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भाग 4: चाँदनी रात की परछाइयाँ और चमगादड़ का पहरा

Yogesh Kumar Maurya · Haunted Places · 9 मिनट

लाइब्रेरी की विशाल हवाविहीन दीवारों के बीच सन्नाटा अचानक और अधिक भारी हो गया था। नताशा के हाथों से वह सूखा हुआ पीला पन्ना छूटकर फर्श पर गिरा और उसकी उंगलियाँ काँपने लगीं। 'व्लाद कोई मालिक नहीं, एक अभिशप्त शैतान है... उसकी अगली बलि वही स्त्री होगी जिसकी शक्ल उसकी खोई हुई प्रेमिका नतालिया से मिलती होगी...' ये पंक्तियाँ नताशा के दिमाग में किसी गर्म लोहे की छड़ की तरह छप चुकी थीं। 
वह फुसफुसाती हुई आवाज़ जो अभी-अभी उसके कानों के पास गूँजी थी—"तुम्हें वह पन्ना नहीं पढ़ना चाहिए था, नताशा..."—वह हवा में विलीन हो चुकी थी, लेकिन उसकी गूँज नताशा की रीढ़ में बर्फानी सिहरन पैदा कर रही थी। 
नताशा ने हिम्मत जुटाकर नीचे गिरे पन्ने को उठाया और उसे अपनी जैकेट की अंदरूनी जेब में छुपा लिया। उसने मेज़ पर रखी विशाल किताब 'क्रोनिकल्स ऑफ ब्लैकवुड' को तुरंत बंद किया और गहरी साँस ली। उसका हर एक अंतर्मन चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि उसे इसी वक्त इस खौफनाक हवेली को छोड़कर भाग जाना चाहिए। लेकिन भागना इतना आसान नहीं था। ओकवुड घाटी चारों तरफ से घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों से घिरी थी, और शाम ढलते ही वहाँ का कोहरा इतना घना हो जाता था कि रास्ता तलाशना नामुमकिन था। 
नताशा धीरे-धीरे लाइब्रेरी के भारी ओक दरवाज़े की ओर बढ़ी। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, गलियारे की ठंडी हवा उसके चेहरे से टकराई। हवेली में अजीब सी खामोशी छाई हुई थी—ऐसी खामोशी जो किसी तूफान के आने से पहले होती है। 
वह अपने कमरे की तरफ भागी और दरवाज़ा अंदर से बंद करके कुंडी चढ़ा ली। उसने अपना सूटकेस बिस्तर पर रखा और अपने कपड़े, पासपोर्ट तथा ज़रूरी दस्तावेज़ उसमें ठूँसने लगी। उसे अब इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि उसका अनुबंध पूरा हुआ या नहीं; उसकी जान सबसे पहले थी। 
सूटकेस पैक करने के बाद नताशा ने खिड़की के पर्दे को थोड़ा हटाकर बाहर देखा। सूरज ढलने में अभी कुछ ही देर बाकी थी, लेकिन आसमान में काले और गहरे लाल बादलों का जमावड़ा शुरू हो चुका था। ओकवुड घाटी की ऊँची पहाड़ियों से नीचे उतरता हुआ धुंधला कोहरा धीरे-धीरे हवेली के बागीचे को अपनी आगोश में ले रहा था। 
अचानक, हवेली के मुख्य फाटक (Main Gate) की तरफ नताशा की नज़र गई। लोहे का विशाल गेट कसकर बंद था, और उस पर भारी लोहे की जंजीरें लिपटी हुई थीं। वहाँ कोई गाड़ी या सवारी का साधन नहीं था। अगर वह पैदल भी भागने की कोशिश करती, तो जंगल के रस्ते में रात के अँधेरे में भटक कर अपनी जान गँवा बैठती। 
"मुझे सुबह का इंतज़ार करना होगा," उसने खुद से फुसफुसाकर कहा। "सुबह जैसे ही सूरज निकलेगा, मैं इस हवेली से बाहर निकलने का कोई रास्ता ढूँढ लूँगी।" 
जैसे-जैसे रात गहराती गई, हवेली का माहौल और अधिक भयावह होता गया। आसमान में पूर्ण चंद्र (Full Moon) अपनी पूरी चमक के साथ उभर आया, लेकिन उसकी रोशनी में एक अजीब सी खूनी रंगत थी—जिसे ओकवुड के लोग 'ब्लड मून' कहते थे। 
रात के ठीक दस बजे, नताशा अपने कमरे में मोमबत्ती की रोशनी में बैठी थी। उसने कमरे की अंगीठी (Fireplace) में और लकड़ियाँ डाल दी थीं ताकि रोशनी और गरमाहट बनी रहे। लेकिन कमरे का तापमान लगातार गिरता जा रहा था। 
