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भाग 6: तहखाने से आती ठंडी हवा और अजीब आवाजें
Yogesh Kumar Maurya · Haunted Places · 8 मिनट
दोपहर के बारह बजने के बाद ब्लैकवुड मैनर की ग्रैंड लाइब्रेरी में छाया सन्नाटा और अधिक गहरा और भारी हो गया था। व्लाद वोल्कोव के शब्द—"या तो तुम मेरी बनकर इस अमरता के अंधेरे को अपना लो, या फिर इस हवेली की दीवारों में हमेशा के लिए दफ़न हो जाओ"—नताशा के दिमाग में किसी जहरीले मंत्र की तरह गूँज रहे थे। जब उसने अपनी पलकें झपकाईं और सामने देखा, तो व्लाद वहाँ नहीं था। वह हमेशा की तरह हवा में बिना कोई आहट छोड़े ओझल हो चुका था।
नताशा का शरीर काँप रहा था। उस पुरानी चमड़े की जिल्द वाली डायरी के पन्ने अभी भी खुले हुए थे, जिन पर नतालिया और व्लाद के अतीत का काला इतिहास दर्ज था। नताशा ने तुरंत उस डायरी को बंद किया, लेकिन उसके हाथ इतने सुन्न पड़ चुके थे कि वह ठीक से सांस भी नहीं ले पा रही थी। उसने मन ही मन खुद को संभाला। उसे अब इस हवेली के केवल ऊपरी कमरों और लाइब्रेरी तक सीमित नहीं रहना था, बल्कि अगर इस खौफनाक जाल से बाहर निकलना था, तो उसे हवेली के हर उस कोने की तलाशी लेनी होगी जिसे व्लाद ने छुपा कर रखा था।
तहखाने की ओर पहला कदम
नताशा लाइब्रेरी से बाहर निकली और मुख्य हॉल की तरफ बढ़ी। हवेली के भीतर की रोशनी लगातार मद्धम होती जा रही थी, क्योंकि बाहर ओकवुड घाटी का कोहरा सूरज की बची-कुची रोशनी को भी पूरी तरह निगल चुका था।
हॉल के एक कोने में, संगमरमर के बड़े खंभों के पीछे एक गुप्त दरवाजा था, जो ज़मीन की तरफ जाने वाली सीढ़ियों की ओर खुलता था। यह हवेली का तहखाना (Cellar) था, जिसके बारे में व्लाद ने चेतावनी दी थी कि वहाँ कभी भूलकर भी मत जाना। लेकिन डर अब नताशा की कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा बन चुका था।
नताशा दबे पाँव उस गुप्त दरवाजे के पास पहुँची। दरवाजा लकड़ी का था और उस पर लोहे की बड़ी-बड़ी कीलें ठुकी हुई थीं। आश्चर्य की बात यह थी कि दरवाजा बंद नहीं था; वह थोड़ा सा खुला हुआ था, और उसके भीतर से एक अजीब सी, बेहद ठंडी हवा का झोंका बाहर आ रहा था—वैसी ही हवा जो व्लाद के वजूद के साथ हमेशा चलती थी।
उस हवा में सूखी हुई मिट्टी, पुरानी शराब, और किसी भारी धातु—यानी खून—की महक घुली हुई थी।
नताशा ने अपनी जैकेट की जेब से फोन निकाला और उसकी फ्लैशलाइट ऑन कर दी। फोन की नीली रोशनी ने तहखाने की सीढ़ियों के अंधेर को चीर दिया। सीढ़ियाँ बहुत पुरानी, पत्थर की थीं जिन पर काई जमी हुई थी।
"क्या कोई है नीचे?" नताशा ने अपनी काँपती हुई आवाज़ में फुसफुसाया।
कोई जवाब नहीं मिला। केवल दूर गहराई से पानी की बूंदों के टपकने की और किसी भारी चीज़ के खींचने की मद्धम सी आवाज़ आ रही थी।
नताशा ने एक-एक कदम सावधानी से नीचे रखना शुरू किया। जैसे-जैसे वह तहखाने की गहराई में उतरती गई, ठंडक इतनी बढ़ गई कि उसके मुँह से निकलने वाली साँसें भाप का रूप लेने लगीं। उसके पैरों के नीचे कुछ कड़े कागज़ या सूखे पत्ते कुचलने की आवाज़ आ रही थी।
तहखाने के अंदर का खौफनाक सच
