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भाग 1 — तीसरी आवाज़
Pretika · Jinn & Spirits · 10 मिनट
कहते हैं, अल्लाह ने इंसान को मिट्टी से बनाया… और जिन्नों को आग से। मगर वो आम आग नहीं थी। वो बे-धुएँ की आग थी। ऐसी आग, जो जलती है, मगर दिखाई नहीं देती। जो पास आती है, मगर निशान नहीं छोड़ती।
किताबों में जिन्नों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। मगर किसी किताब में ये नहीं लिखा… कि जब उस आग को इश्क़ हो जाए, तो वो किसे जलाती है। ख़ुद को… या उसे, जिससे इश्क़ हुआ है।
ये कहानी उसी सवाल की है।
कराची। रात के दो बजकर चालीस मिनट।
सदर की पुरानी गलियाँ सो चुकी थीं। एम्प्रेस मार्केट के पास एक ज़र्द, पुरानी इमारत खड़ी थी — "महताब चैम्बर्स"। अंग्रेज़ों के ज़माने की बनी, ऊँची छतों वाली, जिसकी दीवारों में समंदर की नमी ऐसे बस गई थी, जैसे कोई पुराना ग़म दिल में बस जाता है। नीचे की दुकानें बंद थीं। सड़क पर बस एक आवारा कुत्ता था, और दूर से आती किसी ट्रक के हॉर्न की आवाज़।
मगर चौथी मंज़िल की एक खिड़की में अब भी रौशनी जल रही थी।
वहाँ था "सदा स्टूडियोज़"। वो स्टूडियो, जहाँ रात-रात भर तुर्की ड्रामे उर्दू बोलना सीखते थे। जहाँ इस्तांबुल की हीरोइनें कराची की आवाज़ में रोती थीं, और अंकारा के हीरो लाहौर के लहजे में इज़हार-ए-मोहब्बत करते थे।
और उस स्टूडियो के छोटे से, साउंडप्रूफ़ बूथ में… माइक के सामने खड़ी थी दुआ रहमान।
चौबीस साल की दुआ। सीधे-सादे सूती कुर्ते में, दुपट्टा गले में लिपटा हुआ, बाल एक ढीले जूड़े में, जिससे दो-तीन लटें बार-बार चेहरे पर आ जाती थीं। उसकी शक्ल में ऐसी कोई बात नहीं थी, जो भीड़ में किसी को रोक ले। मगर जब वो बोलती थी… तो लोग रुक जाते थे।
उसकी आवाज़ में कुछ था। जैसे सर्दियों की रात में किसी ने कमरे में अंगीठी जला दी हो। गर्म… धीमी… और ऐसी, जिसके पास बैठे रहने का दिल करे।
सामने स्क्रीन पर तुर्की ड्रामा "आसमान की क़ैद" का एक सीन रुका हुआ था। हीरोइन ज़ेनेप, बारिश में भीगी, अपने हीरो के सामने खड़ी थी। आँखों में आँसू। होंठ काँपते हुए।
हेडफ़ोन में जोज़फ़ भाई की थकी हुई आवाज़ आई।
"चलो बीबी, टेक सैंतालीस। और इस बार ज़रा दिल से। ज़ेनेप रो रही है, और तुम ऐसे बोल रही हो जैसे बिजली का बिल पढ़ रही हो।"
दुआ ने शीशे के उस पार देखा। कंट्रोल रूम में जोज़फ़ भाई बैठे थे। छियालीस साल के, सफ़ेद होती मूँछें, आँखों पर मोटा चश्मा, और होंठों में एक बुझी हुई सिगरेट। जो वो कभी जलाते नहीं थे, क्योंकि स्टूडियो में मना था… मगर कभी निकालते भी नहीं थे।
"जोज़फ़ भाई, रात के तीन बज रहे हैं। इस वक़्त मेरा दिल भी सो चुका है।"
"तो उसे जगाओ। पैसे दिल के मिलते हैं, गले के नहीं।"
दुआ हँस पड़ी। फिर उसने आँखें बंद कीं। एक गहरी साँस ली। और जब आँखें खोलीं… तो वो दुआ नहीं थी। वो ज़ेनेप थी।
