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एपिसोड 7 — असली चेहरा

firoj saifi · Ghost Stories · 29 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
🪞 behind the mirror
Chapter
7 of 8
Category
Ghost Stories
Reading time
29 min
Words
5789
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

एक ऐसा चेहरा, जिसे देखकर इंसान अपनी पहचान खो देता है...

अंधेरा।

इतना गहरा अंधेरा कि Arjun को अपनी साँसों की आवाज़ भी किसी दूसरे इंसान की लग रही थी।

उसके सामने खड़ा वह प्राणी अब उसका चेहरा पहने हुए था।

वही आँखें।

वही नाक।

वही होंठ।

वही माथे पर बचपन का छोटा-सा निशान।

लेकिन एक चीज़ अलग थी।

उसके चेहरे पर मुस्कान थी, जबकि Arjun खुद डर से काँप रहा था।

“तुम कौन हो?” Arjun ने दोबारा पूछा।

प्राणी ने सिर थोड़ा तिरछा किया।

“तुमने सच में मुझे भूल दिया?”

“मैं तुम्हें नहीं जानता!”

“झूठ।”

उसने एक कदम आगे बढ़ाया।

“तुमने मुझे बनाया था।”

अचानक कमरे के सभी टूटे हुए शीशों में रोशनी चमकने लगी।

हर शीशे में Arjun की जिंदगी का कोई न कोई दृश्य दिखाई देने लगा।

उसका बचपन।

उसका स्कूल।

उसकी माँ।

उसका घर।

Aarav के साथ बिताए पल।

लेकिन हर दृश्य में एक छोटी-सी गलती थी।

जहाँ Arjun खड़ा होना चाहिए था, वहाँ कभी कोई खाली जगह होती।

कभी उसकी जगह कोई दूसरा बच्चा दिखाई देता।

और कभी...

उसका चेहरा ही नहीं होता।

Arjun ने एक शीशे की तरफ देखा।

उसमें वह लगभग छह साल का था।

वह अपने कमरे में बैठा खिलौने से खेल रहा था।

पीछे दरवाजा खुला।

एक छोटा लड़का कमरे में आया।

उसने Arjun के कंधे पर हाथ रखा।

Arjun ने उस लड़के की तरफ देखा।

दोनों एक जैसे थे।

लेकिन शीशे के अंदर वाला बच्चा अचानक कैमरे की तरफ मुड़ा।

उसके होंठ हिले।

“भैया, इसे बाहर मत आने देना।”

फिर शीशे के अंदर सब कुछ काला हो गया।

Arjun पीछे हट गया।

“ये क्या है?”

उसके सामने खड़े प्राणी ने जवाब दिया—

“तुम्हारी पहली याद।”

“और वह दूसरा बच्चा?”

“वह तुम्हारी पहली गलती।”

तभी पीछे से लड़की की आवाज़ आई।

“इसकी बात मत सुनना।”

Arjun ने पलटकर देखा।

वह लड़की कमरे के दूसरे छोर पर खड़ी थी।

उसके चेहरे पर डर था।

“ये तुम्हें सच नहीं बताएगा,” उसने कहा।

प्राणी हँस पड़ा।

“और तुम बताओगी?”

लड़की चुप रही।

“बताओगी कि तुम कौन हो?”

वह धीरे-धीरे उसकी तरफ मुड़ा।

“बताओगी कि तुमने कितने चेहरों को अपने अंदर छिपाया है?”

लड़की ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

“चुप हो जाओ।”

“या फिर बताऊँ कि तुमने Devendra के साथ क्या किया था?”

“चुप!”

उसकी चीख से पूरा कमरा काँप गया।

सभी शीशों में एक साथ दरारें पड़ गईं।

और उन दरारों के पीछे से सैकड़ों आवाज़ें आने लगीं।

“हमें बाहर निकालो।”

“हमें याद करो।”

“हम यहाँ हैं।”

“हम अभी भी जिंदा हैं।”

Arjun ने अपने कान ढक लिए।

लेकिन तभी एक आवाज़ बाकी सभी आवाज़ों से अलग सुनाई दी।

वह आवाज़ उसकी माँ की थी।

“Arjun... बेटा... मेरी बात सुनो।”

Arjun की आँखों में आँसू आ गए।

“माँ?”

अंधेरे में उसकी माँ का चेहरा दिखाई दिया।

वह रो रही थी।

“बेटा, अगर तुम मुझे सुन सकते हो, तो उस कमरे का दरवाजा मत खोलना।”

Arjun ने पूछा—

“कौन-सा दरवाजा?”

माँ की आँखें अचानक चौड़ी हो गईं।

“जिसके पीछे तुम्हारे पिता ने तुम्हारा असली चेहरा छिपाया था।”

तभी स्क्रीन जैसी चमकती सतह पर एक लंबा काला हाथ उभरा।

उसने माँ के चेहरे को ढक लिया।

और आवाज़ बंद हो गई।

Arjun चीखा—

“माँ!”

लेकिन वहाँ अब सिर्फ एक खाली शीशा था।

उसमें Arjun का प्रतिबिंब भी नहीं दिखाई दे रहा था।

सिर्फ वही दूसरा चेहरा।

वही मुस्कान।

और वही दो काली आँखें।

“अब समझे?” प्राणी ने कहा।

“तुम्हारी जिंदगी एक कहानी है, Arjun।”

“और उसका लेखक मैं हूँ।”

---

## 1. वह कमरा जहाँ समय मर गया था

Neil ने अपना कैमरा उठाया और उसकी टॉर्च जला दी।

“हम यहाँ खड़े रहकर कुछ नहीं कर पाएँगे। हमें बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ़ना होगा।”

Kabir ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया।

वह कमरे की पिछली दीवार को घूर रहा था।

वहाँ एक लोहे का दरवाजा था, जिस पर सफेद अक्षरों में लिखा था—

**ROOM 00 — ORIGINAL SUBJECT**

Neil ने दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए पूछा, “ये Original Subject क्या है?”

Kabir ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“उधर मत जाना।”

“क्यों?”

“क्योंकि उस कमरे में कोई प्रयोग नहीं हुआ था।”

Neil ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

“तो फिर?”

Kabir ने निगलते हुए कहा—

“वह कमरा प्रयोग से पहले भी था।”

“और उसके अंदर क्या है?”