सीढ़ियों के खत्म होते ही एक लंबा, गलियारा शुरू हुआ, जिसकी दोनों दीवारों पर लोहे की जंजीरें लटकी हुई थीं। यह जगह किसी प्राचीन कारागार (Dungeon) जैसी लग रही थी। दीवारों पर पत्थरों को तराशकर बनाई गई छोटी-छोटी कोठरियाँ (Cells) थीं, जिनके दरवाज़े लोहे की मजबूत सलाखों से बने थे।
नताशा ने अपनी फोन की लाइट को आगे बढ़ाया और कोठरियों के अंदर झाँकने लगी। ज़्यादातर कोठरियाँ खाली थीं, और उनमें केवल पुरानी धूल और मकड़ी के जाले थे। लेकिन जैसे ही वह गलियारे के आखिरी कोने में पहुँची, उसकी चीख निकलते-निकलते बच गई।
एक कोठरी के अंदर, लोहे की सलाखों के पीछे कुछ ऐसा रखा था जिसे देखकर उसका खून जम गया।
वहाँ एक पुराना, संगमरमर का चबूतरा बना हुआ था, और उसके ऊपर एक खुला हुआ ताबूत (Coffin) रखा था। वह ताबूत काले महोगनी की लकड़ी और अंदर से लाल मखमली कपड़े से सजा हुआ था। उस ताबूत के चारों ओर पुरानी मोमबत्तियाँ बुझी हुई हालत में रखी थीं, जिन पर मोम की मोटी परत जमी हुई थी।
नताशा ने हिम्मत जुटाकर सलाखों के पास अपना कदम बढ़ाया। उसने फोन की लाइट उस ताबूत के अंदर डाली।
ताबत खाली था! उसके अंदर केवल काले रंग का एक पुराना रेशमी कोट और कुछ पुरानी राख पड़ी थी। लेकिन उस ताबूत के ठीक सामने दीवार पर एक बहुत बड़ा तैल चित्र टंगा था, जो किसी और का नहीं, बल्कि खुद नतालिया का था—वही महिला जिसकी तस्वीर ऊपर गलियारे में टंगी थी, और जिसकी शक्ल हूबहू नताशा से मिलती थी।
उस पेंटिंग के नीचे एक तांबे की पट्टिका पर लैटिन में कुछ खुदा हुआ था:
“जब तक खून की आखिरी बूँद वापस नहीं आती, यह नींद कभी पूरी नहीं होगी।”
नताशा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसका पैर अचानक ज़मीन पर रखी किसी लोहे की जंजीर से टकरा गया। जंजीर के हिलने से जो खनक पैदा हुई, वह उस सन्नाटे में किसी धमाके जैसी गूँज उठी।
परछाइयों का पहरा
"तुमने मेरी चेतावनी को अनसुना कर दिया, नताशा..."
तभी तहखाने के उस सन्नाटे को चीरती हुई व्लाद की भारी और बेहद ठंडी आवाज़ गूँजी। आवाज़ इतनी अचानक और पास से आई कि नताशा के हाथ से फोन छूटकर पत्थर के फर्श पर गिर गया। फोन की फ्लैशलाइट बुझ गई, और पूरा तहखाना गाढ़े, impenetrable अंधेर में डूब गया।
नताशा ने घबराकर पीछे हटना चाहा, लेकिन उसका शरीर किसी दीवार से जा टकराया। वह दीवार नहीं थी—वह व्लाद का सीना था।
व्लाद की उंगलियों ने बिना किसी आवाज़ के नताशा के कंधे को जकड़ लिया। उसका स्पर्श बर्फ से भी ज़्यादा ठंडा था। अंधेरे के बावजूद नताशा को महसूस हुआ कि व्लाद का चेहरा उसके ठीक करीब आ चुका था। उसकी साँसें नताशा की गर्दन की त्वचा को छू रही थीं, जिनमें किसी भी जीवित इंसान की तरह गर्माहट का नामोनिशान नहीं था।
"तुम... तुम यहाँ तहखाने में क्या कर रहे हो?" नताशा की आवाज़ गले में ही फँस कर रह गई। उसने डरते-डरते पूछा।
व्लाद की हँसी उस तहखाने के पत्थरों से टकराकर गूँज उठी। वह हँसी किसी दरिंदे की खुशफहमी जैसी थी।
"मैं तो हमेशा यहीं रहता हूँ, नताशा," व्लाद की आवाज़ गूँजी। "यह तहखाना इस हवेली की नींव है। यहीं से मेरा अतीत शुरू हुआ था, और यहीं पर हमारा भविष्य तय होगा। मैंने तुमसे कहा था कि कुछ दरवाज़े बंद ही रहने चाहिए, कुछ राहें तुम्हारे लिए नहीं हैं। फिर भी तुम यहाँ चली आईं... क्या तुम अपनी उस पुरानी पहचान को खुद अपने हाथों से जगाना चाहती हो?"
