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भाग 3: पुस्तकालय के छुपे हुए रहस्य और प्राचीन किताबें
Yogesh Kumar Maurya · Haunted Places · 9 मिनट
सुबह की हल्की पीली धूप जब ओकवुड घाटी के घने कोहरे को चीरती हुई कमरे में पहुँची, तब कहीं जाकर नताशा ने अपनी आँखों पर जमी खौफ की चादर को थोड़ा हटाया। रात के भयानक हादसों के बाद उसका शरीर थकान से टूट रहा था, लेकिन उसका मन किसी भी हाल में हार मानने को तैयार नहीं था। उस खिड़की पर टकराता चमगादड़, ज़मीन पर रेंगता वह रहस्यमयी काला धुआँ और व्लाद की बर्फानी ठंडी आँखें—ये सब कोई सपना नहीं था।
दीवार पर लगी घड़ी में ठीक पौने आठ बज चुके थे। नताशा ने अपने कपड़े बदले, ठंडे पानी से मुँह धोया और मन ही मन खुद को मजबूत किया। उसे याद था व्लाद का सख्त हुक्म—सुबह आठ बजे से पहले लाइब्रेरी में कदम मत रखना!
जैसे ही घड़ी ने सुबह के आठ बजाए, नताशा ने अपने कमरे का भारी दरवाज़ा खोला और बाहर गलियारे में निकली।
दिन की रोशनी में हवेली का वह गलियारा रात जितना खौफनाक तो नहीं लग रहा था, लेकिन उसकी दीवारों में बसी उदासी और वीरानापन अब भी बरकरार था। नताशा चुपचाप 300 साल पुरानी उस तैल चित्र (Oil Painting) के सामने से गुज़री। दिन के उजाले में भी उस पेंटिंग में खड़ी महिला की आँखें दुखी लग रही थीं और व्लाद का चेहरा वैसा ही जीवंत, मानों वह कैनवास से बाहर निकलकर अभी सांस लेने लगेगा।
नताशा सीढ़ियों से नीचे उतरकर मुख्य हॉल में पहुँची और हवेली के पश्चिमी हिस्से की तरफ बढ़ी, जहाँ विशाल 'ग्रैंड लाइब्रेरी' स्थित थी।
पुस्तकालय का मुख्य दरवाज़ा ओक की भारी लकड़ी से बना था, जिस पर बारीक नक्काशी की गई थी। नताशा ने जैसे ही दरवाज़े के पीतल के हैंडल को छुआ, दरवाज़ा बिना किसी आवाज़ के अंदर की तरफ खुल गया—मानो वह उसका इंतज़ार ही कर रहा हो।
अंदर का नज़ारा किसी भी इतिहासकार या पुस्तक प्रेमी के लिए एक जादुई दुनिया जैसा था, लेकिन उसमें एक गहरा रहस्यमयी सन्नाटा समाया हुआ था।
लाइब्रेरी का कमरा दो मंजिला था, जिसकी छत बेहद ऊँची थी। चारों तरफ नक्काशीदार सागौन की विशाल अलमारियाँ लगी थीं जो छत तक पहुँचती थीं। उन अलमारियों में हज़ारों की संख्या में प्राचीन, चमड़े की जिल्द वाली किताबें, पांडुलिपियाँ और ऐतिहासिक दस्तावेज़ सजे हुए थे। बीचों-बीच एक विशाल लकड़ी की मेज़ रखी थी जिस पर एक पीतल का बड़ा सा लैंप, सुलेख (Calligraphy) के लिए इस्तेमाल होने वाले पंख और रोशनाई की दवात रखी थी। कमरे के एक कोने में घुमावदार लोहे की सीढ़ियाँ थीं जो ऊपरी मंज़िल की बाल्कनीनुमा गैलरी तक जाती थीं।
लेकिन इस भव्यता के बीच एक बात बहुत अजीब थी—इतनी विशाल लाइब्रेरी में एक भी खिड़की ऐसी नहीं थी जो सीधे बाहर खुलती हो। सारी खिड़कियाँ रंगीन काँच (Stained Glass) की थीं, जिनसे रोशनी तो अंदर आती थी, लेकिन सूरज की सीधी किरणें कहीं भी फर्श पर नहीं पड़ती थीं। पूरा कमरा एक सुनहरी-धुंधली रोशनी में नहाया हुआ था।
"यह मेरी दुनिया है, नताशा," अचानक एक मखमली और भारी आवाज़ गूँजी।
नताशा झटके से मुड़ी। व्लाद लाइब्रेरी के एक अंधेरे कोने में बनी महोगनी की मेज़ के पास खड़ा था। उसने आज भी काले रंग का सिल्क सूट पहन रखा था। दिन की रोशनी में उसका चेहरा और भी ज्यादा सफेद और संगमरमर की तरह बेदाग लग रहा था। उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, लेकिन उसकी लाल रंगत वाली पुतलियों में एक असीम ताकत झलक रही थी।
"मि. वोल्कोव... आप यहाँ पहले से थे?" नताशा ने अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए पूछा।
"मैं हमेशा यहीं होता हूँ," व्लाद ने धीमी मुस्कान के साथ कहा, जिससे उसके नुकीले कैनाइन दाँत फिर से एक पल के लिए चमके। "किताबें झूठ नहीं बोलतीं, नताशा। ये बीते हुए सदियों के उस इतिहास की गवाह हैं जिसे इंसान भूल चुका है। और मेरा मानना है कि तुम पुरानी किताबों की भाषा बहुत अच्छी तरह समझती हो।"
नताशा ने मेज़ पर रखे दस्तावेज़ों की तरफ देखा। "जी, मेरा काम यही है। लेकिन मुझे यह जानना है कि आप मुझसे इस संग्रह में से क्या व्यवस्थित करवाना चाहते हैं?"
