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भाग 2 — नाज़िमाबाद की छत

Pretika · Jinn & Spirits · 11 मिनट

नाज़िमाबाद नंबर तीन। एक तंग गली, जिसके दोनों तरफ़ दो-मंज़िला मकान ऐसे खड़े थे, जैसे पुराने दोस्त कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों। ऊपर बिजली के तारों का जाल, नीचे पानी की टंकियों से टपकता पानी, और हर दूसरे घर के बाहर खड़ी कोई पुरानी मोटरसाइकिल।

इसी गली का आख़िरी मकान था। हरे गेट वाला। रहमान साहब का घर।

दुआ जब रिक्शे से उतरी, तो फ़ज्र की अज़ान ख़त्म हो चुकी थी। गली की मस्जिद से कुछ बुज़ुर्ग लौट रहे थे। उसने दुपट्टा सिर पर ठीक किया और गेट खोला।

आँगन में, तख़्त पर, जाए-नमाज़ अभी तक बिछी थी। और उस पर बैठे थे रहमान साहब। साठ बरस के। सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, सफ़ेद दाढ़ी। गोद में दीवान-ए-ग़ालिब की वो किताब, जिसके पन्ने इतनी बार पलटे गए थे कि अब किनारों से रुई जैसे नर्म हो गए थे।

"आ गई मेरी शहज़ादी?"

दुआ का दिल भर आया। रात भर का डर, वो आवाज़, वो जलता हुआ हाथ… सब एक पल के लिए पीछे छूट गया। वो जाकर अब्बू के पास बैठ गई और उनके कंधे पर सिर रख दिया।

"अब्बू, आप सोए क्यों नहीं? डॉक्टर ने कहा था ना, आपके दिल को आराम चाहिए।"

"दिल को आराम तभी मिलता है बेटा, जब उसकी धड़कन घर लौट आती है।" वो मुस्कुराए। फिर उनकी नज़र दुआ के चेहरे पर ठहर गई। उस्ताद की नज़र थी। चालीस साल बच्चों के चेहरे पढ़ने वाली। "क्या बात है? रंग उड़ा हुआ है।"

दुआ ने नज़र चुराई। "कुछ नहीं अब्बू। बस थकान। रात लंबी थी।"

रहमान साहब ने ज़्यादा नहीं पूछा। उन्होंने बस उसका सिर सहलाया और किताब का एक पन्ना खोला। "सुनो, आज रात तुम्हारे इंतज़ार में ये शेर पढ़ रहा था।" और फिर अपनी पुरानी, क्लास वाली आवाज़ में बोले—

"इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब… कि लगाए न लगे, और बुझाए न बने।"

दुआ के बदन में एक झुरझुरी दौड़ गई।

आतिश। आग।

"अब्बू…" उसने धीरे से पूछा, "आपको क्या लगता है… जिन्न होते हैं?"

रहमान साहब ने किताब बंद की। "होते हैं बेटा। क़ुरआन में उनका ज़िक्र है। मगर उनकी दुनिया अलग है, हमारी अलग। वो अपनी राह चलते हैं, हम अपनी। जब तक कोई किसी की राह में न आए, सब ठीक रहता है।" फिर उन्होंने भौंहें उठाईं। "मगर तुम क्यों पूछ रही हो?"

"बस… एक ड्रामे में डायलॉग था।"

"बस! आ गई महारानी?"

रसोई के दरवाज़े से शगुफ़्ता बेगम निकलीं। हाथ में बेलन, दुपट्टा कमर में खुँसा हुआ, और चेहरे पर वो ग़ुस्सा, जो सिर्फ़ मोहब्बत करने वाली माएँ कर सकती हैं।

"चलो, मुँह-हाथ धोओ, पराठा खाओ, और सो जाओ। और आप, रहमान साहब! सारी रात जागकर ग़ालिब पढ़ रहे थे? ग़ालिब ने कभी आपकी दवाई की पर्ची पढ़ी है?"

दुआ हँस पड़ी। अब्बू भी।

तभी सीढ़ियों से धड़धड़ाती हुई हानिया उतरी। बीस साल की, मोबाइल हाथ में, बाल बिखरे हुए। "आपी! आपी! कल वाला एपिसोड पूरी यूनिवर्सिटी ने देखा। मेरी दोस्त सना कह रही थी, ज़ेनेप की आवाज़ सुनकर उसका मंगेतर रो पड़ा। मैंने कहा, ये आवाज़ मेरी बहन की है। किसी ने यक़ीन ही नहीं किया!"