Kabir की आवाज़ धीमी पड़ गई।

“वह चीज़, जिसकी वजह से बाकी सारे प्रयोग शुरू हुए।”

Arjun ने प्राणी की तरफ देखा।

वह अब भी मुस्कुरा रहा था।

“तुम्हें वहाँ जाना चाहिए,” उसने कहा।

“क्यों?” Arjun ने पूछा।

“क्योंकि तुम्हें अपनी यादें वापस चाहिए।”

“और अगर मैं नहीं गया?”

प्राणी ने कंधे उचकाए।

“तो तुम्हारी माँ तुम्हें हमेशा के लिए भूल जाएगी।”

Arjun का चेहरा बदल गया।

“तुम उसे कुछ नहीं करोगे।”

“मैं?”

प्राणी ने नकली हैरानी दिखाई।

“मैं तो अभी तक तुम्हारी माँ से मिला भी नहीं।”

उसने अपनी उंगली उठाकर छत की तरफ इशारा किया।

“लेकिन जो चीज़ उसके घर में रहती है... वह अब जाग चुकी है।”

Arjun का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“क्या मतलब?”

प्राणी ने कुछ नहीं कहा।

तभी Neil के कैमरे से एक आवाज़ आई।

**बीप।**

स्क्रीन अपने आप चालू हो गई।

उसमें Arjun के घर का दृश्य था।

रात का समय।

उसकी माँ बैठक में बैठी थी।

उसके सामने मेज पर एक पुराना फोटो फ्रेम रखा था।

वह फ्रेम किसी पारिवारिक तस्वीर का था।

लेकिन उसमें सभी चेहरों की जगह खाली सफेद धब्बे थे।

माँ धीरे-धीरे उस तस्वीर को छू रही थी।

फिर उसने सिर उठाकर कैमरे की तरफ देखा।

“तुम आखिर कब लौटोगे, बेटा?”

उसके पीछे दीवार पर लगा बड़ा शीशा धुंधला होने लगा।

शीशे के भीतर कोई खड़ा था।

एक आदमी।

उसकी पीठ कैमरे की तरफ थी।

माँ ने बिना पीछे मुड़े कहा—

“मैं जानती हूँ कि तुम वहाँ हो।”

आदमी धीरे-धीरे पलटा।

उसका चेहरा दिखाई नहीं दिया।

क्योंकि वहाँ चेहरा था ही नहीं।

Arjun की साँस रुक गई।

माँ ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

“अब बाहर आ जाओ।”

Neil ने कैमरा नीचे कर दिया।

“ये लाइव है?”

Kabir ने काँपते हुए जवाब दिया—

“नहीं।”

“फिर ये कैसे दिख रहा है?”

“क्योंकि वह सिर्फ जगहों के बीच यात्रा नहीं करता।”

Kabir ने Arjun की तरफ देखा।

“वह यादों के रास्ते भी यात्रा करता है।”

Arjun ने लोहे के दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया।

“तो फिर हमें जल्दी करनी होगी।”

---

## 2. Room 00

लोहे का दरवाजा खोलते ही एक ठंडी हवा उनके चेहरों से टकराई।

कमरे के अंदर किसी अस्पताल जैसी गंध नहीं थी।

वहाँ गीली मिट्टी, पुराने कागज और जले हुए बालों जैसी बदबू थी।

दीवारों पर कोई शीशा नहीं था।

सिर्फ काली लकड़ी के फ्रेम लगे थे।

हर फ्रेम के भीतर एक पुरानी तस्वीर रखी थी।

पहली तस्वीर में Devendra Sharma जवान दिखाई दे रहा था।

उसके साथ कुछ वैज्ञानिक खड़े थे।

दूसरी तस्वीर में वही लोग एक बड़े शीशे के सामने खड़े थे।

तीसरी तस्वीर में उनमें से आधे लोग गायब थे।

चौथी तस्वीर में केवल Devendra बचा था।

और पाँचवीं तस्वीर...

उसमें Devendra के पीछे Arjun खड़ा था।

Arjun की उम्र लगभग पाँच साल थी।

लेकिन तस्वीर के नीचे लिखी तारीख देखकर उसके हाथ काँपने लगे।

**12 MAY 1989**

Neil ने तारीख पढ़ी।

“ये तो तुम्हारे जन्म से बहुत पहले की है।”

Arjun ने जवाब दिया—

“मेरा जन्म 1998 में हुआ था।”

Kabir ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

“इसका मतलब है कि...”

वह रुक गया।

“इसका मतलब है कि ये तस्वीर नकली है,” Neil ने कहा।

Kabir ने सिर हिलाया।

“नहीं। ये तस्वीर उस समय की है जब इस प्रयोगशाला का पहला रिकॉर्ड बनाया गया था।”

“तो फिर इसमें Arjun कैसे हो सकता है?”

Kabir ने Arjun की तरफ देखा।

“क्योंकि हमने जिस बच्चे को जन्म लेते देखा था, जरूरी नहीं कि वह पहला बच्चा रहा हो।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

Arjun ने तस्वीर को दीवार से उतारा।

पीछे कागज का एक छोटा टुकड़ा चिपका था।

उस पर Devendra की लिखावट थी—

*Subject A: मूल चेहरा।*

*Subject B: प्रतिबिंब।*

*Subject C: स्मृति।*

*Subject D: प्रतिस्थापन।*

*Subject E: द्वार।*

*Subject F: वाहक।*

*Subject G: वापसी।*

और सबसे नीचे एक लाइन थी—

**Subject H: अभी जन्म लेना बाकी है।**

Arjun ने धीरे से कहा—

“आठवाँ चेहरा...”

तभी उसके पीछे दरवाजा बंद हो गया।

**धड़ाम!**

Neil ने तुरंत दरवाजे का हैंडल खींचा।

वह नहीं खुला।

Kabir ने दरवाजे पर जोर से मुक्का मारा।

“खोलो!”

