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सेक्सी प्रेत (29)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट
रात के साढ़े ग्यारह।
शहर की आधी बत्तियाँ बुझ चुकी थीं।
बारिश थम गई थी…
पर सड़कों पर पानी चमक रहा था।
जैसे किसी ने काले शीशे बिछा दिए हों।
कबीर की बाइक हवा चीरती भाग रही थी।
स्पीडोमीटर 90… 100… 110…
पीछे शेखर बैठा था।
अभी भी कमजोर।
पर आँखों में वही पुलिस वाला जज़्बा।
“फोन लग रहा है?” उसने चिल्लाकर पूछा।
कबीर ने फिर कॉल मिलाया।
रिंग।
रिंग।
रिंग।
कोई जवाब नहीं।
उसका दिल बैठ गया।
“राघव फोन क्यों नहीं उठा रहा…”
राघव का फ्लैट।
तीसरी मंज़िल।
पुरानी बिल्डिंग।
सिविल लाइंस से दूर।
सस्ता इलाका।
स्ट्रीट लाइट आधी टूटी।
गली में कुत्ते।
अजीब सन्नाटा।
कभी-कभी ऐसा सन्नाटा…
जो चीख से भी ज्यादा डरावना होता है।
उसी समय…
राघव अपने कमरे में अकेला बैठा था।
लैपटॉप खुला।
स्क्रीन पर फाइल।
“PROJECT SHADOW — Confidential”
वो कांपते हाथों से पढ़ रहा था।
जितना पढ़ता…
चेहरा उतना सफेद।
“ये लोग… इंसान नहीं थे…”
फाइल में लिखा था —
अनाथ लड़कियों पर प्रयोग
भय से ऊर्जा निकालने की कोशिश
आत्मा को बाँधने की टेक्नोलॉजी
असफल सब्जेक्ट्स = “Discard”
और एक नाम…
Subject 17 — Nandini
उसने गहरी साँस ली।
“हे भगवान…”
अचानक—
कमरे की ट्यूब लाइट झिलमिलाई।
टिक…
टिक…
टिक…
फिर बंद।
पूरा कमरा अंधेरा।
“लो फिर…” वो बुदबुदाया।
मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।
“पुरानी बिल्डिंग है… नॉर्मल है…”
वो खुद को समझा रहा था।
तभी—
पीछे से आवाज़।
किसी के चलने की।
चप्पल घिसटने जैसी।
वो मुड़ा।
कोई नहीं।
“मैं ओवरथिंक कर रहा हूँ…”
लेकिन दिल मान नहीं रहा था।
वो किचन की तरफ गया।
पानी लेने।
गिलास भरा।
हाथ काँप रहे थे।
तभी—
सिंक से काला पानी टपका।
साधारण पानी नहीं।
गाढ़ा।
जैसे कीचड़।
“ये क्या…”
उसने नल बंद किया।
पर टपकना जारी।
टप।
टप।
टप।
और हर बूंद फर्श पर गिरकर…
हाथ का निशान बन रही थी।
छोटे-छोटे काले हाथ।
जैसे बच्चे के।
राघव का गला सूख गया।
“ये मज़ाक नहीं है…”
अचानक मोबाइल बजा।
कबीर कॉलिंग।
उसने उठाया।
“हैलो—”
लेकिन दूसरी तरफ आवाज़ नहीं।
सिर्फ…
भारी साँस।
और फुसफुसाहट।
“राघव…”
उसका खून जम गया।
ये कबीर की आवाज़ नहीं थी।
फोन कट।
फिर लाइट वापस।
कमरा सामान्य।
सिंक साफ़।
फर्श सूखा।
वो खुद से हँसा।
“मैं पागल हो रहा हूँ…”
लेकिन दिल तेज़ धड़क रहा था।
दरवाज़े पर दस्तक।
टुक… टुक… टुक…
रात के 12 बजे।
कौन?
वो धीरे से दरवाज़े तक गया।
झिरी से देखा।
कोई नहीं।
पर नीचे…
गीले पैरों के निशान।
बाहर से अंदर आते हुए।
दरवाज़ा खुद खुल गया।
चररर…
हवा अंदर आई।
बर्फ जैसी।
और लाइट फिर गई।
इस बार पूरी बिल्डिंग की।
काला अंधेरा।
अंधेरे में…
सीढ़ियों से आवाज़।
घसीटने की।
खर्ररर…
खर्ररर…
राघव का दिल गले में।
“न… नहीं…”
वो पीछे हटने लगा।
मोबाइल की रोशनी में…
सीढ़ियों पर कुछ दिखा।
लंबी काली परछाईं।
चल नहीं रही।
रेंग रही।
धीरे-धीरे।
उसकी तरफ।
“छाया-भक्षक…”
उसके दिमाग में नाम गूँजा।
कबीर ने बताया था।
“ये डर से ताकत लेता है…”
“शांत रह…”
“शांत रह…”
पर डर कैसे रुके?
वो कमरे में भागा।
दरवाज़ा बंद।
कुंडी लगाई।
अलमारी सरकाई।
सोचा — बच जाऊँगा।
तभी…
दीवार पर उसकी बचपन की फोटो गिर गई।
उसने उठाई।
और…
फोटो बदल चुकी थी।
उसमें उसका शव पड़ा था।
आँखें खुली।
मुँह खुला।
जैसे चीखते मरा हो।
उसकी चीख निकल गई।
और यही गलती थी।
क्योंकि बाहर से आवाज़ आई —
“डर… अच्छा है…”
दरवाज़ा खुद हिलने लगा।
धड़ाम।
धड़ाम।
धड़ाम।
अचानक कमरे का तापमान गिरा।
साँस धुआँ बनकर निकल रही थी।
अलमारी अपने आप खिसक गई।
दरवाज़ा खुला।
और वो चीज़…
अंदर।
पूरा काला।
चेहरा नहीं।
सिर्फ गड्ढे।
वो राघव के सामने रुकी।
हाथ बढ़ाया।
हड्डी जैसा।
और उसके सीने पर रखा।
राघव की साँस रुकने लगी।
जैसे आत्मा खींची जा रही हो।
उसी पल—
नीचे से बाइक की आवाज़।
कबीर!
शेखर!
गेट धड़ाम से टूटा।
“राघव!!” आवाज़ गूँजी।
छाया-भक्षक पलटा।
नंदिनी भी प्रकट हुई।
कमजोर।
पर चमकती।
दोनों आत्माएँ आमने-सामने।
सफेद बनाम काला।
रोशनी बनाम अंधेरा।
टकराव।
धमाका।
काँच टूटे।
दीवारें हिलीं।
नंदिनी चीखी।
वो पीछे फेंकी गई।
वो चीज़ और ताकतवर।
“मैं डर से जीता हूँ…” वो गरजा।
कबीर दौड़ा।
राघव को खींचा।
“भाग!”
तीनों नीचे भागे।
पीछे से हँसी।
भयानक।
पूरा बिल्डिंग काँपी।
बाहर आते ही ऊपर की खिड़की पर लिखा उभरा —
“अब बारी… कबीर की…”
और नंदिनी ज़मीन पर गिर गई।
बेहोश।
क्योंकि…
उसकी रोशनी आधी रह गई थी।
क्रमश:
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 29 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 707
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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