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एपिसोड 5 — जो बाहर आया
firoj saifi · Ghost Stories · 13 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- Horror, mystery
- Chapter
- 5 of 5
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2516
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
आईना टूट रहा था।
एक-एक करके उसमें दरारें फैल रही थीं।
अर्जुन ने अपना हाथ काँच पर रखा हुआ था।
दूसरी तरफ आरव खड़ा था।
उसके चेहरे पर डर था।
“अर्जुन, ऐसा मत करो।”
अर्जुन ने कहा—
“बीस साल पहले तुमने मेरे लिए खुद को अंदर भेज दिया था।”
“मैंने अपनी मर्जी से नहीं किया था।”
“फिर भी तुम गए।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
“और अब तुम वही गलती दोहरा रहे हो।”
अर्जुन मुस्कुराया।
“शायद।”
“नहीं!”
आरव ने पीछे देखा।
वही लंबी आकृति धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी।
उसका शरीर इंसान जैसा था, लेकिन चेहरा खाली।
जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ सिर्फ काला शीशा था।
आरव पीछे हट गया।
“वह आ रहा है।”
अर्जुन ने पूछा—
“कौन?”
आरव ने जवाब दिया—
“जिसने हमें बनाया।”
अर्जुन के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।
“देवेंद्र?”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो?”
आरव ने धीरे से कहा—
“आईने का मालिक।”
अचानक उस आकृति ने हाथ उठाया।
पूरे कमरे में आवाज़ गूँजी—
“एक बाहर जाएगा।”
अर्जुन ने कहा—
“आरव जाएगा।”
आकृति बोली—
“कीमत?”
अर्जुन चुप।
“हर जीवन की कीमत होती है।”
“क्या चाहिए?”
आकृति ने अर्जुन की तरफ देखा।
“तुम्हारी पहचान।”
अर्जुन समझ नहीं पाया।
“मतलब?”
“तुम बाहर जाओगे तो कोई तुम्हें पहचान नहीं पाएगा।”
“और आरव?”
“सब उसे पहचानेंगे।”
अर्जुन ने आरव की तरफ देखा।
आरव ने सिर हिलाया।
“मत करना।”
अर्जुन ने पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि अगर कोई तुम्हें पहचान नहीं पाएगा…”
वह रुक गया।
“तो तुम खुद को भी भूल जाओगे।”
अर्जुन ने कुछ सेकंड सोचा।
फिर कहा—
“मैंने पूरी जिंदगी आधा सच जीया है।”
उसने आईने पर हाथ दबाया।
“अब अगर मुझे खुद को भूलना भी पड़े…”
उसने आरव की तरफ देखा।
“…तो भी ठीक है।”
आकृति आगे आई।
आईना चमक उठा।
आरव चीखा—
“अर्जुन!”
अचानक दोनों के शरीर से सफेद रोशनी निकलने लगी।
दोनों की यादें एक-दूसरे में मिलने लगीं।
बचपन।
माँ।
पिता।
बारिश।
साइकिल।
पहली तस्वीर।
पहला स्कूल।
पहली लड़ाई।
पहली चोट।
सब कुछ।
अर्जुन को हर वह चीज़ याद आने लगी जो उसने बीस साल से भूल रखी थी।
उसे याद आया…
आरव उससे छोटा नहीं था।
दोनों जुड़वाँ थे।
उसे याद आया…
माँ दोनों को बराबर प्यार करती थी।
उसे याद आया…
पिता दोनों को एक प्रयोग की तरह देखते थे।
उसे याद आया…
आरव को आईना कभी पसंद नहीं था।
उसे याद आया…
जिस रात सब हुआ, आरव ने उसे बचाने की कोशिश की थी।
और सबसे आखिरी याद—
छोटा अर्जुन रो रहा था।
आरव उसका हाथ पकड़कर कह रहा था—
“डर मत। मैं हूँ।”
अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले।
“आरव…”
आरव मुस्कुराया।
“अब याद आया?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
अचानक आईना टूट गया।
धड़ाम!
