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भाग 3 — रिश्ता
Pretika · Jinn & Spirits · 10 मिनट
उसी रात। डिफ़ेंस फ़ेज़ आठ। समंदर के बिल्कुल किनारे।
वहाँ एक घर था, जिसे कराची वाले "शीशे का महल" कहते थे। असल नाम था — हयात हाउस।
पुराने रईसों की तरह मोटी दीवारें और ऊँचे दरवाज़े नहीं थे वहाँ। तीन मंज़िलें, और हर मंज़िल की दीवारें शीशे की। दिन में वो घर आसमान और समंदर को अपने अंदर उतार लेता था। मगर रात में… जब बाहर अँधेरा हो जाता और अंदर बत्तियाँ जलतीं… तो हर शीशा आईना बन जाता। और घर में चलने वाला हर इंसान… हर तरफ़ से ख़ुद को देखता। जैसे घर ख़ुद उसे घूर रहा हो।
रात के तीन बजे, तीसरी मंज़िल की बालकनी पर हादी हयात खड़ा था।
उनतीस साल का। लंबा, दुबला, गेहुँआ रंग, और आँखों के नीचे वो साये, जो दो साल की जागी हुई रातों से बनते हैं। लंदन से मरीन बायोलॉजी पढ़कर आया था। उसे समंदर की मछलियों से बात करना आसान लगता था। अपने बाप से नहीं।
दो साल पहले, उसके बड़े भाई तैमूर की शादी की रात… तैमूर मर गया था। उस रात के बाद से हादी ठीक से सोया नहीं था।
नीचे, टीवी लाउंज से एक आवाज़ आ रही थी।
"मैं तुम्हें भूल जाऊँगी… जैसे समंदर भूल जाता है कि उसमें कौन डूबा था।"
हादी के क़दम अपने आप सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गए।
लाउंज में, सफ़ेद सोफ़े पर, उसकी माँ निगहत हयात बैठी थीं। छप्पन बरस की, मगर चालीस से ज़्यादा नहीं लगती थीं। रेशमी गाउन, कंधों पर बिखरे सुनहरी रंगे बाल, और उँगली में वो गहरे हरे ज़मुर्रद की अँगूठी, जो हादी ने कभी उनके हाथ से उतरी हुई नहीं देखी थी।
स्क्रीन पर "आसमान की क़ैद" का रिपीट चल रहा था।
"आप फिर जाग रही हैं, अम्मी?"
"तुम भी तो।" निगहत मुस्कुराईं। "आओ, बैठो। ये लड़की जब रोती है ना, हादी… तो लगता है सच में रो रही है।"
हादी बैठ गया। उसने सोचा था दो मिनट बैठेगा। मगर स्क्रीन पर ज़ेनेप बोलती रही, और वो सुनता रहा। उस आवाज़ में कुछ था। कोई गर्मी। कोई घर। जैसे बचपन की कोई सर्दी की शाम, जब अम्मी… नहीं, उसकी अम्मी ने कभी ऐसे बात नहीं की थी। तो फिर ये याद किसकी थी?
पता नहीं कब उसकी आँखें बंद हो गईं।
और निगहत हयात, सोफ़े के दूसरे कोने पर बैठी, उसे सोते हुए देखती रहीं। धीरे-धीरे, अपनी उँगली में ज़मुर्रद की अँगूठी घुमाती हुई। उनके होंठों पर एक बहुत हल्की मुस्कान थी।
वो मुस्कान किसी माँ की नहीं लगती थी।
अगली शाम, सात बजे। महताब चैम्बर्स।
दुआ ने पूरा दिन ख़ुद को समझाने में गुज़ारा था। ख़्वाब ख़्वाब होते हैं। फ़ाइलें करप्ट होती हैं। दुपट्टे इस्त्री से जलते हैं। और कलाई का लाल निशान… शायद चूड़ी का होगा। मगर उसने तो चूड़ी पहनी ही नहीं थी।
बिल्डिंग की पुरानी लिफ़्ट वही थी, अंग्रेज़ों के ज़माने वाली। लोहे का पिंजरा, सरकने वाला जालीदार दरवाज़ा, और एक पीली बत्ती, जो हमेशा टिमटिमाती रहती थी। दुआ अंदर गई। दरवाज़ा बंद करने ही वाली थी कि एक हाथ ने उसे रोक लिया।
"माफ़ कीजिएगा, क्या मैं भी…?"