अंदर कहीं से घड़ी चलने की आवाज़ आने लगी।

टिक।

टिक।

टिक।

कमरे के कोने में रखी एक पुरानी घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

फिर एक आवाज़ आई।

“प्रयोग शुरू किया जाए।”

Arjun ने चारों तरफ देखा।

दीवारों के फ्रेम धीरे-धीरे खुलने लगे।

उनके पीछे छोटे-छोटे कमरे दिखाई दिए।

हर कमरे में एक बच्चा बैठा था।

हर बच्चा Arjun जैसा दिखता था।

लेकिन हर बच्चे की आँखों में अलग तरह का डर था।

एक बच्चा रो रहा था।

दूसरा दीवार पर नाखून रगड़ रहा था।

तीसरा लगातार एक ही वाक्य दोहरा रहा था—

“मैं असली हूँ।”

“मैं असली हूँ।”

“मैं असली हूँ।”

Arjun ने अपना सिर पकड़ लिया।

“ये सब कौन हैं?”

Kabir ने फुसफुसाकर कहा—

“तुम्हारे अलग-अलग रूप।”

“मेरे?”

“तुम्हारी यादों से बने रूप।”

एक बच्चे ने अचानक सिर उठाया।

उसने Arjun को देखकर कहा—

“तुम गलत जगह आ गए।”

दूसरे बच्चे ने कहा—

“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

तीसरे ने दीवार पर अपना सिर मारना शुरू कर दिया।

“वह आ रहा है!”

चौथे ने चीखकर कहा—

“अपना चेहरा छिपाओ!”

फिर सभी बच्चे एक साथ चिल्लाने लगे।

“वह आ रहा है!”

“वह आ रहा है!”

“वह आ रहा है!”

कमरे की रोशनी बुझ गई।

और अंधेरे में किसी के छोटे-छोटे कदम सुनाई देने लगे।

---

## 3. वह बच्चा जो कभी बड़ा नहीं हुआ

टॉर्च की रोशनी में एक छोटा लड़का दिखाई दिया।

लगभग सात साल का।

सफेद कमीज।

काली निकर।

नंगे पैर।

उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।

Arjun धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने जवाब नहीं दिया।

“क्या तुम मुझे जानते हो?”

बच्चे ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसका चेहरा देखकर Arjun पीछे हट गया।

वह चेहरा...

उसके बचपन का चेहरा था।

लेकिन उसकी आँखों के नीचे काले गड्ढे थे और होंठों पर सूखा खून लगा था।

“तुम आखिर आ ही गए,” बच्चे ने कहा।

Arjun ने पूछा, “तुम कौन हो?”

बच्चे ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“मैं पहला हूँ।”

“पहला कौन?”

“पहला Arjun।”

Neil ने हैरानी से कहा, “ये कैसे संभव है?”

बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें भी तो अपनी यादें उधार मिली हैं।”

Neil की मुस्कान गायब हो गई।

“क्या?”

बच्चा उसके करीब आया।

“तुम्हें याद है कि तुम पहली बार Arjun से कहाँ मिले थे?”

Neil ने जवाब देना चाहा।

लेकिन वह रुक गया।

उसकी आँखों में उलझन फैलने लगी।

“हम... कॉलेज में मिले थे।”

बच्चे ने पूछा—

“किस कॉलेज में?”

Neil ने अपना माथा दबाया।

“मैं...”

उसकी साँसें तेज हो गईं।

“मुझे याद नहीं।”

बच्चा मुस्कुराया।

“क्योंकि वह याद तुम्हारी थी ही नहीं।”

Neil पीछे हट गया।

“ये झूठ है।”

“तुम्हारी पहली तस्वीर कहाँ खींची गई थी?”

“मुझे नहीं पता।”

“तुम्हारे पिता का नाम क्या था?”

Neil चुप हो गया।

उसने आँखें बंद कर लीं।

“मुझे... मुझे याद नहीं।”

उसके कैमरे की स्क्रीन पर अचानक एक तस्वीर चमकी।

एक अस्पताल का कमरा।

एक नवजात बच्चा।

और उसके पास खड़ी एक नर्स।

तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी।

**2:13 AM**

Neil ने काँपते हुए कैमरा गिरा दिया।

“नहीं...”

Arjun ने उसका कंधा पकड़ा।

“Neil, मेरी तरफ देखो।”

लेकिन Neil अब उसे पहचान नहीं रहा था।

“तुम कौन हो?”

“मैं Arjun हूँ।”

Neil की आँखों में डर भर गया।

“नहीं।”

उसने अपना सिर हिलाया।

“Arjun तो...”

वह अचानक चुप हो गया।

बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

“Arjun तो कभी पैदा ही नहीं हुआ।”

फिर बच्चे ने एक उंगली अपने होंठों पर रखी।

“श्श्श।”

“अब उसे सुनाई देगा।”

कमरे की दीवारों के पीछे से एक लंबी, गहरी साँस सुनाई दी।

जैसे कोई विशाल प्राणी लकड़ी के दरवाजे के दूसरी तरफ खड़ा हो।

फिर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

**ठक।**

**ठक।**

**ठक।**

हर चोट के साथ कमरा थोड़ा और ठंडा होता गया।

बच्चे ने Arjun का हाथ पकड़ लिया।

“अब तुम्हें अपनी पहली याद देखनी होगी।”

---

## 4. जन्म से पहले की याद

कमरे के बीचोंबीच अचानक एक गोल रोशनी दिखाई दी।

उस रोशनी में धीरे-धीरे एक अस्पताल का दृश्य उभरने लगा।

एक महिला प्रसव पीड़ा से गुजर रही थी।

उसके पास Devendra खड़ा था।

लेकिन यह Arjun की माँ नहीं थी।

उस महिला का चेहरा धुंधला था।

उसके हाथ में एक छोटा-सा कागज था।

Devendra ने नर्स से कहा—

“बच्चे को बाहर ले जाओ।”

नर्स ने नवजात को उठाया।

बच्चा रो नहीं रहा था।

उसकी आँखें खुली थीं।

और वह सीधे छत की तरफ देख रहा था।

Devendra ने उसे देखा तो उसके चेहरे पर खुशी नहीं, डर दिखाई दिया।

“ये जीवित है?”

