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सेक्सी प्रेत (16)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट
सुबह की धूप
हवेली में अजीब लग रही थी।
जैसे किसी श्मशान में
दीया जला हो।
रोशनी थी…
पर सुकून नहीं।
कबीर सीढ़ियों पर बैठा था।
पूरी रात
उसी जगह।
जहाँ उसने
उसका हाथ आख़िरी बार पकड़ा था।
अब वहाँ
सिर्फ़ धूल थी।
और खालीपन।
रात के बाद
पहली बार
हवेली में ठंडक नहीं थी।
न खुशबू।
न हवा की सरसराहट।
न कोई फुसफुसाहट।
जैसे कोई बहुत बड़ी चीज़
अचानक गायब हो गई हो।
और पीछे
सन्नाटा छोड़ गई हो।
“शायद सच में चली गई…”
उसने खुद से कहा।
दिल ने जवाब दिया—
“या तुम मानना चाहते हो कि चली गई।”
कबीर ने सामान समेटना शुरू किया।
डायरी।
कैमरा।
पुराने नोट्स।
उसने तय किया—
आज ही शहर लौट जाएगा।
काम खत्म।
कहानी खत्म।
हवेली खत्म।
पर…
कुछ खत्म होते-होते
और उलझ जाते हैं।
जब वो ऊपर वाले कमरे में गया
जहाँ पहली बार
नंदिनी दिखी थी—
दरवाज़ा अटका हुआ था।
पहले कभी ऐसा नहीं हुआ।
उसने धक्का दिया।
चररररर…
दरवाज़ा खुला।
अंदर धूप सीधी आ रही थी।
पर…
फ़र्श पर कुछ पड़ा था।
एक पुराना लोहे का ट्रंक।
जंग लगा हुआ।
धूल से ढका।
कबीर ने पहले कभी नहीं देखा था।
“ये यहाँ था?”
उसने खुद से पूछा।
नहीं।
वो पक्का था।
ये कल तक नहीं था।
तो आया कहाँ से?
दिल की धड़कन तेज़।
तर्कवादी दिमाग बोला —
“शायद पहले ध्यान नहीं दिया।”
पर अंदर की आवाज़ बोली —
“नहीं… ये नया है।”
उसने झुककर
ताला छुआ।
ताला खुला हुआ था।
जैसे…
किसी ने जानबूझकर छोड़ा हो।
ट्रंक खुलते ही
धूल का गुबार उठा।
और अंदर…
पुराने कपड़े।
फटी साड़ी।
काँच की टूटी चूड़ियाँ।
एक दुपट्टा।
और नीचे…
कागज़।
बहुत सारे कागज़।
पीले पड़े।
मुड़े-तुड़े।
जैसे सालों से छिपे हों।
उसने पहला कागज़ खोला।
हाथ काँप गए।
वो डायरी थी।
और ऊपर लिखा था—
“नंदिनी”
कबीर का गला सूख गया।
“ये… उसकी है?”
वो बैठ गया।
धीरे-धीरे पढ़ने लगा।
डायरी — पन्ना 1
“लोग कहते हैं मैं बहुत सुंदर हूँ।
मुझे समझ नहीं आता ये तारीफ़ है या खतरा।
जब भी सड़क पर निकलती हूँ,
नज़रें कपड़ों से आर-पार चली जाती हैं।”
कबीर की मुट्ठी भींच गई।
पन्ना 2
“माँ कहती है कम हँसा करो।
पापा कहते हैं सिर झुकाकर चलो।
मोहल्ला कहता है ढंग से कपड़े पहनो।
पर कोई ये नहीं कहता —
गलत वो हैं जो घूरते हैं।”
कबीर की आँखें भर आईं।
पन्ना 3
“आज कॉलेज में फिर वही हुआ।
टीचर ने मुझे ही डाँटा।
कहा — ‘इतना ध्यान मत खींचो।’
क्या मैं ध्यान खींचती हूँ…
या लोग खुद गिरते हैं?”
कबीर समझ रहा था—
उसका “अपराध” सिर्फ़ सुंदर होना था।
पन्ने पलटते गए।
आवाज़ें तेज़ होती गईं।
जैसे वो यहीं बैठी
ये सब पढ़ रही हो।
आख़िरी एंट्री
“अगर मेरे साथ कुछ हुआ…
तो ये मत कहना मैं गलत थी।
मैं बस जीना चाहती थी।
साँस लेना चाहती थी।
हँसना चाहती थी।
अगर मर गई…
तो शायद प्रेत बनकर लौटूँ…
ताकि सबको उनकी नज़र का हिसाब दे सकूँ।”
कबीर के हाथ से डायरी गिर गई।
कमरे में अचानक
हल्की हवा चली।
कबीर का दिल जोर से धड़का।
“नंदिनी…?”
कोई जवाब नहीं।
पर…
डायरी का आख़िरी पन्ना
अपने आप पलटा।
उस पर एक लाइन और थी।
जो पहले नहीं थी।
ताज़ा स्याही।
ताज़ा अक्षर।
“पर अब हिसाब पूरा हो गया…”
कबीर जम गया।
ये उसने नहीं लिखा।
तो किसने?
अचानक…
नीचे से आवाज़ आई।
धप्प!
जैसे कुछ गिरा हो।
कबीर दौड़ा।
सीढ़ियाँ उतरते हुए
दिल गले में आ गया।
नीचे हॉल में…
दरवाज़ा खुला था।
जो उसने बंद किया था।
और…
फ़र्श पर मिट्टी।
गीले पैरों के निशान।
एक नहीं।
कई।
किसी के अंदर आने के निशान।
और…
बाहर जाने के नहीं।
कबीर का दिमाग सुन्न।
“कोई अंदर है…”
उसने धीरे से कहा।
नंदिनी तो जा चुकी थी।
तो फिर…
कौन?
तभी पीछे से आवाज़—
“तुम अभी गए नहीं?”
कबीर पलटा।
इंस्पेक्टर राघव।
दरवाज़े पर खड़ा।
“मैं तुम्हें ढूँढ रहा था,”
वो बोला।
“मुझे कुछ मिला है…”
कबीर ने कहा।
“मुझे भी,”
राघव बोला।
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
“क्या?”
दोनों ने साथ पूछा।
राघव ने फाइल बढ़ाई।
“नंदिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट,”
वो बोला।
“जो हमें कभी नहीं मिली थी।”
कबीर ने पन्ने खोले।
और पढ़ते ही…
उसका खून जम गया।
कारण-ए-मौत: डूबना नहीं।
बल्कि — गला दबाकर हत्या।
कबीर ने राघव की तरफ देखा।
“मतलब…?”
राघव बोला—
“मतलब उसे मारा गया था।”
“और जिसने मारा…
वो आज तक ज़िंदा है।”
उसी पल…
हवेली की ऊपर वाली खिड़की
अपने आप बंद हुई।
धड़ाम!!!
दोनों चौंके।
राघव बोला—
“तुमने कहा था वो चली गई…”
कबीर फुसफुसाया—
“हाँ…”
“तो फिर… ऊपर कौन है?”
दोनों धीरे-धीरे
सीढ़ियों की तरफ बढ़े।
और हवा में…
फिर वही खुशबू फैल गई।
मोगरा।
भीगी मिट्टी।
पर इस बार…
उसमें हल्की-सी
खून की गंध भी थी।
(क्रमशः जारी…)
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 16 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 774
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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