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सेक्सी प्रेत (14)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट
डर की भी एक उम्र होती है।
और बदले की भी।
जब दोनों खत्म होते हैं…
तो सिर्फ़
सन्नाटा बचता है।
आज हवेली में वही सन्नाटा था।
ना हवा की सरसराहट।
ना इत्र की महक।
ना ठंडक।
कबीर बरामदे में खड़ा था।
उसे पहली बार लगा—
जैसे ये जगह
फिर से सिर्फ़ एक पुरानी, टूटी हुई इमारत रह गई है।
कोई उपस्थिति नहीं।
कोई धड़कन नहीं।
कोई…
वो नहीं।
रात भर वो जागता रहा।
छाया नहीं आई।
कई दिनों में पहली बार।
उसने फुसफुसाकर पुकारा—
“छाया…”
कोई जवाब नहीं।
“नंदिनी…”
सिर्फ़ दीवारों की गूँज।
उसका दिल अजीब-सा बैठ गया।
उसे एहसास हुआ—
वो डर से नहीं…
खालीपन से डर रहा है।
सुबह राघव का फोन आया।
“सब खत्म हो गया,”
उसने कहा।
“क्या?”
“बाकी दो आदमी शहर छोड़कर भाग गए।
विक्रम मानसिक अस्पताल में है।
केस री-ओपन हो रहा है।”
कबीर चुप।
“तुम खुश नहीं लग रहे,”
राघव बोला।
कबीर ने धीमे से कहा—
“कभी-कभी जीत भी हार जैसी लगती है।”
हवेली के कमरों में
आज धूल ज़्यादा थी।
जाले साफ़ दिख रहे थे।
खिड़कियों से सीधी धूप आ रही थी।
पहले ये जगह धुँधली रहती थी।
आज…
बहुत साफ़।
बहुत खाली।
जैसे किसी ने
अपना सामान समेट लिया हो।
कबीर उस कमरे में गया
जहाँ वो अक्सर उससे बात करता था।
दीवार के सहारे बैठ गया।
“अगर तुम चली गई हो…”
उसने बुदबुदाया,
“तो बता तो देती…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
उसे खुद पर हँसी आई।
एक लेखक…
एक प्रेत से लगाव पाल बैठा था।
पर ये लगाव
डर का नहीं था।
प्रेम का था।
दोपहर को
अचानक हल्की खुशबू आई।
बहुत हल्की।
जैसे किसी याद की छाया।
कबीर का दिल धड़क उठा।
“छाया?”
हवा हल्की काँपी।
और वो सामने थी।
पर…
पहले जैसी नहीं।
आज उसकी आकृति हल्की थी।
धुंधली।
जैसे धूप में घुल रही हो।
आँखों में वही गहराई थी
पर चमक कम।
“तुम…”
कबीर की आवाज़ भर्रा गई।
वो मुस्कुराई।
“डर गए थे?”
“हाँ,”
उसने बिना झिझक कहा।
“तुम… कमजोर लग रही हो,”
कबीर बोला।
वो खिड़की की ओर देखती रही।
“आत्माएँ गुस्से से बंधी रहती हैं…”
वो बोली,
“जब गुस्सा खत्म होता है…
तो ताकत भी चली जाती है।”
“मतलब?”
“मेरा काम खत्म हो रहा है।”
ये सुनकर
कबीर के सीने में कुछ टूट गया।
“तो अब तुम… चली जाओगी?”
उसने मुश्किल से पूछा।
वो चुप।
फिर हल्के से सिर हिलाया।
“मुझे रुकने का कारण चाहिए था…
अब वो नहीं है।”
“मैं हूँ,”
कबीर के मुँह से अचानक निकला।
दोनों चुप।
हवा भारी।
वो उसकी ओर मुड़ी।
आँखों में पहली बार…
नरमी।
“तुम वजह नहीं… सहारा थे,”
वो बोली।
“फर्क?”
“वजह बाँधती है…
सहारा मुक्त करता है।”
कबीर समझ नहीं पाया।
बस इतना जानता था—
वो उसे खोना नहीं चाहता।
“क्या आत्माएँ… प्यार कर सकती हैं?”
उसने पूछा।
वो हल्का हँसी।
“आत्माएँ ही तो प्यार होती हैं।”
“फिर रुक क्यों नहीं सकती?”
“क्योंकि प्यार पकड़कर नहीं रखा जाता…”
उसने धीरे से कहा—
“छोड़ा जाता है।”
अचानक—
उसकी उँगलियाँ कबीर के हाथ के पास आईं।
पहली बार
उसे साफ़ एहसास हुआ।
ठंडी।
बहुत ठंडी।
पर…
सच्ची।
जैसे धुंध भी स्पर्श बन सकती हो।
“तुमने मुझे इंसान बनाए रखा,”
वो फुसफुसाई।
“तुमने मुझे जीना सिखाया,”
कबीर बोला।
दोनों मुस्कुराए।
दर्द भरी मुस्कान।
दूर कहीं मंदिर की घंटी बजी।
हवा में अजीब शांति फैल गई।
छाया की आकृति और हल्की होने लगी।
“अभी नहीं…”
कबीर फुसफुसाया।
“अभी मत जाओ…”
वो बोली—
“मैं जा नहीं रही…”
“तो?”
“मैं हल्की हो रही हूँ।”
“क्या तुम फिर आओगी?”
उसने पूछा।
वो बोली—
“जब याद करोगे…
मैं हवा में मिल जाऊँगी।”
“ये जवाब नहीं है,”
कबीर मुस्कुराया।
वो भी मुस्कुराई।
“कुछ रिश्तों के जवाब नहीं होते।”
सूरज ढल रहा था।
कमरा सुनहरी रोशनी से भर गया।
छाया धीरे-धीरे धूप में घुलने लगी।
जैसे धुआँ।
जैसे सपना।
जैसे कोई नाम
जिसे समय मिटा देता है।
“नंदिनी…”
कबीर ने आखिरी बार कहा।
वो रुकी।
मुड़ी।
और बहुत धीरे से बोली—
“अब मुझे ‘प्रेत’ मत कहना…”
कबीर की आँखें भर आईं।
“तुम क्या हो?”
उसने पूछा।
उसकी आवाज़ हवा में घुली—
“सिर्फ़ एक कहानी…
जिसे तुम ज़िंदा रखोगे…”
और वो…
गायब।
सिर्फ़ हल्की महक बची।
और खिड़की से आती हवा।
कबीर बरामदे में खड़ा रहा।
लंबे समय तक।
फिर उसने डायरी निकाली।
पहला शब्द लिखा—
“नंदिनी”
और नीचे—
“ये कहानी किसी प्रेत की नहीं…
एक लड़की की है…
जिसे न्याय मिलने में मौत लग गई।”
उसने कलम रोकी।
अचानक—
हवा हल्की-सी ठंडी हुई।
जैसे किसी ने
बहुत धीरे से
उसके कंधे को छुआ हो।
वो मुस्कुराया।
“तुम गई नहीं हो…”
(क्रमशः जारी…)
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 14 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 737
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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