?”

अर्जुन ने पूछा—

“क्या?”

उसने मुस्कुराकर कहा—

“मैंने तुम्हारी जिंदगी जी है।”

“क्या?”

“तुम्हारी माँ…”

“मेरी माँ थी।”

“तुम्हारे पिता…”

“मेरे पिता थे।”

“तुम्हारे दोस्त…”

“मेरे दोस्त थे।”

अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।

दूसरा अर्जुन उसके पास आ गया।

“तुमने जो जिंदगी अपनी समझी…”

उसने अर्जुन के कान के पास फुसफुसाया—

“वह मेरी थी।”

अचानक आरव चीखा—

“अर्जुन! दरवाज़ा!”

अर्जुन ने पीछे देखा।

सातवाँ दरवाज़ा अब खुला हुआ था।

उसके अंदर से तेज़ सफेद रोशनी आ रही थी।

कबीर ने चिल्लाकर कहा—

“अगर तुम अंदर गए तो शायद वापस नहीं आओगे!”

अर्जुन ने आरव की तरफ देखा।

फिर अपने प्रतिबिंब की तरफ।

फिर सातवें दरवाज़े की तरफ।

उसने कहा—

“मैं पहले भी अंदर गया था।”

दूसरा अर्जुन मुस्कुराया।

“हाँ।”

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया।

“इस बार…”

उसने पीछे देखा।

“…मैं सच लेकर बाहर आऊँगा।”

वह अंदर चला गया।

दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया।

कबीर अकेला रह गया।

दूसरा अर्जुन उसकी तरफ मुड़ा।

“अब तुम बताओ…”

कबीर ने बंदूक उठाई।

“क्या?”

दूसरा अर्जुन मुस्कुराया।

“तुमने असली अर्जुन को कब से पहचानना बंद कर दिया?”

कबीर की आँखों में डर उतर आया।

और पहली बार…

उसने बंदूक नीचे कर दी।

क्योंकि वह समझ चुका था।

जिसे वह अर्जुन समझ रहा था…

शायद वह भी असली नहीं था।

---

सातवें कमरे के अंदर

अर्जुन एक लंबे गलियारे में खड़ा था।

चारों तरफ सफेद दीवारें।

न कोई दरवाज़ा।

न कोई खिड़की।

न कोई आवाज़।

फिर अचानक…

एक बच्चा सामने आया।

दस साल का।

वही चेहरा।

वही आँखें।

अर्जुन ने उसे देखा।

“तुम…”

बच्चे ने कहा—

“मैं अर्जुन हूँ।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं अर्जुन हूँ।”

बच्चा मुस्कुराया।

“यही तो सवाल है।”

उसने हाथ आगे बढ़ाया।

“चलो।”

अर्जुन ने पूछा—

“कहाँ?”

बच्चे ने कहा—

“उस रात।”

अचानक पूरा कमरा बदल गया।

अर्जुन ने खुद को बीस साल पहले उसी घर में खड़ा पाया।

बारिश हो रही थी।

माँ रो रही थी।

पिता आईने के सामने खड़े थे।

आरव दस साल का था।

और छोटा अर्जुन…

उसके ठीक सामने।

छोटे अर्जुन ने बड़े अर्जुन की तरफ देखा।

दोनों की नजरें मिलीं।

बड़ा अर्जुन डर गया।

छोटे अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा—

“अब तुम्हें सच पता चलेगा।”

उसने आईने की तरफ इशारा किया।

आईने के अंदर कोई खड़ा था।

एक औरत।

लेकिन वह माँ नहीं थी।

वह वही बूढ़ी औरत थी।

वही काली आँखें।

वही मुस्कान।

उसने छोटे अर्जुन से कहा—

“बस एक बच्चा बाहर जाएगा।”

छोटे अर्जुन ने पूछा—

“कौन?”

औरत ने अर्जुन की तरफ देखा।

फिर कहा—

“जो खुद को बचाने के लिए अपने भाई को छोड़ देगा।”

अर्जुन ने छोटे आरव की तरफ देखा।

आरव रो रहा था।

और तभी…

छोटे अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ दिया।

आईना खुला।

आरव अंदर चला गया।

और बाहर…

अर्जुन।

बड़ा अर्जुन यह दृश्य देखकर टूट गया।

“नहीं…”

उसने आगे बढ़कर छोटे अर्जुन को रोकना चाहा।

लेकिन वह उसे छू नहीं सका।

फिर पीछे से वही बच्चा बोला—

“तुम्हें लगता है उसने तुम्हें धोखा दिया?”

अर्जुन ने पलटकर देखा।

वह बच्चा अब उसके बिल्कुल पीछे था।

“नहीं…”

“तो?”

“मैंने उसे छोड़ा था।”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“लेकिन क्यों?”

बच्चा मुस्कुराया।

“क्योंकि तुम अर्जुन नहीं थे।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

“तो मैं कौन हूँ?”

बच्चा उसके बहुत पास आया।

उसकी आँखें काली होने लगीं।

फिर उसने कहा—

“तुम सातवें प्रयोग हो।”

अर्जुन चीख पड़ा।

सफेद कमरा अचानक टूटने लगा।

हर तरफ आईने उभर आए।

हर आईने में एक अर्जुन।

दर्जनों।

सैकड़ों।

हजारों।

और हर एक कह रहा था—

“मैं असली हूँ।”

अर्जुन ने कान बंद कर लिए।

लेकिन एक आवाज़ सबसे साफ सुनाई दी।

आरव की।

बहुत दूर से।

बहुत कमजोर।

“अर्जुन… मुझे ढूँढो।”

अर्जुन ने आँखें खोलीं।

सामने एक आईना था।

उसमें आरव कैद था।

उसके पीछे वही लंबी आकृति।

आरव चिल्ला रहा था—

“वह मुझे नहीं छोड़ रहा!”

अर्जुन आईने की तरफ दौड़ा।

लेकिन जैसे ही उसने उसे छुआ…

आईने पर एक वाक्य उभरा—

“अगर आरव को बाहर निकालना है, तो अपनी जगह उसे देनी होगी।”

अर्जुन ने कुछ सेकंड तक उस वाक्य को देखा।

फिर धीरे से मुस्कुराया।

उसने कहा—

“तो ठीक है।”

आईने के अंदर आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं!”

अर्जुन ने अपना हाथ काँच पर रखा।

“इस बार…”

उसकी आँखों में आँसू थे।

“…तुम बाहर जाओगे।”

आईना चमक उठा।

और उसी क्षण…

बाहर खड़ा दूसरा अर्जुन मुस्कुराना बंद कर चुका था।

क्योंकि उसे पहली बार समझ आया—

अगर असली अर्जुन अपनी जगह छोड़ देगा, तो वह भी खत्म हो जाएगा।

घर के बाहर बिजली चमकी।

पूरा देवगढ़ गूँज उठा।

और पहाड़ों के बीच…

किसी ने पहली बार अपना असली नाम पुकारा—

“आरव!”

अंदर आईना टूटने लगा।

और बाहर…

किसी ने दरवाज़ा खोल दिया।

एपिसोड 4 समाप्त।

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