एक लंबा, साफ़-सुथरा आदमी। सफ़ेद शर्ट, आस्तीनें मोड़ी हुईं, और ऐसा चेहरा, जो इस पुरानी बिल्डिंग में बिल्कुल ग़लत जगह लगता था। जैसे किसी पुराने रेडियो में किसी ने नया गाना बजा दिया हो।
दुआ ने बस सिर हिलाया। उसने चौथी मंज़िल का बटन दबाया। उस आदमी ने बटन देखा और कुछ नहीं दबाया।
"आप भी चौथी पर?" दुआ ने पूछा।
"जी। सदा स्टूडियोज़। किसी से मिलना है।"
लिफ़्ट चरमराती हुई ऊपर चली। पहली मंज़िल। दूसरी।
और फिर, एक झटका। बत्ती बुझी। लिफ़्ट रुक गई।
लोड-शेडिंग।
घुप्प अँधेरा। इतना गहरा कि दुआ को अपना हाथ भी नहीं दिख रहा था। लोहे के पिंजरे में बस दो साँसों की आवाज़ थी। और फिर, धीरे-धीरे, दुआ की साँस तेज़ होने लगी।
बचपन से उसे बंद जगहों से डर लगता था। बूथ में तो रौशनी होती थी। यहाँ कुछ नहीं था। दीवारें जैसे पास आ रही थीं।
"आप ठीक हैं?" अँधेरे में उस आदमी की आवाज़ आई। नर्म। फ़िक्रमंद।
"मुझे… मुझे बंद जगहों से…" उसकी आवाज़ टूट गई।
"ठीक है। ठीक है। सुनिए, जनरेटर दो-तीन मिनट में चल जाएगा। तब तक… मुझसे बात कीजिए। कुछ भी। अपना नाम बताइए। या कोई भी बात।"
दुआ ने काँपती आवाज़ में कहा, "मैं… मैं यहाँ काम करती हूँ। डबिंग। रात की शिफ़्ट।"
अँधेरे में एक लंबी ख़ामोशी हुई। फिर उस आदमी की आवाज़ बदल गई। जैसे उसने कोई भूली हुई धुन पहचान ली हो।
"एक मिनट… आप… आप ज़ेनेप हैं।"
दुआ का डर एक पल के लिए हैरत में बदल गया। "ज़ेनेप इस्तांबुल में रहती है। मैं नाज़िमाबाद में।"
वो हँसा। अँधेरे में उसकी हँसी अजीब तरह से सुकून देने वाली थी। "मैं हादी। हादी हयात।"
दुआ ठिठक गई। "हयात? कल आपका ड्राइवर आया था? पता पूछने?"
"ड्राइवर?" उसकी आवाज़ में सच्ची हैरत थी। "मैंने किसी को नहीं भेजा। मैं… मैं ख़ुद आया हूँ। पहली बार।"
"क्यों?"
अँधेरा था, इसलिए शायद वो सच बोल पाया। आमने-सामने होते तो शायद न बोल पाता।
"दो साल से ठीक से सोया नहीं हूँ। मेरे भाई की मौत के बाद से। डॉक्टर, दवाइयाँ, सब आज़मा लिया। और पिछली रात… आपकी आवाज़ सुनते-सुनते… सो गया। पूरे चार घंटे। दो साल में पहली बार।" वो रुका। "मैं बस देखना चाहता था कि वो आवाज़ किसकी है, जो मुझे नींद दे सकती है। और शुक्रिया कहना चाहता था।"
दुआ का गला भर आया। वो कुछ कहने वाली थी कि—
लिफ़्ट गर्म होने लगी।
और दुआ समझ गई।
दुआ का बदन अकड़ गया। "नहीं… नहीं… यहाँ नहीं…"
"क्या हुआ?" हादी ने अपने फ़ोन की टॉर्च जलाई। रौशनी का एक सफ़ेद घेरा लिफ़्ट में फैला। दुआ का चेहरा पसीने से भीगा था, आँखें फटी हुई। हादी ने बिना सोचे अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। "दुआ, साँस लीजिए, मैं यहाँ हूँ—"
टॉर्च टिमटिमाई। एक बार। दो बार। और बुझ गई। फ़ोन की स्क्रीन भी काली हो गई, जैसे उसकी जान निकाल ली गई हो।
अँधेरे में, दुआ के कान के बिल्कुल पास, बिना साँस वाली वो आवाज़ आई। इस बार नर्म नहीं थी। इस बार उसमें कोई जंगली, दहकता हुआ दर्द था।
"हटाओ… इसका… हाथ।"
और उसी पल हादी की एक दबी हुई चीख़ निकली। उसने झटके से अपना हाथ खींचा।
खड़खड़ाहट के साथ जनरेटर चला। पीली बत्ती जली। लिफ़्ट फिर से चरमराती हुई ऊपर चली।
दुआ ने हादी की तरफ़ देखा। वो अपना दायाँ हाथ बाएँ हाथ से दबाए खड़ा था। और उसकी हथेली पर, बीचोंबीच, एक लाल, उभरा हुआ जलने का निशान था। ऐसा, जैसे किसी ने दहकती उँगलियों से उसकी कलाई जकड़ी हो।
हादी ने उस निशान को देखा। उसके चेहरे पर डर नहीं था। कुछ और था। जैसे कोई पुराना ज़ख़्म फिर से खुल गया हो।
उसने बहुत धीरे से, लगभग अपने आप से कहा, "फिर से…"
दुआ ने सुन लिया। "फिर से क्या?"
