PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 19 — “मौत का आख़िरी सौदा”

firoj saifi · Ghost Stories · 6 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
19 of 20
Category
Ghost Stories
Reading time
6 min
Words
1006
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

फ़िरोज़ को जब होश आया…

वह एक कब्र के अंदर था।

चारों तरफ़ मिट्टी।

साँस लेना मुश्किल।

उसने ऊपर देखने की कोशिश की।

लेकिन ऊपर लकड़ी का ताबूत था।

फ़िरोज़ ने पूरी ताक़त से ढक्कन धकेला।

नहीं खुला।

उसने चिल्लाया—

“कोई है!”

कोई जवाब नहीं।

उसने फिर कोशिश की।

“नूर!”

कुछ नहीं।

“अब्बा!”

सन्नाटा।

फिर…

बहुत धीमी आवाज़ आई।

“तुम्हारे अब्बा यहाँ नहीं हैं।”

फ़िरोज़ ने आवाज़ पहचानी।

“हामिद।”

अँधेरे में हँसी गूँजी।

“बहुत देर से मेरा नाम याद आया।”

“मुझे बाहर निकालो।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं मरना नहीं चाहता।”

हामिद की आवाज़ गंभीर हो गई।

“यही तुम्हारी सबसे बड़ी गलती है।”

“क्या?”

“तुम अभी भी सोचते हो कि मौत से बचना ज़िंदगी है।”

फ़िरोज़ ने कहा—

“तो क्या है?”

“मौत से बचना…”

कुछ पल चुप्पी रही।

“कभी-कभी मौत को तुम्हारे अंदर ज़िंदा रखना होता है।”

फ़िरोज़ ने ताबूत पर मुक्का मारा।

“पहेलियाँ मत बुझाओ!”

हामिद हँसा।

“ठीक है।”

अचानक ताबूत के अंदर एक छोटा-सा दीपक जल उठा।

फ़िरोज़ ने देखा—

उसके सामने एक कागज़ रखा था।

उस पर लिखा था—

“सौदा।”

नीचे तीन बातें लिखी थीं।

1. फ़िरोज़ अपनी मृत्यु स्वीकार करेगा।

2. बदले में उसका बेटा जीवित रहेगा।

3. बदले में उसका नाम मिटा दिया जाएगा।

फ़िरोज़ ने कागज़ फाड़ दिया।

“नहीं।”

हामिद बोला—

“सोच लो।”

“मैं अपना नाम नहीं दूँगा।”

“तुम्हारा नाम तुम्हारा है ही नहीं।”

“तो किसका है?”

“सलीम का।”

फ़िरोज़ रुक गया।

“क्या?”

“सलीम ने तुम्हें फ़िरोज़ नाम दिया था।”

“तो?”

“नाम उसने दिया।”

हामिद की आवाज़ और गहरी हो गई।

“लेकिन जन्म…”

वह रुका।

“जन्म किसी और ने दिया।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“किसने?”

“मौत ने।”

ताबूत अचानक खुल गया।

फ़िरोज़ बाहर गिरा।

वह एक विशाल भूमिगत कमरे में था।

दीवारों पर सैकड़ों घड़ियाँ लगी थीं।

हर घड़ी पर एक तारीख़।

8 सितंबर 1939

8 सितंबर 1978

8 सितंबर 1987

8 सितंबर 2026

और एक घड़ी…

जिस पर तारीख़ थी—

8 सितंबर 2065।

फ़िरोज़ उस घड़ी के सामने गया।

“ये भविष्य क्यों दिखा रहे हो?”

हामिद उसके पीछे आकर खड़ा हो गया।

“क्योंकि भविष्य पहले ही हो चुका है।”

फ़िरोज़ पलटा।

“क्या?”

“जिस बच्चे को तुम आने वाला समझ रहे हो…”

हामिद मुस्कुराया।

“वह पैदा हो चुका है।”

“कहाँ?”

“तुम्हारे अंदर।”

फ़िरोज़ ने अपनी छाती पकड़ ली।

बच्चे की आवाज़ फिर आई—

“अब्बा…”

“चुप!”

“अब्बा…”

“चुप!”

“अब्बा…”

फ़िरोज़ चीख पड़ा—

“चुप!”

कमरे की सारी घड़ियाँ टूट गईं।

लेकिन 2065 वाली घड़ी चलती रही।

टिक…

टिक…

टिक…

हामिद बोला—

“उसे तुम जितना दबाओगे…”

“क्या होगा?”

“वह उतना मजबूत होगा।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“उसे बाहर आने से कैसे रोकूँ?”

हामिद ने कहा—

“उसे जन्म मत दो।”

“कैसे?”

“अपने अतीत को मारकर।”

फ़िरोज़ चौंका।

“क्या?”

“तुम्हें अपने पहले जन्म को खत्म करना होगा।”

“1939?”

“हाँ।”

“मैं अतीत में जाकर क्या करूँगा?”

“ज़ोया को बचाओ।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।

“ज़ोया?”

