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सेक्सी प्रेत (21)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट
कमरे में घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
धीमी।
लेकिन हर टिक जैसे दिल में हथौड़ा मार रही हो।
विक्रम हवा में लटका हुआ था।
नंदिनी की उँगलियाँ उसके कॉलर में धँसी थीं।
उसके पैर हवा में छटपटा रहे थे।
गला दब रहा था।
आँखें बाहर निकलती हुई।
“ब… बचाओ…”
उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
पहली बार।
उस आदमी की आवाज़ में ताक़त नहीं थी।
सिर्फ डर था।
कमरे का तापमान और गिर गया।
काँच पर बर्फ जमने लगी।
राघव की साँस धुएँ जैसी दिख रही थी।
कबीर ने हाथ आगे बढ़ाया।
“नंदिनी… छोड़ दो उसे…”
नंदिनी ने धीरे से उसकी तरफ देखा।
उस नज़र में आँसू भी थे।
और आग भी।
“तुम्हें पता है… इसने क्या किया था?”
उसकी आवाज़ दो परतों में गूँज रही थी।
जैसे एक साथ दो लोग बोल रहे हों।
एक स्त्री।
एक आत्मा।
अचानक—
कमरे की दीवारें बदलने लगीं।
कबीर ने देखा—
जैसे दीवारों पर तस्वीरें चल रही हों।
यादें।
फ्लैशबैक।
नंदिनी… ज़िंदा।
हँसती हुई।
कॉलेज बैग।
बारिश में भीगती।
फिर…
विक्रम।
कार।
लालच भरी नज़र।
पीछा।
खाली सड़क।
चिल्लाहट।
कपड़े फटने की आवाज़।
मदद की पुकार।
और फिर…
अंधेरा।
कबीर का गला सूख गया।
“हे भगवान…”
नंदिनी बोली —
“मैं मरना नहीं चाहती थी…”
उसकी पकड़ और कस गई।
विक्रम हाँफने लगा।
“मैं बस घर जा रही थी…”
“इसने मुझे चीज़ समझा…”
“खिलौना…”
“और जब मैं टूटी…”
“तो फेंक दिया…”
उसकी आँखों से पानी नहीं…
खून जैसे आँसू बह रहे थे।
राघव चिल्लाया —
“मार दोगी तो सबूत खत्म हो जाएगा!”
“कोई नहीं मानेगा!”
“तुम्हें इंसाफ नहीं मिलेगा!”
नंदिनी चीखी —
“मुझे इंसाफ नहीं चाहिए!”
“मुझे उसका डर चाहिए!”
“उसी डर में उसे मरना चाहिए!”
कमरे की सारी लाइटें फूट गईं।
अंधेरा।
सिर्फ बिजली की चमक।
कबीर धीरे-धीरे उसके पास गया।
दिल काँप रहा था।
लेकिन आवाज़ शांत रखी।
“नंदिनी… मेरी तरफ देखो…”
वो रुकी।
“अगर तुम उसे मार दोगी…”
“तो तुम वही बन जाओगी… जो वो था।”
वो चुप।
“दरिंदा।”
ये शब्द तीर की तरह लगा।
उसकी पकड़ हल्की हुई।
विक्रम नीचे गिरा।
धड़ाम!
वो फर्श पर खाँसते हुए पड़ा रहा।
रोता हुआ।
“मुझे छोड़ दो… मैं पैसे दूँगा… कुछ भी…”
कबीर को घिन आई।
“देखा?”
वो बोला।
“ये आदमी मरने के लायक नहीं…”
“ये जेल में सड़ने के लायक है।”
अचानक—
दरवाज़े पर धमाका।
“पुलिस! दरवाज़ा खोलो!”
इंस्पेक्टर शेखर।
वो आ गया था।
राघव ने कबीर की तरफ देखा।
“हमने लोकेशन भेज दी थी… याद है?”
कबीर समझ गया।
ये मौका है।
आख़िरी।
नंदिनी धीरे-धीरे पीछे हटी।
उसकी आकृति धुंधली होने लगी।
“अगर वो बच गया तो?”
उसने पूछा।
“सिस्टम उसे बचा लेगा तो?”
कबीर बोला —
“मैं लिखूँगा।”
“सब लिखूँगा।”
“उसका सच… तुम्हारी कहानी…”
“पूरा शहर पढ़ेगा।”
“इस बार कोई चुप नहीं रहेगा।”
उसकी आँखें नरम हो गईं।
पहली बार।
वो फिर वही लड़की लग रही थी।
भूत नहीं।
बस… एक लड़की।
जिसके साथ गलत हुआ था।
“तुम सच में लड़ोगे?”
“हाँ।”
“मेरे लिए?”
“नहीं…”
कबीर मुस्कुराया।
“न्याय के लिए।”
धीरे-धीरे…
उसकी उँगलियाँ हवा में घुलने लगीं।
बाल धुंध बने।
चेहरा हल्का।
लेकिन जाते-जाते वो पास आई।
कबीर के कान के पास फुसफुसाई —
“मैं खत्म नहीं हुई हूँ…”
“जब तक सच पूरा नहीं होगा… मैं रहूँगी…”
उसकी ठंडी साँस फिर गर्दन को छू गई।
वही अजीब सिहरन।
डर और आकर्षण साथ।
दरवाज़ा टूटा।
शेखर अंदर घुसा।
टीम के साथ।
विक्रम को हथकड़ी लगी।
वो चीख रहा था —
“वो यहीं थी! वो चुड़ैल! उसने मुझे मारने की कोशिश की!”
शेखर ने कबीर की तरफ देखा।
“अब बताओ… भूत था या इंसान?”
कबीर ने टूटी खिड़की… ठंडी हवा… और गायब होती खुशबू महसूस की।
धीरे से बोला —
“कभी-कभी… इंसान ही भूत बना देता है।”
स्ट्रेचर पर ले जाते वक्त—
विक्रम अचानक चिल्लाया।
उसकी गर्दन पर…
गीले हाथ का निशान उभर आया।
जैसे किसी ने फिर पकड़ लिया हो।
वो डर के मारे बेहोश हो गया।
शेखर सन्न।
“ये कैसे…?”
कबीर खिड़की से बाहर देख रहा था।
बारिश रुक चुकी थी।
सड़क पर धुंध थी।
और दूर…
एक सफेद आकृति।
खड़ी।
देखती हुई।
फिर…
गायब।
क्रमश:
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 21 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 655
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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