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भाग 2: रहस्यमय मालिक: व्लाद वोल्कोव से पहली मुलाकात

Yogesh Kumar Maurya · Haunted Places · 10 मिनट

ब्लैकवुड मैनर के उस विशाल, संगमरमर से बने हॉल में छाई खामोशी इतनी गहरी थी कि नताशा को अपनी खुद की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बजती हुई सुनाई दे रही थीं। सामने सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर खड़ा व्लाद वोल्कोव किसी प्राचीन किंवदंती का हिस्सा लग रहा था—सख्त, निर्दयी, लेकिन एक सम्मोहक सुंदरता से भरा हुआ। 
उसके लंबे काले कोट के पल्ले हवा की हल्की सी जुंबिश से हिल रहे थे, जबकि हवेली की तमाम खिड़कियाँ कसकर बंद थीं। नताशा ने मन ही मन खुद को समझाने की कोशिश की कि शायद यहाँ का पुराना वास्तुशिल्प ही ऐसा है जिससे हवा के अदृश्य झोंके अंदर तक आ जाते हैं। लेकिन तर्क का यह ढाँचा व्लाद की आँखों के सामने टिक नहीं पा रहा था। 
व्लाद ने धीमी गति से नताशा की ओर कदम बढ़ाया। उसकी चाल में एक अजीब सा लोच और खामोशी थी। ऐसा लग रहा था मानो वह फर्श पर चलने के बजाय हवा में तैर रहा हो। उसके जूतों की कोई आवाज़ संगमरमर पर नहीं गूँज रही थी। जब वह नताशा से महज तीन फीट की दूरी पर आकर रुका, तो नताशा को एक बर्फानी ठंडक का अहसास हुआ, मानो किसी ने उसके पास बर्फ की दीवार खड़ी कर दी हो। 
"तुम काफी निडर लगती हो, नताशा," व्लाद ने अपनी भारी और मखमली आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा कंपन था जो सीधे नताशा की नसों में उतरता हुआ महसूस हुआ। "शहर के ज्यादातर लोग इस घाटी की सीमा पार करने से पहले सौ बार सोचते हैं। जो आते भी हैं, वे सूरज ढलने से पहले ही वापस भाग जाने के बहाने तलाशने लगते हैं। लेकिन तुम यहाँ खड़ी हो... बिना किसी झिझक के।" 
नताशा ने अपने सूटकेस के हैंडल को कसकर पकड़ा और अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की पूरी कोशिश करते हुए कहा, "मैं यहाँ किसी अंधविश्वास या उड़ती हुई कहानियों से डरने नहीं आई हूँ, मि. वोल्कोव। मुझे ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और पुरानी पांडुलिपियों को सहेजने का काम दिया गया है। मेरे लिए यह हवेली एक अनमोल संग्रह से ज्यादा कुछ नहीं है।" 
व्लाद के होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान उभर आई। उसने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया। उसकी उंगलियां लंबी, पतली और अस्वाभाविक रूप से पीली थीं। उसकी उंगलियों के पोरों पर एक भारी चाँदी की अंगूठी चमक रही थी, जिस पर एक काले नाग की आकृति खुदी हुई थी। 
"तर्कशास्त्र... इंसान का सबसे बड़ा भ्रम," व्लाद ने नताशा से हाथ मिलाते हुए कहा। 
जैसे ही नताशा की त्वचा व्लाद के हाथ से छुई, उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके हाथ पर सूखी बर्फ रख दी हो। एक तीव्र सिहरन उसकी रीढ़ की हड्डी से होकर पूरे शरीर में फैल गई। नताशा ने झटके से अपना हाथ पीछे खींचना चाहा, लेकिन व्लाद की पकड़ भले ही हल्की दिख रही थी, पर वह लोहे जैसी मजबूत थी। एक पल के लिए दोनों की आँखें मिलीं। व्लाद की पुतलियों का रंग गहरे भूरे से बदलकर क्षण भर के लिए गहरा लाल हुआ और फिर सामान्य हो गया। 
नताशा का दिल जोर से धड़का। उसने पलकें झपकाईं—क्या यह सिर्फ उसकी थकावट का असर था? क्या रोशनी के फेर के कारण उसे ऐसा लगा? 
