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सेक्सी प्रेत (18)

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट

अंधेरा।
इतना गहरा
कि हाथ भी सामने न दिखे।
कमरे का दरवाज़ा
धड़ाम से बंद हुआ
और सब कुछ निगल गया।
कबीर ने साँस रोकी।
“राघव…?”
उसने धीरे से पुकारा।
कोई जवाब नहीं।
सिर्फ़…
भारी साँसें।
किसी की।
बहुत पास।

अचानक
ठंडी हवा उसके कान से गुज़री।
फुसफुसाहट।
“वो झूठ बोलता था…”
कबीर का दिल उछल पड़ा।
आवाज़ नंदिनी की थी।
पर टूटी हुई।
जैसे गले से खून निकल रहा हो।

क्लिक।
राघव ने टॉर्च जलाई।
पतली रोशनी कमरे में तैर गई।
और उसी पल—
दोनों जम गए।
दीवारों पर…
खरोंचें थीं।
नई।
ताज़ा।
जैसे किसी ने नाखूनों से
दीवार नोची हो।
और हर खरोंच में लिखा था—
“क्यों…”
“क्यों…”
“क्यों…”

राघव काँप रहा था।
“मैंने… मैंने रोका था…”
वो बुदबुदाया।
“झूठ मत बोलो,”
अचानक आवाज़ गूँजी।
कमरा हिल गया।
टॉर्च झिलमिलाई।

धुंध फिर जमा होने लगी।
दरवाज़े के पास।
धीरे-धीरे।
एक आकृति।
नंदिनी।
पर अब…
उसका चेहरा वैसा नहीं था
जैसा कबीर ने प्यार से देखा था।
ये उसका दूसरा रूप था।

बाल बिखरे।
आँखें गड्ढों जैसी काली।
गले पर उंगलियों के नीले निशान।
होंठों पर सूखा खून।
कपड़े फटे हुए।
और शरीर…
जैसे पानी में घंटों पड़ा रहा हो।
राघव पीछे हट गया।
“नंदिनी… सुनो…”

“सुना था…”
उसने कहा।
आवाज़ गूँज रही थी।
“उस रात भी सुना था…
जब तुम लोग हँस रहे थे…”
कमरे में अचानक
पुरानी आवाज़ें गूँजने लगीं।
लड़कों की हँसी।
बोतलें टकराने की आवाज़।
“अरे छोड़ो… मज़ाक है…”
“किसे पता चलेगा…”
“चुप करा दो इसे…”

राघव कान बंद कर बैठ गया।
“बस करो… बस करो…”
कबीर समझ गया—
ये यादें हैं।
वो रात फिर से दोहराई जा रही है।
हवेली जैसे टाइम मशीन बन गई थी।

नंदिनी धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसके कदम ज़मीन को छू नहीं रहे थे।
पर हर कदम पर
गीले निशान बन रहे थे।
खून और पानी का मिश्रण।
कबीर का गला सूख गया।

“तुमने… मुझे नहीं रोका,”
वो राघव के सामने आकर रुकी।
“मैं… डर गया था…”
राघव रो पड़ा।
“और मैं?”
उसकी आँखें जल उठीं।
“मैं भी डरी थी…”
कमरा बर्फ़ जैसा ठंडा हो गया।

अचानक—
अदृश्य हाथों ने
राघव का गला पकड़ लिया।
वो हवा में उठ गया।
टॉर्च गिर गई।
अंधेरा।
“कबीर… बचाओ…”
उसकी टूटी आवाज़ आई।

कबीर चिल्लाया—
“नंदिनी! रुक जाओ!”
हवा थमी नहीं।
राघव हवा में तड़प रहा था।
उसी तरह…
जैसे शायद वो उस रात तड़पी थी।
कबीर की आँखों में आँसू आ गए।

“तुम ऐसी नहीं हो!”
कबीर चीखा।
“तुम बदला नहीं… न्याय चाहती हो!”
कुछ पल के लिए
हवा थमी।
उसकी आँखें कबीर की तरफ मुड़ीं।
पहचान की झलक।
दर्द।

“अगर तुम उसे मार दोगी…”
कबीर बोला,
“तो तुम भी उन्हीं जैसी बन जाओगी…”
कमरे में सन्नाटा।
राघव अभी भी हवा में।
साँस टूटती हुई।

“तो क्या करूँ?”
उसकी आवाज़ टूटी।
पहली बार।
गुस्सा कम…
दर्द ज़्यादा।
“मेरे साथ जो हुआ…
उसका हिसाब कौन देगा?”
कबीर धीरे से बोला—
“सच देगा।”

“सच…?”
वो फुसफुसाई।
“हाँ…
सबके सामने सच।”
“नाम… चेहरे… सब उजागर होंगे।”
“भाग नहीं पाएँगे।”
“ज़िंदगी भर मरेंगे।”

कुछ पल।
बहुत भारी।
फिर…
राघव धड़ाम से ज़मीन पर गिरा।
हवा शांत।
उसका गला छूट गया।
वो ज़मीन पर खाँसता रहा।
ज़िंदा।

नंदिनी की आँखों से
काले आँसू बहने लगे।
“मैं थक गई हूँ…”
वो बोली।
“गुस्से से… दर्द से…”
कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
“मैं हूँ ना,”
उसने कहा।
“तुम्हारी कहानी मैं दुनिया को बताऊँगा।”

अचानक…
दीवार पर छाया उभरी।
पर वो उसकी नहीं थी।
एक और छाया।
लंबी।
पुरुष आकृति।
हँसती हुई।
कुटिल।
दोनों ने देखा।
नंदिनी पीछे हट गई।
पहली बार…
डरते हुए।

छाया से आवाज़ आई—
“सच बाहर नहीं आएगा…”
राघव का चेहरा पीला।
“ये… ये विक्रम की आवाज़ है…”
“वो दूसरा लड़का…”
“वो अभी ज़िंदा है…”
कमरा फिर ठंडा।
छाया हँसी।
“और अब तुम्हारी बारी है…”
अचानक…
लाइट्स फट गईं।
काँच टूटा।
और पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

(क्रमशः जारी…)

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
सेक्सी प्रेत
Chapter
18 of 32
Category
Horror
Reading time
4 min
Words
623
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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