PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 18 — “पहला पिता”

firoj saifi · Ghost Stories · 6 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
18 of 20
Category
Ghost Stories
Reading time
6 min
Words
1003
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

कमरे में सिर्फ़ घड़ी की आवाज़ थी।

टिक…

टिक…

टिक…

फ़िरोज़ अपने सामने खड़े बूढ़े आदमी को देख रहा था।

चेहरा उसका अपना था।

लेकिन उम्र इतनी ज़्यादा थी कि पहली नज़र में उसे यक़ीन ही नहीं हुआ कि वह उसी का चेहरा देख रहा है।

सफ़ेद बाल।

गहरी झुर्रियाँ।

आँखों के नीचे काले घेरे।

और कलाई पर वही काली घड़ी।

2:47।

सुइयाँ आगे नहीं बढ़ रही थीं।

बूढ़े फ़िरोज़ ने धीरे से कहा—

“तुम मुझे देखकर डर रहे हो?”

फ़िरोज़ ने जवाब नहीं दिया।

“डरना चाहिए।”

“तुम कौन हो?”

बूढ़ा मुस्कुराया।

“तुमने अभी बाहर सुना था।”

“पहला पिता।”

“हाँ।”

“पिता का मतलब?”

बूढ़े ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा—

“जिसने तुम्हें पैदा किया।”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“मुझे मेरी माँ ने जन्म दिया।”

बूढ़ा हँसा।

“यही तुम्हें हमेशा बताया गया।”

“तो सच क्या है?”

बूढ़े ने कमरे की दीवार की तरफ़ देखा।

वहाँ एक बहुत पुरानी तस्वीर लगी थी।

तस्वीर में एक छोटा बच्चा था।

उसके सामने एक आदमी खड़ा था।

लेकिन आदमी का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

सिर्फ़ उसकी परछाईं।

बूढ़े ने कहा—

“1939 में पहली बार एक बच्चा पैदा हुआ था।”

“कौन?”

“तुम।”

फ़िरोज़ की आँखें सिकुड़ गईं।

“मैं 1939 में पैदा नहीं हुआ।”

“तुम्हारा शरीर नहीं।”

बूढ़े ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“तुम्हारा पहला हिस्सा।”

“मेरा हिस्सा?”

“तुम्हारी आत्मा का पहला टुकड़ा।”

फ़िरोज़ चुप रहा।

बूढ़ा आगे बोला—

“मौत को इंसानों की तरह पैदा नहीं किया जा सकता। उसे बुलाया जाता है। लेकिन 1939 में…”

उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

“मौत ने खुद को पैदा किया।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“कैसे?”

बूढ़े ने कहा—

“एक पिता ने अपने बेटे को वापस माँगा।”

“हामिद?”

“हाँ।”

“अरिफ़?”

“हाँ।”

“तो हामिद ने मौत को बुलाया था?”

“मौत को नहीं।”

बूढ़ा मुस्कुराया।

“उसने अपने बेटे को बुलाया था।”

“फिर?”

“मौत ने जवाब दिया।”

कमरे में अचानक ठंड बढ़ गई।

फ़िरोज़ ने पूछा—

“और वह मौत… हामिद का चेहरा लेकर क्यों आई?”

बूढ़े ने कहा—

“क्योंकि उसे किसी का चेहरा चाहिए था।”

“किसका?”

“जिससे इंसान सबसे ज़्यादा प्यार करता हो।”

फ़िरोज़ के चेहरे पर डर उतर आया।

“अरिफ़।”

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“मौत ने अरिफ़ का चेहरा लिया।”

“लेकिन अरिफ़ तो हामिद का बेटा था।”

“हाँ।”

“तो फिर वह मेरा चेहरा क्यों बन गया?”

बूढ़े ने पहली बार गंभीर होकर कहा—

“क्योंकि अरिफ़ की मौत के बाद उसकी आत्मा पूरी तरह खत्म नहीं हुई।”

फ़िरोज़ धीरे-धीरे समझने लगा।

“उसका एक हिस्सा…”

“तुम।”

“और दूसरा?”

बूढ़े ने कमरे के कोने की तरफ़ देखा।

वहाँ अँधेरा था।

“तुम्हारी परछाईं।”

फ़िरोज़ ने फुसफुसाकर कहा—

“तो मैं अरिफ़ हूँ?”

बूढ़ा मुस्कुराया।

“नहीं।”

“तो?”

“तुम अरिफ़ की मौत से पैदा हुए हो।”

फ़िरोज़ का सिर घूमने लगा।

“मैं किसी का पुनर्जन्म नहीं हूँ?”

“नहीं।”

“तो मैं कौन हूँ?”

बूढ़ा उसके पास आया।

“तुम वो हो जो तब पैदा हुआ… जब एक इंसान की मौत ने दूसरी ज़िंदगी को जन्म दिया।”

अचानक कमरे की दीवार काँपने लगी।

एक आवाज़ आई—

“झूठ!”

फ़िरोज़ पलटा।

दरवाज़े के पास नूर खड़ी थी।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“वह झूठ बोल रहा है।”

बूढ़ा फ़िरोज़ हँसा।

“नूर…”

“तुमने उसे बहुत लंबे समय तक धोखा दिया।”

“मैंने?”