व्लाद ने धीरे से उसका हाथ छोड़ दिया और जैसे कुछ हुआ ही न हो, पलटा। "आओ, मैं तुम्हें तुम्हारा कमरा दिखा देता हूँ। सफर लंबा रहा होगा और कोहरे की घाटी में रातें बहुत जल्दी और खौफनाक तरीके से गहरा जाती हैं।" 
नताशा चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगी। वे हवेली की विशाल, घुमावदार सीढ़ियों को चढ़कर पहली मंजिल के पूर्वी हिस्से में पहुँचे। गलियारा लंबा और अँधेरा था। दीवारों पर मोमबत्तियों के बड़े-बड़े स्टैंड लगे थे, लेकिन उनमें से केवल कुछ ही जल रही थीं। हवा में पुराने विंटेज परफ्यूम, सूखी सूखी गुलाब की पत्तियों और एक अजीब सी धातु जैसी गंध—शायद खून की मद्धम गंध—का मिश्रण तैर रहा था। 
चलते-चलते नताशा की नज़र गलियारे में टंगी एक विशाल तैल चित्र (Oil Painting) पर पड़ी। यह पेंटिंग 18वीं सदी के दौर की लग रही थी। इसमें एक खूबसूरत रानी जैसी महिला खड़ी थी, जिसके चेहरे पर एक मासूम लेकिन उदास मुस्कान थी। लेकिन नताशा का ध्यान उस महिला से ज्यादा उसके बगल में खड़े पुरुष पर गया। 
नताशा के कदम वहीं ठिठक गए। उस पेंटिंग में जो व्यक्ति खड़ा था, वह कोई और नहीं बल्कि व्लाद वोल्कोव ही था! वही पहनावा, वही तीखे नैन-नक्श, और वही सम्मोहक आँखें। 
"यह... यह पेंटिंग कितनी पुरानी है?" नताशा के मुँह से अचानक निकल गया। 
व्लाद रुका और बिना पीछे मुड़े बोला, "लगभग तीन सौ साल पुरानी।" 
"लेकिन... इसमें जो व्यक्ति है... वह बिल्कुल आपकी तरह दिखता है!" नताशा ने अचरज और घबराहट के मिले-जुले स्वर में कहा। 
व्लाद धीरे से मुड़ा और पेंटिंग की तरफ देखने लगा। उसकी आँखों में एक गहरी, सदियों पुरानी उदासी तैर गई। "वह मेरे पूर्वज थे—काउंट व्लाद प्रथम। लोग कहते हैं कि वोल्कोव खानदान में चेहरे पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदलते नहीं हैं। हमारा खून अपने अतीत को बहुत कसकर थामे रखता है, नताशा।" 
नताशा ने पेंटिंग में बनी महिला को ध्यान से देखा। उसके गले में एक अजीबोगरीब लटकन वाला हार था। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ और पूछ पाती, व्लाद ने गलियारे के अंत में स्थित एक भारी ओक के दरवाजे की ओर इशारा किया। 
"यह तुम्हारा कमरा है। यहाँ तुम्हें ज़रूरत का हर सामान मिलेगा। रात के समय इस कमरे से बाहर निकलने की कोशिश मत करना।" व्लाद की आवाज़ अचानक सख्त और चेतावनी भरी हो गई। 
नताशा ने चौंक कर देखा, "क्यों? क्या रात में हवेली में कोई खतरा है?"
व्लाद उसकी तरफ बढ़ा, उसके चेहरे पर अब एक डरावनी गंभीरता थी। "ब्लैकवुड मैनर रात में जागता है, नताशा। पुरानी इमारतें रात में अपने इतिहास की साँसें लेती हैं। कुछ दरवाज़े ऐसे हैं जो बंद ही रहने चाहिए, और कुछ राहें ऐसी हैं जिन पर भटकना किसी नए मेहमान के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। सुबह आठ बजे से पहले लाइब्रेरी का रुख मत करना।" 
नताशा ने केवल सिर हिला दिया। व्लाद ने दरवाजे की बड़ी पीतल की चाबी उसे सौंपी और बिना एक भी शब्द कहे गलियारे के अँधेरे में गायब हो गया। वह इतनी तेज़ी और खामोशी से गया कि नताशा को लगा मानो वह हवा में ही विलीन हो गया हो। 
नताशा ने जल्दी से चाबी घुमाकर कमरे का ताला खोला और अंदर दाखिल होकर दरवाजा तुरंत अंदर से बंद कर लिया। 
कमरा काफी बड़ा और आलीशान था। एक विशाल चारपाई (Canopy Bed) जिस पर गहरे लाल मखमली पर्दे लटके थे, कमरे के बीचों-बीच रखी थी। एक तरफ बड़ी सी फायरप्लेस (अंगीठी) थी जहाँ लकड़ी के कुछ कुंदे सुलग रहे थे, जिससे कमरे में हल्की गरमाहट थी। खिड़की के पास एक बड़ी सी राइटिंग टेबल और महोगनी की अलमारी रखी थी। 
नताशा ने अपना सामान एक तरफ रखा और खिड़की के पास जाकर भारी पर्दों को हटाया। बाहर घाटी में कोहरा इतना घना हो चुका था कि कुछ ही दूरी पर स्थित घने जंगल की सीध भी दिखाई नहीं दे रही थी। आसमान में पूरा चाँद चमक रहा था, लेकिन बादलों की आवाजाही के कारण उसकी रोशनी बार-बार बुझ-बुझ जाती थी। 
तभी उसकी नज़र नीचे बागीचे पर पड़ी। 
कोहरे की धुंधली परछाइयों के बीच, बागीचे के मुख्य चौराहे पर एक विशाल आकृत खड़ी थी। वह व्लाद था। वह पूरी तरह स्थिर खड़ा था और उसका चेहरा सीधे ऊपर नताशा की खिड़की की तरफ उठा हुआ था। इतनी दूरी और अँधेरे के बावजूद, नताशा को ऐसा लगा मानो व्लाद सीधे उसकी आँखों में झाँक रहा हो। 
नताशा का दिल दहल गया। उसने तुरंत खिड़की का पर्दा वापस गिरा दिया और पीछे हट गई। 
वह बिस्तर पर बैठ गई। उसका दिमाग विचारों के बवंडर में फँसा हुआ था। व्लाद का अस्वाभाविक ठंडा स्पर्श, उसकी लाल होती आँखें, 300 साल पुरानी पेंटिंग में उसका हुबहू चेहरा, और रात में बाहर न निकलने की उसकी चेतावनी—यह सब किसी सामान्य इंसान के लक्षण नहीं थे। लेकिन एक वैज्ञानिक और तार्किक सोच रखने वाली युवती के रूप में, नताशा अपने मन में उठते इन खौफनाक विचारों को स्वीकार करने से डर रही थी। क्या वैम्पायर सच में होते हैं? या फिर वह केवल किसी मनोरोगी के जाल में फँस चुकी थी? 