---
1. बाहर की दुनिया
कबीर ने आँखें खोलीं।
वह पुराने घर के हॉल में पड़ा था।
उसके सामने टूटा हुआ आईना था।
अर्जुन गायब था।
आरव भी नहीं था।
सिर्फ काँच के टुकड़े।
कबीर उठकर खड़ा हुआ।
“अर्जुन?”
कोई जवाब नहीं।
फिर मुख्य दरवाज़ा खुला।
एक आदमी अंदर आया।
कबीर ने बंदूक उठाई।
“कौन?”
आदमी ने हाथ ऊपर किए।
“शांत हो जाओ।”
“तुम कौन हो?”
“मेरा नाम नील है।”
कबीर उसे घूरता रहा।
नील ने कहा—
“मैं अर्जुन को ढूँढने आया हूँ।”
कबीर ने पूछा—
“तुम उसे कैसे जानते हो?”
नील ने जेब से वही पुरानी तस्वीर निकाली।
“मैं उसके साथ काम करता था।”
कबीर की नजर तस्वीर पर गई।
“फोटोग्राफर?”
“हाँ।”
“तुम्हें पता है वह कहाँ है?”
नील ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो यहाँ क्यों आए?”
नील ने घर को देखा।
“क्योंकि तीन दिन पहले अर्जुन ने मुझे एक तस्वीर भेजी थी।”
उसने फोन निकाला।
स्क्रीन पर एक फोटो थी।
पुराना घर।
खिड़की।
और खिड़की में…
अर्जुन।
लेकिन तस्वीर लेने का समय था—
आज से बीस साल पहले।
कबीर ने फोन हाथ में लिया।
“ये कैसे संभव है?”
नील ने कहा—
“मैं इसी वजह से यहाँ आया हूँ।”
अचानक पीछे से किसी बच्चे की आवाज़ आई।
“कबीर…”
दोनों पलटे।
सीढ़ियों पर एक बच्चा खड़ा था।
दस साल का।
कपड़े पुराने।
चेहरा शांत।
नील ने फुसफुसाकर पूछा—
“ये कौन है?”
कबीर ने जवाब दिया—
“आरव।”
बच्चा धीरे-धीरे नीचे आया।
नील ने उसे गौर से देखा।
फिर उसकी आँखें फैल गईं।
“लेकिन…”
“क्या?”
नील ने काँपते हुए कहा—
“मैंने इसे पहले देखा है।”
कबीर चौंका।
“कहाँ?”
नील ने जवाब दिया—
“अर्जुन के कैमरे में।”
आरव ने मुस्कुराया।
“अर्जुन कहाँ है?”
दोनों चुप।
आरव ने फिर पूछा—
“मेरा भाई कहाँ है?”
कबीर की आँखों में चिंता भर गई।
क्योंकि आरव के पैरों के नीचे…
कोई परछाईं नहीं थी।
---
2. अर्जुन का लौटना
घर से लगभग एक किलोमीटर दूर जंगल में एक आदमी चल रहा था।
नंगे पैर।
कपड़े फटे हुए।
चेहरे पर चोट।
वह लड़खड़ाता हुआ आगे बढ़ रहा था।
वह अर्जुन था।
या…
उस जैसा कोई।
वह सड़क तक पहुँचा।
एक कार उसके पास आकर रुकी।
ड्राइवर ने खिड़की नीचे की।
“आप ठीक हैं?”
आदमी ने कुछ नहीं कहा।
ड्राइवर बाहर आया।
“आपको अस्पताल ले चलूँ?”
आदमी ने धीरे से सिर उठाया।
“नहीं।”
ड्राइवर पीछे हट गया।
“आपका नाम क्या है?”
