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सेक्सी प्रेत (25)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट
समय रुक गया।
सचमुच।
कम से कम कबीर को ऐसा ही लगा।
राघवन की बंदूक सीधी उसकी छाती पर तनी थी।
ट्रिगर आधा दब चुका।
नंदिनी का हाथ हवा में उठा हुआ।
और बंदूक… काँप रही थी।
कमरे की हवा जम चुकी थी।
कोई साँस नहीं ले रहा था।
“सबूत दो…”
राघवन की आवाज़ ठंडी थी।
“ये आख़िरी मौका है।”
कबीर ने उसकी आँखों में देखा।
वहाँ डर नहीं था।
सिर्फ सत्ता थी।
वही घमंड…
जो विक्रम की आँखों में था।
जो हर अपराधी की आँखों में होता है जब उसे लगता है कि कानून उसकी जेब में है।
“तुम लोग समझते नहीं हो,” राघवन बोला,
“देश ऐसे नहीं चलता।”
“कुछ गंदगी छुपानी पड़ती है।”
“कुछ लोग बलि चढ़ते हैं।”
“ये सिस्टम है।”
कबीर चीखा —
“बलि? वो लड़की इंसान थी!”
“तुम्हारे लिए फाइल… हमारे लिए ज़िंदगी!”
नंदिनी धीरे-धीरे राघवन के पीछे आई।
उसकी आँखें अब पूरी काली।
आवाज़ भारी।
“तुमने मुझे मरते देखा था…”
राघवन का चेहरा सफेद पड़ गया।
“त… तुम…”
“और तुमने कुछ नहीं किया…”
फ्लैश।
कबीर के दिमाग में तस्वीर आई।
वही रात।
विक्रम।
उसके आदमी।
और दूर खड़ी एक कार।
जिसमें बैठा था…
राघवन।
देख रहा था।
मुस्कुरा रहा था।
सब प्लान था।
“तुम हेड थे…” कबीर बुदबुदाया।
“तुमने केस दबाया…”
“तुमने सबूत हटाए…”
“तुमने उसे मरने दिया…”
राघवन गुर्राया —
“चुप!”
उसने ट्रिगर दबाने की कोशिश की।
पर बंदूक हिल नहीं रही थी।
जैसे किसी अदृश्य हाथ ने पकड़ रखी हो।
नंदिनी की आवाज़ गूँजी —
“तुम्हारी सांस… उसी तरह रुकनी चाहिए…”
कमरे की सारी चीजें उड़ने लगीं।
फाइलें।
कुर्सियाँ।
काँच टूट गया।
शेखर चिल्लाया —
“सब नीचे झुको!”
राघवन हवा में उठ गया।
बिल्कुल वैसे…
जैसे कुछ देर पहले विक्रम उठा था।
उसकी टाई गले में कस गई।
चेहरा नीला।
“छोड़… दो…”
उसकी आवाज़ टूट रही थी।
कबीर के अंदर तूफान था।
एक तरफ —
ये मर जाए… तो दुनिया साफ।
दूसरी तरफ —
मर गया… तो सच खत्म।
नेटवर्क बच जाएगा।
नाम कभी सामने नहीं आएंगे।
नंदिनी हमेशा भटकती रहेगी।
वो चिल्लाया —
“नंदिनी! नहीं!”
उसकी आवाज़ गूँजी।
सब रुक गया।
राघवन हवा में लटका रहा।
नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।
आँखों में सवाल।
फिर वही।
न्याय… या मौत?
कबीर धीरे बोला —
“अगर ये मरा… तो लोग कहेंगे हादसा था।”
“अगर जिंदा रहा… तो गवाही देगा।”
“हम उसे कानून से मारेंगे।”
“तुम्हें बदला नहीं… मुक्ति चाहिए।”
ये शब्द सुनकर नंदिनी काँप गई।
उसकी आँखों से आँसू बहे।
इस बार खून नहीं।
साफ पानी।
“मुक्ति…”
वो बुदबुदाई।
जैसे ये शब्द पहली बार सुना हो।
धीरे-धीरे…
राघवन नीचे गिरा।
धड़ाम।
वो खाँसने लगा।
शेखर ने तुरंत हथकड़ी लगा दी।
टीम ने हथियार छीन लिए।
लेकिन तभी —
राघवन हँसने लगा।
धीमी… खतरनाक हँसी।
“तुम सोचते हो… मुझे पकड़कर जीत गए?”
“मेरे पीछे मंत्री हैं… जज हैं… मीडिया है…”
“तुम लोग कल तक गायब हो जाओगे…”
कमरे में फिर डर फैल गया।
कबीर ने जेब से मोबाइल निकाला।
रिकॉर्डिंग ऑन।
“दोबारा बोलो।”
राघवन चौंका।
“क्या?”
“सब रिकॉर्ड हो रहा है।”
“तेरी कबूलियत… तेरी धमकी… सब।”
राघवन का चेहरा उतर गया।
राघव बोला —
“लाइव क्लाउड अपलोड भी है।”
“डिलीट नहीं कर पाएगा।”
अब पहली बार राघवन सच में डरा।
सिस्टम वाला आदमी।
अब सबूत बन चुका था।
नंदिनी दूर खड़ी देख रही थी।
उसका शरीर और धुंधला।
जैसे काम पूरा होते ही वो मिट रही हो।
कबीर उसके पास गया।
“रुको… मत जाओ…”
वो मुस्कुराई।
“अब शायद… मुझे रुकना नहीं पड़ेगा…”
“तुम… आज पहली बार जीते हो…”
“बिना मारे…”
“बिना खून के…”
“यही असली जीत है…”
उसकी आवाज़ धीमी होती गई।
अचानक —
थाने की खिड़की से सुबह की पहली किरण अंदर आई।
सूरज उगा।
और उस रोशनी में…
नंदिनी का शरीर चमकने लगा।
जैसे काँच।
जैसे धुंध।
कबीर ने हाथ बढ़ाया।
पर उँगलियाँ हवा को छू गईं।
वो फुसफुसाई —
“अभी खत्म नहीं…”
“नेटवर्क बाकी है…”
“और… मैं भी…”
फिर—
रोशनी तेज़ हुई।
और वो गायब।
पूरी तरह।
सिर्फ उसकी खुशबू बची।
रातरानी की।
कबीर खाली जगह देखता रह गया।
क्या वो सच में चली गई?
या कहीं पास है?
और अगर नेटवर्क अभी बाकी है…
तो क्या लड़ाई अभी शुरू हुई है?
क्रमश:
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 25 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 671
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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