Pretika › Jinn & Spirits › उस जिन्न की आख़िरी मोहब्बत

भाग 4 — हयात हाउस

Pretika · Jinn & Spirits · 8 मिनट

जुमे के दिन नाज़िमाबाद की उस तंग गली ने ऐसा मंज़र पहले कभी नहीं देखा था।

दो दिन से रहमान साहब के घर में जंग चल रही थी। फ़हद ने रात भर जागकर हरे गेट पर नया पेंट किया था। हानिया ने खिड़कियों के शीशे इतने चमकाए थे कि गली की बिल्लियाँ उनमें अपनी शक्ल देखकर डर जाती थीं। और शगुफ़्ता बेगम… वो ख़ाला सलीमा के घर से उनकी शादी वाली चीनी की प्लेटें माँगकर लाई थीं। वही ख़ाला सलीमा, जिनके बेटे का रिश्ता उन्होंने दो महीने पहले ठुकराया था।

"शगुफ़्ता," ख़ाला सलीमा ने प्लेटें देते हुए बड़ी मीठी ज़हरीली मुस्कान से कहा था, "अब समझ आया, मेरा बेटा क्यों पसंद नहीं आया। तुम्हारी नज़र तो समंदर पर थी।"

शाम पाँच बजे गली में दो काली लैंड क्रूज़र दाख़िल हुईं। गाड़ियाँ इतनी चौड़ी थीं कि दोनों तरफ़ की मोटरसाइकिलें हटानी पड़ीं। पीछे दो गार्ड, बंदूक़ों के साथ। हर छत पर, हर खिड़की में, हर दरवाज़े की झिर्री में… मोहल्ला जमा था।

पहले निगहत हयात उतरीं। हल्के गुलाबी जोड़े में, जैसे किसी फ़ैशन मैगज़ीन से निकलकर आई हों। फिर हादी, सफ़ेद शलवार-क़मीज़ में, नज़रें झुकाए, जैसे पूरे मोहल्ले की निगाहों से शर्मिंदा हो।

और फिर, सबसे आख़िर में, सिकंदर हयात।

साठ के क़रीब। लंबे, चौड़े कंधे, चाँदी जैसे सफ़ेद बाल, पीछे को कंघी किए हुए। और आँखें… ऐसी आँखें, जो किसी चीज़ को देखती नहीं थीं। तौलती थीं। उन्होंने उस छोटे से घर को ऐसे देखा, जैसे कोई ख़रीदार किसी दुकान में रखी चीज़ की क़ीमत लगा रहा हो।

ड्राइंग रूम में, जहाँ सोफ़े के कवर रात भर में धोकर इस्त्री किए गए थे, बातचीत शुरू हुई। निगहत बोलती रहीं, और कमरा उनकी मिठास से भर गया। उन्होंने अम्मी के हाथ के शामी कबाब की तारीफ़ की, रहमान साहब से ग़ालिब पर बात की, हानिया की पढ़ाई पूछी। सब कुछ बिल्कुल सही। ज़रूरत से ज़्यादा सही।

फिर दुआ चाय की ट्रे लेकर आई।

निगहत ने उसे देखा। और उनकी आँखों में एक पल के लिए कुछ चमका। भूख जैसा कुछ।

"इधर आओ, बेटा। मेरे पास बैठो।" उन्होंने दुआ का हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं। बर्फ़ जैसी। "कुछ बोलो।"

"जी?"

"कुछ भी। मैं तुम्हारी आवाज़ टीवी पर नहीं… सामने से सुनना चाहती हूँ।"

दुआ घबरा गई। सबकी नज़रें उस पर थीं। उसने धीरे से कहा, "आप… चाय लीजिए, आंटी। ठंडी हो जाएगी।"

निगहत हयात ने आँखें बंद कर लीं। जैसे कोई पुराना शराबी पहला घूँट लेता है। कुछ सेकंड वो वैसे ही बैठी रहीं। फिर आँखें खोलकर मुस्कुराईं। "माशाअल्लाह।"

हादी ने बेचैनी से पहलू बदला।

तभी सिकंदर हयात ने पहली बार मुँह खोला। उनकी आवाज़ भारी थी, और उसमें कोई गर्मी नहीं थी।

"रहमान साहब, मैं घुमा-फिराकर बात नहीं करता। हम लेन-देन वाले लोग हैं। जहाज़ों का कारोबार है। मगर इस रिश्ते में हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए। न दहेज, न रस्में, न कुछ और।" उन्होंने चाय का कप नीचे रखा। "बस लड़की।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

रहमान साहब ने अपना कप धीरे से मेज़ पर रखा। "सिकंदर साहब, मेरी बेटी कोई माल नहीं, जो जहाज़ पर लादा जाए।"