घड़ी ने रात के बारह बजाए। टंग-टंग की गूँजती आवाज़ के साथ ही पूरे कमरे में अचानक हवा का दबाव बदल गया। 
अंगीठी में जल रही आग अचानक नीली पड़ गई और शांत हो गई। कमरे में ठंडक इतनी बढ़ गई कि नताशा के मुँह से भाप निकलने लगी। 
तभी उसे दरवाजे के बाहर गलियारे में फुसफुसाहट सुनाई दी। ऐसा लगा जैसे कोई बहुत धीमी आवाज़ में उसका नाम पुकार रहा हो... 
"नताशा... नताशा..."
आवाज़ किसी औरत की थी, जो बेहद दर्दनाक और कराहती हुई महसूस हो रही थी। नताशा बिस्तर से उठी। डर के मारे उसके पैर काँप रहे थे, लेकिन उसके अंदर की जिज्ञासा उसे रोक नहीं पाई। वह दबे पाँव दरवाजे की तरफ बढ़ी और अपना कान दरवाजे की लकड़ी से सटा दिया। 
बाहर पैरों की आहट हो रही थी। कोई दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गया था। 
तभी दरवाजे के नीचे की पतली सी झिरी में से काले रंग का धुएँ जैसा कुछ अंदर रिसने लगा। नताशा झटके से पीछे हटी। वह धुआँ धीरे-धीरे कमरे के फर्श पर फैलने लगा और हवा में फिर से वही खून और सूखे गुलाब की गंध भर गई। 
खिड़की के कांच पर बाहर से किसी चीज़ के टकराने की आवाज़ आई—टक! टक! टक!
नताशा ने मुड़कर खिड़की की तरफ देखा। खिड़की के शीशे पर एक विशाल, काला चमगादड़ अपने पंख फैलाए हुए चिपका था। उसकी आँखें अंगारे की तरह लाल चमक रही थीं। वह अपनी तीखी चोंच और पंजों से शीशे को खुरच रहा था, मानो अंदर आने का रास्ता माँग रहा हो। 
नताशा की चीख गले में ही घुट कर रह गई। वह पीछे की तरफ भागी और बिस्तर के पास रखी टेबल लैंप को हाथ में थाम लिया। 
उसी क्षण, कमरे के अंदर मौजूद हवा का रुख बदला और धुएँ की वह परत अचानक गायब हो गई। खिड़की पर बैठा चमगादड़ भी भारी पंख फड़फड़ाता हुआ अँधेरे आसमान में ओझल हो गया। 
सन्नाटा फिर से छा गया, लेकिन यह सन्नाटा सुकून देने वाला नहीं, बल्कि आने वाले भीषण तूफान की दस्तक था। 
नताशा पूरी रात सो नहीं सकी। वह बिस्तर पर बैठी रही, लैंप की रोशनी को अपनी एकमात्र ढाल बनाए हुए। उसे अहसास हो चुका था कि ब्लैकवुड मैनर कोई आम हवेली नहीं है, और मि. व्लाद वोल्कोव कोई आम इंसान नहीं। 
वह इस हवेली के मायाजाल में कदम रख चुकी थी, जहाँ हर गुजरता दिन और हर ढलती रात उसके वजूद को निगलने के लिए तैयार बैठी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह था कि व्लाद ने इस काम के लिए केवल उसे ही क्यों चुना? उस 300 साल पुरानी पेंटिंग वाली महिला और नताशा के बीच क्या रिश्ता था? 
सुबह की पहली किरण जैसे ही खिड़की से छनकर अंदर आई, नताशा ने राहत की साँस ली। उसने तय किया कि वह डरकर भागने के बजाय इस हवेली के सच को सामने लाएगी। उसे सुबह आठ बजे लाइब्रेरी जाना था—वह जगह जहाँ व्लाद के सारे राज़ किताबों के पन्नों के बीच छिपे हुए थे। 
क्रमशः

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
मि. वैम्पायर वांट मी एवरी डे
Chapter
2 of 30
Category
Haunted Places
Reading time
10 min
Words
1825
Language
Hindi (हिंदी)
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