आदमी ने कुछ सेकंड सोचा।
फिर बोला—
“अर्जुन।”
ड्राइवर ने राहत की साँस ली।
“अच्छा। बैठिए।”
अर्जुन कार में बैठ गया।
कुछ देर बाद ड्राइवर ने पूछा—
“आप इस जंगल में क्या कर रहे थे?”
अर्जुन खिड़की से बाहर देखने लगा।
दूर पहाड़।
घना कोहरा।
और उस कोहरे के पीछे…
पुराना घर।
उसने धीरे से कहा—
“मैं घर जा रहा था।”
ड्राइवर ने पूछा—
“कहाँ?”
अर्जुन ने एक पता बताया।
ड्राइवर ने गाड़ी मोड़ी।
लेकिन कुछ मिनट बाद…
अर्जुन ने अपना फोन निकाला।
स्क्रीन पर उसकी माँ का नंबर था।
उसने कॉल किया।
फोन उठा।
दूसरी तरफ महिला की आवाज़ थी।
“हैलो?”
अर्जुन की आँखें भर आईं।
“माँ…”
दूसरी तरफ कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
फिर महिला ने पूछा—
“कौन?”
अर्जुन चुप।
“कौन बोल रहा है?”
अर्जुन ने कहा—
“मैं हूँ।”
“आप कौन?”
अर्जुन के चेहरे पर डर फैल गया।
“माँ… मैं अर्जुन।”
दूसरी तरफ महिला रोने लगी।
“मेरे बेटे अर्जुन की तो बीस साल पहले मौत हो गई थी।”
कॉल कट गया।
अर्जुन फोन को देखता रह गया।
ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर में उसे देखा।
और अचानक ब्रेक लगा दिया।
“क्या हुआ?”
ड्राइवर की नजर पीछे थी।
“आप…”
“क्या?”
“आपके पीछे कोई बैठा है।”
अर्जुन ने धीरे-धीरे पीछे देखा।
सीट खाली थी।
ड्राइवर काँपते हुए बोला—
“अभी एक बच्चा बैठा था।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“कैसा बच्चा?”
“आप जैसा।”
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
आरव।
वह बाहर आ चुका था।
---
3. घर लौटना
सुबह के करीब पाँच बजे अर्जुन अपने पुराने शहर पहुँचा।
वह घर के सामने खड़ा था।
बीस साल बाद।
दरवाज़े पर नया पेंट।
बगीचा बदल चुका था।
लेकिन खिड़की वही थी।
उसने घंटी बजाई।
एक बूढ़ी महिला ने दरवाज़ा खोला।
अर्जुन ने उसे देखा।
उसकी माँ।
बहुत बूढ़ी।
बाल सफेद।
चेहरा थका हुआ।
लेकिन वही आँखें।
अर्जुन ने कहा—
“माँ…”
महिला ने उसे घूरा।
उसके चेहरे पर उलझन थी।
“तुम कौन हो?”
अर्जुन की आँखें भर आईं।
“मैं…”
वह अपना नाम कहने वाला था।
लेकिन अचानक उसके दिमाग में खालीपन आया।
उसे अपना नाम याद नहीं आया।
वह चुप रह गया।
महिला ने पूछा—
“किससे मिलना है?”
उसने पीछे मुड़कर देखा।
फिर दरवाज़ा बंद करने लगी।
तभी पीछे से एक बच्चे की आवाज़ आई—
“माँ।”
महिला रुक गई।
अर्जुन ने नीचे देखा।
आरव खड़ा था।
उसने माँ की तरफ देखा।
“माँ, मुझे अंदर आने दो।”
महिला का चेहरा बदल गया।
उसकी आँखों में अचानक पहचान आ गई।
वह घुटनों के बल बैठ गई।
“आरव?”
