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सेक्सी प्रेत (17)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट

सीढ़ियाँ कभी इतनी लंबी नहीं लगी थीं।
कबीर और इंस्पेक्टर राघव
धीरे-धीरे ऊपर बढ़ रहे थे।
हर कदम…
धक…
धक…
धक…
जैसे लकड़ी नहीं
दिल धड़क रहा हो।
हवेली की पुरानी सीढ़ियाँ
चरमराती थीं।
पर आज—
हर आवाज़
चेतावनी जैसी लग रही थी।

“तुम पक्का कह रहे थे… वो चली गई थी?”
राघव ने फुसफुसाकर पूछा।
“मैंने खुद देखा,”
कबीर बोला।
“रोशनी… उसका गायब होना… सब।”
“तो फिर ये खुशबू?”
राघव ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।
कबीर चुप।
वही खुशबू।
मोगरा।
गीली मिट्टी।
और अब…
हल्की-सी लोहे जैसी गंध।
खून।

ऊपर पहुँचकर
दोनों रुके।
गलियारा खाली था।
पर अजीब बात—
हवा चल रही थी।
जबकि सारी खिड़कियाँ बंद थीं।
ठंडी।
धीमी।
रेंगती हुई।
जैसे कोई अदृश्य चीज़
पास से गुज़र रही हो।

“कौन है वहाँ?”
राघव ने ज़ोर से कहा।
आवाज़ गूँजी।
पर जवाब नहीं आया।
सिर्फ़…
दूर से
टक…
टक…
टक…
जैसे कोई लकड़ी पर उँगलियाँ मार रहा हो।

“ये आवाज़…”
कबीर बोला।
“ऊपर वाले कमरे से,”
राघव ने कहा।
वही कमरा।
जहाँ ट्रंक मिला था।
जहाँ डायरी मिली।
जहाँ नंदिनी पहली बार दिखी थी।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
और दरवाज़े की तरफ बढ़े।

दरवाज़ा आधा खुला था।
हवा से हिल रहा था।
चरररर…
टक…
टक…
आवाज़ अंदर से ही आ रही थी।
राघव ने बंदूक निकाली।
“सावधान,”
वो बोला।
कबीर ने गहरी साँस ली।
दरवाज़ा धक्का दिया।

कमरा खाली।
धूप।
धूल।
और…
फ़र्श पर बिखरे कागज़।
डायरी वहीं थी।
पर…
अब खुली हुई।
जैसे कोई अभी पढ़कर गया हो।

“तुमने छुआ था?”
राघव ने पूछा।
“नहीं,”
कबीर बोला।
डायरी के पन्ने
तेज़ी से खुद-ब-खुद पलटने लगे।
फड़फड़फड़फड़…
दोनों जड़ हो गए।
हवा इतनी तेज़ नहीं थी।
फिर ये कैसे?

अचानक
एक पन्ना आकर रुक गया।
बीच का।
और उस पर…
नए शब्द उभरने लगे।
जैसे अदृश्य हाथ लिख रहा हो।
स्याही खुद बन रही थी।
दोनों की आँखें फटी रह गईं।
लिखा था—
“मैं नहीं…”
फिर अगली लाइन—
“वो है…”
फिर—
“वो अभी ज़िंदा है…”

कबीर की आवाज़ काँपी—
“कौन वो?”
अचानक कमरे का तापमान गिर गया।
साँस से धुआँ निकलने लगा।
राघव ने फुसफुसाया—
“ये… वो ही है…”
“नंदिनी…”

पर इस बार
जो एहसास आया—
वो अलग था।
पहले
उसकी मौजूदगी में
सुकून होता था।
मुलायम ठंडक।
धीमी खुशबू।
आज…
डर था।
कच्चा।
कठोर।
जैसे कोई और ऊर्जा।
भारी।
क्रोधित।

“ये नंदिनी नहीं…”
कबीर बोला।
“क्या मतलब?”
“उसकी मौजूदगी ऐसी नहीं थी।”
राघव ने पूछा—
“तो फिर?”
कबीर धीरे से बोला—
“कोई और है…”

अचानक—
दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीर
अपने आप गिर गई।
धड़ाम!!!
काँच टूट गया।
दोनों चौंके।
तस्वीर पलटी हुई थी।
कबीर ने उठाई।
धूल साफ़ की।
और…
खून जम गया।
तस्वीर में
नंदिनी नहीं थी।
बल्कि…
चार लड़के।
कॉलेज उम्र के।
हँसते हुए।
उनमें से एक—
युवा राघव।

“ये…”
कबीर ने तस्वीर राघव को दिखाई।
राघव का चेहरा सफेद पड़ गया।
होंठ सूख गए।
“ये… पुराने दिन हैं…”
वो बुदबुदाया।
“कौन हैं ये?”
कबीर ने पूछा।
राघव चुप।
“कौन हैं ये?!”
कबीर चीखा।
राघव की आवाज़ टूटी—
“हम… उसी कॉलेज में थे…”

“नंदिनी भी वहीं पढ़ती थी…”
राघव बोला।
कमरा ठंडा होता गया।
“उस रात…
हम चारों नशे में थे…”
कबीर का दिल बैठ गया।
“राघव…”
“मैंने रोका था…”
वो चिल्लाया,
“मैंने कहा था छोड़ दो…”
“पर उन्होंने…”
उसकी आवाज़ टूट गई।

कबीर की आँखों में आग भर गई।
“तो तुम जानते थे…”
“हाँ…”
राघव रो पड़ा।
“मैंने रिपोर्ट बदली…
क्योंकि मैं डर गया था…”
“और वो मर गई,”
कबीर ने कहा।
राघव घुटनों पर बैठ गया।
“मैं कायर था…”

अचानक…
कमरे की सारी खिड़कियाँ
धड़ाम-धड़ाम बंद हो गईं।
हवा तूफ़ान बन गई।
डायरी उड़ने लगी।
और…
पीछे से
धीमी आवाज़ आई—
एक स्त्री की।
पर इस बार…
कोमल नहीं।
कटीली।
टूटी हुई।
“अब याद आया…?”
दोनों जड़।
धीरे-धीरे पीछे मुड़े।
दरवाज़े के पास…
धुंध जमा हो रही थी।
काली।
भारी।
और उसमें से
एक आकृति बन रही थी।

वो नंदिनी थी।
पर वैसी नहीं।
आँखें काली।
चेहरा टूटा।
गले पर नीले निशान।
होंठों पर खून।
और मुस्कान…
डरावनी।
“हिसाब… अभी बाकी है…”
उसकी आवाज़ गूँजी।
राघव काँप गया।
“नंदिनी… मैं…”
वो चीखा—
“माफ़ कर दो…”
वो हँसी।
धीमी।
भयावह।
“माफ़ी…
ज़िंदा लोग माँगते हैं…”
और तभी…
कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद।
अंधेरा।
पूरी तरह।

(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
17 of 32
Category
Horror
Reading time
4 min
Words
686
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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