“अगर ज़ोया नहीं मरी…”

हामिद ने कहा—

“तो मौत का जन्म नहीं होगा।”

“और अगर मौत का जन्म नहीं होगा?”

“तो तुम पैदा नहीं होगे।”

फ़िरोज़ चुप हो गया।

“तो मैं?”

“तुम मिट जाओगे।”

कुछ पल तक कोई आवाज़ नहीं आई।

फिर फ़िरोज़ ने पूछा—

“और मेरा बेटा?”

“वह भी मिट जाएगा।”

फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।

यही असली सौदा था।

खुद को बचाना… और बेटे को खोना।

या…

बेटे को बचाना… और खुद को मिटा देना।

तभी नूर वहाँ आ गई।

“उसकी बात मत सुनो।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।

“तो क्या करूँ?”

नूर ने कहा—

“तीसरा रास्ता है।”

“कौन-सा?”

“मौत को मारो।”

हामिद हँस पड़ा।

“इसे सुनो।”

नूर ने उसकी तरफ़ देखा।

“हाँ।”

“तुम जानती हो मौत को मारा नहीं जा सकता।”

“इंसान वाली मौत को नहीं।”

“तो?”

नूर फ़िरोज़ के पास आई।

“मौत कोई व्यक्ति नहीं।”

“फिर?”

“एक समझौता।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“किसके बीच?”

नूर ने कहा—

“जीवन और डर के बीच।”

हामिद ने पहली बार नूर की तरफ़ गुस्से से देखा।

“बस!”

नूर नहीं रुकी।

“तुम्हें मरने से डर लगता है।”

फ़िरोज़ चुप।

“तुम्हें अपने बेटे को खोने से डर लगता है।”

फ़िरोज़ की आँखें भर आईं।

“तुम्हें अपना नाम खोने से डर लगता है।”

नूर ने उसकी छाती पर हाथ रखा।

“और मौत इन्हीं डर से पैदा होती है।”

फ़िरोज़ ने धीरे से पूछा—

“तो अगर मुझे डर नहीं रहा…”

नूर मुस्कुराई।

“तो मौत के पास तुम्हारे खिलाफ़ कुछ नहीं बचेगा।”

हामिद पीछे हट गया।

“नहीं।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।

“आप डर रहे हैं।”

हामिद की आँखें फैल गईं।

“क्योंकि अगर मैं डरना बंद कर दूँ…”

फ़िरोज़ आगे बढ़ा।

“तो आप खत्म हो जाएँगे।”

हामिद अचानक चीख पड़ा।

उसका चेहरा बदलने लगा।

पहले हामिद।

फिर सलीम।

फिर अरिफ़।

फिर फ़िरोज़।

और अंत में…

कुछ भी नहीं।

सिर्फ़ एक खाली चेहरा।

नूर ने कहा—

“यही है।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“क्या?”

“मौत का असली चेहरा।”

वह खाली चेहरा फ़िरोज़ की तरफ़ बढ़ा।

“मुझे अपना नाम दे दो।”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“मुझे अपना डर दे दो।”

“नहीं।”

“मुझे अपना बच्चा दे दो।”

फ़िरोज़ की आँखों में आँसू आ गए।

“नहीं।”

“तो क्या दोगे?”

फ़िरोज़ कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“मैं तुम्हें…”

उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“अपनी मौत दूँगा।”

खाली चेहरा पीछे हट गया।

“क्या?”

फ़िरोज़ ने कहा—

“मेरी मौत अब मेरी नहीं रहेगी।”

नूर की आँखें फैल गईं।

“फ़िरोज़…”

लेकिन देर हो चुकी थी।

फ़िरोज़ ने अपने सीने पर हाथ रखकर काली घड़ी को पकड़ लिया।

उसने उसे बाहर खींचने की कोशिश की।

उसका शरीर दर्द से काँप उठा।

लेकिन घड़ी बाहर आने लगी।

एक काली रोशनी उसके सीने से निकल रही थी।

उस रोशनी में…

एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

वही बच्चा।

वह फ़िरोज़ की तरफ़ देख रहा था।

“अब्बा…”

फ़िरोज़ रो पड़ा।

“डरना मत।”

बच्चे ने पूछा—

“आप मुझे छोड़ देंगे?”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“तो?”

“मैं तुम्हें अपने साथ लेकर चलूँगा।”

बच्चे ने पहली बार मुस्कुराया।

और काली घड़ी टूट गई।

धड़ाम!

पूरी हवेली काँप उठी।

घड़ियाँ टूट गईं।

दीवारें फट गईं।

ज़मीन हिलने लगी।

नूर ने फ़िरोज़ का हाथ पकड़ा।

“भागो!”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“कहाँ?”

नूर ने सामने देखा।

एक दरवाज़ा खुल चुका था।

उसके ऊपर लिखा था—

8 सितंबर 1987।

“वहीं।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“क्यों?”

नूर ने कहा—

“क्योंकि तुम्हारी कहानी वहीं से नहीं…”

वह रुक गई।

“वहीं खत्म होती है।”

दोनों दरवाज़े के अंदर चले गए।

एपिसोड 19 समाप्त।

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