PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 20 — “जिस रात मौत फिर जागी”

firoj saifi · Ghost Stories · 7 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
20 of 20
Category
Ghost Stories
Reading time
7 min
Words
1320
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

बारिश हो रही थी।

बहुत तेज़ बारिश।

फ़िरोज़ ने आँखें खोलीं।

वह हवेली के बाहर खड़ा था।

लेकिन हवेली…

नई थी।

दीवारें टूटी नहीं थीं।

खिड़कियाँ सही थीं।

आँगन में लालटेन जल रही थी।

और दूर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।

नूर उसके पास खड़ी थी।

“हम आ गए।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“कहाँ?”

“1987।”

फ़िरोज़ ने अपनी घड़ी देखी।

8 सितंबर 1987।

समय—

2:30 रात।

फ़िरोज़ ने हवेली की तरफ़ देखा।

“तो हमें क्या करना है?”

नूर ने कहा—

“सलीमा को ढूँढना।”

“क्यों?”

“क्योंकि इसी रात उसने तुम्हारा पहला शरीर बंद किया था।”

फ़िरोज़ का चेहरा बदल गया।

“और अगर हम उसे रोक दें?”

“तो तुम्हारा पूरा वर्तमान बदल जाएगा।”

“और मेरा बेटा?”

नूर ने कहा—

“वह भी बदल जाएगा।”

फ़िरोज़ कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने कहा—

“चलो।”

वे हवेली के अंदर पहुँचे।

अंदर से बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।

फ़िरोज़ उस आवाज़ को पहचानता था।

“ये बच्चा…”

नूर ने कहा—

“तुम।”

“लेकिन मैं यहाँ हूँ।”

“तुम्हारा पहला शरीर वहाँ है।”

एक कमरे का दरवाज़ा खुला।

अंदर सलीमा खड़ी थी।

जवान।

उसके हाथ में लोहे की छड़।

फ़र्श पर एक छोटा बच्चा पड़ा था।

वही चेहरा।

वही आँखें।

वही काली बिंदी।

फ़िरोज़ की साँस रुक गई।

“मैं…”

सलीमा ने बच्चे की तरफ़ देखा।

“अगर मैंने इसे नहीं मारा…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“तो मौत इसे दुनिया में ले आएगी।”

फ़िरोज़ दरवाज़े के बाहर खड़ा था।

“अम्मी…”

सलीमा ने पीछे देखा।

उसने फ़िरोज़ को देखा।

लेकिन उसके चेहरे पर कोई आश्चर्य नहीं था।

जैसे वह पहले से जानती हो कि वह आएगा।

“तुम आ गए।”

फ़िरोज़ चौंक गया।

“आप मुझे पहचानती हैं?”

सलीमा ने कहा—

“मैंने तुम्हें भेजा था।”

“कहाँ?”

“भविष्य में।”

फ़िरोज़ चुप।

सलीमा ने लोहे की छड़ नीचे रख दी।

“मुझे पता था कि एक दिन तुम वापस आओगे।”

“मुझे रोकने के लिए?”

“नहीं।”

“तो?”

“मुझे बचाने के लिए।”

फ़िरोज़ आगे बढ़ा।

“किससे?”

सलीमा ने बच्चे की तरफ़ देखा।

“उससे।”

बच्चे ने आँखें खोल दीं।

फ़िरोज़ जम गया।

बच्चे ने उसे देखा।

और मुस्कुराया।

“अब्बा।”

फ़िरोज़ की आँखों से आँसू बह निकले।

“तुम…”

सलीमा ने कहा—

“यही तुम्हारी सबसे बड़ी भूल थी।”

“क्या?”

“तुम सोचते रहे कि यह बच्चा तुम्हारा अतीत है।”

उसने बच्चे की तरफ़ इशारा किया।

“लेकिन यह तुम्हारा भविष्य है।”

फ़िरोज़ ने नूर की तरफ़ देखा।

नूर भी स्तब्ध थी।

सलीमा आगे बोली—

“तुम्हें इसे मारना नहीं है।”

“तो?”

“इसे जन्म लेना है।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“फिर मौत?”

सलीमा ने कहा—

“मौत को भी जन्म लेना है।”

“क्यों?”

“क्योंकि…”

उसने फ़िरोज़ के सीने की तरफ़ देखा।

“तुम मौत को अपने अंदर लेकर पैदा हुए थे।”

फ़िरोज़ ने कहा—

“और अब?”