नर्स ने सिर हिलाया।

“हाँ, डॉक्टर।”

Devendra पीछे हट गया।

“नहीं... ये नहीं हो सकता।”

अचानक बच्चे ने रोना शुरू कर दिया।

लेकिन रोने की आवाज़ नवजात जैसी नहीं थी।

वह किसी वयस्क आदमी की हँसी जैसी लग रही थी।

कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।

जब रोशनी वापस आई, तो बिस्तर पर दो बच्चे थे।

दोनों एक जैसे।

नर्स चीख पड़ी।

Devendra ने एक बच्चे को उठाया।

दूसरे बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

फिर बोला—

“मुझे वापस कर दो।”

Devendra के हाथ काँपने लगे।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने जवाब दिया—

“तुमने ही तो मुझे बुलाया था।”

दृश्य अचानक टूट गया।

Arjun घुटनों के बल गिर पड़ा।

उसके सिर में तेज दर्द होने लगा।

उसे अपने जन्म की याद नहीं थी।

लेकिन उस दृश्य के दौरान उसे एक अजीब-सी अनुभूति हुई थी।

जैसे वह वहाँ मौजूद था।

जैसे उसने वह सब अपनी आँखों से देखा था।

जैसे वह उन दोनों बच्चों में से एक था।

“मैं कौन हूँ?” उसने फुसफुसाकर पूछा।

बच्चा उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।

“तुम वह हो जिसे बाहर भेज दिया गया।”

“और दूसरा बच्चा?”

बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।

“वह यहीं रह गया।”

“कहाँ?”

बच्चे ने कमरे की दीवारों की तरफ देखा।

“तुम्हारे अंदर।”

Arjun ने सिर उठाया।

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

बच्चे ने अपने सीने पर हाथ रखा।

“मैं वह हूँ जो तुम्हारे अंदर सोता रहा।”

फिर उसने अपनी उंगली Arjun के सीने पर रख दी।

“और अब वह जाग चुका है।”

उसी क्षण Arjun की छाती के भीतर कुछ हिला।

जैसे उसके दिल के पीछे कोई दूसरा दिल धड़क रहा हो।

धक।

धक।

धक।

Arjun चीख पड़ा।

उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

और जब उसने फिर आँखें खोलीं...

तो वह अकेला था।

कमरा खाली था।

बच्चा गायब था।

Neil भी गायब था।

Kabir भी।

सिर्फ दीवार पर एक नया वाक्य लिखा था—

**एक शरीर। दो चेहरे। एक ही जिंदगी।**

---

## 5. Kabir का अपराध

दूसरी तरफ Kabir एक संकरे गलियारे में भाग रहा था।

उसके पीछे Neil था।

लेकिन Neil अब वैसा नहीं दिख रहा था।

उसका चेहरा बिल्कुल सामान्य था, मगर उसकी आँखें लगातार बदल रही थीं।

कभी वे Neil की आँखें बन जातीं।

कभी किसी बूढ़े आदमी की।

कभी किसी छोटे बच्चे की।

Kabir ने दौड़ते हुए पूछा—

“तुम्हारे साथ क्या हो रहा है?”

Neil ने जवाब दिया—

“मुझे याद आ गया।”

“क्या?”

“पहली बार जब मैं Arjun से मिला था।”

Kabir ने राहत की साँस ली।

“अच्छा है। हमें Arjun को ढूँढ़ना चाहिए।”

Neil रुक गया।

“मैंने उससे कभी मुलाकात नहीं की थी।”

Kabir ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“मैं उसे जानता था, लेकिन उससे कभी मिला नहीं था।”

Neil की आँखों में आँसू आ गए।

“मुझे उसके बारे में सारी जानकारी किसी ने दी थी। उसकी तस्वीरें, उसकी जिंदगी, उसका परिवार... सब कुछ।”

Kabir ने सिर हिलाया।

“यह संभव नहीं है।”

Neil ने अपने कैमरे को देखा।

“मेरे कैमरे में उसकी तस्वीरें तब से मौजूद हैं जब मैं दस साल का था।”

उसने एक पुरानी तस्वीर निकाली।

उसमें दस साल का Neil एक स्कूल के मैदान में खड़ा था।

उसके पीछे एक लड़का दिखाई दे रहा था।

Arjun।

उसी उम्र का Arjun।

लेकिन तस्वीर के पीछे लिखी तारीख थी—

**2004**

Neil का जन्म प्रमाणपत्र 1997 की तारीख बताता था।

उसके हिसाब से उस समय वह सात साल का था।

फिर भी उसे तस्वीर में दिखाई दे रहा मैदान याद नहीं था।

“मुझे ये जगह याद नहीं,” उसने कहा।

Kabir ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

फिर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“मैं इस जगह को जानता हूँ।”

“कहाँ है?”

Kabir ने धीरे से जवाब दिया—

“Devendra की पहली प्रयोगशाला।”

Neil ने उसकी तरफ देखा।

“तुम वहाँ थे?”

Kabir ने आँखें बंद कर लीं।

“हाँ।”

“तब क्या हुआ था?”

काफी देर तक Kabir कुछ नहीं बोला।

फिर उसने कहा—

“उस दिन सात बच्चे लाए गए थे।”

“किसलिए?”

“उनकी याददाश्त पर प्रयोग करने के लिए।”

“और Arjun?”

Kabir ने सिर झुका लिया।

“वह उनमें से एक था।”

Neil ने तस्वीर फिर देखी।

“लेकिन Arjun तो वहाँ मौजूद था जब मैं सात साल का था।”

Kabir ने धीमे स्वर में कहा—

“क्योंकि इस जगह में उम्र हमेशा आगे नहीं बढ़ती।”

Neil का चेहरा बदल गया।

“और बाकी छह बच्चे?”

Kabir ने जवाब देने के बजाय अपने हाथ की तरफ देखा।

उसकी हथेली पर काले रंग का एक निशान उभर रहा था।

गोल निशान।

उसी दरवाजे जैसा।

Neil ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“ये क्या है?”

Kabir ने डरकर हाथ पीछे खींचा।

“नहीं...”

“क्या हुआ?”

Kabir ने फुसफुसाकर कहा—

“वह मुझे पहचान गया।”

“कौन?”

गलियारे की बत्तियाँ एक-एक करके बुझने लगीं।

दूर से किसी के कदमों की आवाज़ आई।

धीरे-धीरे।

भारी।

घसीटते हुए।

Kabir ने Neil को दीवार के पीछे धकेला।

“जो भी हो, आवाज़ मत करना।”

कदम उनके पास आकर रुक गए।

अंधेरे से एक आवाज़ आई—

“कबीर साहब।”

Kabir ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया।

आवाज़ फिर आई।

“आपने मुझे बहुत लंबे समय तक बंद रखा।”

फिर किसी ने धीरे से हँसते हुए कहा—

“अब मेरी बारी है।”

---

## 6. माँ के घर में दूसरा मेहमान

उसी समय Arjun की माँ अपने घर में अकेली बैठी थी।

घड़ी में 2:13 बज रहे थे।

उसके सामने मेज पर तीन कप रखे थे।

एक उसका।

एक Aarav का।

और तीसरा...

