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सेक्सी प्रेत (28)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 4 मिनट
घर की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।
टिक।
टिक।
टिक।
घड़ी की आवाज़।
बस वही।
कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।
सफेद रोशनी दीवार पर पड़ी।
और…
खून से लिखे शब्द।
“तुमने गलत दरवाज़ा खोल दिया है…”
उसका गला सूख गया।
“ये… नंदिनी ने नहीं किया…”
शेखर फुसफुसाया।
नंदिनी उनके पास खड़ी थी।
लेकिन…
पहली बार…
उसके चेहरे पर डर था।
“ये मैं नहीं हूँ…”
उसने धीमे कहा।
“ये… कोई और है…”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“और आत्मा?”
नंदिनी ने सिर हिलाया।
“बहुत पुरानी…”
“बहुत गंदी…”
“मौत जैसी बदबू…”
अचानक—
कमरे का तापमान गिरा।
इतना कि साँस से धुआँ निकलने लगा।
खिड़कियाँ खुद-ब-खुद बंद।
दरवाज़े जाम।
फोन नेटवर्क गायब।
जैसे घर दुनिया से कट गया।
ऊपर से आवाज़।
धीरे-धीरे घसीटने की।
जैसे कोई भारी चीज़ फर्श पर खींच रहा हो।
खर्रररर…
खर्रररर…
शेखर ने पिस्तौल कस ली।
“ऊपर कोई है।”
कबीर बोला — “चल।”
नंदिनी अचानक चिल्लाई —
“मत जाओ!”
दोनों रुक गए।
“वो… इंसान नहीं है…”
लेकिन आवाज़ बढ़ती जा रही थी।
अगर वो अंदर है…
तो छुपना बेकार।
तीनों ऊपर गए।
हर सीढ़ी पर अजीब सर्दी।
जैसे बर्फ पर चल रहे हों।
ऊपर का गलियारा अंधेरा।
दीवारों पर नमी।
जो पहले नहीं थी।
पानी टपक रहा था।
घर जैसे बूढ़ा हो गया हो।
सड़ांध।
सीलन।
मौत की गंध।
तभी—
कबीर के बचपन की फोटो फ्रेम दीवार से गिरकर टूट गई।
वो चौंका।
फोटो उठाई।
लेकिन…
फोटो बदल चुकी थी।
उसमें कबीर नहीं।
एक काली परछाई खड़ी थी।
पीछे।
ठीक उसके पीछे।
“ये दिमाग से खेल रहा है…”
शेखर बोला।
“साइकोलॉजिकल।”
नंदिनी ने सिर हिलाया —
“नहीं…”
“ये यादें खाता है…”
“डर से ताकत लेता है…”
कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुला।
धड़ाम।
अंदर अंधेरा।
पूरा काला।
जैसे रोशनी अंदर जाती ही नहीं।
कबीर ने टॉर्च डाली।
कुछ नहीं दिखा।
सिर्फ…
काली धुंध।
अचानक—
दीवार पर खरोंच।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
जैसे किसी ने नाखून घिसे हों।
और आवाज़ आई—
“कब्ब्बीर…”
उसने जमकर खड़ा रह गया।
“इसने… मेरा नाम लिया…”
नंदिनी पीछे हट गई।
“ये मुझे भी देख रहा है…”
“ये… हमें देख सकता है…”
“ये इंसानों से नफरत करता है…”
“और आत्माओं से भी…”
कबीर सन्न।
“मतलब… ये तुमसे भी बड़ा खतरा है?”
“हाँ…”
अचानक काला धुआँ कमरे में फैल गया।
और उसमें से…
एक आकृति बनी।
लंबी।
टेढ़ी।
हड्डियों जैसी उंगलियाँ।
चेहरा नहीं।
सिर्फ गड्ढे।
जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं।
शेखर की आवाज़ कांपी —
“ये क्या है…”
नंदिनी फुसफुसाई —
“छाया-भक्षक…”
वो आकृति दीवार से निकलकर फर्श पर रेंगने लगी।
चल नहीं रही थी।
घिसट रही थी।
जैसे टूटी लाश।
और सीधा कबीर की तरफ।
कबीर पीछे हटा।
पर पैर फिसल गया।
वो गिर पड़ा।
वो चीज़ उसके ऊपर झुकी।
ठंडी साँस।
बर्फ जैसी उंगलियाँ।
उसका गला जकड़ लिया।
सांस रुकने लगी।
“कबीर!” शेखर चिल्लाया।
गोली चलाई।
धाँय!
पर गोली उसके आर-पार निकल गई।
जैसे धुआँ।
कोई असर नहीं।
नंदिनी अचानक चीखी।
पहली बार।
वो पूरी ताकत से चमकी।
सफेद रोशनी।
वो चीज़ पीछे हटी।
चीख निकली।
भयानक।
मानो सैकड़ों आवाज़ें साथ रो रही हों।
“ये मुझसे नफरत करता है…”
नंदिनी बोली।
“क्योंकि मैं इंसानों की रक्षा कर रही हूँ…”
“ये सिर्फ मौत चाहता है…”
“सबकी…”
वो चीज़ फिर उठी।
इस बार दीवार पर चढ़ गई।
मकड़ी की तरह।
और छत से उल्टी लटककर हँसी।
हड्डी जैसी हँसी।
“तुम… सब… मरोगे…”
अचानक—
उसने काला धुआँ फेंका।
शेखर बेहोश।
कबीर चक्कर।
साँस भारी।
नंदिनी कमजोर।
जैसे उसकी ताकत खिंच रही हो।
“ये… मेरी ऊर्जा खा रहा है…”
वो बोली।
कबीर ने आखिरी ताकत से चिल्लाया —
“तू क्या चाहता है?!”
आवाज़ गूँजी —
“खून…”
“डर…”
“और… तुम्हारी आत्मा…”
अचानक दरवाज़े पर तेज़ रोशनी पड़ी।
पड़ोस के जनरेटर की बिजली वापस आई।
घर में करंट आया।
लाइटें जलीं।
और वो छाया…
गायब।
जैसे कभी थी ही नहीं।
सन्नाटा।
बस टूटा सामान।
बेहोश शेखर।
कांपता कबीर।
और घुटनों पर बैठी नंदिनी।
कमजोर।
“ये… वापस आएगा…”
वो बोली।
“ये डायरेक्टर से भी बड़ा है…”
“ये… मौत का शिकारी है…”
अचानक कबीर को याद आया।
पुरानी फाइल।
हवेली वाली।
एक नाम…
जो कट किया गया था।
“प्रोजेक्ट शैडो”
वो फुसफुसाया —
“क्या ये… उसी एक्सपेरिमेंट का नतीजा है?”
नंदिनी की आँखें फैल गईं।
“हाँ…”
“उन्होंने सिर्फ मुझे नहीं मारा था…”
“और भी लोग थे…”
फोन फिर बजा।
अनजान नंबर।
कबीर ने उठाया।
दूसरी तरफ वही ठंडी आवाज़।
“तुमने मेरी चीज़ देख ली…”
“अब तुम भी सूची में हो…”
“स्वागत है… खेल में…”
कॉल कट।
और खिड़की पर उँगली से लिखा उभरा —
“NEXT — RAGHAV”
कबीर का खून जम गया।
क्योंकि राघव…
अभी अकेला था।
क्रमश:
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- सेक्सी प्रेत
- Chapter
- 28 of 32
- Category
- Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 738
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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