व्लाद चलने लगा। उसके कदम फिर से फर्श पर बिना कोई आवाज़ किए पड़ रहे थे। वह नताशा के बिल्कुल करीब आ गया। नताशा को फिर से वही बर्फीली ठंडक महसूस हुई, जो व्लाद के वजूद का हिस्सा थी।
"यह पूरी लाइब्रेरी तीन हिस्सों में बँटी है," व्लाद ने अपनी पतली उंगलियों से किताबों की ओर इशारा करते हुए कहा। "पहला हिस्सा सामान्य इतिहास का है। दूसरा हिस्सा इस ओकवुड घाटी और मेरे परिवार, यानी वोल्कोव खानदान के इतिहास का है। और तीसरा हिस्सा..." व्लाद रुका, उसकी आवाज़ और गहरी हो गई, "...तीसरा हिस्सा उन किताबों का है जिन्हें पढ़ना हर किसी के बस की बात नहीं है। वे तांत्रिक ग्रंथों, अमरता के अनुष्ठानों और प्राचीन श्रापों से भरी हैं।"
नताशा की नसों में सिहरन दौड़ गई। उसने व्लाद की आँखों में देखते हुए सीधे पूछा, "और आप चाहते हैं कि मैं उन किताबों को भी सहेजूँ?"
"तुम केवल वही सहेजोगी जो तुम्हें दिखाया जाएगा," व्लाद ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा। "तुम्हारा मुख्य काम 16वीं और 17वीं सदी के डायरियों और पांडुलिपियों की सूची (Cataloging) तैयार करना है। विशेष रूप से... इस अलमारी में रखी किताबों की।"
व्लाद उसे लोहे की घुमावदार सीढ़ियों से ऊपर बनी गैलरी में ले गया। वहाँ एक भारी लोहे का जालीदार दरवाज़ा था, जिस पर एक प्राचीन ताला लगा हुआ था। व्लाद ने अपनी जेब से एक अजीब सी काले पत्थर की चाबी निकाली और ताला खोल दिया।
अंदर की अलमारी में धूल जमी हुई थी, लेकिन वहाँ रखी किताबें बेहद अजीब थीं। उनकी जिल्द इंसानी चमड़े जैसी महसूस होती थी और उन पर लैटिन तथा अज्ञात प्राचीन भाषाओं में सुनहरे अक्षरों से लिखा गया था।
"इनमें से सबसे मुख्य पांडुलिपि 'क्रोनिकल्स ऑफ ब्लैकवुड' है," व्लाद ने एक भारी, काली किताब की तरफ इशारा करते हुए कहा। "तुम्हें हर दिन इस किताब के कुछ पन्नों का अनुवाद करना होगा और मुझे उसकी रिपोर्ट देनी होगी। लेकिन एक बात याद रखना, नताशा..."
व्लाद ने नताशा के कंधे पर अपना हाथ रखा। उसकी उंगलियों का स्पर्श बर्फ जैसा ठंडा था, जिसने नताशा के शरीर में एक कंपकंपी पैदा कर दी।
"...इस लाइब्रेरी में कुछ पन्ने ऐसे हैं जो खो गए हैं, और कुछ ऐसे हैं जो छुपा दिए गए हैं। अगर तुम्हें कोई ऐसा पन्ना मिले जिस पर कोई खूनी निशान या लाल मुहर हो, तो उसे पढ़ने की कोशिश मत करना। उसे सीधे मुझे सौंप देना। अगर तुमने मेरी इस हिदायत को नज़रअंदाज़ किया, तो मैं तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता।"
"सुरक्षा? किससे सुरक्षा, मि. वोल्कोव?" नताशा ने हिम्मत जुटाकर पूछा। "रात को जो मेरी खिड़की पर था, उससे? या फिर इस हवेली में घूमती उन अनजानी परछाइयों से?"