तभी बाहर बागीचे से एक अजीब सी ध्वनि आनी शुरू हुई। यह सैकड़ों पंखों के फड़फड़ाने की आवाज़ थी—जैसे चमगादड़ों का कोई विशाल झुंड हवेली के चारों तरफ चक्कर काट रहा हो। 
नताशा दबे पाँव खिड़की के पास पहुँची और पर्दा हटाया। 
जो नज़ारा उसने देखा, उससे उसकी साँसें थम गईं।
हवेली के ऊपर आसमान में हज़ारों की संख्या में काले चमगादड़ गोल-गोल घूम रहे थे। वे एक खौफनाक बवंडर जैसा बना रहे थे। और उस बवंडर के बीचों-बीच, बागीचे के संगमरमर के फव्वारे के ऊपर, व्लाद वोल्कोव खड़ा था। 
व्लाद ने अपने दोनों हाथ हवा में फैला रखे थे। उसका काला कोट हवा में किसी फन फैलाए नाग की तरह लहरा रहा था। चाँद की खूनी रोशनी सीधे उसके सफेद चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी आँखें अंधेरे में अंगारे की तरह लाल धधक रही थीं। 
अचानक, व्लाद ने अपनी गर्दन उठाई और सीधे नताशा की खिड़की की ओर देखा। 
इतनी दूरी होने के बावजूद, नताशा को ऐसा लगा मानो व्लाद उसके ठीक सामने खड़ा हो। व्लाद के होठों पर एक क्रूर, सम्मोहक मुस्कान उभरी। उसने अपना हाथ हवा में उठाया और उँगली से नताशा की तरफ इशारा किया—मानो कह रहा हो कि तुम कहीं नहीं जा सकतीं।
उसी पल, चमगादड़ों का पूरा झुंड एक साथ नताशा की खिड़की की तरफ झपटा!
"आह!" नताशा चीख पड़ी और पीछे हटकर ज़मीन पर गिर पड़ी।
सैकड़ों चमगादड़ खिड़की के काँच से आकर टकराने लगे—टक! टक! खड़-खड़!
वे अपने तीखे पंजे और दाँत शीशे पर मार रहे थे। शीशा टूटने की कगार पर था। उनके खौफनाक पंखों की आवाज़ और तीखी चीखें पूरे कमरे में गूँजने लगीं। वे खिड़की के बाहर इस तरह पहरा दे रहे थे मानो नताशा को एक जेल में कैद कर दिया गया हो। 
नताशा घिसटती हुई पीछे कमरे के कोने में चली गई और अपने दोनों हाथों से कानों को ढक लिया। उसका दिल इतनी तेज़ गति से धड़क रहा था कि उसे लगा वह अभी फट जाएगा।
तभी कमरे के मुख्य दरवाज़े पर भारी थपकी पड़ी।
खट... खट... खट...
कोई बहुत ही धीरे और सधे हुए अंदाज़ में दरवाज़ा खटखटा रहा था।
"नताशा..." दरवाज़े के पार से व्लाद की शांत, मखमली और गूँजती हुई आवाज़ आई। "दरवाज़ा खोलो, नताशा। रात बहुत ठंडी है और बाहर के साए बहुत भूखे हैं।" 
नताशा ने दरवाज़े की तरफ देखा, उसकी आँखें खौफ से फटी की फटी थीं। "दूर रहो मुझसे! मुझे पता चल चुका है तुम क्या हो! तुम एक राक्षस हो!"
दरवाज़े के पार एक मद्धम, गहरी हँसी गूँजी। वह हँसी इंसान की नहीं थी—उसमें सदियों पुराना दर्द, क्रूरता और एक अजीब सा एकाकीपन छुपा था।
"राक्षस?" व्लाद ने कहा, उसकी आवाज़ अब दरवाज़े की लकड़ी को चीरकर सीधे नताशा के दिमाग के अंदर गूँज रही थी। "इंसानों ने हमेशा उस चीज़ को राक्षस कहा है जिसे वे समझ नहीं पाते। अमरता कोई वरदान नहीं है, नताशा... यह एक अभिशाप है। और इस अभिशाप को भुगतते हुए मुझे सदियाँ बीत चुकी हैं। लेकिन जब तुम यहाँ आईं..."
व्लाद रुका। दरवाज़े के निचले हिस्से से फिर वही काला, गाढ़ा धुआँ अंदर रिसने लगा। 
"...जब तुम यहाँ आईं, तो मेरे इस ठंडे, बेजान दिल ने सदियों बाद फिर से धड़कना महसूस किया। तुम्हारी रगों में बहता खून... तुम्हारी साँसों की महक... यह सब मुझे नतालिया की याद दिलाता है। तुम वही हो, नताशा। तुम मेरी नतालिया का पुनर्जन्म हो!"
"मैं नतालिया नहीं हूँ!" नताशा चीखी, अपनी आँखों से बहते आँसुओं को पोंछते हुए। "मैं नताशा हूँ! एक इंसानी औरत! मेरा तुमसे कोई लेना-देना नहीं है!"