"यक़ीन कैसे करें," अम्मी बड़बड़ाईं, "जिस लड़की की आवाज़ पर लोग रोते हैं, उसके लिए एक ढंग का रिश्ता नहीं आता। ख़ाला सलीमा का बेटा पूछ रहा था—"

"अम्मी!" दुआ और हानिया एक साथ चिल्लाईं।

"क्या अम्मी? चौबीस की हो गई है। मेरी चौबीस की उम्र में फ़हद गोद में था।" अम्मी ने ऊपर वाले कमरे की तरफ़ देखा, जहाँ से ख़र्राटों की आवाज़ आ रही थी। "और ये नवाब साहब… बारह बजे से पहले नहीं उठेंगे।"

वो एक आम सुबह थी। एक आम घर की। मगर कुछ ही घंटों बाद… ये घर आम नहीं रहने वाला था।

दोपहर के ढाई बजे दुआ की आँख शोर से खुली।

गली में किसी गाड़ी का भारी इंजन गुर्रा रहा था। फिर ज़ोर-ज़ोर से गेट पीटा गया।

वो दुपट्टा सँभालती हुई नीचे आई। आँगन में अब्बू खड़े थे, अम्मी उनके पीछे, और गेट के बाहर एक काली विगो खड़ी थी। उससे तीन आदमी उतरे थे। दो मोटे-ताज़े, बाज़ुओं पर टैटू। और बीच में… एक दुबला-पतला, साफ़-सुथरा आदमी। सफ़ेद कलफ़ लगा शलवार-क़मीज़, आँखों पर महँगा काला चश्मा, हाथ में एक पतली सी छड़ी।

शकील भाई।

पूरे नाज़िमाबाद में ये नाम लोग धीरे बोलते थे।

"अस्सलाम-ओ-अलैकुम, रहमान साहब।" शकील भाई ने बड़ी तहज़ीब से सिर झुकाया। "आपसे पढ़ा है मैंने। सातवीं क्लास में। आपने मुझे एक बार बेंच पर खड़ा किया था, याद है?"

अब्बू की आवाज़ स्थिर थी। "याद नहीं। बहुत बच्चों को खड़ा किया है।"

"कोई बात नहीं।" शकील भाई मुस्कुराया। "मैं बस ये बताने आया था कि आपका बेटा फ़हद हमारे अठारह लाख रुपये खा गया है। छह महीने हो गए। ना फ़ोन उठाता है, ना दुकान पर मिलता है।"

अम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख़ निकली। अठारह लाख।

गली के घरों की छतों पर, खिड़कियों में, दरवाज़ों की झिर्रियों में… चेहरे उभर आए थे। मोहल्ला देख रहा था। मोहल्ला हमेशा देखता है।

"आप उस्ताद आदमी हैं," शकील भाई ने कहा, "आपकी इज़्ज़त करता हूँ। इसीलिए अभी तक सिर्फ़ बात करने आया हूँ।"

फिर उसने बड़े आराम से, जैसे कोई मक्खी उड़ा रहा हो, अपनी छड़ी आँगन में खड़ी फ़हद की मोटरसाइकिल के शीशे पर मारी। शीशा चटककर ज़मीन पर बिखर गया।

"दस दिन।"

वो पलटने लगा। फिर रुका। उसकी नज़र सीढ़ियों पर खड़ी दुआ पर पड़ी। उसने चश्मा थोड़ा नीचे किया।

"बाजी… आपकी आवाज़ बड़ी प्यारी है। मेरी बीवी रोज़ आपका ड्रामा देखती है।"

बस इतना कहा। मगर उस एक जुमले में जो धमकी थी, वो पूरे आँगन ने सुनी। वो जानता था कि दुआ कौन है। कहाँ काम करती है। किस वक़्त लौटती है।

विगो चली गई। गली के चेहरे धीरे-धीरे ग़ायब हुए। मगर उनकी कानाफूसी नहीं गई।

और तभी रहमान साहब ने अपने सीने पर हाथ रखा, और धीरे से तख़्त पर बैठ गए।

"अब्बू!"

"कुछ नहीं… कुछ नहीं बेटा… बस ज़रा सा… दवाई…"

हानिया दौड़कर दवा लाई। अम्मी ने पानी पिलाया। कुछ मिनटों में अब्बू की साँस सँभल गई। मगर उनकी आँखों में जो टूटा था… वो नहीं सँभला।

ऊपर से फ़हद उतरा। सत्ताईस का, मगर उस वक़्त किसी डरे हुए बच्चे जैसा। उसने सब सुन लिया था।

अम्मी उठीं। उसके सामने जाकर खड़ी हुईं। और एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा।

फिर, उसी पल, अम्मी ने उसे सीने से लगा लिया और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं। "क्यों किया? क्यों किया तूने, बदबख़्त? क्या कमी छोड़ी थी हमने?"