हादी ने तुरंत ख़ुद को सँभाला। हाथ जेब में डाल लिया। "कुछ नहीं। शायद… लिफ़्ट की कोई तार। पुरानी बिल्डिंग है।"
चौथी मंज़िल पर दरवाज़ा खुला। सामने जोज़फ़ भाई खड़े थे, हाथ में मोमबत्ती। उन्होंने दोनों को देखा, फिर हादी को ऊपर से नीचे तक। फिर दुआ की तरफ़ झुककर फुसफुसाए, "बीबी, ये लड़का या तो बहुत शरीफ़ है, या बहुत ख़तरनाक। इतनी अच्छी उर्दू आजकल अमीर लड़के नहीं बोलते।"
हादी ज़्यादा देर नहीं रुका। उसने अपना कार्ड दुआ की तरफ़ बढ़ाया। "अगर कभी… किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो।" फिर एक पल रुका। "और दुआ… अपना ख़याल रखिएगा।"
जिस तरह उसने वो आख़िरी बात कही… वो किसी अजनबी की फ़ॉर्मेलिटी नहीं थी। वो एक चेतावनी थी।
तीन दिन बाद। दोपहर।
नाज़िमाबाद वाले घर में शगुफ़्ता बेगम चूल्हे पर दाल चढ़ाए खड़ी थीं, जब उनका फ़ोन बजा। अनजान नंबर।
"हेलो?"
दूसरी तरफ़ से एक आवाज़ आई। ऐसी शहद जैसी, ऐसी नफ़ीस, कि शगुफ़्ता बेगम ने अनजाने में अपना दुपट्टा ठीक कर लिया।
"अस्सलाम-ओ-अलैकुम, शगुफ़्ता बहन। मैं निगहत हयात बोल रही हूँ। हादी की वालिदा।"
"व-अलैकुम-अस्सलाम… जी… जी…"
"मैं बहुत सीधी बात करूँगी, क्योंकि अच्छी बातों में देर नहीं करनी चाहिए। मैं अपने बेटे हादी के लिए आपकी बेटी दुआ का हाथ माँगना चाहती हूँ। अगर आप इजाज़त दें, तो इस जुमे हम आपके घर हाज़िर होना चाहेंगे।"
शगुफ़्ता बेगम के हाथ से करछी छूटकर सीधी दाल की पतीली में जा गिरी।
"हयात… वो… हयात मरीन वाले?"
"जी।" निगहत हँसीं। "वही।"
उस शाम उस छोटे से घर में जो तूफ़ान आया, वो पूरी गली ने सुना।
हानिया बिस्तर पर उछल रही थी। "आपी! वो लिफ़्ट वाला! वो लिफ़्ट वाला!"