"तुम मानोगी... तुम हर दिन इसे स्वीकार करोगी," व्लाद की आवाज़ और करीब महसूस होने लगी, जैसे वह दरवाज़े के पार नहीं, बल्कि कमरे के अंदर ही खड़ा हो। "मैं तुम्हें हर दिन अपने पास देखना चाहता हूँ। तुम्हारे जिस्म और रूह पर मेरा हक है। तुम इस हवेली से कभी बाहर नहीं जा सकतीं। यह पहरा... ये चमगादड़... यह कोहरा... यह सब तुम्हें मुझसे दूर जाने से रोकने के लिए है।" 
अचानक दरवाज़े का ताला अपने आप घूमने लगा!
कड़क... कड़क...
नताशा की साँसें अटक गईं। उसने देखा कि भारी ओक का दरवाज़ा धीरे-धीरे अपने आप खुल रहा था।
दरवाज़े के फ्रेम में व्लाद खड़ा था। उसकी कद-काठी अँधेरे में और विशाल लग रही थी। उसकी आँखें पूरी तरह लाल थीं और उसके मुँह से बाहर निकले तीखे नुकीले कैनाइन दाँत सफ़ेद चाँदनी में चमक रहे थे। 
उसने कमरे के अंदर कदम रखा। उसके हर कदम के साथ कमरे में एक बर्फीली हवा की लहर फैल रही थी। 
नताशा पीछे की तरफ दीवार से जा सटी। उसके पास भागने का कोई रास्ता नहीं बचा था।
व्लाद धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा। उसने नताशा के काँपते हुए चेहरे को देखा और अपना ठंडा हाथ बढ़ाकर उसकी ठुड्डी को ऊपर उठाया। उसकी उंगलियों का स्पर्श इतना ठंडा था कि नताशा की त्वचा जमने लगी। 
"डरो मत," व्लाद ने बहुत कोमलता से कहा, हालाँकि उसकी आँखों में एक भूखे दरिंदे की चमक थी। "मैं तुम्हें एक झटके में खत्म नहीं करूँगा। तुम मेरे लिए बहुत कीमती हो। मैं तुम्हें हर दिन थोड़ा-थोड़ा अपना बनाऊँगा... जब तक कि तुम्हारी नसों में मेरा खून न बहने लगे।"
उसने अपना मुँह नताशा की गर्दन के करीब लाया। उसकी ठंडी साँसें नताशा की गर्दन की त्वचा पर पड़ रही थीं। नताशा ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और ईश्वर को याद करने लगी।
तभी, कमरे की अंगीठी में जल रही आग अचानक भड़क उठी और उसमें से एक तेज़ पीली-लाल लपट उठी!
उसी पल, हवेली के दूर स्थित टॉवर की पुरानी घड़ी ने रात के बारह बजाए—टंग... टंग... टंग...
घड़ी की हर एक गूँज के साथ व्लाद के चेहरे पर एक तड़प और दर्द के भाव उभर आए। उसने झटके से नताशा को छोड़ दिया और पीछे हट गया। उसने अपनी दोनों हथेलियों से अपना सिर पकड़ लिया।
"नहीं... अभी नहीं..." व्लाद घुरराया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लाचारी थी।
ऐसा लगा जैसे आधी रात का यह समय उसके लिए कोई रुकावट या पाबंदी लेकर आया हो। व्लाद ने नताशा की तरफ एक आख़िरी बार देखा, उसकी लाल आँखें धीरे-धीरे फिर से गहरे भूरे रंग में बदलने लगीं।
"आज की रात तुम बच गई, नताशा," व्लाद ने अपनी भारी साँसों के बीच कहा। "लेकिन याद रखना... सूर्योदय तक ही तुम्हारी आज़ादी है। जैसे ही सूरज ढलेगा, तुम फिर से मेरी होगी। मि. वैम्पायर वांट्स यू एवरी डे..."
यह कहते ही व्लाद मुड़ा और काले धुएँ के गुबार में तब्दील होकर खुले दरवाज़े से बाहर निकल गया।
जैसे ही वह गया, खिड़की पर मंडराते चमगादड़ भी चीखते हुए अँधेरे आसमान में उड़ गए। कमरे का माहौल शांत हो गया, लेकिन नताशा ज़मीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।
उसे अब पूरी तरह अहसास हो चुका था कि वह एक ऐसे जाल में फँस चुकी है जहाँ मौत हर दिन उसका इंतज़ार कर रही थी। लेकिन उस रात उसने एक बात और नोट की थी—अंगीठी की आग का भड़कना और रात के बारह बजे की गूँज व्लाद को कमजोर कर रही थी।
क्या यह व्लाद की एकमात्र कमजोरी थी? क्या नताशा इस रहस्य का इस्तेमाल करके खुद को बचा सकती थी?
सुबह की पहली किरण का इंतज़ार करते हुए नताशा ने मन ही मन कसम खाई कि वह हार नहीं मानेगी। वह इस अमर शैतान के इतिहास को खंगालेगी और उसके इस अभिशाप का अंत ढूँढकर ही रहेगी।
क्रमशः

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
मि. वैम्पायर वांट मी एवरी डे
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4 of 30
Category
Haunted Places
Reading time
9 min
Words
1726
Language
Hindi (हिंदी)
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