नूर ने फ़िरोज़ की तरफ़ देखा।

“तुम्हें सच जानना है?”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

नूर ने कहा—

“तो याद रखो… तुम्हारा पहला पिता कोई इंसान नहीं था।”

फ़िरोज़ चौंका।

“तो कौन?”

नूर ने बूढ़े फ़िरोज़ की तरफ़ देखा।

“मौत।”

कमरा अचानक अँधेरे में डूब गया।

बूढ़े फ़िरोज़ की हँसी सुनाई दी।

“आख़िर तुमने सच बोल ही दिया।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“मौत मेरा पिता है?”

नूर ने कहा—

“नहीं।”

“तो?”

“मौत तुम्हारा पिता नहीं…”

उसने फ़िरोज़ की तरफ़ देखा।

“मौत तुम्हारा पहला रूप है।”

फ़िरोज़ ने कुछ नहीं कहा।

नूर आगे बढ़ी।

“1939 में तुम्हें पैदा करने के लिए किसी माँ की ज़रूरत नहीं थी।”

“तो?”

“एक मौत काफी थी।”

1939 — पहली रात

दृश्य फिर बदल गया।

ज़ोया फर्श पर बैठी थी।

उसके सामने एक छोटा-सा शरीर पड़ा था।

हामिद उसके पीछे खड़ा था।

और सलीमा दीवार से लगी हुई काँप रही थी।

हामिद ने कहा—

“ये बच्चा नहीं है।”

ज़ोया रोते हुए बोली—

“ये मेरा बेटा है।”

“नहीं।”

“तुम्हें कैसे पता?”

हामिद ने बच्चे की तरफ़ इशारा किया।

“क्योंकि इसका साया नहीं है।”

तभी बच्चे ने आँखें खोलीं।

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

उसने पहली बार शब्द बोला—

“अब्बा।”

हामिद जम गया।

ज़ोया ने बच्चे को उठा लिया।

“इसने मुझे नहीं कहा…”

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

“इसने तुम्हें कहा है।”

हामिद धीरे-धीरे बच्चे के पास गया।

बच्चे ने उसका हाथ पकड़ लिया।

और उसी क्षण हामिद के चेहरे पर एक गहरी काली रेखा उभर आई।

वह चीख उठा।

“छोड़ो!”

बच्चे ने हाथ नहीं छोड़ा।

सलीमा डरकर पीछे हट गई।

“ये वही है…”

हामिद ने कहा—

“क्या?”

सलीमा बोली—

“जिसे हमने बुलाया था।”

हामिद ने बच्चे को देखा।

“हमने इसे नहीं बुलाया।”

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

“मैं खुद आया हूँ।”

तीनों चुप हो गए।

बच्चा हँसा।

“मुझे अपना घर चाहिए।”

दृश्य टूट गया।

फ़िरोज़ ज़मीन पर बैठा था।

उसकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।

“तो वह बच्चा…”

नूर ने कहा—

“तुम थे।”

“लेकिन वह 1939 था।”

“हाँ।”

“और फिर मैं 1987 में पैदा हुआ?”

“तुम्हारा शरीर।”

“और 2026?”

“तुम्हारी याद।”

फ़िरोज़ ने सिर उठाया।

“और मेरा असली जन्म?”

नूर चुप रही।

बूढ़े फ़िरोज़ ने कहा—

“अभी नहीं हुआ।”

फ़िरोज़ जम गया।

“क्या?”

“तुम्हारा असली जन्म…”

बूढ़ा मुस्कुराया।

“तुम्हारी मृत्यु के बाद होगा।”

अचानक काली घड़ी की सुई चलने लगी।

2:47

2:48

2:49

फ़िरोज़ ने अपनी छाती पकड़ ली।

उसके अंदर फिर बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

लेकिन इस बार आवाज़ किसी बच्चे की नहीं थी।

वह आवाज़…

फ़िरोज़ की थी।

“मुझे बाहर निकालो…”

फ़िरोज़ ने चीखकर कहा—

“कौन हो तुम?”

अंदर से जवाब आया—

“मैं…”

एक लंबा विराम।

“तुम्हारा आख़िरी जन्म।”

घड़ी—

2:50।

बूढ़े फ़िरोज़ ने कहा—

“अब चुनो।”

“क्या?”

“तुम जीना चाहते हो…”

उसने हाथ आगे बढ़ाया।

“या सच?”

फ़िरोज़ ने उसका हाथ नहीं पकड़ा।

“मैं दोनों चाहता हूँ।”

बूढ़ा हँसा।

“तो तुम्हें दोनों खोने पड़ेंगे।”

और उसी क्षण…

कमरे की ज़मीन टूट गई।

फ़िरोज़ अँधेरे में गिर गया।

नीचे गिरते हुए उसने सिर्फ़ एक आवाज़ सुनी—

“अब्बा…”

फिर सब कुछ काला हो गया।

एपिसोड 18 समाप्त।

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

जिस रात मौत जागी · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories