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सेक्सी प्रेत (13)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट

हर अपराध में
दो तरह के लोग होते हैं।
एक — जो हाथ गंदे करते हैं।
दूसरे — जो हाथ धोकर बच निकलते हैं।
पहले जेल जाते हैं।
दूसरे…
कुर्सी पर बैठते हैं।
और इस कहानी में भी
एक ऐसा ही नाम बचा था।
जिसे आज तक
किसी ने छुआ नहीं।

थाने में सन्नाटा था।
कल की रिकॉर्डिंग ने
सबको अंदर से हिला दिया था।
कोई खुलकर नहीं बोल रहा था।
पर हर कोई जानता था—
कुछ है।
कुछ ऐसा
जिसे फाइल में बंद नहीं किया जा सकता।
राघव ने कबीर को अलग बुलाया।
“तुम सही थे,”
उसने धीमे से कहा।
“किस बारे में?”
“ये आत्महत्या नहीं थी।”
कबीर ने कुछ नहीं कहा।
राघव ने फाइल आगे बढ़ाई।
“ये देखो।”

पुरानी केस डायरी।
पीले पन्ने।
कुछ पन्ने फटे हुए।
कुछ गायब।
पर आखिरी पन्ने पर
एक नाम घेरा हुआ।
“विक्रम चौबे”
कबीर ने भौंहें सिकोड़ीं।
“कौन?”
राघव बोला—
“तब का लोकल नेता।
अब एमएलए।
पैसा, ताकत, पुलिस— सब उसके पास।”
“कनेक्शन?”
राघव बोला—
“उस रात…
बाकी चार लोग उसके आदमी थे।”
“मतलब?”
“मतलब…
उन्होंने वही किया
जो उसे पसंद था।”
कमरा भारी हो गया।

“और केस दबाया किसने?”
कबीर ने पूछा।
राघव हँसा।
“समझदार हो।”
दोनों चुप।
अब तस्वीर साफ़ थी।
चार लोग दरिंदे थे।
पर
पाँचवाँ… असली मालिक था।

“उसे डर नहीं लगेगा,”
राघव बोला।
“क्यों?”
“क्योंकि उसे अपराध याद नहीं…
उसके लिए वो ‘मज़ा’ था।”
कबीर का दिल बैठ गया।
जो लोग पछताते हैं
वो टूटते हैं।
पर जो शर्म खो देते हैं…
उन्हें क्या तोड़ेगा?

हवेली लौटते वक्त
कबीर का मन अशांत था।
“छाया…”
उसने पुकारा।
वो आई।
धीरे।
आज उसकी आभा पहले से तेज़ थी।
जैसे हर आत्मा
उसे और ऊर्जा दे रही हो।
“आखिरी नाम मिल गया,”
कबीर बोला।
वो चुप।
“विक्रम चौबे।”
पहली बार—
उसकी आँखों में
शांत आग जली।
“वो…”
सिर्फ़ एक शब्द।
पर उस शब्द में
सालों का ज़हर था।

“तुम उसे मार दोगी?”
कबीर ने सीधा पूछा।
वो बोली—
“मैं किसी को नहीं मारती।”
“पर बाकी सब मर गए।”
“उन्होंने खुद को मारा।”
“और वो?”
छाया धीरे से मुस्कुराई—
“वो भागेगा।”

उसी रात—
विक्रम चौबे का बंगला।
ऊँची दीवारें।
गार्ड।
सीसीटीवी।
जनरेटर।
अंदर शराब पार्टी।
हँसी।
तेज़ म्यूज़िक।
वो अपने दोस्तों से कह रहा था—
“भूत-प्रेत कुछ नहीं होता… मीडिया का ड्रामा है।”
सब हँसे।
किसी ने कहा—
“वो लेखक पागल है।”
विक्रम बोला—
“दो दिन में चुप हो जाएगा।”

रात 1:12
अचानक—
बिजली चली गई।
जनरेटर फेल।
म्यूज़िक बंद।
पूरा घर अंधेरे में।
गार्ड चिल्लाए—
“सर, बैकअप काम नहीं कर रहा!”
विक्रम झुंझलाया—
“साला सिस्टम!”

मोबाइल की टॉर्च ऑन की।
कॉरिडोर में चला।
हवा ठंडी।
अजीब-सी खुशबू।
वो रुका।
“ये… इत्र?”
दिल में हल्की धड़कन।
फिर खुद हँसा—
“डर गया क्या?”

आईने के पास से गुज़रा।
रुक गया।
आईने में—
उसके पीछे
कोई खड़ा था।
सफ़ेद।
बाल खुले।
वो पलटा।
कोई नहीं।
फिर आईने में—
फिर वही।
इस बार करीब।
आँखें सीधे उसकी आँखों में।

उसका गला सूख गया।
“कौन है?!”
कोई जवाब नहीं।
सिर्फ़ फुसफुसाहट—
“याद है मुझे…”
विक्रम चीखा—
“गार्ड!”
कोई नहीं आया।
दरवाज़े बंद।
फोन नो नेटवर्क।
पूरे घर में…
सिर्फ़ वो।
और…
वो।

हवेली में—
कबीर बेचैन टहल रहा था।
“तुम वहाँ हो?”
उसने पूछा।
छाया धुंधली हो रही थी।
जैसे कहीं दूर जा रही हो।
“आज आखिरी गवाही है…”
“सावधान रहना,”
कबीर फुसफुसाया।
वो मुस्कुराई—
“आज मैं नहीं… उसका सच जाएगा।”

विक्रम कमरे में गिर पड़ा।
आँखों के सामने फ्लैश—
बारिश वाली रात।
नंदिनी की चीख।
उसकी हँसी।
उसका कहना—
“किसी को मत बताना…”
और अब…
वही चेहरा सामने।
वही लड़की।
पर आँखों में
खामोश सवाल।
“क्यों?”
विक्रम रोने लगा।
पहली बार।
“मैंने कुछ नहीं किया… उन्होंने किया…”
फुसफुसाहट—
“झूठ…”

सुबह—
बंगले के बाहर भीड़।
पुलिस।
एम्बुलेंस।
विक्रम ज़िंदा था।
पर…
पागल।
खाली आँखें।
बस एक ही बात दोहरा रहा था—
“वो देख रही है…
वो हर जगह है…
मुझे माफ़ कर दो…”
राघव ने कबीर को फोन किया—
“वो मरा नहीं…
पर उससे भी बुरा…”
कबीर ने हवेली की ओर देखा।
छाया वापस थी।
बहुत शांत।
बहुत थकी।
“तुमने उसे छोड़ा क्यों?”
कबीर ने पूछा।
वो बोली—
“मौत आसान सज़ा है।”
“तो?”
“उसे यादों के साथ जीना होगा।”
हवा चली।
धीरे से उसने कहा—
“आज… मेरा आखिरी गवाह बोल चुका है।”
कबीर ने पहली बार महसूस किया—
उसकी आभा हल्की हो रही थी।
जैसे…
वो मुक्त होने लगी हो।

(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
13 of 32
Category
Horror
Reading time
4 min
Words
707
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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