व्लाद की आँखें अचानक कस गईं। उसने नताशा के करीब आकर कहा, उसकी साँसें ठंडी थीं, "रात को जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक चेतावनी थी, नताशा। यह हवेली बाहरी दुनिया के लोगों को आसानी से स्वीकार नहीं करती। लेकिन तुम... तुम अलग हो। तुम यहाँ अपनी मर्ज़ी से नहीं आई हो, तुम्हें यहाँ नियति खींचकर लाई है।"
यह कहकर व्लाद मुड़ा और सीढ़ियाँ उतरकर नीचे चला गया। जाते-जाते उसने कहा, "तुम्हारा नाश्ता मेज़ पर रखा है। शाम पाँच बजे तक मैं बाहर रहूँगा। तब तक तुम अपना काम शुरू कर सकती हो।"
व्लाद के जाने के बाद नताशा ने राहत की गहरी साँस ली। वह गैलरी के उस लोहे वाले कमरे में अकेली खड़ी थी।
नताशा ने हिचकिचाते हुए 'क्रोनिकल्स ऑफ ब्लैकवुड' नाम की उस भारी किताब को उठाया। किताब बहुत वजनी थी और उससे एक अजीब सी सड़ी हुई महक और पुरानी धूल की गंध आ रही थी। उसने किताब को लाकर नीचे बड़ी मेज़ पर रखा।
जैसे ही नताशा ने किताब का पहला पन्ना पलटा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
किताब के पहले ही पन्ने पर हाथ से बनाई गई एक तस्वीर थी। वह तस्वीर किसी और की नहीं, बल्कि नताशा की खुद की थी! तस्वीर में वह वही कपड़े पहने हुए थी जो उसने आज पहन रखे थे। और तस्वीर के नीचे लैटिन भाषा में लिखा था:
"शकुन पूरा हुआ। अमरता की प्यास बुझाने के लिए वह वापस आ चुकी है।"
नताशा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। हाथों में कपकपी छूटने लगी। यह कैसे संभव हो सकता था? यह किताब सैकड़ों साल पुरानी थी, फिर इसमें उसकी आज की तस्वीर और उसके बारे में यह भविष्यवाणी कैसे लिखी हो सकती थी?
क्या व्लाद ने यह सब उसे डराने के लिए खुद किया था? या फिर सचमुच कोई ऐसी शक्ति थी जो सदियों से उसका इंतज़ार कर रही थी?
नताशा ने पन्ने पलटना शुरू किया। हर पन्ने पर ब्लैकवुड मैनर के इतिहास, खूनी युद्धों और एक ऐसे प्राणी का ज़िक्र था जो कभी नहीं मरता—एक ऐसा जीव जो इंसानी खून पर जीवित रहता था और जिसे ओकवुड घाटी के लोग 'व्लाद द इमॉर्टल' (अमर व्लाद) कहते थे।
जैसे-जैसे नताशा पन्ने पलटती गई, उसे समझ आने लगा कि व्लाद कोई इंसान नहीं, बल्कि एक सदियों पुराना वैम्पायर है। और वह हवेली में केवल किताबों का रखरखाव कराने के लिए उसे नहीं लाया था, बल्कि उसके पीछे कोई बहुत गहरा और भयानक मकसद था।
अचानक, किताब के बीच से एक छोटा सा मुड़ा हुआ पन्ना नीचे गिर पड़ा।
नताशा ने झुककर उस पन्ने को उठाया। वह पन्ना बाकी पन्नों से अलग था। उस पर लाल रोशनाई—या शायद सूख चुके खून—से एक पत्र लिखा गया था। पत्र की लिखावट बहुत पुरानी थी, लेकिन उसकी भाषा हिंदी-संस्कृत मिश्रित थी।
पत्र में लिखा था:
"जो कोई भी इस पत्र को पढ़ रहा है, तुरंत इस हवेली से भाग जाओ! व्लाद कोई मालिक नहीं, एक अभिशप्त शैतान है। वह हर सौ साल में एक बलि ढूंढता है ताकि अपनी अमरता के श्राप को ताज़ा कर सके। उसकी अगली बलि वही स्त्री होगी जिसकी शक्ल उसकी खोई हुई प्रेमिका 'नतालिया' से मिलती होगी। अगर तुम वही हो... तो तुम्हारी जान खतरे में है। वह तुम्हें हर दिन अपने पास रखेगा, जब तक कि तुम्हारा पूरा खून उसका न हो जाए..."
नताशा के हाथ से वह पन्ना छूटकर फर्श पर गिर गया।
"नतालिया?" नताशा ने थरथराते होंठों से कहा।
तभी पूरी लाइब्रेरी में एक ज़ोरदार हवा का झोंका आया, जिससे सारी अलमारियों के दरवाज़े एक साथ खड़खड़ाने लगे। बंद खिड़कियों के बावजूद काँच के शीशे थरथराने लगे।
और ठीक उसी वक्त, नताशा को अपने कानों के बिल्कुल पास व्लाद की वही ठंडी, फुसफुसाती हुई आवाज़ सुनाई दी—हालाँकि कमरे में कोई मौजूद नहीं था:
"तुम्हें वह पन्ना नहीं पढ़ना चाहिए था, नताशा..."
क्रमशः
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- मि. वैम्पायर वांट मी एवरी डे
- Chapter
- 3 of 30
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 9 min
- Words
- 1713
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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