बच्चे ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
महिला ने उसे गले लगा लिया।
अर्जुन दरवाज़े पर खड़ा रहा।
उसे पहली बार समझ आया…
सौदा पूरा हो चुका था।
अब कोई उसे पहचान नहीं रहा था।
आरव को सब पहचान रहे थे।
महिला रोते हुए कह रही थी—
“मेरा बच्चा…”
आरव ने अर्जुन की तरफ देखा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
अर्जुन ने हल्की मुस्कान दी।
फिर पीछे हट गया।
वह सड़क पर अकेला खड़ा रहा।
उसे अपना नाम भी याद नहीं था।
उसे अपना घर भी याद नहीं था।
उसे अपनी जिंदगी भी याद नहीं थी।
लेकिन एक चीज़ याद थी।
आईना।
और उसके अंदर…
वह लंबी आकृति।
---
4. सातवीं तस्वीर
अर्जुन सड़क पर चल रहा था।
उसके पास कोई सामान नहीं था।
सिर्फ एक कैमरा।
वह कैमरा उसकी जेब में था।
उसे नहीं पता था कि वह कैमरा उसके पास कैसे आया।
उसने कैमरा ऑन किया।
स्क्रीन पर सैकड़ों तस्वीरें थीं।
पहली तस्वीर—
पुराना घर।
दूसरी—
आरव।
तीसरी—
माँ।
चौथी—
देवेंद्र।
पाँचवीं—
कबीर।
छठी—
वही बूढ़ी औरत।
फिर सातवीं तस्वीर।
उसमें अर्जुन खुद था।
वह आईने के सामने खड़ा था।
लेकिन तस्वीर में उसके पीछे कोई और खड़ा था।
एक आदमी।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
अर्जुन ने फोटो ज़ूम की।
आदमी के हाथ में एक कागज़ था।
उस कागज़ पर लिखा था—
“प्रयोग 8 शुरू।”
अर्जुन का चेहरा बदल गया।
“आठ?”
तभी कैमरे से एक आवाज़ आई।
रिकॉर्डिंग अपने आप चलने लगी।
देवेंद्र की आवाज़।
“अगर सातवाँ प्रयोग सफल हो गया, तो आठवाँ शरीर तैयार किया जाएगा।”
फिर दूसरी आवाज़।
कबीर की।
“और अगर अर्जुन वापस आ गया?”
देवेंद्र—
“वह अर्जुन नहीं होगा।”
अर्जुन ने रिकॉर्डिंग रोक दी।
उसकी साँस तेज़ हो गई।
तभी कैमरे की स्क्रीन पर एक और तस्वीर दिखाई दी।
तस्वीर में एक लड़की थी।
लगभग बीस साल की।
वह किसी अस्पताल के कमरे में खड़ी थी।
उसके हाथ में एक पुरानी फाइल थी।
फाइल पर लिखा था—
“प्रोजेक्ट मिरर — विषय 8।”
अर्जुन ने तस्वीर के पीछे देखा।
एक पता था।
शहर से 42 किलोमीटर दूर।
एक पुराना मानसिक अस्पताल।
अर्जुन ने पता पढ़ा।
फिर पीछे से आवाज़ आई—
“तुम वहाँ नहीं जा सकते।”
अर्जुन पलटा।
कबीर खड़ा था।
“तुम मेरा पीछा कर रहे हो?”
कबीर ने कहा—
“नहीं।”
“फिर?”
“मैं तुम्हें रोकने आया हूँ।”
“क्यों?”
कबीर ने कहा—
“क्योंकि वहाँ जो है…”
वह रुक गया।
“क्या?”
“वही है जिसने तुम्हारे पिता को यह सब शुरू करने के लिए मजबूर किया।”
अर्जुन ने पूछा—
“वह कौन है?”
कबीर ने कहा—
“तुम्हारी बहन।”
अर्जुन स्तब्ध रह गया।
“मेरी… बहन?”
“हाँ।”
“लेकिन मेरी कोई बहन नहीं थी।”
कबीर ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारी माँ के अनुसार नहीं।”
“और असल में?”
कबीर ने धीरे से कहा—
“तुम्हारे पिता ने एक बच्ची को आईने से बाहर निकाला था।”
“फिर?”
