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सेक्सी प्रेत (20)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट

रात हमेशा से अँधेरी होती है।
पर कुछ रातें…
फ़ैसला करती हैं
कौन जिंदा रहेगा
और कौन इतिहास बन जाएगा।
आज वैसी ही रात थी।
कबीर ने बाइक स्टार्ट की।
इंजन गरजा।
राघव पीछे बैठा।
हवेली पीछे छूट गई।
पर अजीब बात—
उसे लगा
जैसे कोई अब भी साथ चल रहा हो।
अदृश्य।
शांत।
इंतज़ार करता हुआ।

सड़कें लगभग खाली थीं।
बारिश होने वाली थी।
हवा भारी।
घुटन भरी।
राघव ने फोन निकाला।
“मैंने पुराने रिकॉर्ड से उसका पता निकाला है,”
वो बोला।
“कहाँ?”
“सिविल लाइंस… नई कोठी… बड़ी कोठी।”
कबीर हँसा।
कड़वी हँसी।
“पाप हमेशा बड़ी कोठी में ही रहता है।”

बाइक तेज़ दौड़ी।
लाइटें पीछे भागती गईं।
कबीर के दिमाग में
एक ही बात घूम रही थी—
अगर नंदिनी पहले पहुँच गई…
तो?
विक्रम मरेगा।
केस खत्म।
सच खत्म।
न्याय खत्म।

“तुम डर रहे हो?”
राघव ने पूछा।
“हाँ,”
कबीर बोला।
“प्रेत से?”
“नहीं।”
“तो?”
“इंसान से।”

बारिश की पहली बूँद गिरी।
फिर दूसरी।
फिर तेज़ बारिश।
सड़क चमकने लगी।
बाइक फिसल रही थी।
पर समय कम था।
राघव बोला—
“वो हमेशा बच निकलता है…”
“आज नहीं,”
कबीर ने दाँत भींचे।

सिविल लाइंस।
शहर का सबसे पॉश इलाका।
चौड़ी सड़कें।
बड़ी-बड़ी कोठियाँ।
सुरक्षा गार्ड।
सीसीटीवी।
साफ़ फुटपाथ।
जैसे यहाँ कभी अपराध हुआ ही न हो।
जैसे पाप भी सूट-बूट पहनकर चलता हो।

विक्रम की कोठी सामने थी।
तीन मंज़िला।
सफेद दीवारें।
बड़ा गेट।
बाहर दो गार्ड।
और नाम की प्लेट—
“विक्रम मेहता – समाजसेवी”
कबीर की मुट्ठी कस गई।
“समाजसेवी…”
वो बुदबुदाया।

“सीधे अंदर नहीं जा सकते,”
राघव बोला।
“गार्ड रोकेंगे।”
“पीछे से?”
“सर्विस एंट्रेंस है।”
दोनों गली की तरफ मुड़े।
अंधेरा।
कीचड़।
कूड़े के डिब्बे।
यही असली रास्ता था।
हमेशा की तरह।

पीछे का दरवाज़ा खुला था।
अजीब।
इतनी बड़ी कोठी…
और दरवाज़ा खुला?
कबीर ने राघव की तरफ देखा।
दोनों समझ गए—
वो पहले से डरा हुआ है।
या…
कोई पहले से अंदर है।

अंदर घुसे।
रसोई खाली।
बत्तियाँ जल रही थीं।
गिलास गिरा पड़ा था।
फर्श पर पानी।
जैसे कोई भागते-भागते गया हो।
ऊपर से आवाज़—
कुछ गिरने की।
धड़ाम।
फिर—
चीख।
पुरुष की।

“वो है!”
राघव बोला।
दोनों दौड़े।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
दिल धड़क रहा था।
ऊपर पहुँचकर…
कमरा खुला।
और…
जो देखा—
खून जम गया।

कमरा अस्त-व्यस्त।
फर्नीचर टूटा।
काँच बिखरा।
और बीच में…
विक्रम।
ज़मीन पर गिरा।
काँपता हुआ।
चेहरा पीला।
आँखें फटी हुई।
जैसे कुछ भयानक देख लिया हो।

“वो… वो यहाँ थी…”
वो हकलाया।
“कौन?”
कबीर गरजा।
“वो लड़की…”
“पानी से भीगी…”
“मेरे गले पर हाथ…”
“मैं मर जाता…”

राघव झुक गया।
“तू बच गया… क्योंकि हम आ गए।”
विक्रम काँप रहा था।
“तुम लोग उसे रोक नहीं सकते…”
“वो वापस आ गई है…”
“मैंने देखा…”
“उसकी आँखें…”

अचानक—
कमरे का तापमान गिर गया।
तीनों की साँस से धुआँ निकलने लगा।
कबीर ने धीरे से फुसफुसाया—
“वो यहीं है…”
लाइट झिलमिलाई।
हवा भारी।
और…
दरवाज़ा अपने आप बंद।

विक्रम चीख पड़ा—
“नहीं! नहीं! मुझे बचाओ!”
पहली बार।
वो डर रहा था।
सच में।
जैसे शिकार।
कबीर ने सोचा—
आज उसे समझ आएगा
डर क्या होता है।

दीवार पर पानी रिसने लगा।
गीले हाथों के निशान उभरने लगे।
एक-एक करके।
सीधे विक्रम की तरफ।
वो पीछे सरकने लगा।
रोते हुए—
“मैंने कुछ नहीं किया…”

अचानक—
आवाज़।
धीमी।
ठंडी।
“झूठ…”
धुंध जमा हुई।
और उसमें से…
नंदिनी।
पूरी।
स्पष्ट।
पर अब शांत नहीं।
आँखों में तूफ़ान।

वो सीधे विक्रम के सामने रुकी।
उसने उसका कॉलर पकड़ लिया।
विक्रम हवा में उठ गया।
ठीक वैसे ही…
जैसे उसने उसे उठाया था।
कबीर चिल्लाया—
“रुको!”
राघव भी—
“उसे जिंदा चाहिए!”

नंदिनी ने कबीर की तरफ देखा।
आँखों में सवाल।
“न्याय… या मौत?”
कमरे में सन्नाटा।
विक्रम तड़प रहा था।
और फैसला…
कबीर के हाथ में था।

(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
20 of 32
Category
Horror
Reading time
4 min
Words
604
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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