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भाग 9: सपने और हकीकत का धुंधलाता दायरा
Yogesh Kumar Maurya · Haunted Places · 7 मिनट
'ब्लड मून' की उस खूनी और दहशत से भरी रात के बाद जब अगली सुबह की मद्धम पीली धूप ब्लैकवुड मैनर की खिड़कियों से अंदर आई, तो नताशा खुद को अपने बिस्तर पर बेसुध पाया। उसे यह तक याद नहीं था कि वह लाइब्रेरी से उठकर अपने कमरे में कैसे वापस पहुँची थी। उसके शरीर का जर-जर हिस्सा टूट रहा था, और उसका दिमाग किसी गहरे चक्रवात से गुजरने के बाद बचे हुए सन्नाटे की तरह शांत लेकिन सुन्न था।
जब उसने अपनी आँखें खोलीं, तो कमरा बिल्कुल सामान्य लग रहा था। अंगीठी में राख ठंडी हो चुकी थी, खिड़की के शीशे बिल्कुल साफ थे, और बाहर ओकवुड घाटी पर हमेशा की तरह सफेद, घना कोहरा छाया हुआ था। कोई चमगादड़ नहीं था, कोई खूनी चाँद नहीं था, और कोई जीवित होती हुई तस्वीरें नहीं थीं।
लेकिन नताशा जानती थी कि यह सब केवल एक छलावा था। उसके दिल की तेज धड़कनें और उसकी जैकेट की जेब में रखा वह मुड़ा हुआ पुराना पन्ना इस बात का सबूत था कि जो कुछ उसने रात में देखा और महसूस किया, वह कोई सपना या भ्रम नहीं था।
धुंधलाता हुआ मानसिक संतुलन
जैसे-जैसे दिन ढलने लगा, नताशा के भीतर एक अजीब सा मानसिक संघर्ष शुरू हो गया। सपने और हकीकत के बीच की रेखाएँ अब पूरी तरह धुंधली पड़ने लगी थीं। जब वह आईने के सामने अपना चेहरा देखने जाती, तो उसे क्षण भर के लिए आईने में अपना नहीं, बल्कि उस पुरानी पेंटिंग वाली नतालिया का अक्स दिखाई देता।
उसके कानों में लगातार व्लाद की वह भारी और मखमली आवाज़ गूँजती रहती—“तुम मुकर सकती हो, नताशा, लेकिन तुम्हारी रूह जानती है कि सच क्या है...”
नताशा ने खुद को कमरे में कैद करने के बजाय लाइब्रेरी जाने का फैसला किया। उसने सोचा कि अगर वह खुद को काम में व्यस्त रखेगी, तो उसके दिमाग में ये डरावने खयाल आने बंद हो जाएंगे। लेकिन जैसे ही उसने लाइब्रेरी के भारी ओक दरवाज़े को धकेला, उसे अहसास हुआ कि हवेली अब पहले जैसी सामान्य नहीं रह गई थी।
लाइब्रेरी के छिपे हुए कोने और नए भ्रम
लाइब्रेरी के भीतर का तापमान बाहर के मुकाबले काफी कम था। हवा में सूखी हुई पुरानी किताबों की गंध के साथ-साथ अब गुलाब की सड़ी हुई पंखुड़ियों की महक भी घुल चुकी थी। नताशा ने अपनी मेज़ पर बैठकर उन पुरानी पांडुलिपियों को खंगालना शुरू किया जिनका अनुवाद उसे व्लाद के लिए करना था।
लेकिन जैसे ही उसने पन्ने पलटे, उसे अपने ही हाथों की लिखावट में कुछ ऐसे वाक्य लिखे हुए मिले जिन्हें उसने कभी लिखा ही नहीं था।
"मैं जाग रही हूँ या सो रही हूँ? यह हवेली मुझे खा रही है... या मैं खुद इस हवेली का हिस्सा बन रही हूँ?"
नताशा ने काँपते हाथों से उस पन्ने को फाड़ना चाहा, लेकिन जैसे ही उसने ज़ोर लगाया, उसकी उंगलियों से खून की एक हल्की सी बूंद उस कागज़ पर टपक पड़ी। उस बूंद के गिरते ही कागज़ की वे पंक्तियाँ अपने आप गायब हो गईं और उनकी जगह लैटिन में कुछ नए शब्द उभर आए।
तभी, लाइब्रेरी की सबसे दूर वाली अलमारी के पीछे से किसी के पाँव की धीमी आहट सुनाई दी।
"कौन है वहाँ?" नताशा ने अपनी काँपती हुई आवाज़ में पूछा, जबकि उसने हाथ में एक भारी मेटल का पेपरवेट उठा लिया था।
कोई जवाब नहीं मिला। केवल ठंडी हवा का एक झोंका आया जिससे लाइब्रेरी में रखे तमाम दीये एक साथ बुझ गए। कमरा गहरे अँधेरे में डूब गया। केवल एक कोने से आती मद्धम चाँदनी की रोशनी ही एकमात्र सहारा थी।
व्लाद का प्रकटन और उसकी व्यथा
अंधेरे के उस गाढ़े आवरण के बीच से व्लाद की लंबी और गहरी काया धीरे-धीरे आगे आई। उसके चेहरे पर न तो कोई क्रूरता थी और न ही वह खौफनाक चमक जो ब्लड मून की रात को दिखी थी। आज उसका चेहरा बेहद शांत, थका हुआ और किसी गहरी उदासी से भरा हुआ लग रहा था। उसने अपना लंबा काला कोट उतार रखा था और केवल एक सफेद शर्ट में था, जिससे उसकी अस्वाभाविक रूप से सफेद त्वचा और अधिक स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
व्लाद ने नताशा से कुछ कदमों की दूरी पर आकर खुद को रोक लिया। उसकी आँखें गहरी और भावुक थीं।
"डरती क्यों हो, नताशा?" व्लाद की आवाज़ में इस बार वह भारीपन नहीं, बल्कि एक अजीब सा दर्द था जो सीधे दिल को चीर रहा था। "मैं तुम्हें नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं आया हूँ।"
नताशा ने पेपरवेट को कसकर पकड़ रखा था। उसने गुस्से और डर के मिले-जुले स्वर में कहा, "नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं? तुमने मेरी पूरी दुनिया को एक भ्रम में बदल दिया है! मैं क्या सोच रही हूँ, क्या देख रही हूँ—यह मेरा अपना दिमाग तय नहीं कर पा रहा है! यह सब तुम्हारी वजह से है, व्लाद!"