“उसने घर में सात लोगों को मार दिया।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“कौन?”
कबीर ने कहा—
“तुम्हारे पिता।”
अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया।
कबीर ने आगे कहा—
“तुम्हारी माँ।”
“आरव?”
कबीर ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो?”
“आरव बच गया था।”
अर्जुन ने पूछा—
“फिर बाकी?”
कबीर ने कहा—
“बाकी छह लोग…”
वह रुक गया।
“वे सात प्रयोग थे।”
अर्जुन ने कैमरा नीचे कर दिया।
“और आठवाँ?”
कबीर ने कहा—
“आठवाँ प्रयोग तुम नहीं हो।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तो कौन?”
कबीर ने अस्पताल की दिशा में देखा।
“वह लड़की।”
---
5. अस्पताल
रात होने से पहले दोनों पुराने अस्पताल के बाहर पहुँचे।
इमारत कई सालों से बंद थी।
जंग लगी गेट।
टूटी खिड़कियाँ।
दीवारों पर काई।
मुख्य दरवाज़े पर एक पुराना बोर्ड—
“प्रवेश निषेध।”
कबीर ने ताला तोड़ा।
दोनों अंदर गए।
गलियारे में अंधेरा था।
अर्जुन की टॉर्च दीवारों पर घूम रही थी।
एक जगह बच्चों के नाम लिखे थे।
1 — सफल नहीं।
2 — असफल।
3 — गायब।
4 — अस्थिर।
5 — समाप्त।
6 — समाप्त।
7 — स्थानांतरित।
अर्जुन ने पूछा—
“सातवाँ कौन था?”
कबीर ने कहा—
“तुम्हारा भाई।”
“आरव?”
“हाँ।”
“और आठ?”
कबीर ने कुछ नहीं कहा।
वे अस्पताल के सबसे नीचे वाले हिस्से में पहुँचे।
एक कमरे के बाहर लिखा था—
MIRROR ROOM — 08
अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।
अंदर कोई मशीन नहीं थी।
सिर्फ एक कुर्सी।
एक कैमरा।
और सामने…
एक आईना।
अर्जुन आईने के सामने गया।
उसमें उसका प्रतिबिंब दिखाई दिया।
इस बार सामान्य।
लेकिन कुछ सेकंड बाद…
प्रतिबिंब ने मुस्कुराया।
अर्जुन नहीं मुस्कुराया था।
कबीर ने पीछे से कहा—
“पीछे हटो।”
अर्जुन ने कदम पीछे किया।
प्रतिबिंब ने नहीं किया।
वह वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने अपना हाथ उठाया।
और आईने के अंदर से बाहर निकल आया।
अर्जुन चीख पड़ा।
वह आकृति धीरे-धीरे कमरे में आई।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
लेकिन आँखें काली।
वही दूसरा अर्जुन।
उसने कबीर की तरफ देखा।
“तुमने इसे यहाँ क्यों लाया?”
कबीर ने बंदूक उठाई।
“तुम कौन हो?”
दूसरा अर्जुन मुस्कुराया।
“जिसे तुमने इतने साल तक अर्जुन समझा।”
अर्जुन ने कहा—
“तुमने मेरी जिंदगी चुराई।”
दूसरा अर्जुन बोला—
“नहीं।”
वह धीरे-धीरे उसकी तरफ आया।
“तुमने मुझे जिंदगी दी।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“झूठ।”
“तुम्हें लगता है तुम्हारे पिता ने मुझे बनाया?”
वह हँसा।
“नहीं।”
“तो?”
उसने आईने की तरफ देखा।
“तुम्हारे पिता सिर्फ दरवाज़ा खोल पाए थे।”
फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“मैं उस दरवाज़े के दूसरी तरफ पहले से मौजूद था।”
कबीर ने बंदूक चलाई।
धाँय!