सलीमा मुस्कुराई।

“अब तुम मौत को अपने अंदर से निकालोगे।”

कमरे की हवा अचानक बदल गई।

दीवारों पर काली दरारें फैलने लगीं।

सलीम दरवाज़े पर दिखाई दिया।

“सलीमा!”

सलीमा ने उसकी तरफ़ देखा।

“अब समय आ गया है।”

सलीम ने फ़िरोज़ को देखा।

“तुम?”

फ़िरोज़ ने कहा—

“हाँ।”

सलीम की आँखों में आँसू आ गए।

“बेटा…”

फ़िरोज़ ने पहली बार बिना डरे कहा—

“अब्बा।”

सलीम उसके पास आया।

उसने फ़िरोज़ को गले लगा लिया।

दोनों कुछ पल तक चुप रहे।

सलीम ने फुसफुसाकर कहा—

“मुझे माफ़ करना।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“किस बात के लिए?”

“तुम्हें सच बहुत देर से बताया।”

फ़िरोज़ ने कहा—

“अब बता दीजिए।”

सलीम ने बच्चे की तरफ़ देखा।

“तुम्हारी मौत…”

वह रुक गया।

“तुम्हारे अंदर नहीं है।”

फ़िरोज़ चौंका।

“तो कहाँ है?”

सलीम ने धीरे से कहा—

“तुम्हारे बेटे में।”

फ़िरोज़ ने बच्चे की तरफ़ देखा।

बच्चा मुस्कुरा रहा था।

“अब्बा…”

फ़िरोज़ ने उसे गोद में उठा लिया।

बच्चे ने अपना सिर उसके सीने पर रख दिया।

उसी क्षण…

काली घड़ी फिर दिखाई दी।

लेकिन इस बार वह फ़िरोज़ की छाती में नहीं थी।

वह बच्चे की कलाई पर थी।

फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।

“नहीं…”

नूर पीछे हट गई।

“ये कैसे?”

सलीमा ने कहा—

“क्योंकि तुमने मौत को अपने अंदर से निकाल दिया।”

“लेकिन…”

फ़िरोज़ बच्चे की कलाई देखता रहा।

“ये तो…”

सलीमा ने कहा—

“अब इसका नया घर है।”

कमरे में अँधेरा भर गया।

एक आवाज़ आई—

“और नया नाम भी।”

फ़िरोज़ ने चारों तरफ़ देखा।

“कौन?”

अँधेरे से हामिद निकला।

लेकिन अब वह बूढ़ा नहीं था।

उसका चेहरा बिल्कुल शांत था।

“मैं।”

फ़िरोज़ ने बच्चे को और कसकर पकड़ लिया।

“इसके पास मत आना।”

हामिद मुस्कुराया।

“मैं इसके पास नहीं आया।”

उसने फ़िरोज़ की तरफ़ देखा।

“तुम मेरे पास आए हो।”

“मैं?”

“हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि अब तुम्हें आख़िरी सच सुनना है।”

फ़िरोज़ चुप रहा।

हामिद ने कहा—

“तुम्हारा नाम फ़िरोज़ नहीं है।”

कमरे में सन्नाटा।

फ़िरोज़ ने धीरे से पूछा—

“फिर?”

हामिद ने कहा—

“फ़िरोज़ सिर्फ़ वह नाम है…”

वह बच्चे की तरफ़ देखता है।

“जो तुम्हारे बेटे ने तुम्हें दिया।”

फ़िरोज़ के हाथ काँप गए।

“मुझे?”

“हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि समय उल्टा चल रहा है।”

नूर ने सिर पकड़ लिया।

“नहीं…”

हामिद बोला—

“बाप बेटे को नाम नहीं देता।”

उसने फ़िरोज़ की तरफ़ देखा।

“कभी-कभी…”

वह मुस्कुराया।

“बेटा बाप को नाम देता है।”

फ़िरोज़ की आँखों के सामने सारी यादें घूमने लगीं।

पहली रात।

लकड़ी का बक्सा।

काली घड़ी।

सलीम।

सलीमा।

नूर।

अरिफ़।

हामिद।

1939।

1987।

2026।

और वह बच्चा…

हर जगह।

हर बार।

हर जन्म में।

अब्बा।

फ़िरोज़ ने बच्चे को देखा।

“तुमने मेरा नाम रखा था?”

बच्चा मुस्कुराया।

“हाँ।”

“कौन-सा?”