सिकंदर हयात की आँखें सिकुड़ीं। मगर इससे पहले कि वो कुछ कहते, निगहत खिलखिलाकर हँस पड़ीं। "अरे, इनकी बात का बुरा मत मानिए, भाई साहब। सारी ज़िंदगी बंदरगाह पर गुज़ारी है, अब इन्हें इंसानों से बात करना कहाँ आता है।" उन्होंने अम्मी का हाथ थामा। "अगले हफ़्ते, हफ़्ते की शाम, आप सब हमारे घर खाने पर आइए। हमारा घर देखिए। हमें देखिए। फिर फ़ैसला कीजिए।"

जाते वक़्त, गेट पर, हादी एक पल के लिए दुआ के पास रुका। बस इतना कहा, बहुत धीरे से, "मुझे माफ़ कर दीजिए। अब्बू ऐसे ही हैं।"

फिर एक पल रुककर, और भी धीरे, "और अम्मी… अम्मी उनसे भी ज़्यादा ऐसी हैं।"

अगले हफ़्ते, हफ़्ते की शाम।

जब रहमान साहब का पूरा ख़ानदान किराए की गाड़ी से हयात हाउस के गेट पर उतरा, तो पाँचों के मुँह खुले के खुले रह गए।

सामने वो शीशे का महल था। सूरज डूब रहा था, और पूरा घर सुनहरी आग में नहाया हुआ था। तीन मंज़िलें, सब शीशे की। उसके पीछे अरब सागर, जिसकी लहरें घर की नींव के पत्थरों से टकरा रही थीं। अंदर, ऊँची छत से लटकते झूमर, सफ़ेद संगमरमर के फ़र्श।

"अम्मी," फ़हद ने फुसफुसाकर कहा, "यहाँ तो बर्तन भी सोने के होंगे।"

"चुप कर। और कोई चीज़ मत छूना।"

खाना एक लंबी शीशे की मेज़ पर लगा था। बीस कुर्सियाँ, जिनमें से सिर्फ़ आठ भरी थीं। मेज़ के पीछे की पूरी दीवार शीशे की थी। अब बाहर अँधेरा हो चुका था, और वो शीशा एक बड़ा, काला आईना बन गया था, जिसमें पूरी मेज़ दिख रही थी।

दुआ ने बिरयानी की प्लेट से नज़र उठाई और उस आईने में देखा।

आठ लोग बैठे थे। आईने में भी आठ होने चाहिए थे।

आईने में नौ थे।

मेज़ के आख़िरी सिरे पर, जो कुर्सी असल में ख़ाली थी… आईने में उस पर कोई बैठा था। एक साया। धुँधला। बिना चेहरे का। मगर उसकी आँखों की जगह दो हल्के नारंगी अंगारे सुलग रहे थे। और वो अंगारे… दुआ को देख रहे थे।

दुआ के हाथ से चम्मच गिर गया। उसने झटके से असली कुर्सी की तरफ़ देखा। ख़ाली। फिर आईने में। अब वहाँ भी ख़ाली।

"क्या हुआ, बेटा?" निगहत ने पूछा। उनकी नज़र भी उसी कुर्सी पर थी। और उनके होंठों पर वो हल्की सी मुस्कान थी।

"कुछ… कुछ नहीं आंटी।"

तभी ऊपर से एक आवाज़ आई। कोई गुनगुना रहा था।

सबने ऊपर देखा। संगमरमर की घुमावदार सीढ़ियों के ऊपर, रेलिंग पकड़े, एक दुबली-पतली औरत खड़ी थी। सफ़ेद कपड़े। नंगे पाँव। कमर तक बिखरे बाल। और वो एक धुन गुनगुना रही थी।

दुआ का ख़ून जम गया।

ये वही धुन थी। वही पुरानी, अजनबी ज़बान वाली धुन। जो स्टूडियो की उस "दुआ" फ़ाइल में, उसकी आवाज़ के हर टुकड़े के बीच बज रही थी।

"ये रमीन है," निगहत ने बहुत नर्मी से कहा, "हमारी बड़ी बहू। तैमूर के जाने के बाद से… बेचारी बीमार है। किसी से बात नहीं करती।" फिर उन्होंने ऊपर देखकर हल्की सी आवाज़ दी, "ज़ुबैदा!"

