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सेक्सी प्रेत (15)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट
कभी-कभी
सबसे ज़्यादा आवाज़
खामोशी करती है।
उस रात हवेली में
इतनी शांति थी कि
कबीर को अपनी धड़कन भी
ज्यादा सुनाई दे रही थी।
टक… टक… टक…
जैसे कोई दरवाज़ा भीतर से पीट रहा हो।
लेकिन ये दरवाज़ा बाहर का नहीं था।
ये उसके सीने के अंदर था।
सूरज ढल चुका था।
आसमान बैंगनी हो रहा था।
हवेली की टूटी खिड़कियों से
हल्की हवा अंदर आ रही थी।
पर आज…
ठंडक नहीं थी।
पहली बार।
कबीर ने महसूस किया—
जब वो होती थी
तभी ठंडक होती थी।
आज हवेली भी
उतनी ही अकेली थी
जितना वो।
उसने पूरी शाम
उसे पुकारा नहीं।
डर था।
अगर पुकारा
और वो नहीं आई…
तो?
उम्मीद टूट जाएगी।
और अगर आई…
तो?
शायद आख़िरी बार।
दोनों ही हालात डरावने थे।
रात के करीब ग्यारह बजे।
अचानक…
वही खुशबू।
मोगरे और भीगी मिट्टी की।
कबीर की साँस अटक गई।
“नंदिनी…”
हवा हल्की काँपी।
पर इस बार
वो पहले से भी ज्यादा धुंधली थी।
जैसे काँच के पार खड़ी हो।
“तुम आई…”
उसने राहत की साँस ली।
वो मुस्कुराई।
पर उस मुस्कान में
थकान थी।
“आज आख़िरी बार,”
उसने धीरे से कहा।
ये शब्द…
किसी गोली से ज़्यादा गहरे लगे।
“मत कहो ऐसा,”
कबीर की आवाज़ काँपी।
“सच को रोक नहीं सकते,”
वो बोली।
“मैं बंधी थी…
गुस्से से… दर्द से… अधूरेपन से…”
वो उसकी आँखों में देखती रही।
“अब मैं खाली हूँ।”
“खाली क्यों लग रहा है?”
कबीर बोला।
“क्योंकि तुम जा रही हो।”
वो पास आई।
इतनी पास
कि उसकी ठंडी मौजूदगी
कबीर की साँसों में घुल गई।
“खाली होना बुरा नहीं होता,”
वो बोली,
“खाली जगह में ही
नई रोशनी आती है।”
“मुझे रोशनी नहीं चाहिए,”
कबीर हँसा,
“मुझे तुम चाहिए।”
दोनों चुप।
वो पहली बार
थोड़ा काँपी।
“ऐसा मत कहो…”
उसने फुसफुसाया।
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मैं इंसान होती…
तो शायद रुक जाती।”
ये सुनकर
कबीर की आँखें भर आईं।
“तो इंसान बन जाओ,”
उसने आधी मुस्कान से कहा।
वो हँसी।
धीमी।
मधुर।
“मौत के बाद
कोई वापस नहीं आता।”
“तुम आई तो हो…”
“मैं वापस नहीं आई…
मैं अटकी रही।”
बाहर बादल गरजे।
अचानक तेज़ हवा चली।
दरवाज़े अपने आप हिले।
मोमबत्ती बुझ गई।
कमरे में सिर्फ़ चाँदनी रह गई।
उस रोशनी में
वो बहुत खूबसूरत लग रही थी।
डरावनी नहीं।
सिर्फ़… खूबसूरत।
जैसे कोई अधूरी कविता।
“मुझे एक बात बताओ,”
कबीर बोला।
“हम्म?”
“अगर उस रात… तुम्हारे साथ ये सब नहीं होता…
तो तुम कैसी होती?”
वो कुछ पल चुप रही।
फिर मुस्कुराई।
“बहुत बोलती।”
“और?”
“बहुत हँसती।”
“और?”
“शायद… तुमसे प्यार कर बैठती।”
कबीर का दिल रुक गया।
“शायद?”
उसने पूछा।
वो करीब आई।
इतनी करीब
कि उसकी आँखें साफ़ दिखीं।
“नहीं…
पक्का।”
अचानक
उसने हाथ बढ़ाया।
इस बार…
स्पर्श साफ़ था।
ठंडा।
पर असली।
कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
पहली बार।
दो दुनियाएँ मिलीं।
ज़िंदा… और मृत।
धड़कन… और सन्नाटा।
गर्मी… और बर्फ़।
पर अजीब बात—
दर्द नहीं था।
सुकून था।
“डर नहीं लग रहा?”
उसने पूछा।
“नहीं,”
कबीर बोला।
“क्यों?”
“क्योंकि तुम अब प्रेत नहीं लगती…”
“तो?”
“तुम… बस नंदिनी हो।”
उसकी आँखें भर आईं।
तभी…
अचानक कमरे में
हल्की सुनहरी रोशनी फैलने लगी।
जैसे कहीं से सुबह उतर रही हो।
वो चौंकी।
“समय आ गया…”
कबीर ने हाथ कसकर पकड़ लिया।
“नहीं!”
“कबीर…”
“मत जाओ…”
“अगर मैं रुकी…”
वो बोली,
“तो फिर फँस जाऊँगी…
फिर कभी मुक्त नहीं हो पाऊँगी।”
“मुझे फर्क नहीं पड़ता!”
“मुझे पड़ता है…”
उसने मुस्कुराकर कहा—
“क्योंकि तुमने मुझे आज़ादी सिखाई है।”
धीरे-धीरे
उसकी उँगलियाँ धुंध बनने लगीं।
कबीर का हाथ
खाली होने लगा।
“नंदिनी…”
“रोना मत…”
“कैसे नहीं रोऊँ?”
“क्योंकि मैं जा नहीं रही…”
“फिर?”
“मैं तुम्हारी कहानियों में रहूँगी…”
अचानक—
उसने झुककर
कबीर के माथे को छुआ।
एक ठंडी चुम्बन।
जैसे बर्फ़ की बूँद।
और उसी पल—
पूरी रोशनी फैल गई।
आँखें चौंधिया गईं।
हवा थम गई।
और…
वो गायब।
पूरी तरह।
इस बार…
कोई खुशबू नहीं।
कोई छाया नहीं।
सिर्फ़ खाली कमरा।
कबीर बहुत देर तक वहीं बैठा रहा।
हाथ हवा में उठे हुए।
जैसे अभी भी उसका हाथ पकड़े हो।
फिर धीरे-धीरे हाथ गिर गया।
आँसू खुद गिरते रहे।
कोई आवाज़ नहीं।
सिर्फ़ दिल टूटने की धीमी खनक।
सुबह।
सूरज की पहली किरण कमरे में आई।
कबीर ने डायरी खोली।
लिखा—
“आज वो चली गई।
पर पहली बार… मैं अकेला नहीं हूँ।
क्योंकि अब वो डर नहीं…
मेरी याद है।”
तभी…
खिड़की से हल्की हवा आई।
पन्ना अपने आप पलटा।
और आख़िरी लाइन खुद-ब-खुद उभरी—
“मैं हमेशा यहीं हूँ…”
कबीर मुस्कुराया।
“मुझे पता है।”
(क्रमशः जारी…)
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 15 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 729
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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