"अगर तुम सच में मुझसे मोहब्बत करते हो…" उसकी आवाज़ टूटी, "…तो मुझे जाने दो।"
स्क्रीन पर ज़ेनेप के होंठ रुके। अब हीरो के बोलने की बारी थी, मगर हीरो की डबिंग अगले दिन होनी थी। तो वो हिस्सा ख़ाली था। तीन सेकंड की ख़ामोशी।
जोज़फ़ भाई ने अँगूठा उठाया। "वाह! ये हुई ना बात। रुको, एक बार सुन लेते हैं।"
उन्होंने प्लेबैक चलाया। स्पीकर में दुआ की आवाज़ गूँजी — "…तो मुझे जाने दो।"
और फिर, उस तीन सेकंड की ख़ामोशी में… जहाँ कुछ नहीं होना चाहिए था… एक आवाज़ आई।
मर्दाना। गहरी। धीमी। जैसे बहुत दूर से आ रही हो, और फिर भी बिल्कुल कान के पास।
"मोहब्बत करने वाले… जाने नहीं देते।"
कंट्रोल रूम में सन्नाटा छा गया।
जोज़फ़ भाई की उँगली प्ले बटन पर जमी रह गई। उनकी बुझी सिगरेट होंठ से फिसलकर कीबोर्ड पर गिर पड़ी।
दुआ बूथ में खड़ी थी, हेडफ़ोन कानों पर। उसने भी सुना था। उसके हाथ की उँगलियाँ धीरे-धीरे ठंडी पड़ने लगीं।
"जोज़फ़ भाई…" उसने माइक में फुसफुसाकर कहा, "ये… ये क्या था?"
जोज़फ़ भाई ने ख़ुद को सँभाला। "कुछ नहीं। कोई क्रॉसटॉक होगा। बगल वाले स्टूडियो का… कोई पुराना ट्रैक…"
"बगल वाला स्टूडियो छह महीने से बंद है।"
जोज़फ़ भाई चुप हो गए।
उन्होंने स्क्रीन पर वो हिस्सा ज़ूम किया। आवाज़ की लहरें हरे रंग की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों में दिख रही थीं। दुआ की आवाज़ वाली लकीरें आम थीं। शब्द से पहले साँस की एक हल्की सी लहर, फिर आवाज़।
मगर उस दूसरी आवाज़ की लकीर…
"दुआ," जोज़फ़ भाई ने बहुत धीरे से कहा, "बाहर आओ। ये देखो।"
दुआ बूथ का भारी दरवाज़ा खोलकर कंट्रोल रूम में आई। जोज़फ़ भाई ने स्क्रीन की तरफ़ इशारा किया।
"पच्चीस साल से ये काम कर रहा हूँ। हज़ारों आवाज़ें रिकॉर्ड की हैं। बच्चों की, बूढ़ों की, गाने वालों की, रोने वालों की। हर इंसान बोलने से पहले साँस लेता है, दुआ। हर एक। चाहे कितनी भी छोटी हो, वो साँस यहाँ दिखती है।" उन्होंने स्क्रीन पर उँगली रखी। "इस आवाज़ में साँस नहीं है।"
"मतलब?"
जोज़फ़ भाई ने उसकी तरफ़ देखा। चश्मे के पीछे उनकी आँखें किसी ऐसे डर से भरी थीं, जिसे वो मानना नहीं चाहते थे।
"मतलब… ये आवाज़ किसी ऐसे गले से निकली है… जिसे साँस की ज़रूरत ही नहीं।"
उसी वक़्त दुआ का फ़ोन बजा। दोनों उछल पड़े। स्क्रीन पर लिखा था — "अम्मी"।
दुआ ने काँपते हाथ से फ़ोन उठाया। "हाँ अम्मी…"
"हाँ अम्मी? हाँ अम्मी?" दूसरी तरफ़ शगुफ़्ता बेगम की आवाज़ ऐसी थी, जैसे प्रेशर कुकर की सीटी। "तीन बज रहे हैं, दुआ! तीन! तुम्हारे अब्बू जाए-नमाज़ पर बैठे-बैठे दो बार ऊँघ चुके हैं, मगर सोने का नाम नहीं ले रहे। कहते हैं, जब तक मेरी बेटी घर नहीं आती, मुझे नींद नहीं आएगी। अब बताओ, मैं किसको सँभालूँ? उनके दिल को, या तुम्हारी नौकरी को?"