गोली उसके कंधे में लगी।
लेकिन वह गिरा नहीं।
उसने घाव को देखा।
फिर मुस्कुराया।
“अब भी वही गलती।”
कबीर ने दूसरी गोली चलाई।
इस बार आकृति ने हाथ उठाया।
गोली हवा में रुक गई।
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
गोली धीरे-धीरे जमीन पर गिर गई।
आकृति ने कहा—
“तुम दोनों हमेशा सोचते रहे कि आईना मुझे रोकता है।”
वह मुस्कुराया।
“सच्चाई यह है…”
उसने आईने की तरफ देखा।
“आईना मुझे बाहर आने में मदद करता है।”
कमरे की सभी लाइटें जल उठीं।
दीवार पर एक स्क्रीन चमकी।
उस पर पुरानी रिकॉर्डिंग चलने लगी।
देवेंद्र दिखाई दिया।
वह कैमरे के सामने बैठा था।
उसके चेहरे पर डर था।
“अगर यह रिकॉर्डिंग कोई देख रहा है…”
वह कुछ सेकंड चुप रहा।
“तो समझिए प्रयोग असफल नहीं हुआ।”
कबीर ने स्क्रीन की तरफ देखा।
देवेंद्र ने कहा—
“हमने जिसे बाहर निकाला…”
उसकी आवाज़ काँपने लगी।
“वह कोई आत्मा नहीं थी।”
अर्जुन ने पूछा—
“तो क्या था?”
स्क्रीन पर देवेंद्र ने सीधे कैमरे की तरफ देखा।
और कहा—
“वह आईना नहीं था। वह एक जीव था।”
कमरे की हवा भारी हो गई।
देवेंद्र की रिकॉर्डिंग जारी रही—
“वह इंसानों की यादें खाता है।”
“हर याद के साथ वह इंसान का चेहरा ले सकता है।”
“और जब वह सात चेहरों को पूरा कर लेगा…”
देवेंद्र की आँखों में आँसू आ गए।
“तो उसे किसी आईने की जरूरत नहीं होगी।”
स्क्रीन अचानक बंद हो गई।
दूसरा अर्जुन मुस्कुराया।
“सात चेहरे…”
उसने अर्जुन की तरफ देखा।
“और अब…”
उसने अपना चेहरा अर्जुन के बिल्कुल सामने कर दिया।
“आठवाँ।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“कौन-सा आठवाँ चेहरा?”
दूसरे अर्जुन ने कहा—
“तुम्हारी बहन का।”
अचानक कमरे के पीछे का दरवाज़ा खुल गया।
एक लड़की अंदर आई।
लगभग बीस साल की।
लंबे काले बाल।
हाथ में पुरानी फाइल।
वह सीधे अर्जुन के सामने आकर खड़ी हो गई।
उसकी आँखें बिल्कुल अर्जुन जैसी थीं।
उसने धीरे से कहा—
“भैया…”
अर्जुन जम गया।
लड़की ने मुस्कुराकर कहा—
“मुझे घर ले चलो।”
कबीर ने फुसफुसाकर कहा—
“अर्जुन…”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
कबीर की आँखों में आतंक था।
“क्या?”
कबीर ने कहा—
“तुम्हारी बहन की मौत तुम्हारे पैदा होने से पहले हो गई थी।”
लड़की की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
उसने धीरे से अर्जुन के कान के पास कहा—
“लेकिन मैं मरी नहीं थी।”
अचानक पूरा अस्पताल अंधेरे में डूब गया।
और अंधेरे में…
सैकड़ों बच्चों की आवाज़ें एक साथ गूँजीं—
“आठवाँ चेहरा पूरा हो गया।”
फिर एक आईना टूटने की आवाज़ आई।
चटाक!
और किसी ने अंधेरे में अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
वह हाथ…
आरव का था।
लेकिन आरव की आवाज़ नहीं आई।
उसकी जगह किसी और ने फुसफुसाया—
“अब असली कहानी शुरू होती है।”
एपिसोड 5 समाप्त।
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