फ़हद, जो तीन दिन से किसी से नज़र नहीं मिला रहा था, पहली बार कमरे से बाहर आया। उसकी आँखों में एक उम्मीद थी, जिसे वो छुपाने की कोशिश कर रहा था। और दुआ जानती थी कि वो उम्मीद किस चीज़ की है। अठारह लाख की।
अम्मी तस्बीह पर तस्बीह पढ़ रही थीं। "या अल्लाह, तेरा शुक्र है। या अल्लाह, मेरी बेटी की क़िस्मत खोल दी।"
सिर्फ़ रहमान साहब चुप थे। तख़्त पर बैठे, ग़ालिब की किताब बंद किए।
"शगुफ़्ता," आख़िर उन्होंने कहा, "बड़े लोगों के रिश्ते, बड़े सवाल लेकर आते हैं। समंदर किनारे शीशे के महल में रहने वाले लोग, नाज़िमाबाद के एक रिटायर्ड मास्टर की बेटी को क्यों चाहेंगे?"
"क्योंकि मेरी बेटी हीरा है!" अम्मी ने तड़पकर कहा।
रहमान साहब ने उनकी तरफ़ देखा। बहुत थकी हुई आँखों से।
"हीरे को लोग पहनते भी हैं, शगुफ़्ता। और तिजोरी में बंद भी कर देते हैं।"
रात को, छत पर, दुआ ने हादी का कार्ड निकाला। देर तक उसे घूरती रही। फिर नंबर मिलाया।
तीसरी घंटी पर उसने उठाया। "हेलो?"
"आपने बिना मुझसे पूछे अपनी अम्मी को भेज दिया?" दुआ की आवाज़ में ग़ुस्सा था। और उस ग़ुस्से के नीचे कुछ और भी, जिसे वो ख़ुद नहीं पहचान पा रही थी।
दूसरी तरफ़ लंबी ख़ामोशी हुई।
"दुआ… क़सम से… मैंने अम्मी से सिर्फ़ इतना कहा था कि मुझे एक आवाज़ से नींद आती है। बस। मुझे नहीं पता था कि वो…" वो रुका। उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मेरी अम्मी कभी कुछ बेवजह नहीं करतीं।"
फिर उसने ख़ुद को सँभाला। "अगर आप ना कहेंगी, तो मैं ख़ुद आपके घर आकर माफ़ी माँग लूँगा। आपके अब्बू से भी। मैं आप पर कोई बोझ नहीं बनना चाहता।"
दुआ ने आसमान की तरफ़ देखा। लोड-शेडिंग फिर से थी। तारे फिर से निकल आए थे।
"मैं सोचूँगी," उसने कहा, और फ़ोन रख दिया।
उसी वक़्त, बीस किलोमीटर दूर, हयात हाउस की दूसरी मंज़िल पर।
निगहत हयात अपने ड्रेसिंग रूम में थीं। सामने छत से फ़र्श तक का एक बड़ा आईना। कमरे में बस एक लैंप जल रहा था।
उन्होंने धीरे-धीरे अपनी उँगली से वो ज़मुर्रद की अँगूठी उतारी। तीस साल में पहली बार।
अँगूठी के नीचे, उनकी उँगली की खाल पर, जले हुए निशान थे। अक्षर। किसी पुरानी लिपि के। वही अक्षर… जो दुआ ने अपने ख़्वाब में उस जिन्न की कलाइयों पर जलते हुए देखे थे।
निगहत ने आईने में देखा।
आईने में उनका अक्स… एक पल देर से हिला। जैसे उसे सोचकर हिलना पड़ा हो।
"मिल गई," निगहत ने आईने से कहा। बहुत धीमे। बहुत प्यार से। "और इस बार… वो ख़ुद उससे मोहब्बत कर बैठा है।"
उनका अक्स मुस्कुराया। ख़ुद निगहत के मुस्कुराने से पहले।
और ड्रेसिंग रूम के खुले दरवाज़े के बाहर, अँधेरे गलियारे में, सफ़ेद कपड़ों में एक दुबली-पतली औरत खड़ी थी। नंगे पाँव। बिखरे बाल। आँखों से चुपचाप आँसू बहते हुए।
रमीन। हयात हाउस की बड़ी बहू। तैमूर की बेवा।
वो दो साल से एक लफ़्ज़ नहीं बोली थी।
मगर उस रात, अँधेरे में, उसके होंठ हिले। बिना आवाज़ के। बस एक नाम।
"दुआ…"
- Writer
- Pretika
- Story
- उस जिन्न की आख़िरी मोहब्बत
- Chapter
- 3 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 10 min
- Words
- 1873
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- 4 parts free · 16 unlock with coins
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