फ़हद की आवाज़ भर्रा गई। "मैंने ऑनलाइन मोबाइल का बिज़नेस शुरू किया था, अम्मी। दुबई से माल मँगवाना था। पार्टनर सारे पैसे लेकर भाग गया।" उसने नज़र उठाई। "और… और आपको क्या लगा था, हानिया के सेमेस्टर की फ़ीस कहाँ से आई थी?"

आँगन में सन्नाटा छा गया।

हानिया के हाथ से पानी का गिलास छूट गया।

उस रात घर में खाना नहीं बना।

रात ग्यारह बजे दुआ ने फ़हद को गली के कोने पर, बंद दुकान के चबूतरे पर अकेले बैठे देखा। वो उसके पास जाकर बैठ गई।

"भाई, तुमने हमसे क्यों नहीं कहा?"

फ़हद ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर बोला, "किस मुँह से कहता, दुआ? बड़ा मैं हूँ। घर मुझे चलाना था। और चला तुम रही हो। रात-रात भर पराई आवाज़ों में बोलकर।" उसकी आँखें भीग गईं। "मैं बस एक बार… एक बार कुछ बनकर दिखाना चाहता था।"

दुआ ने उसका हाथ पकड़ा। "हम मिलकर देखेंगे। कुछ न कुछ होगा।"

मगर अठारह लाख, एक वॉइस आर्टिस्ट की तनख़्वाह से, दस दिन में… कुछ नहीं होने वाला था। दोनों ये जानते थे।

आधी रात के बाद, जब पूरा घर सो गया, दुआ छत पर चली गई।

नाज़िमाबाद की छतें कराची का असली चेहरा थीं। हर छत पर पानी की टंकी, सूखते कपड़े, टूटी कुर्सियाँ, और ऊपर बेशुमार तार। दूर, बहुत दूर, क्लिफ़्टन की ऊँची इमारतों की रौशनियाँ, और उनसे भी आगे… समंदर। जो दिखता नहीं था, मगर जिसकी नमकीन हवा यहाँ तक आती थी।

तभी अचानक पूरा मोहल्ला अँधेरे में डूब गया। लोड-शेडिंग। हर घर से एक साथ "उफ़्फ़" की आवाज़ आई। और फिर, बिजली जाते ही, आसमान में तारे निकल आए। वो तारे, जो कराची की रौशनियों में हमेशा खोए रहते हैं।

पीछे से क़दमों की आहट हुई। हानिया थी, दो कप चाय लिए।

"आपी, मुझसे सोया नहीं गया।" उसने एक कप दुआ को दिया। "मेरी फ़ीस… मुझे पता होता तो…"

"चुप।" दुआ ने उसे अपने पास बिठा लिया। "तुम पढ़ो। बस पढ़ो। बाक़ी हम देख लेंगे।"

दोनों बहनें देर तक चुपचाप चाय पीती रहीं। फिर दुआ ने, बिना सोचे, धीरे से कहा, "हानिया… अगर मैं तुम्हें कुछ बताऊँ, तो हँसोगी तो नहीं?"

और उसने बता दिया। बूथ। बिना साँस की आवाज़। शीशे पर जलता हाथ। एक सौ बयालीस घंटे की फ़ाइल।

हानिया ने पहले उसे घूरा। फिर हँसी रोकने की कोशिश की। फिर रोक नहीं पाई। "आपी… अगर कोई जिन्न सच में आप पर आशिक़ हो गया है… तो कम से कम उसका टेस्ट तो अच्छा है।"

"हानिया!"

"अच्छा, अच्छा, सॉरी।" वो हँसते-हँसते रुकी। फिर उसकी नज़र दुआ के कंधे पर पड़ी। और उसकी हँसी अचानक ग़ायब हो गई।

"आपी… आपका दुपट्टा…"

दुआ ने देखा।

दुपट्टे का किनारा, जो उसके कंधे से लटक रहा था… जला हुआ था। हल्का सा। भूरा। जैसे किसी ने उसे अंगारे के पास पकड़ा हो। और जब दुआ ने उसे छुआ…

वो अब तक गर्म था।

उस रात दुआ बहुत देर से सोई। और सोते ही उसने ख़ुद को एक समंदर के किनारे खड़ा पाया।

मगर वो पानी का समंदर नहीं था।

लहरें नारंगी थीं। सुनहरी। आग की लहरें। वो आतीं, उसके पैरों को छूतीं, और लौट जातीं। मगर उनमें जलन नहीं थी। बस एक गुनगुनी गर्मी थी। जैसे सर्दी की धूप।

और उन लहरों के बीच… कुछ दूर… कोई खड़ा था।

लंबा क़द। काले कपड़े, जो धुएँ जैसे लहरा रहे थे, मगर धुआँ नहीं थे। उसका चेहरा आग की रौशनी में टुकड़ों में दिखता था। कभी एक तीखा जबड़ा। कभी माथे पर गिरे काले बाल। और आँखें… राख जैसी सलेटी, जिनके बीच दो अंगारे सुलग रहे थे।

"तुम?" दुआ ने कहा।

"मैं।" वही आवाज़। बिना साँस की।

"नाम क्या है तुम्हारा?"