उस व्यक्ति का, जिसे वह हर रात अपने सपनों में देखती थी।

उसने तीसरे कप में चाय डाली।

“तुम फिर देर से आए।”

शीशे के अंदर खड़ा लंबा प्राणी चुप रहा।

माँ ने अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई।

“मैंने तुम्हारी बात मान ली है।”

प्राणी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

“अच्छा।”

“लेकिन अब मुझे मेरा बेटा वापस चाहिए।”

“कौन-सा बेटा?”

माँ की आँखें भर आईं।

“Arjun।”

प्राणी ने अपना हाथ शीशे पर रखा।

“तुम्हारे कितने बेटे हैं?”

“दो।”

“क्या तुम्हें उनके चेहरे याद हैं?”

माँ ने तुरंत जवाब दिया—

“हाँ।”

“तो बताओ, Arjun की आँखें कैसी हैं?”

माँ ने बिना सोचे कहा—

“भूरी।”

शीशे के अंदर का प्राणी मुस्कुराया।

“गलत।”

माँ चुप हो गई।

“उसकी आँखें नीली थीं।”

“नहीं।”

“तुम्हें याद नहीं।”

“मुझे याद है!”

प्राणी ने अपना चेहरा शीशे के करीब किया।

“तो फिर बताओ, उसके माथे पर निशान किस तरफ है?”

माँ ने अपने माथे पर हाथ रखा।

उसकी आँखों के सामने Arjun का चेहरा आया।

लेकिन कुछ ही पल बाद वह चेहरा धुंधला होने लगा।

माँ ने जोर से आँखें बंद कर लीं।

“नहीं।”

उसने मेज को पकड़ लिया।

“मैं अपने बेटे को नहीं भूलूँगी।”

प्राणी ने कहा—

“तुम पहले ही भूल चुकी हो।”

माँ के सामने रखे तीन कप अचानक टूट गए।

**छन्न!**

उसने चीखकर पीछे देखा।

बैठक के दरवाजे पर Aarav खड़ा था।

वह थका हुआ दिखाई दे रहा था।

उसके कपड़े गंदे थे।

हाथ पर चोट लगी थी।

लेकिन वह मुस्कुरा रहा था।

“माँ।”

माँ दौड़कर उसके पास गई।

“बेटा!”

उसने Aarav को गले लगा लिया।

“तुम कहाँ थे?”

Aarav ने उसके कंधे पर सिर रख दिया।

“बहुत दूर।”

“Arjun कहाँ है?”

Aarav की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

“कौन Arjun?”

माँ पीछे हट गई।

“तुम्हारा भाई।”

Aarav ने उसे देखा।

फिर उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति आ गई।

“माँ, आपका कोई दूसरा बेटा नहीं है।”

माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

“तुम ऐसा क्यों बोल रहे हो?”

Aarav ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि अब आपको सिर्फ एक बेटे की जरूरत है।”

माँ ने उसका हाथ छोड़ दिया।

“तुम Aarav नहीं हो।”

कमरे में खामोशी छा गई।

Aarav ने धीरे से अपना सिर झुकाया।

फिर उसकी गर्दन से एक चरमराहट की आवाज़ आई।

उसने सिर उठाया।

अब उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

“आपको इतनी देर से समझ आया?”

माँ चीख पड़ी।

Aarav ने अपना हाथ बढ़ाया।

“चिंता मत करो।”

उसके चेहरे पर फिर वही मुस्कान आ गई।

“मैं आपको कुछ नहीं करूँगा।”

वह धीरे-धीरे उसके करीब आया।

“मुझे सिर्फ आपकी एक याद चाहिए।”

माँ ने पीछे हटते हुए पूछा—

“कौन-सी याद?”

Aarav ने फुसफुसाकर कहा—

“जिस दिन आपने मुझे जन्म दिया था।”

माँ का मुँह खुला रह गया।

और उसी पल घर की सारी तस्वीरों से एक-एक करके चेहरे गायब होने लगे।

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## 7. असली Aarav

Arjun जब दोबारा होश में आया, तो वह एक पुराने बिस्तर पर लेटा हुआ था।

उसके हाथ-पैर ठंडे थे।

सिर के ऊपर एक पीली लाइट टिमटिमा रही थी।

उसने उठने की कोशिश की, लेकिन उसकी कलाई किसी चीज़ से बँधी हुई थी।

उसने नीचे देखा।

लोहे की जंजीरें।

सामने काँच की दीवार।

और उस दीवार के पीछे एक छोटा कमरा।

कमरे में Aarav बैठा था।

उसके हाथ घुटनों पर रखे थे।

चेहरा नीचे झुका हुआ था।

Arjun ने जोर से पुकारा—

“Aarav!”

Aarav ने सिर उठाया।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“भैया...”

Arjun जंजीरें खींचने लगा।

“तुम वहाँ कैसे पहुँचे?”

Aarav ने काँच पर हाथ रखा।

“मुझे यहाँ से निकालो।”

“मैं कोशिश कर रहा हूँ।”

“नहीं, भैया।”

Aarav ने सिर हिलाया।

“आपको समझना होगा।”

“क्या?”

“मैं बाहर नहीं आया था।”

Arjun की साँस रुक गई।

“क्या मतलब?”

Aarav ने काँपते हुए कहा—

“जो आपके साथ बाहर गया था... वह मैं नहीं था।”

Arjun के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“फिर वह कौन था?”

Aarav ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

“वह मेरा चेहरा पहने हुए था।”

Arjun ने जंजीरों को पूरी ताकत से खींचा।

“तो फिर तुम यहाँ कैसे हो?”

Aarav ने धीरे से जवाब दिया—

“क्योंकि असली Aarav कभी बाहर आया ही नहीं।”

उसने काँच पर अपनी हथेली रख दी।

“भैया, आप मेरी बात सुन रहे हैं?”

“हाँ!”

“आपको याद है, बचपन में जब मुझे अँधेरे से डर लगता था, तो आप क्या करते थे?”