किसी और दिन दुआ हँस देती। आज उसकी आँखें भर आईं। अम्मी की डाँट में भी एक घर था। एक छत थी। एक ऐसी जगह, जहाँ बिना साँस वाली आवाज़ें नहीं होतीं।
"बस आधा घंटा, अम्मी। दो लाइनें बाक़ी हैं।"
"आधा घंटा। और जोज़फ़ भाई से कहना, अगर मेरी बेटी को रिक्शे में अकेले भेजा, तो मैं ख़ुद सदर आकर उनकी मूँछें उखाड़ दूँगी।"
फ़ोन कट गया। जोज़फ़ भाई ने, इतने डर में भी, अपनी मूँछों पर हाथ फेरा। "तुम्हारी अम्मी मुझसे इतनी मोहब्बत क्यों करती हैं, समझ नहीं आता।"
दोनों हँसे। मगर वो हँसी कमरे की ठंडक को पूरी तरह भगा नहीं पाई।
"देखो," जोज़फ़ भाई ने कहा, "शायद कोई रेडियो सिग्नल होगा। पोर्ट पास में है, जहाज़ों के वायरलेस… कभी-कभी ऐसा हो जाता है।"
वो ख़ुद को समझा रहे थे। दुआ ये जानती थी। मगर उसने भी मान लेना बेहतर समझा।
"आख़िरी दो लाइनें," जोज़फ़ भाई ने कहा। "तुम रिकॉर्ड करो, मैं नीचे फ़ज़लू के ढाबे से दो कप दूध-पत्ती लेकर आता हूँ। हम दोनों को चाहिए।"
"आप मुझे अकेला छोड़कर जा रहे हैं? अभी? इसके बाद?"
"पाँच मिनट, बीबी। सीढ़ियाँ उतरूँगा, चढ़ूँगा। ऑटो-रिकॉर्ड चालू है। तुम बस बोलती जाना।"
वो चले गए। उनके जूतों की आवाज़ लकड़ी की पुरानी सीढ़ियों पर धीरे-धीरे दूर होती गई।
दुआ वापस बूथ में गई। दरवाज़ा बंद किया। दीवारों पर लगे काले फ़ोम ने बाहर की हर आवाज़ निगल ली। अब बस वो थी, माइक था, और स्क्रीन पर रुकी हुई ज़ेनेप।
उसने हेडफ़ोन लगाए। स्क्रिप्ट उठाई।
"मैं तुम्हें भूल जाऊँगी," उसने पढ़ा। "जैसे समंदर भूल जाता है कि उसमें कौन डूबा था।"
आवाज़ अच्छी आई। उसने अगली लाइन पढ़ी।
"मगर अगर कभी लहरें तुम्हारा नाम लें… तो समझ लेना, वो मैं हूँ।"
और फिर… बूथ गर्म होने लगा।
पहले हल्का सा। जैसे किसी ने एसी बंद कर दिया हो। फिर और। दुआ के माथे पर पसीना आ गया। गर्दन पर, कानों के पीछे। ऐसी गर्मी, जैसे वो किसी तंदूर के बिल्कुल पास खड़ी हो। मगर हवा में धुआँ नहीं था। जलने की कोई बू नहीं थी।
थी तो बस एक ख़ुशबू। ऊद की। संदल की। और वैसी, जैसी गर्मी की पहली बारिश में तपती मिट्टी से उठती है।
दुआ ने स्क्रिप्ट नीचे रख दी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने हेडफ़ोन उतारने के लिए हाथ उठाया—
और हेडफ़ोन में, उसके दोनों कानों के बीच, बिल्कुल बीच में… जैसे कोई उसके सिर के अंदर बोल रहा हो… वो आवाज़ आई।
"दुआ…"
उसका हाथ हवा में जम गया।
बिना साँस की आवाज़। गहरी। धीमी। और इतनी नर्म… कि डर के साथ-साथ उसके सीने में कुछ और भी हिल गया। कुछ ऐसा, जिसका उसे कोई नाम नहीं पता था।
"डरो मत।" आवाज़ ने कहा। "मैं चार महीने से तुम्हें सुन रहा हूँ। हर रात। हर लाइन। जब तुम ज़ेनेप बनकर रोती हो… जब तुम हँसकर जोज़फ़ से लड़ती हो… जब तुम अकेले में, रिकॉर्डिंग के बीच, अपने अब्बू का पसंदीदा शेर गुनगुनाती हो…"
दुआ की आँखें फैल गईं। वो सच में ऐसा करती थी। जब कोई नहीं होता था।