वो हल्का सा मुस्कुराया। उस मुस्कुराहट में इतनी पुरानी उदासी थी, जैसे सदियों से किसी ने उसे मुस्कुराते न देखा हो। "नाम बताने से रिश्ते बनते हैं, दुआ। और मेरे रिश्ते… लोगों को जला देते हैं।"

"तो फिर मेरे पास क्यों आते हो?"

"मैं नहीं आता।" उसने कहा। "तुम्हारी आवाज़ मुझे खींच लाती है। तुम बोलती हो… और मैं बँध जाता हूँ।"

वो उसकी तरफ़ बढ़ा। हर क़दम के साथ आग की लहरें शांत होती गईं, जैसे उसे रास्ता दे रही हों। वो उससे बस एक हाथ की दूरी पर आकर रुक गया।

फिर उसने अपना हाथ उठाया। धीरे से। उसके चेहरे की तरफ़। और उसकी उँगलियाँ दुआ के गाल से बस एक इंच पहले रुक गईं।

उसने उसे छुआ नहीं। मगर उसकी गर्मी… दुआ के गाल से उतरकर उसकी गर्दन पर आई, फिर कंधे पर। जैसे किसी ने गर्म रेशम का दुपट्टा बहुत धीरे से उसके बदन पर सरका दिया हो। दुआ की साँस अटक गई। उसकी आँखें अपने आप बंद हो गईं। उसे डरना चाहिए था। वो जानती थी, उसे डरना चाहिए था।

मगर उस पल, सदियों पुरानी उस आग के सामने… उसे पहली बार लगा कि कोई उसे सिर्फ़ सुन नहीं रहा… महसूस कर रहा है।

"अभी नहीं।" उसकी फुसफुसाहट उसके कान के बिल्कुल पास थी। "अगर मैंने तुम्हें छुआ… तो वो जान जाएँगे।"

दुआ ने आँखें खोलीं। "कौन?"

उसका चेहरा अचानक सख़्त हो गया। उसने पीछे मुड़कर देखा, जैसे कोई उसे पुकार रहा हो। और तब दुआ ने देखा… उसकी कलाइयों पर, उसकी गर्दन के चारों ओर… चमकती हुई ज़ंजीरें थीं। लोहे की नहीं। हर्फ़ों की। अरबी जैसे किसी पुराने ख़त के अक्षर, जो जल रहे थे और उसकी खाल में धँसे हुए थे।

"जिनका मैं ग़ुलाम हूँ।"

और फिर, एक झटके से, जैसे किसी ने ज़ंजीर खींची हो… वो पीछे घसीटा गया। आग के समंदर के बीच। दूर। और दूर। और जाते-जाते उसकी चीख़ गूँजी—

"दुआ!"

दुआ झटके से उठ बैठी।

कमरे में अँधेरा था। बगल वाले बिस्तर पर हानिया गहरी नींद में थी। घड़ी में चार बजकर बारह मिनट।

हवा अब भी गर्म थी।

और उसकी बाईं कलाई पर… एक हल्का लाल घेरा था। चूड़ी जैसा। उसने उसे छुआ। गर्म था।

तभी तकिए के पास पड़ा उसका फ़ोन चमका। जोज़फ़ भाई का मैसेज था। चार बजकर दस मिनट पर भेजा हुआ।

"दुआ, सो रही हो तो सुबह पढ़ना। दो बातें। पहली — कल शाम कोई तुम्हारा पूछने स्टूडियो आया था। काली लैंड क्रूज़र। ड्राइवर ने गार्ड से कहा, 'हयात साहब कल ख़ुद आएँगे।'

दूसरी बात…

वो 'दुआ' वाली फ़ाइल। मैंने आज शाम डिलीट कर दी थी। अभी स्टूडियो का सिस्टम चेक किया। वो वापस आ गई है। और उसके आख़िर में कुछ नया जुड़ा है। चार मिनट की रिकॉर्डिंग।

बीबी… उसमें आग की लहरों की आवाज़ है। और तुम्हारी आवाज़ है। तुम किसी से उसका नाम पूछ रही हो।"

Writer
Pretika
Story
उस जिन्न की आख़िरी मोहब्बत
Chapter
2 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
11 min
Words
2100
Language
Hindi (हिंदी)
Price
4 parts free · 16 unlock with coins

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