Arjun चुप हो गया।

उसे याद नहीं था।

Aarav की आँखों में दर्द उभर आया।

“आप कहते थे कि अगर मैं डरूँ, तो तीन बार आपका नाम पुकारूँ।”

Arjun ने अपना सिर पकड़ लिया।

“मुझे याद नहीं...”

Aarav रोने लगा।

“आपने मुझे वादा किया था कि मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।”

Arjun की आँखों से आँसू बहने लगे।

“मुझे माफ कर दो।”

Aarav ने सिर हिलाया।

“आपकी गलती नहीं है।”

उसने काँच के पास अपना चेहरा लाया।

“लेकिन अब आपके पास सिर्फ एक मौका है।”

“कौन-सा मौका?”

Aarav ने पीछे की दीवार की तरफ इशारा किया।

वहाँ एक छोटा दरवाजा था।

उस पर लिखा था—

**MEMORY EXTRACTION**

Aarav ने कहा—

“उस दरवाजे के पीछे आपकी पहली याद है।”

“और अगर मैं उसे ढूँढ़ लूँ?”

“तो आप जान जाएँगे कि हम दोनों में से असली कौन है।”

Arjun ने पूछा—

“और अगर मैं गलत निकला?”

Aarav की आँखें अचानक डर से भर गईं।

“तो आप अपनी जगह हमेशा के लिए उसे दे देंगे।”

तभी कमरे की लाइट बंद हो गई।

काँच की दीवार पर एक लंबी परछाई उभरी।

वह परछाई Arjun के पीछे खड़ी थी।

Arjun ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

वही प्राणी।

Arjun का चेहरा।

Arjun की मुस्कान।

वह उसके कान के पास झुका और फुसफुसाया—

“तुम्हारा भाई झूठ बोल रहा है।”

Arjun ने आँखें बंद कर लीं।

“तुम भी झूठ बोल रहे हो।”

प्राणी हँसा।

“बिल्कुल।”

फिर उसने Arjun के कान में कहा—

“लेकिन इस बार... मैं तुम्हें सच भी बताऊँगा।”

उसने काँच की दीवार पर हाथ रखा।

Aarav के कमरे में दरारें फैलने लगीं।

“तुम दोनों में से कोई भी असली नहीं है।”

Arjun ने उसकी तरफ देखा।

प्राणी ने मुस्कुराकर कहा—

“क्योंकि असली बच्चा तो जन्म के समय ही मर गया था।”

---

## 8. वह फाइल जो कभी नहीं खोली गई

अचानक कमरे में तेज अलार्म बजने लगा।

लाल बत्तियाँ चमकने लगीं।

दीवार के पीछे से किसी मशीन के चलने की आवाज़ आई।

प्राणी ने पहली बार अपना सिर उठाकर छत की तरफ देखा।

उसकी मुस्कान गायब हो गई।

“नहीं।”

उसने पीछे हटते हुए कहा—

“यह अभी नहीं हो सकता।”

काँच की दीवार के पीछे Aarav ने मौका देखकर अपने कमरे का दरवाजा खोल दिया।

वह बाहर भागा और Arjun के पास आया।

उसने जंजीरों को खोलने के लिए पास रखी एक लोहे की छड़ उठाई।

“भैया, जल्दी!”

जंजीर टूट गई।

Arjun बिस्तर से नीचे उतरा।

दोनों दरवाजे की तरफ भागे।

लेकिन जैसे ही वे गलियारे में पहुँचे, सामने Kabir दिखाई दिया।

उसके कपड़ों पर खून लगा था।

चेहरा पीला पड़ चुका था।

उसने Arjun को देखकर कहा—

“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

Arjun ने उसका कॉलर पकड़ लिया।

“मुझे सब कुछ जानना है!”

Kabir ने सिर हिलाया।

“ठीक है।”

उसने अपनी जेब से एक पुरानी फाइल निकाली।

उसके ऊपर लिखा था—

**PROJECT MIRROR — FINAL REPORT**

Kabir ने फाइल Arjun को दे दी।

“तुम्हारे पिता ने ये रिपोर्ट अपनी मौत से पहले लिखी थी।”

Arjun ने पहला पन्ना खोला।

उसमें सात बच्चों की तस्वीरें थीं।

हर बच्चे के नीचे एक नाम लिखा था।

पहला बच्चा—Arjun।

दूसरा बच्चा—Aarav।

तीसरा बच्चा—Neil।

चौथा बच्चा—एक अज्ञात नाम।

पाँचवाँ बच्चा—एक अज्ञात नाम।

छठा बच्चा—एक अज्ञात नाम।

सातवाँ बच्चा—एक अज्ञात नाम।

Arjun ने Neil की तस्वीर को देखा।

“Neil भी प्रयोग का हिस्सा था?”

Kabir ने कहा—

“हममें से कोई भी अपनी यादों का पूरा मालिक नहीं है।”

Arjun ने अगले पन्ने पर नजर डाली।

वहाँ एक चित्र बना था।

एक इंसानी चेहरा।

उसके भीतर दो छोटे चेहरे।

और उनके पीछे एक काला दरवाजा।

चित्र के नीचे लिखा था—

*एक शरीर में दो चेतनाएँ स्थिर नहीं रह सकतीं।*

*जब तक दोनों में से एक दूसरे को स्वीकार न कर ले, चक्र पूरा नहीं होगा।*

अगली लाइन ने Arjun के हाथ ठंडे कर दिए।

*वास्तविक Subject H किसी बच्चे का प्रतिबिंब नहीं है।*

*वह वह चेतना है जो जन्म और मृत्यु के बीच की जगह में फँसी हुई है।*

*उसे शरीर नहीं चाहिए।*

*उसे पहचान चाहिए।*

Arjun ने पन्ना पलटा।

आखिरी पन्ने पर Devendra की लिखावट थी—

**अगर मेरा बेटा यह पढ़ रहा है, तो समझ लेना कि मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।**

**लेकिन मैं यह तय नहीं कर पाया कि किस बेटे को बचाना चाहिए।**

नीचे एक और लाइन लिखी थी।

**क्योंकि जिस रात तुम दोनों पैदा हुए थे, उस रात तीसरा बच्चा भी पैदा हुआ था।**

Arjun ने सिर उठाया।

“तीसरा बच्चा?”