व्लाद ने एक लंबी और ठंडी साँस ली। उसने बहुत धीमी गति से अपना एक हाथ आगे बढ़ाया, लेकिन नताशा के करीब नहीं आया।
"यह हवेली... और यह अभिशाप... ये सिर्फ मेरे अकेलेपन की सजा नहीं हैं, नताशा," व्लाद ने अपनी आँखें झुकाते हुए कहा। "जब इंसानों ने तीन सौ साल पहले नतालिया को मुझसे छीना था, तब उन्होंने सिर्फ एक जान नहीं ली थी; उन्होंने मेरी रूह के उस हिस्से को मार डाला था जो इंसान हुआ करता था। तब से लेकर आज तक, हर सौ साल बाद जब मैं किसी को देखता हूँ जो उसकी तरह दिखता है, मुझे लगता है कि शायद मेरा अधूरा अध्याय पूरा होने वाला है।"
व्लाद की इन बातों ने नताशा के गुस्से को थोड़ा शांत कर दिया। उसके भीतर का वह तार्किक और संवेदनशील मन पिघलने लगा। उसने व्लाद की आँखों में उस अमरता का बोझ देखा—एक ऐसा दर्द जो सदियों से बिना थके जी रहा था।
"लेकिन मैं वह औरत नहीं हूँ, व्लाद," नताशा की आवाज़ थोड़ी नरम पड़ी, उसके हाथ से पेपरवेट धीरे से मेज़ पर फिसल गया। "मैं नताशा हूँ। मेरी अपनी ज़िंदगी है, मेरे अपने सपने हैं। मैं किसी के अतीत की परछाई बनकर नहीं जीना चाहती।"
व्लाद ने नताशा की तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक फीकी, दर्दभरी मुस्कान उभर आई।
"शुरुआत में मुझे भी यही लगा था कि तुम सिर्फ एक अक्स हो," व्लाद ने धीरे-धीरे नताशा के करीब एक कदम बढ़ाया। इस बार उसकी उपस्थिति से वह बर्फीली ठंडक नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। "लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, मैं देख रहा हूँ कि तुम उस अक्स से कहीं ज्यादा मजबूत हो। तुम इस अंधेरे को चुनौती दे रही हो। और शायद... शायद यही वजह है कि मैं तुम्हें हर दिन और ज्यादा चाहने लगा हूँ।"
धुंधलाता दायरा और नया मोड़
नताशा के दिल की धड़कनें तेज हो गईं। व्लाद के ये शब्द—"मैं तुम्हें हर दिन और ज्यादा चाहने लगा हूँ"—उसके दिल के किसी कोने को छू गए। वह जो अब तक इस हवेली को एक जेल मान रही थी, अचानक उसे एक ऐसे इंसान का घर लगने लगी जो प्यार के लिए सदियों से तरस रहा था।
लेकिन तभी, कमरे की दीवार पर टंगी एक पुरानी घड़ी ने अजीब सी घरघराहट के साथ शाम के छह बजाए।
घड़ी की सुइयों के टिक-टिक करते ही कमरे का माहौल एक बार फिर बदलने लगा। दीवारों पर जो परछाइयाँ शांत थीं, वे अचानक हिलने लगीं। बाहर ओकवुड घाटी के कोहरे में किसी के चीखने की बहुत दूर से एक भयानक आवाज़ गूँजी।
व्लाद का चेहरा अचानक सख्त हो गया। उसने नताशा की तरफ देखा और कहा, "वक्त आ गया है, नताशा। इस हवेली के बाहरी पहरेदार जाग रहे हैं। जो लोग नहीं चाहते कि हमारा चक्र पूरा हो, वे अब सक्रिय हो चुके हैं।"
"कौन? कौन नहीं चाहता?" नताशा ने चौंककर पूछा।
इससे पहले कि व्लाद कोई जवाब देता, लाइब्रेरी के मुख्य दरवाज़े पर किसी ने बाहर से बहुत ज़ोरदार धक्का दिया।
धड़! धड़! धड़!
बाहर कोई था—कोई ऐसा जो हवेली के इस गुप्त और खौफनाक दायरे में जबरन घुसपैठ करने की कोशिश कर रहा था। व्लाद की आँखें गुस्से से लाल हो उठीं। उसने नताशा को अपने पीछे सुरक्षित करते हुए कहा, "लगता है ओकवुड का वह पुराना साया अब इस हवेली की देहरी तक पहुँच चुका है..."
क्रमशः
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- मि. वैम्पायर वांट मी एवरी डे
- Chapter
- 9 of 30
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 7 min
- Words
- 1335
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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