बच्चे ने उसके कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाया।

फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।

उसने धीरे से कहा—

“ये नाम…”

सलीम ने पूछा—

“क्या?”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।

“ये मेरा नाम नहीं…”

वह रुक गया।

“ये तो…”

अचानक पूरी हवेली काँप उठी।

दीवारों पर लिखे सभी नाम गायब हो गए।

सिर्फ़ एक नाम रह गया।

सलीम।

फिर उसके नीचे—

ज़ोया।

फिर—

सलीमा।

फिर—

नूर।

और सबसे नीचे—

फ़िरोज़।

लेकिन अब फ़िरोज़ के नाम के नीचे एक और नाम लिखा था।

“पिता।”

बच्चे ने उसकी उँगली पकड़ ली।

“अब्बा…”

फ़िरोज़ ने आँसू पोंछे।

“हाँ।”

“आप घर चलोगे?”

फ़िरोज़ मुस्कुराया।

“कौन-सा घर?”

बच्चे ने हवेली के पीछे इशारा किया।

वहाँ एक बिल्कुल नया घर खड़ा था।

जिसे फ़िरोज़ ने पहले कभी नहीं देखा था।

उसके दरवाज़े पर लिखा था—

“फ़िरोज़ का घर।”

फ़िरोज़ ने दरवाज़ा खोला।

अंदर उसकी बचपन की सारी चीज़ें थीं।

पुरानी तस्वीरें।

अब्बा की घड़ी।

सलीमा की चूड़ियाँ।

नूर की तस्वीर।

और एक मेज़ पर…

एक डायरी।

फ़िरोज़ ने डायरी खोली।

पहले पन्ने पर लिखा था—

“अगर तुम यहाँ तक पहुँच गए हो, तो समझो मौत हार नहीं गई…”

फ़िरोज़ का चेहरा गंभीर हो गया।

उसने अगला पन्ना पलटा।

“क्योंकि मौत कभी हारती नहीं।”

तीसरा पन्ना—

“वह सिर्फ़ अपना घर बदलती है।”

फ़िरोज़ ने आख़िरी पन्ना खोला।

वहाँ सिर्फ़ एक वाक्य था—

“जिस रात तुमने मौत को अपने बेटे में भेजा… उसी रात मौत ने एक नया पिता चुन लिया।”

फ़िरोज़ ने बच्चे की तरफ़ देखा।

बच्चा मुस्कुरा रहा था।

“अब्बा…”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तुम्हारा नाम क्या है?”

बच्चे ने कुछ पल सोचा।

फिर उसने कहा—

“फ़िरोज़।”

फ़िरोज़ की आँखों में डर लौट आया।

“और मेरा?”

बच्चे ने मुस्कुराकर जवाब दिया—

“अब्बा।”

अचानक काली घड़ी ने एक बार घंटी बजाई।

टन।

फिर दूसरी बार।

टन।

फिर तीसरी बार।

टन।

घड़ी की सुई 2:47 पर आकर रुक गई।

फ़िरोज़ ने खिड़की से बाहर देखा।

बारिश बंद हो चुकी थी।

आसमान साफ़ था।

उसे लगा…

सब खत्म हो गया।

लेकिन तभी दूर हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में…

एक आदमी दिखाई दिया।

वह फ़िरोज़ जैसा दिखता था।

वह मुस्कुरा रहा था।

और उसके पीछे…

सलीम खड़ा था।

फिर सलीमा।

फिर नूर।

फिर हामिद।

और सबसे पीछे…

एक बच्चा।

उस बच्चे ने शीशे पर अपनी उँगली से कुछ लिखा।

फ़िरोज़ ने दूर से पढ़ने की कोशिश की।

धीरे-धीरे शब्द साफ़ हुए—

“यह अंत नहीं है।”

फ़िरोज़ ने बच्चे का हाथ पकड़ लिया।

लेकिन जब उसने नीचे देखा…

उस बच्चे की परछाईं नहीं थी।

फ़िरोज़ की भी नहीं।

सिर्फ़…

एक ही परछाईं थी।

और वह परछाईं…

दोनों से अलग खड़ी थी।

उसने अपना सिर उठाया।

और मुस्कुराई।

फिर अँधेरे में एक आख़िरी आवाज़ गूँजी—

“अगली बार… मैं तुम्हारा अब्बा बनकर नहीं आऊँगा।”

कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।

फिर आवाज़ आई—

“मैं तुम्हारा बेटा बनकर आऊँगा।”

समाप्त… या शायद शुरुआत।

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