Kabir ने धीरे से कहा—

“हाँ।”

“वह कहाँ है?”

Kabir ने जवाब देने के लिए मुँह खोला।

लेकिन उससे पहले गलियारे के अंत से एक आवाज़ आई।

“मैं यहीं हूँ।”

सभी ने पलटकर देखा।

वहाँ एक छोटा बच्चा खड़ा था।

उसका चेहरा Arjun जैसा था।

Aarav जैसा था।

और उस faceless creature जैसा भी।

वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा।

“आप लोगों ने मुझे बहुत देर तक इंतज़ार कराया।”

Arjun पीछे हट गया।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने मासूमियत से मुस्कुराकर कहा—

“मैं तीसरा बेटा हूँ।”

फिर उसने अपनी उंगली Arjun की तरफ उठाई।

“और आज रात...”

उसकी आँखों में काला अंधेरा फैल गया।

“आप दोनों में से एक को मेरी जगह लेनी होगी।”

---

## 9. तीसरे बच्चे की शर्त

गलियारे की दीवारें सिकुड़ने लगीं।

छत नीचे आने लगी।

Neil कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

Kabir ने Arjun और Aarav को अपने पीछे कर लिया।

“इसकी बात मत सुनना।”

बच्चे ने हँसकर कहा—

“आप हर बार यही कहते हैं, Kabir अंकल।”

Kabir का चेहरा बदल गया।

“तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”

बच्चे ने जवाब दिया—

“क्योंकि आप ही तो मुझे गोद में उठाकर पहली बार उस कमरे तक ले गए थे।”

Kabir की आँखों में आँसू भर आए।

“मैंने तुम्हें नहीं उठाया था।”

“उठाया था।”

“नहीं!”

बच्चा उसके करीब आया।

“आपने मुझे कहा था कि सब ठीक हो जाएगा।”

Kabir पीछे हट गया।

बच्चे ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

“फिर आपने दरवाजा बंद कर दिया।”

Kabir घुटनों के बल गिर पड़ा।

“मैं मजबूर था...”

“हर कोई मजबूर था।”

बच्चे की आवाज़ अचानक बदल गई।

अब वह किसी छोटे बच्चे की आवाज़ नहीं थी।

वह आवाज़ बूढ़ी थी।

गहरी थी।

और उसमें ऐसी ठंडक थी कि Arjun को लगा उसकी हड्डियाँ जम जाएँगी।

“Devendra ने मुझे बनाया।”

“तुम्हारी माँ ने मुझे भुलाया।”

“तुम्हारे भाई ने मुझे कैद किया।”

फिर उसने Arjun की तरफ देखा।

“और तुमने मुझे अपना चेहरा दिया।”

Arjun ने सिर हिलाया।

“मैंने कुछ नहीं किया।”

बच्चे ने कहा—

“तुमने मुझे जन्म दिया, Arjun।”

उसने अपने सीने पर हाथ रखा।

“जब तुमने पहली बार आईने में अपना प्रतिबिंब देखा था, उसी पल मैं पैदा हुआ।”

“लेकिन तुम मेरे जैसे क्यों दिखते हो?”

बच्चा मुस्कुराया।

“क्योंकि तुमने खुद को कभी सच में नहीं देखा।”

फिर उसने अपनी हथेली खोल दी।

उसमें एक छोटी चाबी रखी थी।

“Memory Extraction का दरवाजा खोलो।”

Arjun ने चाबी की तरफ देखा।

“और उसके पीछे क्या है?”

बच्चे ने कहा—

“तुम्हारी असली जिंदगी।”

“अगर मैं दरवाजा खोल दूँ?”

“तो तुम्हें अपनी पहचान मिल जाएगी।”

“और अगर नहीं खोला?”

बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।

“तो तुम्हारी माँ आज रात मर जाएगी।”

Arjun ने चाबी छीन ली।

“मैं तुम्हें रोकूँगा।”

बच्चे ने कोई विरोध नहीं किया।

उसने सिर्फ इतना कहा—

“तुम मुझे रोक नहीं सकते।”

फिर वह पीछे मुड़ा और अंधेरे में चलने लगा।

कुछ कदम बाद वह रुका।

“वैसे, Arjun...”

Arjun ने उसकी तरफ देखा।

बच्चा मुस्कुराया।

“तुम्हारी माँ अभी अपने कमरे में अकेली नहीं है।”

---

## 10. दरवाजे के पीछे

Arjun, Aarav और Kabir तेजी से गलियारे के अंत की तरफ भागे।

वहाँ एक बड़ा लोहे का दरवाजा था।

उसके बीच में गोल ताला लगा था।

Arjun ने चाबी उसमें डाली।

ताला खुल गया।

दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

अंदर एक छोटा कमरा था।

कमरे में कोई मशीन नहीं थी।

कोई वैज्ञानिक उपकरण नहीं।

सिर्फ एक लकड़ी का पालना।

उसके पास एक कुर्सी।

और दीवार पर लगा एक शीशा।

Arjun धीरे-धीरे पालने के पास गया।

उसमें एक पुराना कंबल रखा था।

उसने कंबल उठाया।

नीचे एक अस्पताल का पहचान-पत्र था।

उस पर लिखा था—

**शिशु: Arjun Sharma**

**जन्म: 12 मई 1998**

**स्थिति: मृत घोषित**

Arjun के हाथ काँपने लगे।

“नहीं...”

उसने पहचान-पत्र को फिर देखा।

उसके नीचे एक दूसरा कार्ड था।

**शिशु: Aarav Sharma**

**जन्म: 12 मई 1998**

**स्थिति: जीवित**

और तीसरा कार्ड...

उस पर कोई नाम नहीं था।

सिर्फ एक शब्द लिखा था—

**RETURNED**

Arjun ने पीछे मुड़कर Aarav को देखा।

Aarav की आँखों से आँसू बह रहे थे।

“भैया...”

Arjun ने पूछा—

“क्या ये सच है?”

Aarav ने सिर झुका लिया।

“मुझे नहीं पता।”

“तुम्हें कुछ तो याद होगा!”

Aarav ने अपना सिर पकड़ लिया।

“मुझे सिर्फ इतना याद है कि माँ हमें दोनों को गोद में लेकर रो रही थी।”

“और तीसरा बच्चा?”