"कौन… कौन हो तुम?" उसके होंठ हिले, मगर आवाज़ बमुश्किल निकली।
एक पल की ख़ामोशी। फिर—
"तुम्हारी आवाज़ में आग है, दुआ।" वो रुका। "और मैं… आग से बना हूँ।"
दुआ ने हेडफ़ोन नोचकर फेंक दिए। वो पीछे दीवार से जा लगी। साँसें तेज़-तेज़ चल रही थीं। बूथ की गर्मी अचानक ग़ायब हो गई, जैसे किसी ने दरवाज़ा खोलकर सब बाहर निकाल दिया हो।
और तब उसने देखा।
बूथ के शीशे पर। कंट्रोल रूम की तरफ़ से। जहाँ कोई नहीं था।
एक हथेली का निशान था।
मर्दाना हाथ। लंबी उँगलियाँ। और वो निशान… चमक रहा था। अंगारे जैसा नारंगी। जैसे शीशे को किसी ने अंदर तक तपा दिया हो। धीरे-धीरे वो रंग गहरा लाल हुआ, फिर काला पड़ने लगा, और फिर… मिटने लगा।
नीचे सीढ़ियों पर जोज़फ़ भाई के क़दमों की आवाज़ आई। वो कंट्रोल रूम में घुसे, दोनों हाथों में चाय के कप।
"बीबी, फ़ज़लू ने आज इलायची डाली है, कहता है तुम्हारे लिए ख़ास—"
उनकी नज़र शीशे पर पड़ी। उस मिटते हुए निशान पर।
दोनों कप उनके हाथ से छूट गए। गर्म चाय फ़र्श पर फैल गई। मगर उन्हें होश नहीं था।
कुछ देर बाद, जब दोनों कुर्सियों पर बैठे काँपते हुए एक-दूसरे को देख रहे थे, जोज़फ़ भाई ने चुपचाप कंप्यूटर की तरफ़ हाथ बढ़ाया। "ऑटो-रिकॉर्ड… देखते हैं क्या रिकॉर्ड हुआ।"
उन्होंने फ़ोल्डर खोला।
टेक सैंतालीस वहाँ था। टेक अड़तालीस भी। मगर उनके नीचे एक और फ़ाइल थी। ऐसी फ़ाइल, जो उन्होंने कभी नहीं बनाई थी।
उसका नाम था — "दुआ"।
बस इतना। दुआ।
फ़ाइल की लंबाई थी — एक सौ बयालीस घंटे। और बनाने की तारीख़… चार महीने पहले की।
जोज़फ़ भाई ने काँपते हाथ से उसे चलाया। स्पीकर में दुआ की आवाज़ आई। फिर दुआ की। फिर दुआ की। हर वो लाइन, जो उसने पिछले चार महीनों में उस बूथ में बोली थी। हर हँसी। हर खाँसी। हर गुनगुनाहट। सब, एक के बाद एक, किसी ने बड़े प्यार से जोड़-जोड़कर रखी थी। जैसे कोई आशिक़ अपनी महबूबा के ख़त सँभालकर रखता है।
और हर टुकड़े के बीच… एक बहुत धीमी, बहुत पुरानी धुन। कोई गुनगुना रहा था। ऐसी ज़बान में, जो न उर्दू थी, न अरबी, न तुर्की।
दुआ ने मुँह पर हाथ रख लिया।
उस रात, जब वो फ़ज्र से ठीक पहले रिक्शे में बैठकर घर की तरफ़ जा रही थी, और कराची का आसमान धीरे-धीरे स्याह से नीला हो रहा था… उसे नहीं पता था कि इस शहर में कोई था, जो चार महीने से सिर्फ़ उसकी आवाज़ के सहारे जी रहा था।
और उसे ये भी नहीं पता था… कि इसी शहर के एक दूसरे कोने में, समंदर के किनारे बने एक शीशे के घर में, कोई और भी उसकी आवाज़ सुन रहा था।
मगर उसकी नीयत… मोहब्बत नहीं थी।
- Writer
- Pretika
- Story
- उस जिन्न की आख़िरी मोहब्बत
- Chapter
- 1 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 10 min
- Words
- 1878
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- 4 parts free · 16 unlock with coins
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