"मैं यहाँ किसी पहचान की तलाश में नहीं आई हूँ!" नताशा ने अपनी पूरी ताकत जुटाकर व्लाद को धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उसका शरीर ऐसे लोहे के खंभे की तरह अडिग खड़ा था जिस पर कोई असर न हुआ। "मुझे जाने दो! यह सब पागलपन है! मैं कोई नतालिया नहीं हूँ!"
व्लाद ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। अंधेरे में उसकी आँखें दो अंगारों की तरह चमक उठीं—गहरी लाल और खौफनाक।
"तुम मुकर सकती हो, नताशा, लेकिन तुम्हारी रूह जानती है कि सच क्या है," व्लाद ने उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा। "तीन सौ साल पहले इसी तहखाने में, इसी ताबूत के पास मेरा सब कुछ छीन लिया गया था। गाँववालों की आग ने नतालिया को मुझसे जुदा कर दिया था। तब से लेकर आज तक, यह हवेली एक सूना मज़ार बनकर जी रही थी। लेकिन अब... अब तुम आ चुकी हो।"
व्लाद का दूसरा हाथ धीरे से नताशा की गर्दन की तरफ बढ़ा। उसकी ठंडी उंगलियाँ नताशा की नसों पर थिरकने लगीं, जहाँ उसका खून धड़क रहा था।
"तुम्हारी धड़कनें... तुम्हारी नसों में दौड़ता यह गर्म इंसानी खून... यह मुझे याद दिलाता है कि मेरा अभिशाप अब खत्म होने की कगार पर है," व्लाद की आवाज़ में एक अजीब सा उन्माद था। "मैं तुम्हें हर दिन चाहूँगा, नताशा। सुबह से लेकर रात तक, और रात से लेकर अगली सुबह तक... तुम सिर्फ मेरी हो।"
नताशा की आँखों से डर के मारे आँसू बह निकले। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगी। उसके जिस्म की सारी ताकत जवाब दे चुकी थी।
तभी, तहखाने की सीढ़ियों के ऊपर से एक अजीब सी खड़खड़ाहट और तेज़ हवा की आवाज़ सुनाई दी।
बाहर दोपहर ढल चुकी थी और शाम होने वाली थी। ओकवुड घाटी की वह पुरानी हवेली एक बार फिर से अपनी दिन की मूक निद्रा से जाग रही थी। चमगादड़ एक बार फिर से खिड़कियों के बाहर मंडराने लगे थे।
व्लाद ने नताशा की तरफ देखा, और उसकी लाल होती आँखें धीरे-धीरे शांत होने लगीं। उसने नताशा का हाथ छोड़ा और अंधेरे में पीछे हटते हुए कहा, "शाम हो रही है, नताशा। तहखाने की हवा तुम्हारे नाज़ुक जिस्म के लिए ठीक नहीं है। ऊपर चलो... लाइब्रेरी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।"
जैसे ही व्लाद पीछे हटा, फर्श पर गिरा हुआ नताशा का फोन अचानक अपने आप ऑन हो गया, जिसकी रोशनी में वहाँ व्लाद का कोई नामोनिशान नहीं था—वह हवा में गायब हो चुका था।
नताशा थरथराते हुए उठी, अपना फोन उठाया और बिना पीछे मुड़े सीढ़ियों की तरफ भाग पड़ी। वह जान चुकी थी कि यह हवेली सिर्फ ईंट-पत्थरों से नहीं बनी है, बल्कि यह व्लाद के उस पुराने इतिहास और अधूरे प्यार का एक ऐसा जीवंत पिंजरा है जिससे बचकर निकलना नामुमकिन था।
लेकिन उस तहखाने में उस ताबूत को देखने के बाद नताशा के मन में एक बात साफ हो चुकी थी—व्लाद अपनी इस अमरता और अकेलेपन के जाल से तंग आ चुका था, और वह नताशा को अपना हमसफर बनाकर इस खौफनाक सफर को हमेशा के लिए खत्म करना चाहता था।
क्रमशः
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- मि. वैम्पायर वांट मी एवरी डे
- Chapter
- 6 of 30
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1598
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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