Aarav ने धीरे से कहा—

“वह माँ की गोद में नहीं था।”

Arjun ने शीशे की तरफ देखा।

उसमें एक महिला दिखाई दे रही थी।

उसकी माँ।

वह अस्पताल के बिस्तर पर बैठी थी।

उसकी गोद में एक बच्चा था।

वह बच्चे के माथे को चूम रही थी।

उसके पास Devendra खड़ा था।

उसके चेहरे पर आँसू थे।

Devendra ने बच्चे को देखा और कहा—

“मैं तुम्हें बचाऊँगा।”

फिर उसने शीशे के भीतर किसी अदृश्य व्यक्ति से कहा—

“चाहे मुझे अपने दूसरे बेटे को खोना पड़े।”

दृश्य बदल गया।

Devendra एक बच्चे को उठाकर एक काले दरवाजे की तरफ जा रहा था।

उसके पीछे एक और बच्चा रो रहा था।

माँ दोनों बच्चों को पुकार रही थी।

“उन्हें अलग मत करो!”

लेकिन Devendra दरवाजे के भीतर चला गया।

दरवाजा बंद हो गया।

और शीशे के भीतर माँ की चीख गूँजती रही।

Arjun पीछे हट गया।

“मेरे पिता ने हममें से किसी एक को वहाँ छोड़ दिया था।”

Aarav ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“लेकिन किसे?”

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

अचानक कमरे के बाहर से Neil की आवाज़ आई।

“Arjun!”

वह दरवाजे पर खड़ा था।

उसके हाथ में कैमरा था।

“मुझे सब याद आ गया!”

Arjun उसकी तरफ बढ़ा।

“क्या?”

Neil ने कैमरा चालू किया।

स्क्रीन पर एक पुरानी रिकॉर्डिंग दिखाई दी।

Devendra कैमरे के सामने बैठा था।

उसने सीधे लेंस की तरफ देखा और कहा—

“अगर तुम यह रिकॉर्डिंग देख रहे हो, तो इसका मतलब है कि तीसरा बच्चा बाहर आ चुका है।”

Devendra ने लंबी साँस ली।

“वह Arjun नहीं है।”

“वह Aarav भी नहीं है।”

फिर उसने कैमरे के पास झुककर फुसफुसाया—

“**वह मैं हूँ।**”

रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

कमरे में पूर्ण खामोशी छा गई।

Arjun ने धीरे से सिर उठाया।

उसकी नजर शीशे पर पड़ी।

शीशे में अब कोई प्रतिबिंब नहीं था।

सिर्फ Devendra खड़ा था।

वह मुस्कुरा रहा था।

और उसके पीछे...

तीसरा बच्चा।

उसने अपना हाथ उठाया।

शीशे के भीतर से एक उंगली बाहर निकली।

फिर दूसरी।

फिर पूरा हाथ।

Arjun पीछे हटने लगा।

लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

उस हाथ ने उसकी कलाई पकड़ ली।

और उसे शीशे की तरफ खींचने लगा।

Aarav ने Arjun का दूसरा हाथ पकड़ लिया।

“भैया!”

Neil और Kabir भी उसे खींचने लगे।

लेकिन शीशे के भीतर से आती ताकत बढ़ती जा रही थी।

Arjun ने पूरी ताकत से चीखते हुए कहा—

“मुझे छोड़ना मत!”

Aarav ने रोते हुए जवाब दिया—

“कभी नहीं!”

तभी शीशे के अंदर से एक आवाज़ आई।

वह Devendra की आवाज़ थी।

“मुझे माफ कर देना, बेटा।”

Arjun ने शीशे की तरफ देखा।

Devendra की आँखों में आँसू थे।

“मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।”

Arjun चीखा—

“तो फिर मुझे अंदर क्यों भेजा?”

Devendra ने सिर झुका लिया।

“क्योंकि उस रात...”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मैंने गलत बच्चे को बाहर निकाल लिया था।”

अचानक शीशा फट गया।

एक तेज सफेद रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।

Arjun की पकड़ छूट गई।

Aarav पीछे गिर पड़ा।

Neil की टॉर्च टूट गई।

Kabir की चीख सुनाई दी।

और फिर...

सब कुछ शांत हो गया।

---

## अंतिम दृश्य — असली Arjun कौन है?

सुबह के पाँच बज रहे थे।

एक सुनसान सड़क पर एक आदमी धीरे-धीरे चल रहा था।

उसके कपड़े गंदे थे।

चेहरे पर खून लगा था।

वह सड़क के किनारे रुककर एक दुकान के शीशे में देखने लगा।

उसने अपना चेहरा छुआ।

“मैं Arjun हूँ।”

उसने खुद से कहा।

“मैं Arjun Sharma हूँ।”

शीशे में उसका प्रतिबिंब मुस्कुराया।

लेकिन वह खुद नहीं मुस्कुराया था।

प्रतिबिंब ने धीरे से अपना हाथ उठाया।

फिर शीशे पर उंगली से लिखा—

**तुम्हें किसने बताया?**

आदमी पीछे हट गया।

“नहीं...”

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

“मैं असली हूँ।”

प्रतिबिंब ने अपना मुँह खोला।

उसके अंदर कोई जीभ नहीं थी।

कोई दाँत नहीं थे।

सिर्फ एक गहरा अंधेरा था।

उस अंधेरे के भीतर से तीन बच्चों की आवाज़ें एक साथ आईं—

“एक शरीर।”

“दो चेहरे।”

“तीन जन्म।”

फिर शीशे पर आखिरी वाक्य उभरा—

**और चौथा अभी पैदा होना बाकी है।**

आदमी ने डरकर पीछे देखा।

सड़क के दूसरी तरफ एक गर्भवती महिला खड़ी थी।

वह उसे देखकर मुस्कुराई।

फिर उसने अपने पेट पर हाथ रखा।

अंदर से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी।

महिला ने धीरे से कहा—

“हम फिर मिलेंगे, Arjun।”

और अगले ही पल सड़क खाली हो गई।

सिर्फ दुकान के शीशे पर एक नया निशान रह गया।

एक गोल निशान।

उसके बीच में लिखा था—

**08**

फिर एक दूसरा निशान उभरा।

**09**

और उसके नीचे...

**10**

दूर कहीं एक घड़ी ने 2:13 बजने की आवाज़ दी।

**टन।**

**टन।**

**टन।**

**एपिसोड 7 समाप्त।**

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