एक नौकरानी दौड़कर आई और रमीन को बाज़ू से पकड़कर अंदर ले गई। रमीन ने कोई विरोध नहीं किया। मगर जाते-जाते उसने पलटकर नीचे देखा। सीधे दुआ की तरफ़।

खाने के बाद दुआ वॉशरूम के बहाने उठी। उसे साँस लेनी थी। अकेले।

वॉशरूम एक लंबे गलियारे के आख़िर में था। गलियारे की दोनों दीवारें शीशे की थीं, और रात में वो दोनों आईने बन गई थीं। दुआ जैसे-जैसे चलती, उसके अक्स दोनों तरफ़ अनगिनत होते जाते। सौ दुआएँ। हज़ार दुआएँ। सब एक साथ चलती हुईं।

और फिर, एक झटके से, किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।

रमीन।

पता नहीं वो कहाँ से आई थी। उसका हाथ ठंडा था, और काँप रहा था। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी, लाल, जैसे बरसों से रोई हों। उसने दुआ का हाथ खींचकर उसकी हथेली ऊपर की ओर पलटी। फिर अपने नाख़ून से, बहुत ज़ोर से, उस पर कुछ बनाने लगी।

एक गोला। फिर उसके बीच से एक लकीर।

जैसे कुछ काटा जा रहा हो। मना किया जा रहा हो।

"क्या… क्या कह रही हो तुम?" दुआ ने फुसफुसाकर पूछा।

रमीन के होंठ हिले। आवाज़ नहीं निकली। मगर दुआ ने होंठ पढ़ लिए। डबिंग करते-करते उसे होंठ पढ़ने की आदत हो गई थी।

"हाथ… मत… देना।"

फिर रमीन ने अपनी आस्तीन ऊपर सरकाई। और दुआ की चीख़ उसके गले में अटक गई।

रमीन की बाईं हथेली से लेकर कोहनी तक… पूरी खाल जली हुई थी। पुराना, सूखा हुआ जलना। और उस जली खाल में, उभरे हुए, वही अक्षर थे। वही हर्फ़। जो दुआ ने ख़्वाब में उस जिन्न की ज़ंजीरों में देखे थे।

"रमीन!"

गलियारे के दूसरे सिरे पर निगहत हयात खड़ी थीं।

रमीन ने ऐसे हाथ छोड़ा, जैसे उसे करंट लगा हो। ज़ुबैदा दौड़ती हुई आई और उसे घसीटकर ले गई। रमीन ने इस बार पीछे मुड़कर नहीं देखा।

निगहत धीरे-धीरे चलती हुई दुआ के पास आईं। उन्होंने दुआ का वही हाथ अपने हाथ में लिया, जिस पर रमीन ने नाख़ून से निशान बनाया था। अँगूठे से उसे हल्का सा सहलाया, जैसे मिटा रही हों।

"डर गई?" उन्होंने बड़ी फ़िक्र से पूछा। "बेचारी। तैमूर से बहुत मोहब्बत करती थी। उसका ग़म बर्दाश्त नहीं कर पाई।" फिर उन्होंने दुआ की हथेली को देखा। देर तक। "कितनी प्यारी हथेलियाँ हैं तुम्हारी। साफ़। बिल्कुल ख़ाली काग़ज़ जैसी।"

उस रात, दो बजे, दुआ स्टूडियो पहुँची। उसे घर पर नींद नहीं आ रही थी, और वो किसी से बात नहीं कर सकती थी। सिवाय उसके।

जोज़फ़ भाई अभी आए नहीं थे। उसने बूथ की बत्ती जलाई, दरवाज़ा बंद किया, हेडफ़ोन लगाए, और रिकॉर्ड का बटन दबा दिया।

"तुम वहाँ थे," उसने माइक में कहा। "मेज़ के आख़िरी सिरे पर। मैंने देखा तुम्हें।"

जवाब में… माइक का तार सुलगने लगा।

पहले एक पतली सी धुएँ की लकीर। फिर तार की रबड़ पिघलने लगी। बूथ की दीवारों पर लगे काले फ़ोम पर, अपने आप, जलने के निशान उभरने लगे। जैसे कोई अदृश्य उँगली उन पर लिख रही हो। अक्षर बनते गए। उर्दू के अक्षर। बड़े-बड़े, दहकते हुए।

उस… घर… में… मत… जाना।

और हेडफ़ोन में वो आवाज़ आई। इस बार उसमें डर था। सदियों पुरानी उस आग में… डर।

"दुआ… उस घर में मत जाना। वहाँ की हर दीवार आईना है। और हर आईने के पीछे… एक दुल्हन है… जो अब तक चीख़ रही है।"

Writer
Pretika
Story
उस जिन्न की आख़िरी मोहब्बत
Chapter
4 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
8 min
Words
1513
Language
Hindi (हिंदी)
Price
4 parts free · 16 unlock with coins

← पिछला भाग

उस जिन्न की आख़िरी मोहब्बत · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories